धर्म संसार / शौर्यपथ / मकर संक्रांति का पर्व हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है। मकर संक्रांति को लेकर कई तरह की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। मकर संक्रांति की एक पौराणिक कथा के अनुसार, आज के दिन सूर्यदेव धनु राशि से निकल कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मकर राशि का स्वामी शनि देव को माना जाता है। कहते हैं कि मकर राशि में प्रवेश कर सूर्य देव अपने पुत्र से मिलने जाते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया और अपने अश्व को विश्व-विजय के लिये छोड़ दिया। इंद्र देव ने उस अश्व को छल से कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। जब कपिल मुनि के आश्रम में राजासगर के साठ हजार पुत्र युद्ध के लिये पहुंचे तो कपिल मुनि ने श्राप देकर उन सबको भस्म कर दिया। राजकुमार अंशुमान, राजा सगर के पोते ने कपिल मुनि के आश्रम में जाकर विनती की और अपने बंधुओं के उद्धार का रास्ता पूछा। तब कपिल मुनि ने बाताया कि इनके उद्धार के लिये गंगा जी को धरती पर लाना होगा।
राजकुमार अंशुमान ने तय किया कि उनके वंश का कोई भी राजा चैन से नहीं रहेगा जब तक गंगा मां धरती पर नहीं आ जाती हैं। गंगा जी को धरती पर लाने के लिए राजकुमार अंशुमान ने कठिन तप किया और उसी में अपनी जान दे दी। भागीरथ राजा दिलीप के पुत्र और अंशुमान के पौत्र थे।
इसके बाद राजा भागीरथ ने घोर तपस्या करके गंगा जी को प्रसन्न किया और उन्हें धरती पर लाने के लिये मना लिया। इसके बाद भागीरथ ने भगवान शिव की तपस्या की जिससे महादेव गंगा जी को अपने जटा में रख कर, वहां से धीरे-धीरे गंगा के जल को धरती पर प्रवाहित कर सकें। भगवान शिव ने भागीरथ के कठिन तपस्या प्रसन्न होकर उन्हें इच्छित वर दिया। इसके बाद गंगा जी महादेव के जटा में समाहित होकर धरती के लिये प्रवाहित हुई। भागीरथ ने गंगा जी को रास्ता दिखाते हुए कपिल मुनि के आश्रम गये, जहां पर उनके पूर्वजों की राख उद्धार के लिये प्रतीक्षा कर रही थी।
कहते हैं कि गंगा जी के पावन जल से भागीरथ के पूर्वजों का उद्धार हुआ। उसके बाद गंगा जी सागर में मिल गया। कहा जाता है कि जिस दिन गंगा जी कपिल मुनि के आश्रम पहुंची उस दिन मकर संक्रांति का दिन था। कहते हैं कि इस कारण ही इस दिन श्रद्धालु गंगा स्नान करते हैं।