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रायपुर/ शौर्यपथ / एथेनाल मिश्रित पेट्रोल (ई-20) के कारण जनता परेशान हो रही है। प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि ई-20 पेट्रोल देश की जनता के लिए मुसीबत बना। मोदी सरकार ने नफा नुकसान का वैज्ञानिक परीक्षण किये बिना पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनाल मिला कर पेट्रोल बेचना शुरू कर दिया है जिसके कारण लोगों के वाहन खराब हो रहे है। ई-20 पेट्रोल के कारण लोगों की गाड़ियां न सिर्फ खराब हो रही है इस एथेनाल वाले पेट्रोल के कारण वाहनों की माईलेज भी आधा हो गया है। मोदी सरकार ने अपने एक मंत्री की जिद और उनके पुत्रों के व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए पूरे देश को संकट में डाल दिया है। ई-20 पेट्रोल आम पेट्रोल की अपेक्षा शुरू नहीं है इसीलिए माईलेज में कमी आ रही है तथा गाड़ियों के इंजन भी खराब हो रहे है।
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि विशेषज्ञों का कहना है ई-20 पेट्रोल के कारण एथेनाल हवा से नमी को जल्दी सोख लेता है। पुराने वाहनों में लगे मेटल (लोहे) के फ्यूल टैंक और फ्यूल पंप में इस नमी के कारण अंदर ही अंदर जंग लगने की संभावना बढ़ जाती है, जो इंजन में जाकर उसे नुकसान पहुंचा सकता है।
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि एथेनाल एक बेहतरीन (घुलनशील) की तरह काम करता है। अप्रैल 2023 से पहले बनी (या केवल ई-10 के लिए डिजाइन की गई) गाड़ियों के रबर सील, गैस्कैट, प्लास्टिक और फ्यूल पाइप एथेनाल के संपर्क में आने से कमजोर होकर टूटने या रिसने लगते है।
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि लंबे समय तक ई-10 या उससे कम क्षमता के लिए बनी गाड़ियों में सीधे ई-20 ईंधन डालने से फ्यूल इंजेक्टर जाम हो सकते है और महंगे पुर्जे खराब हो सकते है, जिससे भारी मेंटेनेंस खर्च उठाना पड़ सकता है।
रायपुर / शौर्यपथ (राजनितिक) /पूर्व मंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता मोहम्मद अकबर ने नकटी प्रकरण में मंत्री केदार कश्यप द्वारा दी गई चुनौती को स्वीकार करते हुए कहा है कि जो दस्तावेज सार्वजनिक करने की बात मंत्री कह रहे हैं वे पहले ही सार्वजनिक है।
एक बयान में श्री अकबर ने कहा- यह सत्य है कि शासकीय दस्तावेज स्पष्ट रूप से बताते हैं कि नकटी सहित सेरीखेड़ी, मंदिर हसाैद, रमचंडी, बरौंदा, और रीको की कुल 436.01 हेक्टेयर( करीब 1076 एकड़) भूमि को नगर विकास योजना के नाम पर निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है। इस प्रस्तावित योजना में नकटी की भी कुछ जमीनों को शामिल किया गया है। जिसके बारे में सरकार को स्पष्ट करने का आग्रह किया गया है कि इस योजना में वह विवादित जमीन तो शामिल नहीं है। जहां विध्वंस हुआ है।वन मंत्री केदार कश्यप जी ने इस पर चुनौती देते हुए बयान दिया है कि मोहम्मद अकबर दस्तावेजो को सार्वजनिक करें। जबकि मेरा कहना है कि सभी दस्तावेज सार्वजनिक है, मैंने 11 जुलाई को ही इसे मीडिया के लिए जारी किया है।मंत्री जी की चुनौती का स्वागत हैश्री अकबर ने कहा- मंत्री जी की चुनौती का स्वागत है। लेकिन चुनौती देने के पहले उन्हें संबंधित विभाग की निविदा को पढ़ लेना चाहिए था। या संबंधित मंत्री से ही पूछ लेते। मेरे द्वारा जो कहा गया है वह सरकार के दस्तावेज पर आधारित है। किसी अफवाह के आधार पर नहीं। मंत्री जी की जानकारी के लिए स्पष्ट किया जा रहा है कि निविदा सूचना 245 पृष्ठों की है। प्रथम पृष्ठ में नवा रायपुर अटल नगर के लेयर -2 में स्थित टाउन डेवलपमेंट स्कीम( टीडीएस) के लिए आधारभूत संरचना के विकास हेतु डेवलपर के चयन, जिसके बदले मिश्रित उपयोग की भूमि के विकास एवं विक्रय अधिकार प्रदान किए जाएंगे, लिखा है। इस निविदा को प्रस्तुत करने की अंतिम तिथि 22 जुलाई 2026 रखी गई है। पृष्ठ क्रमांक 6 के बिंदु क्रमांक 1.1.4 में ग्रामों के नाम और कुल भूमि का क्षेत्रफल 436.0152 हेक्टेयर लिखा है। पृष्ठ 28, 29, 30, 31, में ले-आउट और नक्शे लगे हैं जो निविदा सूचना में ही हैं। सभी जानकारियों एवं दस्तावेज सार्वजनिक हैं, लेकिन यदि मंत्री जी को और अलग से कोई जानकारी चाहिए तो चुनौती स्वीकार है। दस्तावेज कहां भेजना है, बता दें।
