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March 09, 2026
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राजनीति

राजनीति (1193)

मृणेन्द्र चौबे
राजनांदगांव।शौर्यपथ /छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के अध्यक्ष एवं कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त नीलू शर्मा आज पश्चिम बंगाल के पुरुलिया ज़िले के मानबाजार विधानसभा क्षेत्र में आयोजित परिवर्तन यात्रा (रथ यात्रा) में शामिल हुए। इस दौरान कार्यक्रम स्थल पर बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की भीड़ उमड़ी और लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला।
नीलू शर्मा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी विकास, पारदर्शिता और जनकल्याण की नई दिशा देने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि परिवर्तन यात्रा में कार्यकर्ताओं और नागरिकों का उत्साह इस बात का संकेत है कि पश्चिम बंगाल में अब बदलाव की मजबूत इच्छा दिखाई दे रही है और जनता भाजपा के विज़न को स्वीकार कर रही है।
उन्होंने कहा कि यह परिवर्तन यात्रा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास और समर्थन का प्रतीक है। भाजपा का उद्देश्य प्रदेश में विकास, सुशासन और जनकल्याण की नई शुरुआत करना है।
कार्यक्रम में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, केंद्रीय राज्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद सतीश चंद्र दुबे, पुरुलिया के सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो और वरिष्ठ नेत्री एवं पूर्व राज्यसभा सांसद रूपा गांगुली सहित प्रदेश और जिला स्तर के कई पदाधिकारी मौजूद रहे।
मानबाजार विधानसभा में आयोजित परिवर्तन यात्रा ने यह संदेश दिया कि पश्चिम बंगाल अब बदलाव की राह पर आगे बढ़ रहा है और भाजपा के नेतृत्व में विकास का नया अध्याय लिखने के लिए तैयार है।

भाजपा सरकार शराब की खपत बढ़ाने और काली कमाई में लिप्त – सुशील आनंद शुक्ला

रायपुर/ राजनीति /
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि शराबबंदी की बात करने वाली भाजपा सरकार अब शराब में खुलेआम कमीशनखोरी की व्यवस्था तैयार कर रही है।

शुक्ला ने कहा कि साय सरकार द्वारा शराब निर्माता कंपनियों से उनके ब्रांड के रेट पर टेंडर मंगाया गया है, जिसमें सरकार कंपनियों द्वारा दिए गए रेट में अपना सेस जोड़कर वही दर शराब की बोतलों पर चस्पा करेगी और उसी के आधार पर बिक्री कराई जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा रेट नेगोशिएशन की कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई जा रही है, जिससे निर्माता कंपनियां सत्ता में बैठे लोगों का कमीशन जोड़कर रेट तय करेंगी और सरकार उसी दर पर शराब खरीदेगी।

अन्य राज्यों में भारी डिस्काउंट, छत्तीसगढ़ में पूरा रेट

प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग अध्यक्ष ने कहा कि जिन राज्यों में शराब दुकानें निजी ठेकेदारों के माध्यम से संचालित होती हैं, वहां शराब निर्माता कंपनियां 40 से 60 प्रतिशत तक डिस्काउंट देती हैं। वहीं वही ब्रांड अन्य राज्यों में कम दर पर उपलब्ध होते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार पूरे रेट पर शराब खरीदी कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरी प्रक्रिया से घोटाले की बू आ रही है।

शराबबंदी केवल राजनीतिक पाखंड

सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि भाजपा जब विपक्ष में थी, तब शराबबंदी को लेकर बड़े-बड़े आंदोलन और प्रदर्शन किए गए, लेकिन सत्ता में आते ही भाजपा का असली चेहरा सामने आ गया है। उन्होंने कहा कि साय सरकार के फैसले स्पष्ट रूप से शराबखोरी को संरक्षण देने वाले हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा मनपसंद मोबाइल ऐप लागू करने, 67 नई शराब दुकानें खोलने और अब इस वर्ष 30 और नई दुकानों की तैयारी से यह साबित हो गया है कि भाजपा का शराबबंदी का दावा केवल राजनीतिक पाखंड था।

