कुम्हड़ाकोट से ससम्मान वापस लाया गया आठ चक्कों वाला विशाल विजय रथ, नवाखानी की रस्म के साथ संपन्न हुई बाहर रैनी
जगदलपुर, शौर्यपथ। विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरे में सदियों पुरानी परंपराओं, जनजातीय आस्था और सामाजिक समरसता का अनूठा संगम एक बार फिर देखने को मिला। भीतर रैनी के बाद निभाई जाने वाली बाहर रैनी की रस्म गुरुवार को पारंपरिक रीति-रिवाजों और उत्साह के साथ संपन्न हुई। इस अवसर पर कुम्हड़ाकोट में छिपाए गए आठ चक्कों वाले विशाल विजय रथ को मान-मनौव्वल और पारंपरिक रस्मों के बाद ससम्मान वापस लाया गया।
रूठे ग्रामीणों को मनाने पहुंचे राजपरिवार के सदस्य
बस्तर दशहरे की विशिष्ट परंपरा के अनुसार, भीतर रैनी की रस्म पूरी होने के बाद बुधवार को माड़िया जनजाति के लोगों ने विशाल विजय रथ को खींचकर लालबाग स्थित कुम्हड़ाकोट के जंगलों में पहुंचा दिया था। रथ को प्रतीकात्मक रूप से छिपाने की यह परंपरा बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है, जिसमें राजा और प्रजा के बीच आत्मीय संबंध, संवाद और मान-मनौव्वल का भाव समाहित है।
गुरुवार को बाहर रैनी की रस्म के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य रथ को वापस लाने के लिए कुम्हड़ाकोट पहुंचे। यहां उन्होंने माड़िया समाज के लोगों और ग्रामीणों के साथ बैठकर पारंपरिक रीति से संवाद किया। ग्रामीणों की मान-मनौव्वल की गई और आपसी सौहार्द के बीच रथ को वापस लाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
नवाखानी में दिखी परंपरा और सामाजिक समरसता की झलक
इस अवसर पर कुम्हड़ाकोट में पारंपरिक नवाखानी का आयोजन भी किया गया। नई फसल के आगमन की खुशी में नए चावल से तैयार खीर का नैवेद्य अर्पित किया गया। इसके बाद राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव, सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, महापौर संजय पाण्डे तथा ग्रामीणों ने एक साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण किया। इस सामूहिक आयोजन ने बस्तर की लोकपरंपराओं और सामाजिक एकजुटता की विशिष्ट तस्वीर प्रस्तुत की।
गाजे-बाजे और जयकारों के साथ लौटा विजय रथ
मान-मनौव्वल और नवाखानी की रस्म पूरी होने के बाद माड़िया समुदाय के लोगों तथा राजपरिवार के सदस्यों ने मिलकर विशाल विजय रथ को वापस लाने की परंपरा निभाई। पारंपरिक गाजे-बाजे और जयकारों के बीच रथ को खींचकर राजमहल के सिंहद्वार तक लाया गया। इसी के साथ बाहर रैनी की महत्वपूर्ण रस्म संपन्न हुई।
बस्तर दशहरे की यह परंपरा केवल रथ की आवाजाही तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय जनजातीय समाज की भागीदारी, पारस्परिक सम्मान और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत की झलक मिलती है। यही विशिष्ट परंपराएं बस्तर दशहरे को देश-दुनिया के अन्य उत्सवों से अलग पहचान प्रदान करती हैं।