सड़क पर सत्ता से ज़्यादा नज़र आ रही है विपक्ष की चुप्पी, अब फैसला धीरज बाकलीवाल को करना होगा
दुर्ग। लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष केवल सरकार की आलोचना करने के लिए नहीं होता, बल्कि जनता की आवाज़ बनकर सत्ता को जवाबदेह बनाने के लिए होता है। यदि विपक्ष ही अपनी भूमिका से पीछे हट जाए तो नुकसान केवल किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और आम जनता का होता है।
दुर्ग नगर निगम की वर्तमान परिस्थितियों को लेकर शहर में लगातार सवाल उठ रहे हैं। गंदगी, बदहाल व्यवस्थाएं, विकास कार्यों में कथित भेदभाव और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सत्ता पक्ष के भीतर से भी समय-समय पर आवाजें उठती रही हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से उम्मीद नेता प्रतिपक्ष से होती है कि वे इन मुद्दों को निगम परिषद से लेकर सड़कों तक मजबूती से उठाएं। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज होती जा रही है कि नेता प्रतिपक्ष संजय कोहले इन मुद्दों पर अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखा पा रहे हैं।
कांग्रेस संगठन इन दिनों नए तेवर और नई कार्यशैली की बात कर रहा है। प्रदेश नेतृत्व लगातार यह संदेश दे रहा है कि संगठन में केवल पद धारण करने वाले नहीं, बल्कि मैदान में संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता मिलेगी। कई मंचों से यह भी कहा गया है कि जो लोग केवल पद के भरोसे राजनीति कर रहे हैं, उन्हें अब सक्रिय संघर्षशील कार्यकर्ताओं के लिए जगह छोड़नी चाहिए।
ऐसे में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि क्या यही कसौटी नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका पर भी लागू होगी?
जनता यह अपेक्षा करती है कि विपक्ष सत्ता के हर निर्णय की समीक्षा करे, जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाए और यदि कहीं अनियमितता हो तो उसके खिलाफ संघर्ष करे। यदि विपक्ष की सक्रियता केवल औपचारिक बैठकों या सीमित राजनीतिक गतिविधियों तक सिमट जाए तो लोकतंत्र का संतुलन प्रभावित होता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दुर्ग शहर कांग्रेस के जिला अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल के सामने अब संगठनात्मक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण चुनौती है। यदि कांग्रेस को नगर निगम में प्रभावी विपक्ष के रूप में स्थापित करना है तो उसे ऐसा नेतृत्व देना होगा जो सड़कों पर संघर्ष करता दिखाई दे, जनता के बीच उपस्थित रहे और सत्ता पक्ष से वैचारिक दूरी बनाए रखते हुए जनहित के मुद्दों को मुखरता से उठाए।
यह किसी व्यक्ति विशेष के निजी जीवन या व्यक्तिगत संबंधों का विषय नहीं है। सार्वजनिक पद पर बैठे प्रत्येक जनप्रतिनिधि का मूल्यांकन उसके सार्वजनिक कार्यों, सक्रियता और जनता के प्रति जवाबदेही के आधार पर होना स्वाभाविक है।
अब सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है—क्या कांग्रेस संगठन नगर निगम में विपक्ष की भूमिका को और अधिक धार देने के लिए कोई बड़ा निर्णय लेगा, या फिर वर्तमान व्यवस्था को ही जारी रखेगा? इसका उत्तर आने वाले दिनों में संगठन की रणनीति और नेतृत्व के निर्णयों से स्पष्ट होगा।
मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड जैसे भाजपा शासित राज्यों ने अपने प्रदेश के हित में मनरेगा के भार का विरोध किया
