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भिलाई महापौर की कुर्सी पर दावेदारी, जाति प्रमाण पत्र ने बढ़ाया सवाल

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लक्ष्मीपति राजू की ओबीसी दावेदारी पर उठी नजरें, केंद्रीय सूची और छत्तीसगढ़ की आरक्षण व्यवस्था के बीच पात्रता का पेच

 शौर्यपथ राजनितिक विश्लेषण
भिलाई / शौर्यपथ / भिलाई नगर निगम के आगामी महापौर चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज होने लगी है। महापौर पद ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित होने के बाद कांग्रेस के भीतर संभावित दावेदारों को लेकर चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं। इन्हीं नामों में सेक्टर-7 के पार्षद लक्ष्मीपति राजू का नाम प्रमुखता से सामने आ रहा है। हालांकि उनकी दावेदारी के साथ ही अब एक ऐसा सवाल भी चर्चा में है, जिसका संबंध सीधे जाति प्रमाण-पत्र और ओबीसी आरक्षण की पात्रता से है।
लक्ष्मीपति राजू आंध्र प्रदेश मूल के बताए जाते हैं और उनकी जाति किंतल कलिंगा बताई जा रही है। उनका कहना है कि उनके पास सक्षम एसडीएम द्वारा जारी जाति प्रमाण-पत्र मौजूद है और वे महापौर पद के लिए अपनी दावेदारी पेश करेंगे।
यहीं से चुनावी गणित का महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—क्या राज्य के सक्षम अधिकारी द्वारा जारी जाति प्रमाण-पत्र अपने आप नगर निगम की ओबीसी आरक्षित सीट पर चुनाव लडऩे की पात्रता सुनिश्चित करता है, या उम्मीदवार की जाति का छत्तीसगढ़ की लागू ओबीसी आरक्षण व्यवस्था में होना भी जांच का विषय बनेगा?
केंद्रीय ओबीसी सूची और राज्य की सूची—दोनों का महत्व अलग
आरक्षण व्यवस्था में केंद्रीय और राज्य स्तर की सूचियां अलग-अलग प्रयोजनों के लिए लागू होती हैं। किसी जाति का केंद्रीय ओबीसी सूची में होना अपने आप यह नहीं बताता कि संबंधित व्यक्ति को छत्तीसगढ़ की राज्य स्तरीय आरक्षण व्यवस्था में भी वही लाभ मिलेगा।
27 जनवरी 2026 को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर में सुमन कुमारी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य मामले में न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने राज्य-विशिष्ट आरक्षण के सिद्धांत पर विस्तार से विचार किया। न्यायालय ने कहा कि आरक्षण लाभ और सामाजिक स्थिति का प्रमाण-पत्र संबंधित राज्य की व्यवस्था से जुड़ा होता है तथा दूसरे राज्य में प्रवास मात्र से आरक्षण का अधिकार स्वत: प्राप्त नहीं होता। मामले में यह भी देखा गया कि संबंधित भर्ती के लिए छत्तीसगढ़ के सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी स्थायी जाति प्रमाण-पत्र की आवश्यकता थी। ?
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लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि यह फैसला शिक्षा विभाग में नियुक्ति से जुड़े मामले में आया था। इसलिए इसे भिलाई नगर निगम महापौर चुनाव पर सीधे लागू मान लेना उचित नहीं होगा। नगर निगम चुनाव के लिए लागू निर्वाचन कानून, आरक्षण संबंधी प्रावधान, उम्मीदवार की सामाजिक स्थिति और सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाण-पत्र—इन सभी की जांच के बाद ही अंतिम स्थिति स्पष्ट होगी।
लक्ष्मीपति राजू की दावेदारी मजबूत, लेकिन सवाल का जवाब जरूरी
राजनीतिक रूप से देखें तो लक्ष्मीपति राजू भिलाई की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय चेहरा हैं। वे सेक्टर-7 से लगातार चार बार पार्षद रहे हैं। छात्र राजनीति से सक्रिय राजनीति में आए राजू ने अपने क्षेत्र में मजबूत राजनीतिक पकड़ बनाई है। वे दो बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भी पार्षद का चुनाव जीत चुके हैं।
जनता के बीच सक्रियता और संगठन में प्रभाव के चलते महापौर पद के लिए उनका नाम मजबूत दावेदारों में लिया जाना स्वाभाविक है। लेकिन आरक्षित सीट पर दावेदारी केवल राजनीतिक स्वीकार्यता से नहीं, बल्कि वैधानिक पात्रता से भी तय होती है।
