दुर्ग / शौर्यपथ / नगरीय निकाय चुनाव का आगाज हो चूका है पार्षद आरक्षण के बाद दुर्ग निगम के कई वरिष्ठ पार्षद इस आरक्षण के बाद राजनितिक सफ़र के एक ऐसे रास्ते पर पहुँच गए जो उनके लिए डेड एंड साबित हो सकता है वही कुछ पार्षद महापौर की रेस में शामिल होने के लिए अग्रसर है तो कुछ अन्य वार्डो की तलाश किन्तु वर्तमान स्थिति में अगर देखा जाए तो एक बार फिर राजनीती घमासान दोनों ही दलों में देखने को मिलेगी . कुछ सफल भी होंगे तो कुछ के लिए राजनितिक सफ़र 05 साल या अधिक समय के लिए बंद हो जायेगा . राजनितिक पड़ाव का आखिरी सफ़र कांग्रेस में ज्यादा देखने को मिलेगा भाजपा के पार्षदों को एल्डरमैन के रूप में पुनः सक्रियता निभाने का मौका मील सकता है .
भाजपा के शिवेंद्र परिहार , देव नारायण चंद्राकर , अरुण सिंह , मीना सिंह ओम,प्रकाश सेन ऐसे पार्षद रहे है जिन्होंने अपने वार्ड में लगातार सक्रीय भूमिका निभाई और संगठन में भी अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए है किन्तु आरक्षण की मार से अब नै भूमिका की तलाश में है ऐसे में महापौर के आरक्षण का भी इन्हें इंतज़ार है . प्रदेश में भाजपा की सत्ता होने से इनके लिए एल्डरमैन के रूप में एक मार्ग और खुला हुआ है वही महापौर आरक्षण के बाद बनी स्थिति में ए महापौर दावेदार के रूप में भी सामने आ सकते है . भाजपा के ये चार शिवेंद्र परिहार , देव नारायण चंद्राकर , अरुण सिंह,ओम प्रकाश सेन चेहरे अपने राजनितिक गुरुओ के सहारे इस रेस में शामिल है जो वार्ड में लोकप्रिय भी है इसमें से ओम प्रकाश सेन अपने वार्ड में महिला आरक्षित होने से परिवार के महिला सदस्य के साथ मैदान में उतर सकते है और जीत दर्ज कर सकते है वही देव नारायण चंद्राकर बगल के वार्ड में कुच कर अपना निगम का राजनीती सफ़र जारी करे तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा वही एल्डरमैन के लिए भी मार्ग प्रशस्त है .
वही अगर कांग्रेस की बात कही जाए तो ऋषभ जैन किसी अन्य वार्ड से टिकिट की उम्मीद तो कर सकते है किन्तु विधान सभा चुनाव के बाद बनी स्थिति और आरक्षण की मार से इनका आगे का मार्ग लम्बे समय के लिए विराम की दिशा में संकेत कर रहा है . कुछ ऐसी ही स्थिति मनदीप भाटिया की भी है प्रथम बार निगम चुनाव लड़ कर पार्षद और फिर बाद में एमआई सी सदस्य बने किन्तु आरक्षण की ऐसी हवा चली की आगे का मार्ग वर्तमान परिदृश्य में बंद ही नजर आ रहा है . कांग्रेस के वरिष्ठ पार्षद टाइगर अभि जिन्दा है के संबोधन को सार्थक करते हुए एक बार फिर चुनावी मैदान में उअतारने की तैयारी में है ऐसी भी चर्चा है कि वार्ड 39 से ए चुनावी मैदान में उतर सकते है जहाँ से वर्तमान में पुष्पा गुलाब वर्मा मैदान में है इस बार यह वाद सामान्य होने से और पूर्व में कांग्रेस का वार्ड होने से कांग्रेस इस वार्ड को एक बार फिर अपने खेमे में लाने की कोशिश करेगी वही भाजपा के संभावित प्रत्याशी गुलाब वर्मा से मुकाबला करने में मदन जैन ही उपयुक्त हो सकते है . दुर्ग निगम महापौर धीरज बाकलीवाल का वार्ड ओबीसी महिला होने से अब अपने निवास वार्ड 45 जो कि सामान्य है पर निगाह है किन्तु इस वार्ड में कांग्रेस के लिए प्रत्याशी के रूप में पूर्व विधायक अरुण वोरा की पहली पसंद राजेश शर्मा ही हो सकते है . दुर्ग कांग्रेस में राजेश शर्मा ही एक ऐसे कांग्रेसी है जो कही से भी कांग्रेस के लिए सक्रीय नहीं रहे है सिर्फ वोरा परिवार के करीबी होने से इस परिवार के लिए पूर्व विधायक अरुण वोरा सभी नियमो को दरकिनार कर देते है और अपनी कही बातो से भी मुकर जाते है जैसा कि पिछले कार्यकाल में देखने को मिला वार्ड 45 से पार्षद रहे किन्तु सक्रिय के लिहाज से और हार की संभावना से इमके वार्ड को परिवर्तित कर 46 नंबर से श्रीमती कमला शर्मा को टिकिट मिला जिसके कारण कांग्रेस ने अपने मजबूत कार्यकर्ता लीला पाल को भी खो दिया किन्तु सत्ता की ताकत के आगे सब जायज का किस्सा यहाँ भी चला वही एल्डरमैन के लिए राजेश शर्मा के नाम को नामित कर कई कांग्रेसियों से भी नाराजगी मोल ली जो विधान सभा चुनाव में हार का एक प्रमुख कारण रही और अपने ही वार्ड से प्रत्यशी के रूप में अरुण वोरा की हार हुई अब एक बार फिर वार्ड 45 सामान्य सीट के लिए वर्तमान महापौर बाकलीवाल और राजेश शर्मा किसी एक पर मुहर लगाने में बड़ी भूमिका अरुण वोरा की होगी जो उनके आगे की राजनितिक सफ़र के लिए भी काफी अहम् होगी . वही हमीद खोखर जो अपने वार्ड से लगातार तीन बार विजयी हुए है इस बार महिला आरक्षित होने से चुनाव मैदान से हटने की बात कह रहे है किन्तु राजनीती में कब क्या हो कहना संभव नहीं ऐसे में अंतिम समय में परिवार के किसी को चुनावी मैदान में भी उतार सकते है और यह सीट कांग्रेस के खाते में डाल सकते है जो कि आने वाले समय में स्पष्ट हो जायेगा .
राजनीती एक ऐसा मंच है जहन स्थिति निरंतर बदलती है ऐसे में कयासों का बाजार लगातार इस ठण्ड में गर्मी प्रदान कर्ता रहेगा स्थितिया बदलेंगी और चर्चाये भी दोस्त कब दुश्मन बनेगे , दुश्मन कब दोस्त बनेगे यह कहा नहीं जा सकता क्योकि राजनीती में पद महत्तवपूर्ण होता है दोस्ती दुश्मनी राजनीती में लम्बे समय के लिए नहीं होती .
चुनावी विश्लेषण
शरद पंसारी (संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार )