ओपिनियन / शौर्यपथ / तमाम आशंकाओं के बीच रूस जब ढोल-बाजे के साथ कोरोना वायरस की वैक्सीन लेकर बाजार में उतर रहा है, तब वाल्डेमर हॉफकिन को याद करना जरूरी हो जाता है। हॉफकिन रूस के पड़ोसी देश यूक्रेन में पैदा हुए थे और उन्होंने अपनी ज्यादातर पढ़ाई रूस में ही की थी, लेकिन हम हॉफकिन को जानते हैं उन दो वैक्सीन के कारण, जो उन्होंने भारत को दी थीं। एक थी, हैजे की वैक्सीन और दूसरी, प्लेग की। इन दोनों ही वैक्सीन ने भारत को दो महामारियों से मुक्त कराने में बड़ी भूमिका निभाई थी। हैजे की वैक्सीन उन्होंने पेरिस के पास्टर इंस्टीट्यूट में विकसित की थी और प्लेग की मुंबई में रहकर। दोनों ही बार उन्होंने वैक्सीन का इंजेक्शन सबसे पहले खुद को लगाया था। वैसे यह उन दिनों का एक आम चलन भी था। वैक्सीन सुरक्षित है, इसका भरोसा दिलाने के लिए उस दौर के तमाम बॉयो-केमिस्ट उसे सबसे पहले अपने ऊपर ही आजमाते थे।
तब से एक सदी से ज्यादा का समय बीत चुका है और इस बीच अब यह तरीका बदल गया है। वैक्सीन विकसित करने वालों को अब इस तरह का करतब दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती। अब दुनिया भर में वैक्सीन के परीक्षण का एक निश्चित प्रोटोकॉल है, और यह माना जाता है कि उस प्रोटोकॉल के पालन से जो वैक्सीन तैयार होगी, वह पूरी तरह सुरक्षित होगी। लेकिन रूस ने इस रास्ते को नहीं अपनाया और वैक्सीन की विश्वसनीयता साबित करने के लिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की बेटी को इसका पहला इंजेक्शन लगाया गया, यानी एक ही झटके में रूस ने वैक्सीन विज्ञान को उस जगह पहुंचा दिया है, जहां वह एक सदी पहले खड़ा था। वह भी शायद इस उम्मीद में कि दुनिया रूस की इस उपलब्धि का लोहा मानने को मजबूर हो जाए।
ऐसा सिर्फ रूस ही ने नहीं किया, बल्कि कई अन्य देश भी इसकी तैयारी कर रहे हैं। चीन ने तीसरे चरण का परीक्षण किए बिना ही रेड आर्मी के सैनिकों को वैक्सीन लगाने की इजाजत दे दी है, जहां से अच्छे परिणामों की खबरें भी दुनिया भर में प्रसारित की जा रही हैं। इस बीच खबर यह भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह चाहते हैं कि अमेरिकी वैक्सीन 3 नवंबर से पहले बाजार में आ जाए, ताकि जब वहां राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो, तो लोग टं्रप की इस उपलब्धि का गौरव-बोध लेकर वोट डालने जाएं। हालांकि, वैज्ञानिक कह रहे हैं कि वैक्सीन को लांच करना अगले साल के शुरू में ही संभव हो पाएगा। इस बीच ऐसी खबरें भी आईं कि रूस, चीन व ईरान हैकिंग करके अमेरिका से वैक्सीन शोध के आंकडे़ चुराने की कोशिश कर रहे हैं। वैक्सीन बनाने की इस होड़ को कई विशेषज्ञों ने वैक्सीन का राष्ट्रवाद भी कहा है।
अच्छी बात यह है कि तमाम आशंकाओं के विपरीत भारत ने अपने आप को जल्दबाजी की इस होड़ से दूर रखा। पिछले महीने स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति में कहा था कि तीसरे चरण के फास्ट ट्रैक परीक्षण के बाद भारत में बॉयोटेक की वैक्सीन को 15 अगस्त को जारी कर दिया जाएगा। तभी से यह अटकल लगाई जाने लगी थी कि प्रधानमंत्री लाल किले के अपने भाषण में इसकी घोषणा कर सकते हैं। हालांकि आलोचना के बाद मंत्रालय ने अपने रुख को बदल दिया था। लेकिन अब जब प्रधानमंत्री ने किसी तारीख की कोई घोषणा नहीं की है, तो यह साफ है कि भारत ने इसके खतरों को अच्छी तरह से समझ लिया है।
वैक्सीन के मामले में भारत का जोखिम रूस से कहीं ज्यादा बड़ा है। इस समय दुनिया की साठ प्रतिशत वैक्सीन का उत्पादन भारत में होता है। यह भी कहा जाता है कि दुनिया भर में दस साल तक के हर बच्चे को, जिसका पूरा टीकाकरण हुआ है, कम से कम एक भारतीय वैक्सीन जरूर लगी होगी। वैक्सीन के बाजार में भारत ने अपनी यह साख गुणवत्ता के कारण कई वर्षों में बनाई है। ऐसे में, थोड़ी सी भी जल्दबाजी या एक भी गलत कदम वर्षों की इस मेहनत पर पानी फेर सकता है।
बात सिर्फ वैक्सीन-कारोबार की ही नहीं है। मान लीजिए, परीक्षण में कुछ मामूली कमी रह जाए और बाद में पता लगे कि इससे सिर्फ आधा प्रतिशत लोगों को कोई समस्या या साइड इफेक्ट हो गया, तो कोरोना संक्रमण जिस बडे़ पैमाने पर देश में फैल चुका है, उसे देखते हुए हमें तकरीबन सभी नागरिकों को यह वैक्सीन लगानी ही पडे़गी। ऐसे में, आधा प्रतिशत का अर्थ होगा देश में साठ लाख से ज्यादा लोगों को एक नया रोग दे देना। इसलिए दुर्घटना से देर भली वाला रास्ता अपनाना ही समझदारी भी है। संक्रमण जिस तरह से फैल रहा है और उसके चलते जैसे आर्थिक और सामाजिक नतीजे देखने को मिल रहे हैं, उसमें दुनिया भर के वैज्ञानिकों पर यह दबाव है कि वे पहले जिस काम करने में कई साल लगा देते थे, उसे कुछ हफ्तों में पूरा कर लें। वे इसके लिए दिन-रात एक कर भी रहे हैं, लेकिन जल्दी के इस दबाव में गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।
एक सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि समस्या जब पूरी दुनिया की है, तो राष्ट्रीय स्तर पर इसके समाधान क्यों खोजे जा रहे हैं? क्यों नहीं पूरी दुनिया के वैज्ञानिक इस पर एक साथ मिलकर काम करते? बात अपने आप में सही भी है, लेकिन पिछले अनुभव इस रास्ते को अपनाने की इजाजत नहीं देते। साल 2009 में जब दुनिया के बहुत सारे हिस्सों में स्वाइन फ्लू रोग फैल रहा था, तब तमाम कोशिशों के बाद अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने इसकी वैक्सीन विकसित कर ली थी। लेकिन घरेलू जरूरतों को देखते हुए उन्होंने इसके निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी। अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के आंकड़ों के अनुसार, जब तक यह पाबंदी हटी और वैक्सीन सब तक पहुंची, बाकी दुनिया में 5,75,000 लोगों की इस महामारी के कारण मौत हो गई थी। जाहिर है, भारत को अपनी वैक्सीन भी विकसित करनी होगी और बड़े पैमाने पर उसका उत्पादन भी करना होगा, लेकिन बिना किसी जल्दबाजी या हड़बड़ी के।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) हरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार