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फसल अवशेष, पलारी, नरवाई जलाने पर होगी आर्थिक दण्ड की कार्रवाई Featured

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राजनांदगांव / शौर्यपथ / जिले में धान फसल की कटाई प्रारंभ हो चुकी है, जिन क्षेत्रों में धान के बाद रबी फसल लिया जाता है वहाँ किसान धान कटाई के बाद खेत में पड़े पराली को जला देते है। इसके संबंध में किसानों को भ्रम है कि पराली जलाने के बाद अवशेष (राख) से खेत को खाद मिलेगा तथा खेत साफ हो जाएगा, लेकिन यह सोचना गलत है, क्योंकि पराली जलाने से भूमि की उपजाऊ क्षमता तथा लाभदायक कीट भी खत्म हो जाती है। साथ ही वायु प्रदुषण का कारण बनती है जिससे मनुष्य, पशु पंक्षी सभी को विभिन्न प्रकार की बीमारियां भी होती है जिसका उदाहरण -दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे शहरों में कुछ वर्षो से देखने को मिल रहा है।
धान की पराली जलाने से होने वाले नुकसान -
एक टन धान पराली जलाने से हवा में 3 किलो ग्राम कार्बन, 513 किलो ग्राम कार्बन डाई-आक्साईड, 92 किलो ग्राम कार्बन मोनो आक्साईड तथा 250 किलो ग्राम राख घुल जाती है। धान पराली जलाने से वायु प्रदुषित होने से आँखो में जलन एवं सांस संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। पराली जलाने से भूमि की उपजाऊ क्षमता लगातार घट रही है इस कारण भूमि में 80 प्रतिशत तक नाईट्रोजन, सल्फर एवं 20 प्रतिशत अन्य पोषक तत्व की कमी आ रही है। मित्र कीट की मृत्यु होने से नई-नई बीमारियाँ उत्पन्न होती है। एक टन धान पराली जले से 5.5 किलो ग्राम नाईट्रोजन, 2 किलो ग्राम फास्फोरस और 1.2 किलो ग्राम सल्फर जैसे पोषक तत्व नष्ट हो जाते है। पशुओं के लिए वर्ष भर चारा आपूर्ति की समस्या बन जाती है।
फसल अवशेष/पराली/नरवाई जलाने पर आर्थिक दंड -
आवास एवं पर्यावरण विभाग द्वारा वायु (प्रदुषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम 1981 की धारा 19(5) के अंतर्गत फसल अपशिष्ट को जलाया जाना प्रतिबंधित किया गया है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के तहत खेती में कृषि अवशेषों को जलाये जाने पर प्रतिबंध लगाया गया है जिसके तहत पराली जलाने वाले व्यक्ति पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। आर्थिक दंड के रूप में 2 एकड़ से कम खेत पर 2500 रूपए, 2 से 5 एकड़ खेत पर 5000 रूपए तथा 5 एकड़ से अधिक पर 15000 रूपए जुर्माना लगाया जाएगा।
पराली का निर्मित गौठान में दान -
जिले में सुराजी गांव योजना के तहत गौठान निर्मित किए गए है जिसमें धान पराली का दान करें, ताकि गौठान में वर्षभर पशुओं के लिए चारा आपूर्ति बनी रहें। पैरादान करने के लिए संबंधित गौठान समिति/ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी से सम्पर्क कर सकते है।
पराली का प्रबंधन -
स्टा मल्चर मशीन की सहायता से पराली को गठ्ठे में एक कर उपयोग कर सकते है। वेस्ट डी-कम्पोजर के 200 लीटर प्रति एकड़ घोल को फसल कटाई उपरांत खेतो में पड़े अवशेषों के उपर छिड़काव कर सड़ा सकते है। जिससे खेतों में ही पोषक तत्व प्रबंधन किया जा सकता है। वेस्ट डी-कम्पोजर बनाने के लिए 200 लीटर पानी में 2 किलो ग्राम गुड़ मिलाकर वेस्ट डी-कम्पोजर का 20 ग्राम का घोल डालकर 6 से 7 दिन के लिए ढककर रख देते है। प्रतिदिन दो बार डंडे से उसे अच्छी तरह मिलाना चाहिए। धान के पराली का यूरिया से उपचार करके पशु चारे के रूप में उपयोग कर सकते है।

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