रायपुर/ शौर्यपथ / भाजपा शासित राज्य मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड ने मनरेगा में राज्य पर पड़ने वाले बोझ का विरोध किया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल ने मनरेगा के जी राम जी स्वरूप का अनुमोदन करते हुए केंद्र और राज्य का खर्च 60 एवं 40 प्रतिशत की मंजूरी दे दिया है। यह राज्य की जनता पर बोझ है। छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल को भी मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के समान इस कानून पर राज्य के हित में आपत्ति जताना था। यही नहीं भाजपा शासित राज्यों ने किसानी काम के समय मनरेगा के काम बंद करने पर भी आपत्ति जताया है जबकि छत्तीसगढ़ सरकार में बैठे नेताओं ने अपनी कुर्सी बचाने राज्य के हित में विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि ने कहा कि बड़ा प्रश्न यह है कि राज्य के वित्तीय संसाधन सीमित है। राज्य का सारा टैक्स तो जीएसटी के माध्यम से केंद्र लेता है फिर मनरेगा का बोझ राज्य पर डालने से राज्य के अन्य कार्य प्रभावित होंगे। भाजपा सरकार पिछले ढाई साल से वित्तीय रोना रोकर वैसे ही कोई नई योजना नहीं शुरू कर पाई है, अब मनरेगा का भार उठाने के बाद राज्य के और काम भी प्रभावित होंगे। यह फैसला राज्य की जनता के साथ धोखा है। राज्य को मनरेगा के मामले में केंद्र के सामने विरोध प्रकट करना था कि पूरा खर्च केंद्र उठाये या उसके लिए विशेष सहायता करे।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि राज्य मंत्रिमंडल के द्वारा मनरेगा के वित्तीय प्रावधान में 60-40 की मंजूरी दिये जाने का निर्णय राज्य के जनता पर अन्याय है। अभी तक मनरेगा केंद्र प्रवर्तित योजना थी, अब इसमें 40 प्रतिशत भाग राज्य को देना होगा। केंद्र सरकार की चाटुकारिता में साय सरकार ने राज्य के हितों का ख्याल नहीं रखा। राज्य के हिस्से को 40 प्रतिशत करने के केंद्र के फैसले का विरोध करने के बजाय इस राज्य मंत्रिमंडल के द्वारा अनुमोदित कर दिया गया। साथ ही इसके लिए 4000 करोड़ रू. का वित्तीय प्रावधान भी किया गया है, जबकि अभी तक राज्य के मनरेगा पर 6200 करोड़ रू. खर्च होते थे, इसका मतलब है भले घोषित तौर पर दिन बढ़ा दिया लेकिन सरकार की नीयत मनरेगा के काम में कटौती की है जब बजट कम है तो ज्यादा दिन कैसे काम देंगे? जीरामजी कानून पास हुए 8 महीने हो गये। अमूमन 15 जून के बाद मनरेगा के काम बंद हो जाते है। सरकार अब निर्णय ले रही मतलब इस फैसले से 4 माह तक काम नहीं होगा, उसके बाद काम शुरू होगा।
वार्ड 44 और 52 में आयोजित बैठकों में कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, जनसंपर्क अभियान तेज करने और संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाने पर जोर
दुर्ग / शौर्यपथ / प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्देशानुसार दक्षिण ब्लॉक कांग्रेस कमेटी, दुर्ग द्वारा रविवार को वार्ड स्तर पर संगठनात्मक बैठकों का आयोजन किया गया। दक्षिण ब्लॉक अध्यक्ष गुरदीप सिंह भाटिया के नेतृत्व में पहली बैठक शाम 5 बजे वार्ड क्रमांक 44 गुरुघासीदास नगर तथा दूसरी बैठक शाम 6:30 बजे वार्ड क्रमांक 52 बोरसी में संपन्न हुई।
बैठकों में संगठन को बूथ स्तर तक सशक्त बनाने, कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने और आगामी कार्यक्रमों की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई। इस दौरान सभी वार्ड एवं बूथों के रजिस्टर संधारित कर कार्यकर्ताओं की अद्यतन सूची तैयार करने के निर्देश भी दिए गए।
बैठक में निर्णय लिया गया कि कांग्रेस के आगामी कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से संचालित करते हुए जनसंपर्क अभियान को और तेज किया जाएगा। साथ ही कार्यकर्ताओं से केंद्र एवं राज्य सरकार की नीतियों को लेकर कांग्रेस का पक्ष घर-घर तक पहुंचाने का आह्वान किया गया।
इस अवसर पर दक्षिण ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष गुरदीप सिंह भाटिया ने कहा कि प्रदेश नेतृत्व के निर्देशानुसार प्रत्येक वार्ड और बूथ को सक्रिय किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि "कार्यकर्ता ही पार्टी की वास्तविक ताकत हैं। उनके सहयोग और समर्पण से संगठन को जमीनी स्तर तक और अधिक मजबूत बनाया जाएगा।"