शराब बिक्री बढ़ाने की नीति, काउंटर दोगुने

कांग्रेस नेता ने कहा कि सरकार बनने के बाद शराब की बिक्री बढ़ाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से नीतियां बनाई गईं। पहले से संचालित लगभग 700 शराब दुकानों को कंपोजिट कर देशी और अंग्रेजी शराब एक ही दुकान में बेचने की व्यवस्था की गई, जिससे प्रभावी रूप से करीब 1400 काउंटर बन गए और शराब की उपलब्धता दोगुनी कर दी गई।

अवैध शराब और तस्करी का आरोप

सुशील आनंद शुक्ला ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में अवैध शराब की बिक्री में वृद्धि हुई है। दूसरे राज्यों से शराब की तस्करी हो रही है और बिना होलोग्राम या नकली होलोग्राम वाली शराब सरकारी दुकानों से बेची जा रही है। उन्होंने कहा कि पूरी सरकार शराब से होने वाली काली कमाई में डूबी हुई है।

कांग्रेस ने मांग की कि सरकार शराब नीति, खरीदी प्रक्रिया और रेट निर्धारण की पूरी जानकारी सार्वजनिक करे तथा इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

दुर्ग। शौर्यपथ 

जिला कांग्रेस कमेटी दुर्ग में ऊर्जावान, जमीनी और संघर्षशील युवा नेता राहुल शर्मा को पुनः जिला महामंत्री बनाए जाने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं, युवाओं, वरिष्ठ नेताओं और आमजन में हर्ष और उत्साह की लहर है। उनकी नियुक्ति को संगठन में ऊर्जा, अनुभव और निरंतरता का प्रतीक माना जा रहा है।

राहुल शर्मा का राजनीतिक सफर 2005 में नगर शाला अध्यक्ष के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद

2006 में एनएसयूआई दुर्ग विधानसभा के उपाध्यक्ष,

2008–09 में मध्य ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के महामंत्री,

2010–2012 तथा 2012–2018 तक श्री आर.एन. वर्मा के नेतृत्व में सचिव एवं महामंत्री,

2018 में गया पटेल की अध्यक्षता वाली समिति में महामंत्री के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूती दी।

अब 2026 में उन्हें एक बार फिर जिला महामंत्री का दायित्व सौंपा गया है, जो उनके संगठनात्मक कौशल और नेतृत्व पर विश्वास को दर्शाता है।

राहुल शर्मा का नाम केवल पदों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वे आंदोलनों और जनसंघर्षों में भी अग्रिम पंक्ति में रहे हैं। 2012 में नगर निगम दुर्ग के खिलाफ जनसमस्याओं को लेकर हुए आंदोलन में उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज हुआ, जिसमें वे विवेक मिश्रा, इलियास चौहान, अय्यूब खान, प्रकाश गीते और रज्जन खान के साथ 6 दिन जेल भी गए। इसे उनके संघर्षशील और निडर राजनीतिक जीवन का अहम अध्याय माना जाता है।

अपनी नियुक्ति पर राहुल शर्मा ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व विधायक अरुण वोरा, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री राजेंद्र साहू, तथा शहर कांग्रेस कमेटी दुर्ग के अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें धन्यवाद दिया।

उनकी नियुक्ति पर बधाई देने वालों में युवा साथियों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं की लंबी सूची शामिल है, जिनमें प्रमुख रूप से सुरेश गुप्ता, पिंकी गुप्ता, आशुतोष सिंह, विवेक मिश्रा, नासिर खोखर, विकास पुरोहित, सुरेश देवांगन, प्रकाश शर्मा, गुरदीप भाटिया, विकास राठी, सरोज यादव, प्रवीण चन्द्राकर, छोटे लाला यादव, राकेश सिन्हा, मनीष सोनवानी, लक्ष्मण शर्मा, विक्रांत शर्मा, राजू यादव, योगेश शर्मा, अनूप सिन्हा, विक्की यादव, प्रवीण सिंह, आशीष मेश्राम, सूर्यमणि मिश्रा, बाला पीढ़ियार, सौरभ पांडे, रिंकू शुक्ला, मोनू शर्मा, अजित शुक्ला सहित अनेक कार्यकर्ता शामिल हैं।

