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संभल हिंसा मामला: कोर्ट का बड़ा आदेश, पूर्व सीओ समेत 20 पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज करने के निर्देश, पुलिस ने फैसले को बताया अवैध

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संभल / लखनऊ।

   संभल में नवंबर 2024 की जामा मस्जिद सर्वे हिंसा से जुड़े बहुचर्चित मामले में न्यायपालिका ने बड़ा और दूरगामी असर डालने वाला आदेश दिया है। चंदौसी स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर की अदालत ने 13 जनवरी 2026 को तत्कालीन क्षेत्राधिकारी अनुज चौधरी (वर्तमान में एएसपी), इंस्पेक्टर अनुज तोमर तथा 15–20 अन्य अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश जारी किया है।

24 वर्षीय युवक को गोली लगने का आरोप

यह आदेश यामीन, निवासी खग्गू सराय अंजुमन, की याचिका पर दिया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि 24 नवंबर 2024 को संभल की जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान भड़की हिंसा के समय उनका 24 वर्षीय बेटा आलम, जो बिस्कुट और रस बेचने घर से निकला था, को पुलिस द्वारा कथित रूप से गोली मारी गई। गोली लगने से आलम गंभीर रूप से घायल हो गया था।

याचिका में दावा किया गया है कि युवक हिंसा में शामिल नहीं था, इसके बावजूद पुलिस ने उस पर फायरिंग की।

अखिलेश यादव का भाजपा पर हमला

कोर्ट के आदेश के बाद इस मामले ने राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह आदेश पुलिस अधिकारियों के लिए चेतावनी है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा—

“अब कोई बचाने नहीं आएगा। भाजपा का फॉर्मूला है—पहले इस्तेमाल करो, फिर बर्बाद करो।”

पुलिस ने आदेश मानने से किया इनकार

वहीं, संभल पुलिस प्रशासन ने इस न्यायिक आदेश को मानने से फिलहाल इनकार कर दिया है। संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार बिश्नोई ने अदालत के आदेश को “अवैध” बताते हुए कहा कि इस पूरे मामले की न्यायिक जांच पहले ही पूरी हो चुकी है, जिसमें पुलिस को क्लीन चिट दी जा चुकी है।

एसपी ने स्पष्ट किया कि पुलिस इस आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती देगी

हिंसा की पृष्ठभूमि

गौरतलब है कि 24 नवंबर 2024 को संभल में जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क गई थी। इस दौरान पत्थरबाजी और गोलीबारी की घटनाएं सामने आई थीं, जिसमें 5 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई पुलिसकर्मी और नागरिक घायल हुए थे। यह मामला प्रदेश भर में कानून-व्यवस्था और पुलिस कार्रवाई को लेकर लंबे समय तक चर्चा में रहा।

कानूनी और प्रशासनिक टकराव

इस प्रकरण में अब न्यायपालिका के आदेश और पुलिस प्रशासन के रुख के बीच स्पष्ट टकराव नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में यह मामला न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी बड़ा मुद्दा बनने की संभावना जता रहा है।

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