बैठक में राय सिंह ढीकोला, अजय शर्मा, प्रकाश जोशी, पोषण साहू, नंदा राऊत, भूपेंद्र वर्मा, ललित उके, सुभाष पाल, एमन साहू, बंटी नवरंग, महेंद्र बघेल, कन्या देशलहरे सहित वार्ड अध्यक्ष, बूथ अध्यक्ष एवं बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
बैठक की कार्यवाही रजिस्टर में दर्ज कर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय को प्रेषित किए जाने की जानकारी दी गई।
(यह समाचार दक्षिण ब्लॉक कांग्रेस कमेटी, दुर्ग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित है।)
निकाय चुनाव से पहले दावेदारों की सक्रियता तेज, स्टार प्रचारकों से लेकर महापौर प्रत्याशी तक नामों की चर्चा; सत्ता और संगठन की परीक्षा बनेगा रिसाली
भिलाई/रिसाली। रिसाली नगर निगम चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने अभी भले ही आधिकारिक तौर पर अपने प्रत्याशियों की घोषणा नहीं की हो, लेकिन दोनों दलों में संभावित चेहरों को लेकर मंथन तेज हो गया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं हैं कि इस बार रिसाली का चुनाव केवल महापौर चुनने का नहीं, बल्कि दोनों प्रमुख दलों की संगठनात्मक ताकत और जनाधार की बड़ी परीक्षा भी होगा।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार कांग्रेस की ओर से पूर्व मंत्री ताम्रध्वज साहू चुनाव प्रचार की कमान संभाल सकते हैं, जबकि भाजपा की ओर से विधायक ललित चंद्राकर प्रमुख रणनीतिक भूमिका में दिखाई दे सकते हैं। दोनों नेताओं के अनुभव और संगठनात्मक पकड़ को देखते हुए चुनावी मुकाबला बेहद रोचक होने की संभावना जताई जा रही है।
महापौर की दौड़ में कई चेहरे, कांग्रेस में सबसे आगे रामेश्वरी का नाम
महापौर पद के संभावित दावेदारों की चर्चा भी तेज हो गई है। कांग्रेस में रामेश्वरी दिवाकर गायकर का नाम सबसे प्रमुख दावेदार के रूप में सामने आ रहा है। वहीं हेमिन चतुर्वेदी भी टिकट की दौड़ में सक्रिय मानी जा रही हैं। हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व और चुनावी समीकरणों के आधार पर लिया जाएगा।
भाजपा में भी दावेदारों की लंबी कतार
भाजपा में भी महापौर पद को लेकर कई नाम चर्चा में हैं। पार्टी के भीतर पार्वती ढीढ़ी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। इसके अलावा चंद्रकली चतुर्वेदी, हिंदी डाहरे सहित अन्य संभावित दावेदार भी संगठन के संपर्क में बताए जा रहे हैं। उम्मीदवार चयन में संगठन, सामाजिक समीकरण और जीत की संभावना अहम आधार बन सकते हैं।
40 वार्ड, सीधा मुकाबला और प्रतिष्ठा की लड़ाई
रिसाली नगर निगम के 40 वार्डों में इस बार मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही माना जा रहा है। हालांकि आम आदमी पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दल भी चुनावी मैदान में सक्रिय होने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुकाबले का केंद्र कांग्रेस और भाजपा ही रहेंगी।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार प्रदेश में भाजपा की सरकार होने के कारण चुनाव में सत्ता पक्ष को प्रशासनिक अनुभव का लाभ मिल सकता है, जबकि कांग्रेस स्थानीय मुद्दों और अपने पारंपरिक जनाधार के भरोसे मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है।
28 जून तक नामांकन, ऑनलाइन मतदान से होगा नए अध्यक्ष का चुनाव; संगठन ने अपनाया निष्पक्ष रुख
दुर्ग। दुर्ग शहर युवा कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव ने अब पूरी तरह राजनीतिक सरगर्मी पैदा कर दी है। नामांकन प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है और 28 जून तक नामांकन दाखिल किए जा रहे हैं। चुनाव की तिथि की आधिकारिक घोषणा भले अभी शेष हो, लेकिन यह तय है कि मतदान पूरी तरह ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से कराया जाएगा।