कुल मिलाकर, राहुल शर्मा की पुनर्नियुक्ति को दुर्ग कांग्रेस संगठन के लिए मजबूती, युवा नेतृत्व और संघर्ष की नई ऊर्जा के रूप में देखा जा रहा है।

दुर्ग कांग्रेस में नेतृत्व संकट, संगठन सवालों के घेरे में 

दुर्ग। शौर्यपथ राजनीति 

दुर्गनगर निगम के पूर्व महापौर के रूप में धीरज बाकलीवाल की पहचान एक शालीन, सौम्य और मिलनसार जनप्रतिनिधि की रही है। आम जनता के बीच उनका व्यवहारिक व्यक्तित्व स्वीकार्य रहा, लेकिन सक्रिय संगठनात्मक राजनीति में कदम रखते ही उनकी भूमिका पर अब गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। शहर कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद जिस ऊर्जा, आक्रामकता और जमीनी सक्रियता की अपेक्षा कार्यकर्ताओं को थी, वह अब तक दिखाई नहीं दे सकी है।

अध्यक्ष नियुक्ति के साथ ही सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक मीम—जिसमें पैसे देकर अध्यक्ष बनने का तंज कसा गया—को शुरुआत में लोगों ने हल्के-फुल्के व्यंग्य के तौर पर लिया। लेकिन बीते कुछ महीनों की संगठनात्मक कार्यप्रणाली ने उस मज़ाक को अब एक राजनीतिक बहस में बदल दिया है। कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या दुर्ग कांग्रेस वास्तव में मजबूत हो रही है या सिर्फ चेहरों का बदलाव हुआ है?

वरिष्ठ नेताओं से दूरी, कमजोर पकड़ का संकेत

धीरज बाकलीवाल के अध्यक्षीय कार्यकाल में सबसे बड़ा सवाल उनकी वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं से बढ़ती दूरी को लेकर खड़ा हो रहा है। दीपक दुबे, आर.एन. वर्मा, अरुण वोरा जैसे अनुभवी नेताओं का मंच से धीरे-धीरे गायब होना केवल संयोग नहीं माना जा रहा। इसके विपरीत, जनसमर्थन खो चुके और सीमित प्रभाव वाले चेहरों के साथ नज़दीकियां संगठन की दिशा पर सवाल खड़े करती हैं।

यह तुलना स्वाभाविक रूप से भाजपा संगठन से की जा रही है, जहां आज भी चंद्रिका चंद्राकर, उषा टावरी, रमशिला साहू, लाभचंद बाफना जैसे वरिष्ठ नेताओं को सम्मान, मंच और संगठनात्मक स्थान प्राप्त है। भाजपा में वरिष्ठ-कनिष्ठ संतुलन को संगठनात्मक मजबूती की रीढ़ माना जाता है, जबकि दुर्ग कांग्रेस में यही संतुलन टूटता नजर आ रहा है।

कार्यकारिणी बनी, लेकिन नाराज़गी भी

जिला व शहर कार्यकारिणी की घोषणा के बाद असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। अनुभवी और संघर्षशील नेताओं को दरकिनार कर अपेक्षाकृत नए और अनुभवहीन लोगों को बड़ी जिम्मेदारियां देना अब चर्चा का विषय बन चुका है। यह नाराज़गी केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रही—कई कार्यकर्ता सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदेश नेतृत्व तक अपनी पीड़ा पहुंचाने लगे हैं।

हाल ही में कांग्रेस कार्यालय से जारी एक तस्वीर, जिसमें अध्यक्ष सभी पदाधिकारियों से मुलाकात करते दिखाई देने थे, उल्टा असर डाल गई। तस्वीर में चंद लोगों की मौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या संगठन के भीतर ही संवाद टूट रहा है?

