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दुर्ग के दीदी - भैया निगम से लेकर केंद्र तक और केंद्र से निगम तक का राजनैतिक सफऱ Featured

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दुर्ग / शौर्यपथ / भारत की राजनीती में दुर्ग जिला एक ऐसा जिला है जहा से दोनों ही पार्टी के नेता दिल्ली तक केन्द्रीय राजनीती कर चुके है और दोनों ही दल के नेताओ में कई तरह की समानताये है तो कई विरोधाभास भी . जी हाँ हम बात करते है दुर्ग जिले में दीदी के नाम से मशहूर भाजपा की राष्ट्रिय महासचिव राज्यसभा सांसद डॉ सरोज पाण्डेय की . भिलाई के मैत्री नगर से एक सामान्य परिवार से राजनितिक सफऱ शुरू करने वाली सरोज पाण्डेय ने दुर्ग निगम में 10 साल तक महापौर के रूप में शहरी सरकार चलाई है महापौर रहते रहते विधायक और सांसद के पद में एक साथ विद्यमान रही .
वर्तमान में डॉ. सरोज पाण्डेय भारत ही नहीं दुनिया के सबसे बड़े संगठन में आठ राष्ट्रिय महासचिव में से एक है , साथ ही राज्यसभा की सांसद भी है . सामान्य परिवार से आने के बाद अपने मेहनत के दम पर महापौर , विधायक और सांसद तक का सफऱ भाजपा के राष्ट्रिय महासचिव के सफऱ तक पहुँचाने के बाद भी जारी है . राजनितिक जीवन में कई उतार चढाव आने के बाद भी यहाँ तक एक बार लोकसभा का चुनाव हारने के बाद भी संगठन ने भरोसा कायम रखा और केंद्र की राजनीती में महासचिव के पद पर शोभित किया . डॉ. सरोज पाण्डेय के बाद उनके ही ख़ास समर्थको को दुर्ग निगम में महापौर के रूप में सत्ता हांसिल हुई जैसे कि वर्तमान में विधायक वोरा के समर्थन से ही धिरक बाकलीवाल को महापौर की खुर्सी प्राप्त हुई .
अब बात करे तो शहर के विधायक अरुण वोरा की पिछले 6 चुनाव में कांग्रेस की तरफ से एक ही प्रत्याशी शहर के लिए निर्धारित रहा यानी की 30 साल के राजनितिक जीवन में 3 हार और तीन जीत के बाद भी शहर के विधायक अरुण वोरा है ये भी संभव है कि भविष्य के चुनाव में शहर विधायक के प्रत्याशी के रूप में एक बार फिर अरुण वोरा का नाम आये या हो सकता है कि युवाओ की मांग के अनुसार विधायक पुत्र को टिकिट मिल जाए जो भी हो कांग्रेस की तरफ से एक ही चेहरा या एक ही परिवार को मौका मिलेगा जो की भविष्य में तय होगा किन्तु अगर वर्तमान की बात करे तो लगभग एक साथ राजनीती शुरू करने वाले शहर के लाडले अरुण भैया ( कांग्रेस ) और भाजपा से डॉ. सरोज पाण्डेय उफऱ् दीदी दोनों ने ही राजनीती की शुरुवात लगभग एक साथ की थी किन्तु तब स्थिति बहुत ही अलग थी तब अरुण वोरा देश के कद्दावर नेता मोतीलाल वोरा जो मुख्यमंत्री , राज्यपाल और अखिल भारतीय कांग्रेस के सालो से कोषाध्यक्ष पद पर रहे साथ ही गाँधी परिवार के सबसे करीबी रहे है बावजूद इसके अरुण वोरा दुर्ग की राजनीती से कभी बाहर नहीं जा पाए और दुर्ग तक सीमित रहे . अरुण वोरा के दुर्ग की राजनितिक तक सीमित रहने से दुर्ग का कोई भी कांग्रेसी ब्लाक अध्यक्ष , विधानसभा क्षेत्र का अध्यक्ष , विधायक प्रतिनिधि , सांसद प्रतिनिधि से आगे नहीं बढ़ पाया क्योकि आगे बढऩे के लिए उनके नेता को भी आगे बढऩे का इंतज़ार करना पडा . दुर्ग में आज ऐसे कई कांग्रेसी है जो धीरे धीरे ग्रामीण राजनीती की तरफ तो कोई वैशानी नगर की तरफ तो कोई भिलाई की तरफ रुख कर लिया ताकि आगे बढ़ सके .
जबकि इसके विपरीत दुर्ग जो एक समय कांग्रेस का गढ़ था इस गढ़ में स्व. हेमचंद यादव ने सेंध मारी और सरकार में मंत्री पद पर 10 सालो तक रहे , स्व. हेमचंद यादव भी दुर्ग बैगा पारा के सामान्य यादव परिवार से मंत्री पद तक का सफऱ फिर प्रदेश उपाध्यक्ष के पद पर संगठन में प्रदेश स्तर की राजनीती में सक्रीय रहे . वही भाजपा से दूसरी बड़ी नेत्री के रूप में डॉ. सरोज पाण्डेय आगे बड़ी जो आज भाजपा के केन्द्रीय संगठन में एक महत्तवपूर्ण पद पर है और कई प्रदेशो में प्रभारी की भूमिका का कुशल तरीके से नेत्रित्व भी कर चुकी है . उनके कई समर्थक विधायक तक का सफऱ तय कर चुके है और अपनी एक अलग पहचान बना चुके है . वही दुर्ग कांग्रेस में संगठन की बात करे पद की बात करे या अन्य किसी भी समबन्ध में कांग्रेस की चर्चा हो पिछले 40 सालो से एक ही नाम . दुर्ग कांग्रेस से आज वर्तमान में ऐसा कोई नहीं जो प्रदेश स्तर की राजनीति तो दूर जिले स्तर की राजनीती कर रहा हो ऐसे में वर्तमान में कई कांग्रेसी दबी जुबान में और कई बार तो खुले में भी इस बात को कह चुके है कि दुर्ग में कांग्रेस के कार्यकर्ता के रूप में राजनीती की शुरुवात कार्यकत्र्ता के रूप में ही अंत भी . यह आंकलन पूर्व से लेकर वर्तमान राजीनीतिक स्तर का आंकलन मात्र है भविष्य में कोई और दुर्ग से प्रदेश स्तर या केंद्र स्तर पर भी पहुँच सकता है क्योकि भविष्य किसी ने नहीं देखा किन्तु भूतकाल सबके सामने है .

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