August 05, 2026
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    “छत्तीसगढ़ की धरती के महादानी दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल: जिनकी दानभूमि पर खड़े हैं अस्पताल, विश्वविद्यालय और मानव सेवा के अनेक मंदिर”

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    विशेष लेख

    छत्तीसगढ़ की पावन धरती ने समय-समय पर ऐसे महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने कर्म, सेवा और त्याग से समाज को नई दिशा दी। इन्हीं महान विभूतियों में एक नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान से लिया जाना चाहिए—महादानी दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल का।

    4 अप्रैल 1876 को जन्मे दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल न केवल अपने समय के अत्यंत समृद्ध उद्यमी थे, बल्कि उससे कहीं बढ़कर वे समाज सेवा, परोपकार और मानव कल्याण के प्रतीक थे। आज भी रायपुर और आसपास के अनेक महत्वपूर्ण संस्थान उनकी दानशीलता के प्रमाण हैं, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि समय के साथ उनका नाम धीरे-धीरे जनस्मृति से ओझल होता चला गया।

    डी.के. अस्पताल से जुड़ा नाम, लेकिन योगदान उससे कहीं बड़ा

    रायपुर का प्रतिष्ठित डी.के. (दाऊ कल्याण) अस्पताल आज भी उनके नाम से जाना जाता है। बहुत से लोग उन्हें केवल इसी अस्पताल की जमीन के दानदाता के रूप में जानते हैं, जबकि उनकी दानशीलता का दायरा इससे कहीं अधिक विशाल था।

    1944 में दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल ने डी.के. अस्पताल के लिए जमीन के साथ भवन निर्माण हेतु 1,25,000 रुपये नकद दान किए, जो आज के मूल्यांकन में लगभग 70 करोड़ रुपये के बराबर माने जाते हैं।

    एम्स सहित कई संस्थानों की नींव में उनका योगदान

    रायपुर में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) भी उसी भूमि पर बना है, जिसे दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल ने समाज के हित में दान किया था। यह तथ्य उनकी दूरदर्शिता और समाज के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

    शिक्षा और कृषि के क्षेत्र में भी उदार योगदान

    दाऊ जी ने केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक ही अपने दान को सीमित नहीं रखा।

    उन्होंने लभांडी क्षेत्र की जमीन के साथ कृषि महाविद्यालय और गरीब छात्रों के लिए छात्रावास निर्माण हेतु 1,12,000 रुपये दान किए, जो आज के मूल्य में लगभग 62 करोड़ रुपये के बराबर माने जाते हैं।

    इसके अतिरिक्त उन्होंने—

    टीबी अस्पताल के लिए 323 एकड़ भूमि दान की

    बरोंडा ग्राम में कृषि अनुसंधान के लिए भूमि प्रदान की

    भाटापारा में कृषि विज्ञान के लिए विशाल भूमि दान दी

    धार्मिक और सामाजिक सेवा में भी अग्रणी

    दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल की आस्था और सेवा भाव धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में भी दिखाई देता है।

    उन्होंने रायपुर के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के संचालन हेतु पूरा खैरा गांव दान कर दिया।

    भाटापारा में अकाल के समय लोगों की पीड़ा को देखते हुए उन्होंने “कल्याण सागर” जलाशय का निर्माण कराया, जिससे हजारों लोगों और पशुओं को पानी की सुविधा मिली।

    पशु सेवा और ज्ञान के प्रसार में योगदान

    भाटापारा में विशाल पशु चिकित्सालय का निर्माण

    गरीबों और विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय की स्थापना

    ये सभी कार्य इस बात का प्रमाण हैं कि दाऊ जी का दृष्टिकोण केवल तत्कालीन समाज तक सीमित नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के कल्याण की सोच से जुड़ा था।

    छत्तीसगढ़ से बाहर भी उदार दान

    उनकी परोपकारिता केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रही। देश के विभिन्न हिस्सों में भी उन्होंने जरूरत के समय उदारतापूर्वक सहयोग किया।

    प्रमुख योगदानों में शामिल हैं—

    नागपुर के लेडी इरविन अस्पताल के निर्माण में सहयोग

    सेंट्रल महिला कॉलेज के निर्माण में प्रमुख दान

    बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए सहायता

    वर्धा की भीषण बाढ़ में उदार दान

    अपने समय के अत्यंत समृद्ध उद्यमी

    दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल अपने समय के अत्यंत संपन्न उद्यमियों में गिने जाते थे।

    1937 में उन्होंने लगभग 70,000 रुपये का राजस्व भुगतान किया, जो आज की गणना में लगभग 39 करोड़ रुपये से अधिक के बराबर माना जा सकता है।

    आज क्यों धुंधला पड़ गया यह नाम?

    इतने विशाल और ऐतिहासिक योगदान के बावजूद आज यह विडंबना है कि छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी तो दूर, बहुत से लोग इस महान माटीपुत्र के नाम और कार्यों से परिचित भी नहीं हैं।

    यह केवल इतिहास की भूल नहीं, बल्कि उस विरासत के प्रति हमारी उपेक्षा भी है जिसने इस प्रदेश की सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूत नींव रखी।

    स्मरण और सम्मान की आवश्यकता

    आज आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ की जनता, सामाजिक संस्थाएं और सरकार मिलकर दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल जैसे महादानी व्यक्तित्वों को पुनः जनस्मृति में स्थापित करें।

    क्योंकि किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी वर्तमान उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन महान व्यक्तियों से होती है जिन्होंने अपना सर्वस्व समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।

    दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल न केवल छत्तीसगढ़ के गौरव हैं, बल्कि वे भारतीय परोपकार की परंपरा के एक उज्ज्वल अध्याय भी हैं।

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