वर्तमान चुनावी परिदृश्य में ऋषि साहू और मनीष सोनवानी सबसे मजबूत दावेदारों के रूप में उभरकर सामने आए हैं। दोनों युवा नेता लगातार कार्यकर्ताओं और युवा मतदाताओं के बीच जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। संगठन के भीतर भी दोनों की सक्रियता और स्वीकार्यता को लेकर सकारात्मक चर्चा है।
सूत्रों के अनुसार, रौनक दुबे ने भी अध्यक्ष पद के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत की है, जिससे चुनावी मुकाबला और अधिक दिलचस्प हो गया है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों की नजर फिलहाल मुख्य रूप से ऋषि साहू और मनीष सोनवानी के बीच बनते मुकाबले पर टिकी हुई है।
संगठन ने नहीं खोले अपने पत्ते
इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संगठन ने किसी भी प्रत्याशी के समर्थन में आधिकारिक रुख नहीं अपनाया है। संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि "सभी प्रत्याशी हमारे अपने हैं। जो कार्यकर्ताओं का अधिक विश्वास प्राप्त करेगा, वही विजयी होगा। संगठन पूरी तरह निष्पक्ष है।"
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संगठन का यह निर्णय भविष्य में किसी प्रकार की गुटबाजी से बचने और लोकतांत्रिक परंपरा को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
35 वर्ष तक के युवाओं को मिलेगा मतदान का अधिकार
युवा कांग्रेस के संगठनात्मक नियमों के अनुसार अध्यक्ष पद के चुनाव में 35 वर्ष तक की आयु वाले सदस्य ही मतदान कर सकेंगे। मतदान ऑनलाइन होने से युवा मतदाताओं में भी उत्साह का माहौल दिखाई दे रहा है।
जीत किसी की भी हो, संगठन रहेगा मजबूत
चुनावी प्रतिस्पर्धा के बावजूद सबसे सकारात्मक संदेश दोनों प्रमुख दावेदारों की ओर से सामने आया है। ऋषि साहू और मनीष सोनवानी दोनों ने स्पष्ट कहा है कि चुनाव परिणाम चाहे जो भी हो, वे मिलकर संगठन को बूथ स्तर तक और अधिक मजबूत बनाने का कार्य करेंगे। दोनों नेताओं ने आपसी सामंजस्य और कांग्रेस संगठन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
वरिष्ठ नेताओं का मिल रहा निष्पक्ष सहयोग
इस पूरे चुनाव में वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं द्वारा भी निष्पक्ष भूमिका निभाई जा रही है। संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी सभी दावेदारों को समान अवसर देने और चुनाव प्रक्रिया को लोकतांत्रिक एवं पारदर्शी बनाने पर जोर दे रहे हैं।
बूथ स्तर तक संगठन विस्तार पर रहेगा फोकस
दुर्ग युवा कांग्रेस का यह चुनाव केवल नए अध्यक्ष के चयन तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आगामी राजनीतिक चुनौतियों की तैयारी के रूप में भी देखा जा रहा है। कांग्रेस संगठन लगातार बूथ स्तर तक अपनी सक्रियता बढ़ाने की रणनीति पर कार्य कर रहा है और माना जा रहा है कि नया युवा अध्यक्ष संगठन की इस रणनीति को और गति देगा।
अब सभी की निगाहें ऑनलाइन मतदान की तिथि की आधिकारिक घोषणा और नामांकन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद बनने वाले अंतिम चुनावी समीकरणों पर टिकी हुई हैं।
काला दिवस मनाने वाली भाजपा को कांग्रेस का पलटवार, कहा- संवैधानिक आपातकाल और वर्तमान हालात की तुलना नहीं छिपा सकती सच्चाई
रायपुर। आपातकाल की बरसी पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा मनाए जा रहे "काला दिवस" को लेकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष दीपक बैज ने भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि देश के लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा आज भाजपा का अलोकतांत्रिक चरित्र बन चुका है।
दीपक बैज ने कहा कि वर्ष 1975 में लगाया गया आपातकाल संविधान के प्रावधानों के तहत लागू किया गया था। उस समय देश में उत्पन्न परिस्थितियों और आंतरिक संकट को देखते हुए राष्ट्रपति द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आपातकाल की घोषणा की गई थी, जिसे निर्धारित समय के बाद समाप्त भी कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आज उस ऐतिहासिक घटना को राजनीतिक हथियार बनाकर भ्रम फैलाने का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि वास्तविक चिंता का विषय वर्तमान परिस्थितियां हैं, जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के कार्यकाल में संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव बढ़ा है, विपक्षी दलों को कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं तथा केंद्रीय एजेंसियों का राजनीतिक उपयोग हो रहा है।
बैज ने दावा किया कि चुनाव आयोग, जांच एजेंसियों और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर देशभर में सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों के नेताओं पर कार्रवाई, दल-बदल की राजनीति और निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने की घटनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती हैं।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, करों का बोझ, पेपर लीक की घटनाएं और आम नागरिकों की समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। उनके अनुसार लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं होता, बल्कि जनता की आवाज को सुनना और संस्थाओं की स्वतंत्रता बनाए रखना भी उसकी मूल आत्मा है।
दीपक बैज ने कहा कि जो संगठन और राजनीतिक दल कभी आपातकाल के विरोध को अपना प्रमुख मुद्दा बनाते थे, वे आज अपनी ही सरकार के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों पर उठ रहे सवालों पर मौन दिखाई देते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि किसानों, युवाओं और विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए प्रशासनिक और कानूनी तंत्र का उपयोग किया जा रहा है।
कांग्रेस ने भाजपा द्वारा मनाए जा रहे काला दिवस को राजनीतिक दिखावा बताते हुए कहा कि यदि लोकतंत्र और संविधान की वास्तविक चिंता है तो पहले वर्तमान व्यवस्था में उठ रहे सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए। वहीं भाजपा लगातार कांग्रेस पर आपातकाल के ऐतिहासिक अध्याय को लेकर निशाना साध रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आपातकाल की बरसी को लेकर छिड़ा यह विवाद आने वाले समय में केंद्र और विपक्ष के बीच वैचारिक संघर्ष को और तीखा कर सकता है। फिलहाल कांग्रेस और भाजपा दोनों लोकतंत्र, संविधान और संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगा रही हैं, जिससे राजनीतिक माहौल और गर्म होने के संकेत मिल रहे हैं।
दो-तिहाई पार्षदों का एक साथ केरल रवाना होना बना चर्चा का विषय, शहर की समस्याओं के बीच सियासी समीकरणों और संभावित राजनीतिक खेल पर उठ रहे सवाल।
दुर्ग राजनीतिक।
दुर्ग की राजनीति में इन दिनों विकास, गुटबाजी और सियासी रणनीतियों का ऐसा संगम दिखाई दे रहा है, जिसने नगर निगम की राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। नगर निगम के बड़ी संख्या में पार्षदों का सामूहिक रूप से केरल भ्रमण पर जाना केवल एक पर्यटन यात्रा है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है, यही प्रश्न आज शहर के राजनीतिक गलियारों से लेकर आम नागरिकों के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बन चुका है।
राजनीति में संख्या शक्ति का अपना महत्व होता है। सत्ता पक्ष अपने संगठन और जनप्रतिनिधियों को मजबूत रखने का प्रयास करता है तो विपक्ष सत्ता की कमजोर कड़ियों को तलाशने में जुटा रहता है। दुर्ग नगर निगम की वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो निगम की सामान्य सभाओं से लेकर विभिन्न विकास कार्यों तक लगातार मतभेद और टकराव की स्थिति दिखाई देती रही है। कई अवसरों पर भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और निर्दलीय पार्षदों को एक सुर में निगम प्रशासन तथा शहरी सरकार के नेतृत्व पर सवाल उठाते देखा गया है।
