नजरिया / शौर्यपथ / गणेशजी दुनिया के सर्वप्रथम और मौलिक प्रबंधन गुरु हैं। प्रबंध के पुरोधा हैं। आस्था के आकाश और धर्म के धरातल पर भारतीय संस्कृति में वह प्रथम पूज्य भी हैं और अपनी संपूर्ण उपस्थिति में प्रबंधन के प्रेरणा स्रोत भी। वह ऐसे प्रबंधशास्त्री भी हैं, जिनमें हमें पग-पग पर उपयोगी व्यवहार भी दिखता है व नवाचार भी। वह प्रखर प्रबंधक होने के साथ कुशल प्रशासक भी हैं।
एक कुशल प्रबंधन गुरु में पांच विशेषताएं होती हैं। पहली विशेषता है, संस्कारशीलता, दूसरी- व्यवहार कुशलता, तीसरी- संस्थान की हित साधना, चौथी- त्वरित-औचित्यपूर्ण निर्णय क्षमता और पांचवीं- नवाचार के प्रति उत्साह। इन पांचों विशेषताओं की कसौटी पर गणेश विश्व के पहले प्रबंधन गुरु लगते हैं। संस्कारशीलता के संदर्भ में देखें, तो उनमें साहस और समर्पण के संस्कार कूट-कूटकर भरे हैं। एक प्रबंधक के लिए कठिनाइयों से लोहा लेने का साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण का संस्कार अनिवार्य है। गणेश की संस्कारशीलता अर्थात साहस व समर्पण का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि जब भगवान शिव ने यह उत्तरदायित्व उन्हें सौंपा कि मेरे विश्राम में कोई व्यवधान नहीं पहुंचाए, तब गणेश रक्षा प्रबंधक के रूप में द्वार पर खडे़ हो गए। किसी कारणवश भगवान परशुराम जब भगवान शिव से मिलने आए, तो गणेश ने उन्हें द्वार पर ही रोक लिया। द्वार के रक्षा प्रबंधक का कर्तव्य निभाया। इस पर क्रोधित हो परशुराम ने गणेश को युद्ध के लिए ललकारा। गणेश में साहस था, उन्होंने इस चुनौती को स्वीकारा और युद्ध किया। ऐसी कथा है कि इसी युद्ध में गणेश के एक दांत का क्षय हुआ था, जिसके कारण वह एकदंत कहलाए। दोनों के बीच युद्ध के शोर से भगवान शिव की निद्रा टूटी और उन्होंने आगे बढ़कर दोनों को युद्ध से रोका और अपने पुत्र को साहस व समर्पण अर्थात कर्तव्यनिष्ठा के लिए आशीर्वाद दिया।
तात्पर्य यह है कि प्रबंधन गुरु की प्रथम विशेषता साहस और समर्पण से वह संपन्न हैं। जहां तक व्यवहार कुशलता की बात है, तो यहां भी गणेश विशिष्ट सिद्ध होते हैं। उदाहरण के लिए, दूर्वा (एक प्रकार की घास) और मोदक, दोनों के प्रति उनका व्यवहार समान है। उनके पूजन में दूर्वा और भोग में लड्डू का समान महत्व है। इसे कहते हैं, समता का व्यवहार। वह एक हाथ में फरसा अर्थात शक्तिशाली अस्त्र को जितना सम्मान देते हैं, अपने वाहन के रूप में अंगीकार करके मामूली मूषक को भी उतना ही मान प्रदान करते हैं। किसी प्रबंधक की यह विशेषता ही उसे सफल बनाती है कि वह व्यवहार कुशल हो, गुणी का सम्मान करे, किंतु गुणहीन या साधारण का अनादर भी न करे। हां, प्रदर्शन के आधार पर कभी पुरस्कार या चेतावनी का व्यवहार वह कर सकता है।
यदि संस्थान की हित साधना के आधार पर देखें, तो भले ही यह क्षेपक हो, किंतु उदाहरण तो है ही कि जब पार्वतीजी स्नान के लिए गईं, तो गणेश को आदेश दे गईं कि किसी को प्रवेश नहीं करने देना। बाल गणेश को द्वारपाल का काम मिल गया, जब भगवान शिव आए, तो गणेश ने उन्हें भी प्रवेश करने नहीं दिया। भले ही क्रोध में भगवान शिव ने गणेश का मस्तक काट दिया, लेकिन गणेश अपने कर्तव्य या उत्तरदायित्व से पीछे नहीं हटे।
तात्पर्य यह कि कुशल कर्तव्यनिष्ठ खुद को खतरे में डालकर त्याग करते हुए भी संस्थान, समाज, देश की हित-साधना करता है। गणेश जी ने यही किया था।
आज प्रतिस्पद्र्धा का समय है, हर जगह व्यक्तियों व संस्थानों के बीच अव्वल आने की होड़ है। कथा है कि एक प्रतिस्पद्र्धा पौराणिक काल में भी हुई थी। प्रतिस्पद्र्धा में प्रथम आने के लिए गणेश ने श्रीराम लिखकर और माता-पिता शिव-पार्वती की परिक्रमा करके त्वरित व औचित्यपूर्ण निर्णय क्षमता का परिचय दिया था। वह हमें प्रेरित करते हैं कि कम से कम समय में अच्छे से अच्छे कार्य को कैसे पूरा किया जा सकता है।
जहां तक नवाचार के प्रति उत्साह का मामला है, तो महाभारत के लेखन के समय वेदव्यास द्वारा दी गई कलम टूट जाने पर उन्होंने अपने दांत से ही लेखन कर इस ग्रंथ को पूरा किया था। इससे भी उनका प्रबंधकीय कौशल ही सिद्ध होता है। वह एक ऐसे भगवान हैं, जो हर स्थिति, हर रूप और हर आयु वर्ग में ढल जाते हैं और हमें सहज, सृजनशील और कर्मशील जीवन की प्रेरणा देते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) अजहर हाशमी , साहित्यकार व शिक्षाविद्