भूपेश बघेल की पसंद पर भी सवाल

धीरज बाकलीवाल का चयन छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके भूपेश बघेल की पसंद के रूप में हुआ। ऐसे में अब जब संगठनात्मक निष्क्रियता और असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, तो आलोचना की आंच भूपेश बघेल तक भी पहुंचने लगी है। हालांकि यह स्पष्ट है कि चयन के बाद संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी शहर अध्यक्ष की होती है।

नेता प्रतिपक्ष की निष्क्रियता ने बढ़ाई मुश्किलें

दुर्ग नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष के रूप में संजय कोहले की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बदहाल निगम व्यवस्था, जनसमस्याएं और प्रशासनिक विफलताओं के बावजूद विपक्ष की आवाज़ कमजोर रही है। इसे भी धीरज बाकलीवाल के निर्णयों और नेतृत्व क्षमता से जोड़कर देखा जा रहा है।

अस्तित्व की लड़ाई या नई शुरुआत?

आज दुर्ग कांग्रेस एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सवाल साफ है—

क्या धीरज बाकलीवाल मजबूत इच्छाशक्ति, स्पष्ट निर्णय और समावेशी नेतृत्व के साथ मैदान में उतरेंगे?

या फिर कांग्रेस दुर्ग में केवल दस्तावेजों और पुरानी स्मृतियों तक सिमट कर रह जाएगी?

आने वाले चुनाव सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक अस्तित्व की परीक्षा होंगे। अब देखना यह है कि अध्यक्ष पद की कुर्सी धीरज बाकलीवाल के लिए अवसर बनती है या उनकी राजनीतिक उलटी गिनती की शुरुआत।

दुर्ग। शौर्यपथ। भारतीय जनता पार्टी पर “दागदार नेताओं को सर्फ से धोकर राजनीति में शामिल करने” का आरोप लगाने वाली कांग्रेस अब खुद उसी आरोपों के घेरे में नजर आ रही है। दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस की नई कार्यकारिणी समिति के गठन के बाद महामंत्री पद पर लक्ष्मी साहू की नियुक्ति ने संगठन के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।

हाल ही में घोषित ग्रामीण कांग्रेस की जंबो कार्यकारिणी में पूर्व जिला पंचायत सदस्य लक्ष्मी साहू को महामंत्री बनाया गया। जैसे ही उनका नाम सूची में सामने आया, राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। सवाल उठने लगे—क्या दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस में साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं की कमी हो गई है? या फिर कांग्रेस भी अब उसी “वाशिंग मशीन” राजनीति की राह पर है, जिसका वह विरोध करती रही है?

नियुक्ति पर उठे सवाल, संगठन में असंतोष की आहट

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जब कांग्रेस पहले से ही बैकफुट पर मानी जा रही है, ऐसे समय में यह नियुक्ति पार्टी के भीतर असहजता का कारण बन गई है। सूत्रों के अनुसार, कुछ कांग्रेसी सदस्य ही इस निर्णय पर सवाल उठा रहे हैं। चर्चा का केंद्र दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष राकेश ठाकुर की कार्यशैली भी बन गई है।

लक्ष्मी साहू का नाम हाल ही में एक विवाद के कारण भी सुर्खियों में रहा है। रसमड़ा निवासी संतोष रामटेक ने पुलिस अधीक्षक को शिकायत सौंपकर लक्ष्मी साहू, उनके पति यशवंत साहू और मोनिका साहू पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत में आरोप है कि कांग्रेस पार्टी के नाम पर नौकरी दिलाने का झांसा देकर पैसे लिए गए और कार्य न होने पर रकम वापस मांगने पर कथित रूप से धमकी दी गई। संतोष रामटेक ने यह भी दावा किया है कि उनकी मां के साथ मारपीट की गई, जिसका वीडियो उन्होंने सबूत के तौर पर प्रस्तुत करने की बात कही है।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि या पुलिस द्वारा किसी निर्णायक कार्रवाई की जानकारी अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजनीतिक चर्चा में इन आरोपों का उल्लेख प्रमुखता से हो रहा है।

क्या संगठन को अंधेरे में रखा गया?