ऐसे समय में जब बरसात का मौसम शुरू हो चुका है और शहर के अनेक वार्ड जलभराव, गंदगी, अधूरी सफाई व्यवस्था, बदहाल सड़कों और मूलभूत सुविधाओं की समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब बड़ी संख्या में पार्षदों का एक साथ दस दिन की यात्रा पर निकलना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है। यह किसी व्यक्ति विशेष की यात्रा का विरोध नहीं है, बल्कि जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं पर उठता एक लोकतांत्रिक प्रश्न है।
जनप्रतिनिधि केवल व्यक्तिगत नागरिक नहीं होते। वे अपने वार्ड और हजारों नागरिकों की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे में जब शहर समस्याओं से घिरा हो और निगम के भीतर राजनीतिक असंतोष भी लगातार सामने आ रहा हो, तब सामूहिक यात्रा का राजनीतिक महत्व स्वतः बढ़ जाता है।
इसी कारण निगम क्षेत्र में "ऑपरेशन पैंथर" की चर्चा जोर पकड़ रही है। हालांकि महापौर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना कानूनी रूप से आसान नहीं है, लेकिन राजनीतिक इतिहास गवाह है कि कई बार बड़ी राजनीतिक घटनाओं की शुरुआत सीधे टकराव से नहीं बल्कि रणनीतिक बैठकों और समूहबद्ध गतिविधियों से होती है। यही कारण है कि पार्षदों का यह सामूहिक भ्रमण केवल पर्यटन न मानकर राजनीतिक दृष्टि से भी देखा जा रहा है।
चर्चा का दूसरा पहलू आर्थिक है। यात्रा में शामिल पार्षदों द्वारा अलग-अलग राशि बताए जाने से भी जिज्ञासाएं बढ़ी हैं। कोई दस हजार रुपये प्रति व्यक्ति बता रहा है तो कोई पंद्रह हजार रुपये। वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों में दस दिनों का केरल भ्रमण इतनी कम लागत में संभव कैसे हो रहा है, यह भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी पूछा जा रहा है कि यदि यात्रा की वास्तविक लागत अधिक है तो शेष खर्च का वहन कौन कर रहा है।
हालांकि इस प्रश्न का कोई आधिकारिक उत्तर सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राजनीति में कोई भी सामूहिक गतिविधि बिना किसी उद्देश्य के नहीं होती। अक्सर दिखाई देने वाले चेहरे अलग होते हैं और रणनीति तैयार करने वाले चेहरे अलग। यही कारण है कि इस यात्रा को लेकर कई तरह के राजनीतिक अनुमान लगाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर, निगम की राजनीति में लंबे समय से विकास कार्यों को लेकर भी मतभेद सामने आते रहे हैं। कई पार्षदों ने सामान्य सभा में आरोप लगाया है कि विकास कार्यों के आवंटन और स्वीकृति में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जाता है तथा जनप्रतिनिधियों को विश्वास में नहीं लिया जाता। स्थानीय विधायक एवं प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव की अनुशंसाओं और विकास योजनाओं को लेकर भी समय-समय पर राजनीतिक विवाद सामने आते रहे हैं।
इन परिस्थितियों में केरल यात्रा केवल एक भ्रमण कार्यक्रम न रहकर राजनीतिक संकेतों का माध्यम बन गई है। यात्रा समाप्त होने के बाद क्या कोई नया राजनीतिक समीकरण सामने आएगा, क्या निगम के भीतर शक्ति संतुलन में बदलाव होगा, या यह केवल सामूहिक पर्यटन साबित होगा—इन सभी प्रश्नों के उत्तर आने वाला समय ही देगा।
फिलहाल इतना तय है कि दुर्ग नगर निगम का यह घटनाक्रम केवल केरल यात्रा तक सीमित नहीं है। इसके पीछे छिपे राजनीतिक संदेश, संभावित रणनीतियां और बदलते समीकरण आने वाले दिनों में दुर्ग की शहरी राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। इसलिए निगम क्षेत्र से लेकर राजनीतिक गलियारों तक हर नजर अब केरल से लौटने वाले पार्षदों और उनके अगले कदम पर टिकी हुई है।
"केरल की यह यात्रा पर्यटन से अधिक राजनीति का विषय बन चुकी है। अब सबकी निगाहें इस बात पर हैं कि लौटने के बाद पार्षद केवल यात्रा की यादें साझा करेंगे या दुर्ग की राजनीति में किसी नए अध्याय का सूत्रपात करेंगे।"
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