शौर्यपथ लेख । पत्रकार यानी कि चौथा स्तंभ जो कि अब नाम का ही चौथा स्तंभ है । कौन सा पत्रकार सुरक्षित रहेगा कौन सा पत्रकार असुरक्षित अब ये सत्ता के ऊपर निर्भर हो गया है । अगर पत्रकार सत्ता के अवैधानिक कार्यो को उजागर कर तो वह पत्रकार ज्यादा समय तक सुरक्षित नही हो सकता । आज पत्रकार को सुरक्षित रहना है तो सत्ता के हिसाब से चलना पड़ता है तभी पत्रकार सुरक्षित रह सकता है ये छोटे और बड़े बेनर के पत्रकार को अच्छे से मालूम है । किंतु आज भी ऐसे पत्रकार है जो 1947 से पहले की शैली अपना रहे है जब देश गुलाम था जब अंग्रेजो का शासन था तब के पत्रकार ऐसे थे जो कलमवीर थे और खुल कर अपनी बात लिखते थे गुलाम भारत मे भी पत्रकार उतने असुरक्षित नही थी जितने आज है । आज अधिकतर बेनर किसी ना किसी राजनैतिक पार्टी की विचारधारा के आगोश में है अगर वह विचारधारा सत्ताधारी के अनुसार हो तो सुरक्षित ही नही समृद्ध पत्रकार की श्रेणी में गिना जाएगा । ऐसा नही है कि सिर्फ छत्तीसगढ़ में ये हालात है पूरे देश मे यही आलम है तभी तो पत्रकार या तो किसी समिति के अध्यक्ष है किसी सदन के सदस्य है या फिर किसी दल के अघोषित प्रचारक । देश मे गरीबी , शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार के मुद्दे अब गायब हो गए है उसकी जगह ले ली है बेतुकी बातों ने फला हीरोइन कितने बार कपड़े बदली कितने बार रोइ कितने बार हंसी क्या पहनी क्यो पहनी , फला आदमी देश भक्त है या समाज का दुश्मन ये फैसला कुछ चापलूस पत्रकार अपने आकाओं को खुश करने के लिए उछलते रहते है और खुद को न्याय पालिका तक समझते है । ऐसी ऐसी बाते सामने लाते है कि कभी कभी ऐसा लगता है देश की इंटेलिजेंस एजेंसी सिर्फ टाइम पास कर रही असली काम यही कर रहे एक प्रश्नवाचक चिन्ह और सूत्र की बात कर किसी को बजी देशद्रोही , समाज का दुश्मन , देशभक्त , समाज सुधारक तक का तमगा दे देते है । कुछ ऐसे ही पक्षपात और एकतरफा स्थिति के कारण भूपेश सरकार ने चुनाव के समय पत्रकार सुरक्षा कानून की बात की थी और इस चुनावी वादों को मूर्त रूप देने का आश्वासन दिया था । आज भूपेश सरकार को सत्ता संभाले लगभग दो साल हो गए किन्तु आज भी छत्तीसगढ़ में पत्रकार सुरक्षित नही है जब भी पत्रकारों पर कोई हमला होता है तो इसे आपसी रंजिश की बात कह कर मामले को दूसरा रूप देने की बात चालू हो जाती है । ऐसे कई मामले सामने आ भी चुके है लेकिन हम वर्तमान मामले की ही बात करे तो कमल शुक्ला के साथ जिस तरह जी घटना हुई उससे एक बार फिर पत्रकार समूह को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या सरकार गठन के दो साल बाद भी पत्रकारों के लिए सुरक्षा कानून पर कोई ठोस पहल होगी । कई अखबारों में गृह मंत्री का बयान प्रकाशित हुआ कि दोनों पार्टी में वादी परिवादी में जो भी गलत होगा उस पर कार्यवाही होगी गृह मंत्री का यह बयान एक दक्ष राजनैतिक बयान था जिसमे उनके द्वारा पत्रकारों की सुरक्षा की बात पर कोई जवाब नही दिया गया वही दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि घटना को अंजाम देने वालो को पार्टी से निष्काषित कर दिया गया क्या निष्कासन ही सही रास्ता है क्या कांग्रेस के मुखिया का वादा स्थानीय कांग्रेस संगठन भूल गया । वीडियो में देखने से साफ लग रहा है कि कमल शुक्ला पर आक्रमण करने वाला किस विश्वास के साथ बात कर रहा था जैसे कि शहर की प्रशासनिक व्यवस्था पर उसका ही राज हो और जब fir दर्ज हुई तो एक शिकायत कमल शुक्ला के खिलाफ प्रेषित कर दी ताकि मामला बराबर का हो जाये । हा भई हो भी सकता है क्योंकि सरकार के एक अपरोक्ष अंग हो सत्ताधारी दल के सक्रिय सदस्य हो इसलिए किसी बात का डर नही आज जब fir दर्ज हुई तो याद आ गया कि कमल शुक्ला ने पूर्व में कभी जान से मारने की धमकी दी थी । चलो याद तो आया पर तब क्यो मौन थे जब जान से मारने की धमकी दी थी तभी पहुंच जाते कानून के दरवाजे और शिकायत कर देते तब किस बात ने रोक रखा था महोदय आपको । एक पत्रकार को सरे आम मार कर कौन सी बहादुरी दिखा दिए पत्रकार ने तो कलम से लड़ाई लड़ी तुम भी कलम से लड़ लेते भाई तुम्हे तो किसी ने नही रोका था शिकायत से । आज जब चौतरफा वीडियो वायरल हुआ तो सब याद आ गया । वैसे तुम भी सही हो महोदय क्योकि पत्रकार एक नही है यहां तो पत्रकारिता में भी राजनीति जगजाहिर है पुराने और वरिष्ठ पत्रकार पर हमला होता है तो बवाल खड़ा हो जाता है किंतु जब मझोले और छोटे पत्रकार पर कोई विपदा आती है तो यही कुछ वरिष्ठ पत्रकार होते है जो समर्थन तो नही करते उल्टे विरोध के स्वर निकलते है । ऐसा नही कि सभी वरिष्ठ पत्रकार ऐसा करते है कुछ ऐसे वरिष्ठ आज भी है जो युवा पीढ़ी का दिल से स्वागत करते है और सही गलत के बारे में बताते है । आज जो भी घटना पत्रकारों के साथ हो रही उसमें कुछ हद तक जिम्मेदार पत्रकार भी है एकता में बल की बात तो करते है पर एकता में अभी भी अभाव है । आज पत्रकार अगर एक हो जाये तो मारपीट की बात तो दूर कोई तिरछी आंख भी नही करेगा । इस तरह की घटना से शासन को , पत्रकारों को भी सीख लेने की ज़रूरत है क्योंकि अगर देश के चार स्तम्भ में से एक स्तम्भ पत्रकार है तो उनकी मजबूती भी सबसे ज्यादा जरूरी है । बस एक बार दिल मे हांथ रखकर ज़रूरत है उस कल्पना की जिसमे ये देखे की तीन स्तम्भ के सहारे देश का लोकतंत्र कैसे और कब तक खड़ा रहेगा ...( शरद पंसारी - संपादक दैनिक शौर्यपथ समाचार पत्र )