लक्ष्मी साहू की नियुक्ति के बाद यह भी चर्चा उठी कि क्या राकेश ठाकुर ने संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को विश्वास में लिया था? क्या यह निर्णय सर्वसम्मति से हुआ या शीर्ष स्तर पर तय कर दिया गया?

राकेश ठाकुर की ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के समय भी संगठन के भीतर विरोध के स्वर सुनाई दिए थे। ऐसे में अब यह नया विवाद उनके नेतृत्व पर दोबारा सवाल खड़े कर रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि हाल ही में लक्ष्मी साहू का रामटेक परिवार से विवाद सामने आया था, जिससे यह मुद्दा और संवेदनशील बन गया है।

‘काबिलियत या सेटिंग’ की बहस

संगठन के भीतर यह भी फुसफुसाहट है कि क्या नियुक्तियां काबिलियत के आधार पर हो रही हैं या “सेटिंग” के जरिए? क्या कांग्रेस में सर्वसम्मति और सामूहिक निर्णय की परंपरा कमजोर पड़ रही है?

पूर्व में भी राकेश ठाकुर पर दुर्ग में कांग्रेसी नेताओं के फोटो पोस्टरों से हटवाने को लेकर विवाद खड़ा हो चुका है। ऐसे में यह नया घटनाक्रम उनकी कार्यप्रणाली को लेकर आलोचनाओं को और बल दे रहा है।

कांग्रेस की छवि पर असर?

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप और चर्चा होना सामान्य बात है, लेकिन जब हर चर्चा नकारात्मक दिशा में जाए तो उसका असर संगठन की छवि पर पड़ना स्वाभाविक है। दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस अब अपनी जंबो टीम के साथ राजनीतिक मुकाबले के लिए मैदान में उतर चुकी है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चयन प्रक्रिया भविष्य में संगठन को मजबूती देती है या आंतरिक असंतोष को और बढ़ाती है।

फिलहाल, लक्ष्मी साहू की नियुक्ति ने दुर्ग की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले समय में पुलिस जांच और संगठनात्मक प्रतिक्रिया किस दिशा में जाती है, यही तय करेगा कि यह विवाद अस्थायी राजनीतिक शोर है या कांग्रेस के लिए दीर्घकालिक चुनौती।

धीरज बाकलीवाल की मर्जी के आगे बौनी साबित हुई प्रदेश संगठन की लिस्ट

दुर्ग। शौर्यपथ।

शौर्यपथ समाचार पत्र द्वारा पूर्व में यह समाचार प्रकाशित किया गया था कि दुर्ग शहर कांग्रेस संगठन रिमोट कंट्रोल से संचालित नजर आ रहा है। उस समाचार के बाद दुर्ग कांग्रेस में हलचल जरूर मची, वर्षों से शांत पड़े गुटों में संवाद की कोशिशें भी दिखीं और मीडिया से दूरी बनाए रखने वाला संगठन अचानक सक्रिय भी हुआ।

लेकिन समय बीतते ही एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि शौर्यपथ की उस रिपोर्ट में उठाया गया संदेह कहीं न कहीं सच तो नहीं था?

