दुर्ग। शौर्यपथ।
शहर की राजनीति में कई बार छोटी दिखने वाली घटनाएँ भी बड़े सवाल खड़े कर जाती हैं। गंजपारा चौक के नामकरण को लेकर हालिया घटनाक्रम ने यही साबित किया है। चौक का नाम “महेश चौक” घोषित होते ही शहर की फिजा में चर्चा का दौर तेज हो गया—क्या यह महज़ एक नामकरण है, या फिर शहरी सरकार की कार्यप्रणाली और प्राथमिकताओं का आईना?
लंबित आवेदन और अचानक निर्णय
पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल के कार्यकाल में साहू समाज द्वारा “कर्मा माता चौक” और राजस्थानी ब्राह्मण समाज द्वारा “परशुराम चौक” नामकरण के लिए आवेदन दिए गए थे। दोनों प्रस्ताव एमआईसी में लंबित रहे। इसके अतिरिक्त, समीप निर्माणाधीन जगन्नाथ मंदिर को देखते हुए “जगन्नाथ चौक” नाम की भी चर्चा थी।
लेकिन परिषद के औपचारिक निर्णय से पहले ही गंजपारा चौक को “महेश चौक” के रूप में संबोधित किए जाने की खबर सामने आई। कार्यक्रम में राम रसोई के संरक्षक चतुर्भुज राठी की उपस्थिति ने इस पूरे घटनाक्रम को और राजनीतिक रंग दे दिया।
सवालों के घेरे में शहरी सरकार
वर्तमान महापौर अलका बाघमार ने पूर्व सरकार की त्रुटियों को सुधारने का संकल्प लेकर पदभार संभाला था। शपथ ग्रहण के समय निष्पक्षता और पारदर्शिता की जो बात कही गई थी, वह अब गंजपारा चौक के नामकरण प्रकरण में सवालों के घेरे में है।
यदि परिषद द्वारा अब तक औपचारिक निर्णय नहीं हुआ, तो “महेश चौक” नाम की घोषणा किस अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत हुई?
क्या यह निर्णय प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरकर लिया गया, या फिर प्रभावशाली वर्गों के दबाव में जल्दबाजी में?
राम रसोई और दोहरे मापदंड का आरोप
बस स्टैंड स्थित राम रसोई के अनुबंध को लेकर भी पूर्व में अनियमितताओं की चर्चा रही है। स्वयं महापौर ने पूर्व सरकार की गलतियों का उल्लेख करते हुए दूरी बनाई थी। किंतु वर्तमान कार्यकाल में भी अनुबंध की शर्तों के पालन पर सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद संचालन जारी है और निगम की प्रेस विज्ञप्ति में संचालक को “समाजसेवी” के रूप में प्रस्तुत किया जाना विरोधाभास पैदा करता है।
यही कारण है कि गंजपारा चौक के नामकरण को लेकर यह धारणा बल पकड़ रही है कि कहीं न कहीं प्रभावशाली और संपन्न वर्ग की आवाज़ अन्य समाजों की अपेक्षा अधिक प्रभावी रही।
भावनाएँ बनाम राजनीति
साहू समाज, राजस्थानी ब्राह्मण समाज और उड़िया समाज की ओर से लंबे समय से चली आ रही मांगों पर विचार न करते हुए अचानक एक नाम को आगे बढ़ाना सामाजिक संतुलन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। शहर की विविध सामाजिक संरचना में संतुलन बनाए रखना शहरी सरकार की जिम्मेदारी है।
नामकरण मात्र औपचारिकता नहीं—यह भावनाओं, पहचान और सम्मान का विषय होता है। ऐसे में यदि प्रक्रिया पारदर्शी न हो, तो अविश्वास जन्म लेता है।
निष्पक्षता की कसौटी पर बाघमार सरकार
पिछले एक वर्ष में कई ऐसे प्रसंग सामने आए हैं, जिनमें शहरी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर आलोचना हुई है। गंजपारा चौक प्रकरण ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।
क्या यह निर्णय प्रशासनिक पारदर्शिता के तहत हुआ?
क्या परिषद की सहमति ली गई?
क्या सभी समाजों की भावनाओं का सम्मान किया गया?
इन सवालों के जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं हैं।
गंजपारा चौक का नाम चाहे जो भी हो, शहर की जनता निष्पक्ष और पारदर्शी शासन की अपेक्षा रखती है। यदि निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट और सर्वसम्मति से हो, तो विवाद की गुंजाइश कम होती है। लेकिन यदि जल्दबाजी और प्रभाव का आरोप लगे, तो चर्चा का बाजार गर्म होना स्वाभाविक है।
अब देखना होगा कि शहरी सरकार इन उठते सवालों का जवाब कैसे देती है—और क्या निष्पक्षता की कसौटी पर स्वयं को सिद्ध कर पाती है, या यह प्रकरण भी राजनीतिक गलियारों में एक और बहस बनकर रह जाएगा।