शौर्यपथ लेख / माननीय मंत्री जी, शराबबंदी के सवाल पर आपके शानदार परफॉर्मेंस के बाद छत्तीसगढ़ राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री जी के बयान का अंश है कि, अब वक्त है पछतावे का । पूर्व चुनाव में आपकी पार्टी का नारा था अब वक्त है बदलाव का । उनके बयान और आपके नारे की तुकबंदी कमाल की है। प्रदेश के आम मतदाताओं के कवियों-लेखकों-बुद्धिजीवियों की ओर से दोनों पार्टियों के मंत्रियों को साष्टांग प्रणाम। बड़े चाहे जैसे भी हों उन्हें प्रणाम करने की भारतीय सनातन परम्परा के इस निर्वहन के बाद कृपया आप ये बतायें कि आपने पिछले विधानसभा चुनाव के समय नारा दिया था, वक्त है बदलाव का। हमने बदल दिया। पर आपको तो सुनाई ही नहीं देता। अब क्या करें ? राईट टू रिकॉल तो अभी है नहीं।
कोरोना प्रोटोकॉल की मैय्यत के बीच आनंदित भीड़ - रिपोर्टर ने कहा कि आप संस्कृति मंत्री हैं और शराब के कारण संस्कृति खराब हो रही है जिसे आप नहीं सुन पाए। रिपोर्टर ने सरल करके फिर दुहराया पर आप कोरोना प्रोटोकॉल की मैय्यत के बीच वहाँ मौजूद आपके कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ और उनके आनंदमय सन्नाटे के कारण फिर नहीं सुन पाये। हालांकि दो-दो बार पूछे गये सवालों को आपने पूरी शालीनता से सुना,लेकिन आपको फ़िर भी सुनाई ही नहीं दिया तो इसमें आपकी क्या गलती ? उस पूरे सीन में आपका धैर्य और मीडिया के प्रति सम्मान भी देखने को मिला। जिस पर मीडिया का ध्यान ही नहीं गया। इन्हें तो केवल निगेटिव चाहिये।
बेमिसाल मुस्कान और नासमझ मीडिया - मेरे को सुनाई ही नहीं दिया आप क्या बोले,यह कहते हुए आप आगे बढ़ गए। आदरणीय मंत्रीजी, शराबबंदी के सवाल के जवाब में हल्की मुस्कान के साथ दोनों हाँथ जोड़े आपका आगे सरक जाने वाला वह सीन कमाल का था। आपकी संवाद अदायगी भी बेमिसाल है। पर मीडिया ने आपकी इस अदा को नोटिस ही नहीं किया। प्रॉपर हाईलाइट भी नहीं किया। मुद्दों के बीच मंचीय मैच्योरिटी की जरा भी समझ नहीं हैं मीडिया को। छी।
बाकी सब माया है - आपके साथ आप पर समर्पित भीड़ भी चुप्प आगे सरक गई। इस दृश्य में पॉजिटिव बात मुझे यह दिखी कि चलते समय मंत्रीजी के दोनों हाँथों की पूरी की पूरी दसों उंगलियां जुड़ी हुई थीं। यानी हमारे सर जी बहुत विनम्र जननेता हैं। जिन्हें जिले की कमान मिली है उनमें आलाकमान ने कुछ तो देखा होगा? सच्चाई यही है। बाकी सब माया है।
नशा शराब में होता तो नाचती बोतल - हमारे लोकतांत्रिक इतिहास के अनुसार नेताओं के कान की क़्वालिटी पर सवाल दागना या शराब की बंदी-बिक्री या नष्ट होती संस्कृति से संबंधित सवाल करना क्या एक्सपायरी डेट की रिपोर्टिंग नहीं थी ? सरेआम, दिनदहाड़े और वह भी मंत्री जी के प्रभारी बनने के बाद प्रथम नगर आगमन के शुभ दिवस में ऐतिहासिक उत्साह और आनंद के मौसम में रिपोर्टर का दारू पर प्रश्न उठाना निहायत ही असभ्य हरकत थी। तो सारे सुबूतों और गवाहों को मद्दे नज़र रखते हुये यह अदालत इस नतीजे पर पहुंचती है कि पूछने वाले का दिमाग ही खराब रहा होगा। कान एकदम ठीक थे। अदालत का यह भी मानना है कि रिपोर्टर ने शायद फिल्म शराबी भी नहीं देखी है। अन्यथा उसे पता होता कि नशा शराब में होता तो नाचती बोतल, नशे में कौन नहीं है ये बताओ जरा ?
आप आम निचोड़ कर खाते हैं कि चूसकर - शराब पर रिपोर्टर के सतही ज्ञान को देखकर मंत्रीजी रिपोर्टर पर तरस खाकर आगे बढ़ गये होंगे। कुछ तो ढंग का सवाल करना था। अभी आम का सीजन है तो उस बंबईया स्टार की तरह ही पूछ लेना था। मंत्री जी, आप आम कौन सा खाते हैं? कैसे खाते हैं ? पिजगोल (निचोड़) कर खाते हैं कि चूसकर खाते है ? पर रिपोर्टर ने तो खाने की जगह बेधड़क पीने पर ही सवाल दाग दिया। इसलिए भी चौथा स्तंभ बदनाम है। सरेआम ऐसी बेशर्म और बेधड़क रिपोर्टिंग ? छी।
अकेल्ला- दुकेल्ला में - आदरणीय मंत्री जी, इस घटना के वीडियो को देखने के बाद लोग बौरा गए हैं। वे तरह-तरह के गोठिया रहे हैं। एक पूछता है, जब मीडिया के द्वारा, इतने लोगों के बीच, वो भी माइक में,सरेआम पूछे गए सवाल का वे अइसन दुर्गति कर सकते हैं तो अकेल्ला- दुकेल्ला में आम आदमी का वे कतका जंउहर करेंगे? ये सवाल ला सुनके तो मोर कान के संग दिमाग हा तको काम नहीं करत हे।
: योगेश अग्रवाल, एक मतदाता ।