प्रदेश कांग्रेस संगठन द्वारा हाल ही में दुर्ग शहर कांग्रेस की अधिकृत सूची जारी की गई, लेकिन जैसे ही दुर्ग शहर कांग्रेस अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल ने स्थानीय स्तर पर पदाधिकारियों की घोषणा की, एक बड़ा संगठनात्मक विरोधाभास सामने आ गया।

? शहर अध्यक्ष द्वारा जिन चार नामों को “कांग्रेस प्रवक्ता” के रूप में घोषित किया गया, वे नाम प्रदेश कांग्रेस संगठन की सूची में कहीं भी दर्ज नहीं हैं।

यहीं से सवाल खड़े होते हैं—

क्या दुर्ग शहर कांग्रेस अध्यक्ष को यह अधिकार है कि वह प्रदेश संगठन की सूची में स्वयं संशोधन करें?

क्या यह निर्णय प्रदेश कांग्रेस की अनुमति से लिया गया है या फिर यह व्यक्तिगत मर्जी का विस्तार है?

और सबसे अहम—क्या इससे संगठन की मर्यादा और अनुशासन को ठेस नहीं पहुंची है?

प्रदेश कांग्रेस द्वारा जारी सूची में कांग्रेस प्रवक्ता पद का कोई उल्लेख ही नहीं है, जबकि स्थानीय स्तर पर अचानक चार प्रवक्ता घोषित कर दिए गए। इससे न केवल संगठनात्मक भ्रम की स्थिति बनी है, बल्कि कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष और अविश्वास भी गहराता जा रहा है।

सूची जारी होते ही दुर्ग शहर कांग्रेस के भीतर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। पार्टी के अंदरूनी हलकों में अब खुलकर यह कहा जा रहा है कि

धीरज बाकलीवाल का कार्यकाल संगठन को आगे ले जाने की बजाय पीछे खींचता नजर आ रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए जिस मुखर, आक्रामक और स्पष्ट नेतृत्व की आवश्यकता होती है, वह दुर्ग शहर कांग्रेस में फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा। कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर शहर अध्यक्ष का बैकफुट पर जाना, विपक्षी राजनीति को कमजोर कर रहा है।

प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जहां लगातार एक मुखर विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं, वहीं दुर्ग शहर कांग्रेस अध्यक्ष के चयन को लेकर अब पार्टी के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। चर्चा यहां तक है कि

प्रदेश संगठन को जिन उम्मीदों के साथ धीरज बाकलीवाल को जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वे अपेक्षाएं अब संदेह के घेरे में हैं।

राजनीतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का साफ कहना है कि

? प्रदेश कांग्रेस संगठन की सूची में बिना अनुमति नाम जोड़ना, संगठनात्मक मर्यादाओं का उल्लंघन है।

? यह कदम “सृजन संगठन अभियान” और अनुशासन की भावना के विपरीत है।

अब निगाहें प्रदेश कांग्रेस संगठन पर टिकी हैं—

क्या प्रदेश संगठन दुर्ग शहर कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा जारी की गई इस सूची पर अपनी मोहर लगाएगा?

या फिर यह स्पष्ट करेगा कि संगठन में अंतिम अधिकार किसका है—प्रदेश का या शहर अध्यक्ष की व्यक्तिगत मर्जी का?

दुर्ग शहर कांग्रेस के भविष्य, उसकी विश्वसनीयता और विपक्ष की भूमिका पर यह मामला अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है।

प्रदेश संगठन इस पर क्या कदम उठाता है, यही तय करेगा कि दुर्ग कांग्रेस संगठन मजबूत होगा या फिर चंद लोगों की खींचतान में उलझकर रह जाएगा।

दुर्ग । छत्तीसगढ़ विधानसभा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पेश किए गए बजट पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज हो गई हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने बजट को 'बेहद अस्पष्ट' करार देते हुए सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह बजट किसानों, मजदूरों, युवाओं और शहर के मध्यम वर्ग की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता।

साहू ने कहा, इस बजट में खेतिहर किसानों, मजदूरों और शहरी मध्यम वर्ग के लिए कोई ठोस प्रावधान नहीं है। रोजगार सृजन, शिक्षा, सिंचाई और युवाओं से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर चुप्पी साध ली गई है। उन्होंने आगे जोर देकर कहा कि कई घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित हैं और जमीनी स्तर पर इनका कोई असर नजर नहीं दिखाई देता।