इसीलिए जाति प्रमाण-पत्र को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट समाधान चुनावी प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होगा।
सवाल प्रमाण-पत्र के अस्तित्व से आगे का है
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण अंतर यही है कि "जाति प्रमाण-पत्र है या नहीं" और "उस प्रमाण-पत्र के आधार पर संबंधित आरक्षित पद के लिए उम्मीदवार कानूनी रूप से पात्र है या नहीं"—ये दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं।
यदि लक्ष्मीपति राजू के पास छत्तीसगढ़ के सक्षम अधिकारी द्वारा जारी वैध प्रमाण-पत्र है, तो उस प्रमाण-पत्र की वैधानिकता, उसमें दर्ज जाति तथा प्रमाण-पत्र जारी करने के आधार की जांच संबंधित प्रक्रिया के अनुसार होगी।
वहीं, यदि किसी जाति की केंद्रीय सूची और राज्य की लागू आरक्षण सूची में स्थिति अलग है, तो उसका प्रभाव भी चुनावी पात्रता की जांच में महत्वपूर्ण हो सकता है।
बाहरी राज्य से आए उम्मीदवारों की पात्रता पर भी उठ सकता है सवाल
यह मुद्दा केवल लक्ष्मीपति राजू तक सीमित नहीं है। भिलाई-दुर्ग की राजनीति में दूसरे राज्यों से आकर लंबे समय से रहने वाले कई लोग सक्रिय राजनीति में हैं। ऐसे में आरक्षित सीटों पर चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों की सामाजिक स्थिति और आरक्षण पात्रता भविष्य में भी राजनीतिक बहस का विषय बन सकती है।
सिर्फ यह तथ्य कि कोई व्यक्ति लंबे समय से छत्तीसगढ़ में रह रहा है, अपने आप आरक्षित वर्ग की चुनावी पात्रता का अंतिम आधार नहीं माना जा सकता। लागू कानून, संबंधित आरक्षण सूची, सामाजिक स्थिति प्रमाण-पत्र और निर्वाचन नियमों का परीक्षण ही निर्णायक होगा।
अधिवक्ता की नजर में भी नियम-कानून ही आधार
इस विषय पर वरिष्ठ अधिवक्ता रविशंकर सिंह का कहना है कि आरक्षण से संबंधित मामलों में नियम और कानून का पालन ही मूल आधार है। उनके अनुसार केवल प्रमाण-पत्र होना ही पूरी प्रक्रिया का अंतिम आधार नहीं माना जा सकता। प्रमाण-पत्र किस आधार पर जारी हुआ, उसमें कौन-सी जाति दर्ज है और संबंधित राज्य की आरक्षण व्यवस्था में उस जाति की स्थिति क्या है—इन पहलुओं को देखना आवश्यक होगा।
कांग्रेस के सामने भी आसान नहीं होगा फैसला
महापौर पद के लिए कांग्रेस में कई नामों की चर्चा है और लक्ष्मीपति राजू उनमें प्रमुख दावेदार बताए जा रहे हैं। हालांकि पार्टी ने अभी किसी नाम पर अंतिम फैसला नहीं किया है।
ऐसे में जाति प्रमाण-पत्र और ओबीसी आरक्षण से जुड़ा सवाल पार्टी के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। प्रत्याशी चयन से पहले यदि संबंधित उम्मीदवार की चुनावी पात्रता पूरी तरह स्पष्ट हो जाए तो भविष्य में किसी कानूनी विवाद की संभावना भी कम की जा सकती है।
फिलहाल स्थिति दो अलग-अलग दावों के बीच खड़ी दिखाई देती है—एक ओर लक्ष्मीपति राजू के पास एसडीएम द्वारा जारी जाति प्रमाण-पत्र होने का उनका दावा है, दूसरी ओर उनकी जाति की राज्य एवं केंद्रीय आरक्षण व्यवस्था में स्थिति को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
अब निगाह चुनावी प्रक्रिया पर
अंतत: यह तय करना कि लक्ष्मीपति राजू भिलाई नगर निगम की ओबीसी आरक्षित महापौर सीट से चुनाव लडऩे के लिए पात्र हैं या नहीं, सक्षम निर्वाचन प्राधिकारी और लागू कानून-नियमों के आधार पर ही संभव होगा।
इसलिए फिलहाल इसे किसी व्यक्ति की पात्रता पर अंतिम फैसला नहीं, बल्कि चुनाव से पहले उठे एक महत्वपूर्ण वैधानिक सवाल के रूप में देखा जाना चाहिए।
भिलाई की महापौर की कुर्सी के लिए सियासी दौड़ अभी शुरू ही हुई है, लेकिन लक्ष्मीपति राजू की दावेदारी ने एक अहम प्रश्न जरूर सामने ला दिया है—
"क्या राज्य के सक्षम अधिकारी द्वारा जारी जाति प्रमाण-पत्र ही पर्याप्त है, या ओबीसी आरक्षित महापौर पद की पात्रता के लिए संबंधित जाति का छत्तीसगढ़ की लागू आरक्षण व्यवस्था में होना भी आवश्यक है?"
*इस सवाल का आधिकारिक और कानूनी जवाब सामने आने के बाद ही भिलाई महापौर चुनाव की तस्वीर पूरी तरह साफ होगी।*

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