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बदलते बस्तर का नया अध्याय: जिन हाथों में कभी बंदूक थी, आज उन्हीं हाथों से मुख्यमंत्री को मिला सम्मान का जल Featured

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मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की पुनर्वास नीति का असर, आत्मसमर्पित दंपत्ति की किराना दुकान बनी विकसित छत्तीसगढ़ की नई पहचान

रायपुर/बीजापुर / शौर्यपथ /
कभी शासन व्यवस्था के खिलाफ हथियार उठाने वाले हाथ आज मेहनत और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुके हैं। जिन आंखों में कभी व्यवस्था के प्रति अविश्वास और संघर्ष की छाया थी, उन्हीं आंखों में अब सम्मानजनक जीवन, रोजगार और बेहतर भविष्य के सपने दिखाई दे रहे हैं। बीजापुर जिले के सुदूर वनांचल स्थित कोण्डापल्ली गांव में सोमवार को देखने को मिला यह दृश्य केवल एक भावनात्मक क्षण नहीं था, बल्कि बदलते बस्तर और विकसित छत्तीसगढ़ की उस सोच का जीवंत प्रमाण था जिसे मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार धरातल पर साकार करने का दावा करती रही है।
प्रदेशव्यापी सुशासन तिहार के तहत मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जब कोण्डापल्ली में आयोजित चौपाल के लिए जा रहे थे, तभी उनका काफिला अचानक एक छोटी-सी किराना दुकान के सामने रुक गया। बाहर से सामान्य दिखने वाली इस दुकान के भीतर संघर्ष, परिवर्तन और पुनर्वास की एक ऐसी कहानी मौजूद थी, जिसने मुख्यमंत्री को भी प्रभावित कर दिया।
यह दुकान आत्मसमर्पित दंपत्ति मासा तामो और जयमोती की थी, जिन्होंने कभी नक्सल संगठन का हिस्सा रहते हुए वर्षों तक जंगलों में जीवन बिताया था। आज वही दंपत्ति मुख्यधारा में लौटकर स्वरोजगार के माध्यम से सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने खरीदी पानी की बोतल, बढ़ाया आत्मविश्वास
मुख्यमंत्री दुकान के भीतर पहुंचे और दोनों से आत्मीयता के साथ बातचीत की। उन्होंने उनके संघर्ष, आत्मसमर्पण और वर्तमान जीवन के बारे में जानकारी ली। इस दौरान मुख्यमंत्री ने दुकान से पानी की बोतल खरीदी और कहा कि आत्मनिर्भरता ही नए जीवन की सबसे बड़ी पहचान है।
यह दृश्य प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था। यह केवल एक ग्राहक और दुकानदार का संवाद नहीं था, बल्कि शासन और समाज के बीच विश्वास की उस नई डोर का प्रतीक था जो वर्षों के संघर्ष के बाद बस्तर में मजबूत होती दिखाई दे रही है।

बंदूक से रोजगार तक का कठिन सफर
मासा तामो का जीवन बचपन से ही कठिनाइयों से भरा रहा। कम उम्र में पिता का निधन हो गया और आर्थिक अभावों के कारण शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके। वर्ष 2007 में परिस्थितियों के दबाव में वह नक्सली संगठन से जुड़ गए।
दूसरी ओर जयमोती का जीवन भी संघर्षों से अछूता नहीं रहा। बचपन में माता-पिता को खोने के बाद जीवन की विषम परिस्थितियों ने उन्हें भी उसी राह पर पहुंचा दिया। संगठन में दोनों की मुलाकात हुई और वर्ष 2021 में उन्होंने विवाह किया।
समय के साथ दोनों ने महसूस किया कि हिंसा का रास्ता न तो उनके जीवन को बेहतर बना सकता है और न ही आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कर सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने अक्टूबर 2025 में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का ऐतिहासिक निर्णय लिया।

पुनर्वास केंद्र ने बदली जिंदगी की दिशा
आत्मसमर्पण के बाद बीजापुर पुनर्वास केंद्र ने दोनों के जीवन को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यहां उन्हें पहली बार अक्षर ज्ञान प्राप्त हुआ, कौशल विकास प्रशिक्षण मिला और विभिन्न शासकीय योजनाओं से जोड़ा गया।
शासन द्वारा उनके लिए राशन कार्ड, आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड, मनरेगा जॉब कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, बैंक खाता सहित आवश्यक दस्तावेज तैयार कराए गए। महिला एवं बाल विकास विभाग की सक्षम योजना के तहत जयमोती को एक लाख रुपये का ऋण स्वीकृत हुआ।
इसी सहायता के बल पर कोण्डापल्ली में एक छोटी-सी किराना दुकान की शुरुआत हुई, जो आज उनके परिवार की आजीविका का प्रमुख आधार बन चुकी है।

अब हथियार नहीं, मेहनत और सम्मान है पहचान
मुख्यमंत्री से बातचीत के दौरान मासा और जयमोती ने बताया कि अब वे सामान्य नागरिकों की तरह सम्मानपूर्वक जीवन जी रहे हैं। दुकान से होने वाली आय से परिवार का खर्च चल रहा है और भविष्य को लेकर नई उम्मीदें जगी हैं। उन्होंने कहा कि कभी कल्पना भी नहीं की थी कि जीवन में ऐसा परिवर्तन आएगा, लेकिन सरकार की पुनर्वास नीति, प्रशासनिक सहयोग और समाज के विश्वास ने उन्हें नई पहचान और नया जीवन दिया है।

मुख्यमंत्री बोले— यह सिर्फ दो लोगों की कहानी नहीं, बदलते बस्तर की कहानी है
"मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि मासा तामो और जयमोती की कहानी केवल दो व्यक्तियों के जीवन परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे बस्तर के बदलते स्वरूप का प्रतिबिंब है।"
उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति को अवसर, विश्वास, सुरक्षा और सम्मान मिलता है तो वह हिंसा का रास्ता छोड़कर विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सकता है। यही राज्य सरकार की पुनर्वास नीति का उद्देश्य भी है।

संपादकीय दृष्टि: विकसित छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी तस्वीर
कोण्डापल्ली की यह छोटी-सी दुकान शायद आर्थिक दृष्टि से बहुत बड़ी न हो, लेकिन सामाजिक और मानवीय दृष्टि से यह विकसित छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी तस्वीरों में से एक है। यह वह परिवर्तन है जिसमें बंदूक की जगह रोजगार ने ली है, भय की जगह विश्वास ने और संघर्ष की जगह सम्मानजनक जीवन ने।
बस्तर में सड़क, बिजली, पानी और भवन निर्माण विकास के महत्वपूर्ण संकेतक हैं, लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी सफलता तब मानी जाती है जब हिंसा छोड़कर लोग स्वेच्छा से विकास और लोकतंत्र की मुख्यधारा में लौटें।
कोण्डापल्ली में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का एक छोटी-सी दुकान पर रुकना और वहां से पानी खरीदना केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि नया बस्तर अब बंदूक नहीं, व्यापार; संघर्ष नहीं, विश्वास; और अलगाव नहीं, विकास की भाषा बोल रहा है।

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