पूर्व गृहमंत्री ने सरकार के पुराने वादों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पूर्व में किए वादों जैसे रोजगार सृजन, सरकारी भर्तियां और युवाओं के लिए योजनाओं पर अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गयी है। लोगों की बेरोजगारी बढ़ रही है, लेकिन बजट में इसका कोई समाधान नहीं दिखता।

रायपुर। शौर्यपथ। 

छत्तीसगढ़ विधानसभा में आज प्रस्तुत किया गया राज्य का वित्तीय बजट “डबल इंजन सरकार” की हकीकत दिखाता है, जो राज्य को आगे नहीं ले जा रही, बल्कि पीछे की ओर खींच रही है।

इस बजट में कुल बढ़ोतरी मात्र ₹7,000 करोड़ की है - जिसमें रोज़गार सृजन के लिए कोई ठोस रोडमैप नहीं, इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए कोई स्पष्ट योजना नहीं, और राजस्व सृजन का कोई प्रभावी माध्यम नहीं है।

राज्य के संविदा कर्मचारियों को पिछले 3-3 महीनों से वेतन नहीं मिला है। पिछले वित्तीय वर्ष में जिन कार्यों को स्वीकृति मिली थी, वे या तो अब तक शुरू ही नहीं हो पाए हैं या फिर अधूरे पड़े हैं। अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल का कार्य,और राजधानी के मेकाहारा अस्पताल में प्रस्तावित इंटीग्रेटेड हॉस्पिटल व कैंसर यूनिट आज भी लंबित हैं।

राजस्व सृजन का हाल यह है कि राज्य सरकार महात्मा गांधी के शहीद दिवस और होली जैसे पावन पर्वों के दिन भी शराब की दुकानें खोलकर व्यापार चला रही है, क्योंकि इस सरकार के पास वही एक राजस्व का साधन रह गया है।

जब UPA सरकार की मनरेगा योजना प्रभावी थी, तब पिछली बार इसके लिए लगभग ₹4,000 करोड़ का आवंटन था, जिसमें से राज्य सरकार ने सिर्फ़ ₹400 करोड़ ही खर्च किए - बाक़ी बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार से आया।

अब “VB GRAM G” जैसी योजना के नाम पर राज्य सरकार से ₹1,600 करोड़ खर्च करने की उम्मीद की जा रही है। बजट देखकर साफ़ पता चलता है कि राज्य सरकार इतना खर्च करने में सक्षम नहीं है।

इसका सीधा असर ग्रामीण छत्तीसगढ़ में रोज़गार के अवसरों में कमी और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास की रफ़्तार पर पड़ेगा।

विकास की गाड़ी रिवर्स में डाल दी गई है और प्रदेश को आर्थिक व मौलिक पतन की ओर धकेला जा रहा है।

केंद्र और राज्य की सरकारें मिलकर छत्तीसगढ़ की जनता को सिर्फ़ झूठे वादों में उलझाने का काम कर रही हैं।

कार्यकारिणी घोषित होते ही कार्यकर्ताओं में निराशा, गुटबाजी के संकेत तेज

दुर्ग।

दुर्ग शहर कांग्रेस की नई कार्यकारिणी की घोषणा के साथ ही संगठन के भीतर उम्मीदों की जगह निराशा की चर्चा तेज हो गई है। चार दशक तक दुर्ग कांग्रेस की कमान वोरा परिवार के प्रभाव में रही। लंबे अंतराल के बाद छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद के अनुरूप पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल को शहर अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तब यह माना जा रहा था कि संगठन में नई ऊर्जा और सक्रियता का संचार होगा।

लेकिन अध्यक्ष पद संभालने के लगभग चार माह बाद भी कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि संगठन में अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आ रहा।

वोरा बंगले से बाकलीवाल बंगले तक?

