जीना इसी का नाम है / शौर्यपथ / साल 2005 की बात है। जबर्दस्त बारिश ने करोड़ों भारतीयों के ख्वाबों के शहर को जैसे अचानक बेपरदा कर दिया था। कहां तो रंग-बिरंगी रोशनी में डूबी उसकी मादक रातें दुनिया भर के लोगों को ललचाया करती थीं, और कहां वह बजबजाती हुई सुबह! मुंबइकर उस रोज अपने शहर पर किसी सूरत नाज नहीं कर पा रहे थे। मीठी नदी समेत तमाम नालियों ने जैसे सारी गंदगी सागर से उधार मांग ली थी। शहर की हर सड़क पर इंसानी खुदगर्जी सड़ांध मार रही थी।
अफरोज शाह की उम्र तब 22 साल थी, और हर संजीदा शहरी की तरह उन्हें भी अपने शहर से भरपूर इश्क था। मगर जिस हालत में मुंबई उस रोज फंसी थी, उसकी बेचैनी अफरोज के भीतर उतर आई। उन दिनों वह कानून की पढ़ाई कर रहे थे। एक तरफ करियर था, दुनियादारी थी और दूसरी तरफ, जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने का नजरिया। लॉ की पढ़ाई मुकम्मल हुई और वह वकालत भी करने लगे। वकालत कुछ चली, तो यह ख्याल आया कि अपना भी एक आशियाना होना चाहिए, और उनकी तलाश वर्सोवा इलाके में पूरी हुई। अपने घर की खिड़की से समुद्री लहरों की अठखेलियां देखना कितनों को नसीब होता है? अफरोज की यह मुराद पूरी हो गई थी। मगर एक रोज उन्होंने गौर किया कि अरब सागर के इस तट पर भारी मात्रा में कचरे का ढेर जमा है। समुद्र के नीले सौंदर्य को ग्रहण लगाता हुआ। साल 2005 की पुरानी पीड़ा जैसे एक नई टीस के साथ उभर आई।
इस दौरान पूरे एक दशक का वक्फा गुजर चुका था। अफरोज को लगा, जैसे उनका शहर उनसे अपना कर्ज मांग रहा है। भीतर के पेशेवर वकील ने सलाह दी कि अदालत का दरवाजा खटखटाया जाए, मगर प्रेमी मुंबइकर मन ने कहा, मोहब्बत की है, तो म्युनिसिपैलिटी और कोर्ट का मुंह किसलिए देख रहे हो, अपना किरदार निभाओ। और फिर हाथों में ग्लब्स पहन अफरोज चल पड़े वर्सोवा तट पर!
कचरे के बीच पहुंचकर उन्हें बचपन के वे दिन याद आए, जब छुट्टियों के दिन घर वालों के साथ वह समुद्र तट पर आते थे। तब ऐसी गंदगी कहां थी? दरअसल, आर्थिक उदारीकरण के वे शुरुआती साल थे। उन दिनों लोग सौदे-सुलफ के लिए घर से झोले वगैरह लेकर चला करते थे। देखते-देखते प्लास्टिक की सस्ती थैलियों ने पहले महानगरों की, और फिर छोटे-छोटे शहरों तक की आदत बदल डाली।
वह अक्तूबर, 2015 की एक सुबह थी। पहले दिन अफरोज ने कचरे से भरे पांच बैग उठाए। फिर तो हर सप्ताहांत में वह तट पर पहुंचने लगे। उनकी इस कोशिश को कोई और भी गौर से देख रहा था। अफरोज की ही बिल्डिंग में रहने वाले हरबंश माथुर ने सबसे पहले उनके साथ अपना कदम मिलाया और फिर तो देखते ही देखते आस-पड़ोस के कई लोग आ गए। कचरा काफी था। मगर अफरोज ने 109 हफ्ते की एक अवधि तय की कि इसके भीतर हमें वर्सोवा बीच की सूरत बदलनी है।
उनकी ईमानदार पहल ने अनगिनत स्वच्छता प्रेमियों को आकर्षित किया। अगस्त 2016 में तो बॉलीवुड की कई नामचीन हस्तियों और वैश्विक संगठनों के अधिकारियों ने कूड़ा-कचरा उठाकर अफरोज शाह के साथ अपनी एकजुटता दिखाई। अफरोज और उनके साथी काफी संजीदगी से अपने उद्यम में जुटे हुए थे, मगर कोई भी अच्छा कार्य बिना विघ्न-बाधा के कभी संपन्न हुआ है, जो अफरोज और उनके लोग पूरा कर लेते! जो लोग वर्सोवा तट को कूडे़दान के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे, उन्होंने वॉलंटीयर्स को मुहिम बंद करने की धमकियां देनी शुरू कर दीं। अफरोज साथियों की जान जोखिम में नहीं डाल सकते थे, लिहाजा उन्होंने कुछ वक्त के लिए काम बंद कर दिया।
लेकिन यह मुहिम अब तक एक जन-आंदोलन का रूप ले चुकी थी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तक बात पहुंची, उन्होंने अफरोज को बुलाया और सुरक्षा मुहैया कराते हुए अभियान जारी रखने को कहा। शिवसेना के बडे़ नेताओं ने भी अफरोज को अपना समर्थन दिया। फिर तो तेजी से सब जुट गए। 28 मई, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने मन की बात कार्यक्रम में अफरोज व उनके साथियों के प्रयासों का जिक्र करते हुए उनकी खूब सराहना की। अमिताभ बच्चन ने तो न केवल कौन बनेगा करोड़पति में उन्हें बुलाया, बल्कि अफरोज की मुहिम को उन्होंने एक ट्रैक्टर व एक एक्स्क्वेटर भी भेंट की। शुरुआत में हरेक शनिवार-रविवार को अफरोज तकरीबन 50 वॉलंटीयर्स का खाना अपने घर से लेकर आते थे। बाद में दाऊदी बोहरा समुदाय ने यह जिम्मेदारी ले ली।
आज वर्सोवा तट की काया बदल चुकी है, यहां से 20 हजार टन से भी अधिक प्लास्टिक और कचरा हटा चुके अफरोज को संयुक्त राष्ट्र ‘चैंपियन्स ऑफ अर्थ’ सम्मान से नवाज चुका है। पिछले साल सीएनएन ने उन्हें दुनिया के शीर्ष 10 नायकों में शुमार किया। कुदरत से बेपनाह मोहब्बत करने वाले इस 37 वर्षीय आशिक का कहना है- ‘हर नदी, हर सागर तट के पास अपना एक अफसाना है, आप सुनिए तो सही।’
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह अफरोज शाह, वकील, प्रकृतिप्रेमी