शहर में यह चर्चा आम है कि दुर्ग कांग्रेस की राजनीति केवल “चेहरों के बदलाव” तक सीमित रह गई है। पहले जो प्रभाव एक परिवार विशेष का माना जाता था, अब वही केंद्रीकरण दूसरे खेमे में सिमटता दिखाई दे रहा है। कार्यकारिणी की घोषणा के बाद यह धारणा और मजबूत हुई है कि निर्णय प्रक्रिया कुछ सीमित लोगों तक केंद्रित हो गई है।

कई कार्यकर्ता खुलकर तो नहीं, परंतु निजी बातचीत में यह कहने लगे हैं कि संगठन “रिमोट कंट्रोल” से संचालित होता प्रतीत हो रहा है।

गुटबाजी की आहट और सामाजिक संतुलन पर सवाल

नई कार्यकारिणी में कुछ अनुभवहीन चेहरों को प्रमुख जिम्मेदारी दिए जाने पर भी चर्चा गर्म है। वहीं सतनामी समाज, ताम्रकार समाज , बरई समाज और उड़िया समाज जैसे प्रभावी वर्गों की कथित अनदेखी को लेकर भी असंतोष सामने आ रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दुर्ग जैसे सामाजिक रूप से विविध शहर में संतुलन साधना संगठनात्मक मजबूती की पहली शर्त होती है। यदि सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठते हैं, तो उसका असर चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

प्रवक्ताओं की निष्क्रियता भी चर्चा में

कांग्रेस संगठन में प्रवक्ताओं की भूमिका सरकार और निगम की नीतियों के खिलाफ मुखर विपक्ष तैयार करने की होती है। लेकिन वर्तमान संरचना में कुछ निष्क्रिय चेहरों को पुनः स्थान दिए जाने से यह संदेश जा रहा है कि संगठन आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने के मूड में नहीं है।

सोशल मीडिया और जनसंपर्क के दौर में यह कमी संगठन की राजनीतिक धार को कमजोर कर सकती है।

निगम में विपक्ष की भूमिका पर भी प्रश्नचिन्ह

पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल की पसंद से बने नेता प्रतिपक्ष की सक्रियता को लेकर भी कार्यकर्ताओं में असंतोष है। नगर निगम की बदहाल व्यवस्थाओं, नागरिक समस्याओं और विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं के मुद्दों पर अपेक्षित आक्रामकता दिखाई नहीं दी।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जब विपक्ष जनता की आवाज नहीं बन पाता, तो संगठन की विश्वसनीयता स्वतः कमजोर होती है।

क्या पूर्व मुख्यमंत्री के फैसले पर उठेंगे सवाल?

शहर अध्यक्ष की नियुक्ति पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद के अनुरूप मानी जाती रही है। ऐसे में अब संगठन के भीतर उठती आलोचनाओं को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि खुलकर कोई सामने नहीं आ रहा, परंतु यह संकेत मिल रहे हैं कि यदि स्थिति नहीं बदली तो असंतोष सार्वजनिक रूप ले सकता है।

आने वाले चुनाव की परीक्षा

नई कार्यकारिणी घोषित हो चुकी है। अब असली परीक्षा आने वाले चुनावों में होगी। क्या यह टीम अनुभवहीनता के आरोपों से ऊपर उठकर संगठन को नई दिशा दे पाएगी?

या फिर पद ग्रहण की औपचारिक खुशियों तक ही सीमित रह जाएगी?

दुर्ग कांग्रेस के भीतर उठते ये सवाल केवल संगठनात्मक फेरबदल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह आने वाले चुनावी परिणामों की भूमिका भी लिख सकते हैं।

राजनीतिक संदेश स्पष्ट है —

यदि संगठन जमीनी कार्यकर्ताओं को साथ लेकर, सामाजिक संतुलन साधते हुए और आक्रामक विपक्ष की भूमिका में नहीं आता, तो “चेहरे बदलने” से ज्यादा कुछ नहीं बदलेगा।

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