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तीजा पर रिकेश सेन की पहल से उठे सवाल

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तीजा पर रिकेश सेन की पहल से उठे सवाल

    दुर्ग / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ के लोकपर्व तीजा के अवसर पर वैशाली नगर विधायक रिकेश सेन ने 14 सितंबर को तीजा पर मायके गईं बहनों के भाइयों के लिए नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था कर एक अलग तरह की जनसेवा की पहल की है। इस व्यवस्था में केवल भोजन उपलब्ध कराने की बात नहीं, बल्कि तीजा की पारिवारिक परंपरा, भाई-बहन के रिश्ते और सामाजिक सरोकार को जोडऩे का प्रयास भी दिखाई देता है।

दिन के भोजन की व्यवस्था श्रीराम रसोई, नेहरू नगर, विधायक कार्यालय के सामने तथा राम रसोई, हनुमान मंदिर के पास सुपेला में की गई। वहीं रात्रि भोजन के लिए वैशाली नगर विधानसभा क्षेत्र के विभिन्न रेस्टोरेंट में नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था की गई। इसके लिए श्वेतांबर जैन मंदिर के सामने, जीरो रोड, शांतिनगर स्थित विधायक रिकेश सेन के कार्यालय से कूपन वितरित किए गए। इच्छुक भाई कूपन प्राप्त कर निर्धारित रेस्टोरेंट में कूपन दिखाकर रात्रि भोजन का लाभ ले सकते हैं।

रिकेश सेन की इस पहल ने जहां क्षेत्र में चर्चा बटोरी है, वहीं अब इसका राजनीतिक असर पड़ोसी विधानसभा क्षेत्रों तक दिखाई देने लगा है। सवाल यह नहीं कि एक विधायक ने भोजन की व्यवस्था क्यों की, बल्कि सवाल यह भी है कि जब एक जनप्रतिनिधि अपने स्तर पर ऐसी पहल कर सकता है तो दूसरे जनप्रतिनिधियों से भी जनता इसी तरह की संवेदनशीलता की अपेक्षा क्यों न करे?

अब नजर दुर्ग विधानसभा पर

दुर्ग विधानसभा क्षेत्र में प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री एवं विधायक गजेंद्र यादव के सामने भी अब एक स्वाभाविक राजनीतिक सवाल खड़ा हो गया है। दुर्ग शहर में राम रसोई जैसी व्यवस्थाएं पहले से मौजूद हैं। ऐसे में क्या तीजा पर्व की तर्ज पर अथवा आगामी 17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर दुर्ग विधानसभा क्षेत्र में भी जरूरतमंदों और आम नागरिकों के लिए नि:शुल्क भोजन की कोई विशेष व्यवस्था की जाएगी?

यह सवाल किसी विधायक की पहल को कमतर आंकने के लिए नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों के बीच सेवा की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के रूप में भी देखा जा सकता है।

दुर्ग ग्रामीण और रिसाली पर भी टिकी नजर

इसी तरह दुर्ग ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में प्रदेश सरकार में दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री ललित चंद्राकर की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है। खासकर इसलिए कि आने वाले समय में रिसाली नगर निगम चुनाव होने हैं और रिसाली क्षेत्र दुर्ग ग्रामीण विधानसभा का महत्वपूर्ण शहरी इलाका है।

ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर दुर्ग ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र, विशेषकर रिसाली में भी किसी बड़े स्तर पर नि:शुल्क भोजन अथवा जनसेवा की पहल सामने आएगी?

रिकेश सेन की पहल ने बढ़ाई अपेक्षाएं

रिकेश सेन पिछले कुछ समय से अपने विधानसभा क्षेत्र में ऐसी पहलों को लेकर चर्चा में रहे हैं, जिन्हें उनके समर्थक जनसेवा का नया मॉडल बताते हैं। यही कारण है कि उनकी ताजा भोजन व्यवस्था को भी केवल एक दिन के आयोजन के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे जनप्रतिनिधि की व्यक्तिगत सक्रियता और जनता से सीधे जुडऩे की राजनीति के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि राजनीतिक विरोधियों और आलोचकों की ओर से विधायक द्वारा किए जा रहे खर्च और इन व्यवस्थाओं के आर्थिक स्रोत को लेकर सवाल उठाए जाते रहे हैं। इन सवालों का उत्तर संबंधित आयोजकों द्वारा दिया जाना ही उचित होगा। बिना प्रमाण किसी व्यक्ति या संस्था पर आर्थिक अनियमितता का आरोप लगाना उचित नहीं होगा।

सुविधा के साथ जवाबदेही भी जरूरी

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि द्वारा जनता को सुविधा देना निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है। लेकिन इसी के साथ एक दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है—क्या ऐसी सुविधाएं और जनसेवा की पहल सभी क्षेत्रों में जनता तक पहुंच रही हैं?

यदि एक विधायक अपने स्तर पर पर्व-त्योहार को जनसेवा से जोड़कर नई परंपरा शुरू करता है, तो दूसरे विधायकों के सामने भी जनता की अपेक्षाएं बढऩा स्वाभाविक है। यही लोकतांत्रिक जवाबदेही है।

अब निगाहें 17 सितंबर पर रहेंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस और सेवा गतिविधियों के बीच क्या दुर्ग विधानसभा में मंत्री गजेंद्र यादव तथा दुर्ग ग्रामीण विधानसभा में ललित चंद्राकर भी इसी तरह नि:शुल्क भोजन की व्यवस्था करेंगे? क्या वहां भी कूपन बांटे जाएंगे? या फिर इस मुद्दे पर मौन ही कायम रहेगा?

राजनीति में चर्चाओं का दौर लगातार चलता रहता है, लेकिन अंतत: जनता परिणाम देखती है। एक विधायक ने पहल करके सुविधा उपलब्ध कराई है, अब दूसरे जनप्रतिनिधियों की बारी है कि वे इस चुनौती को किस रूप में लेते हैं—सेवा की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक संदेश या फिर मौन।

आगामी रिसाली नगर निगम चुनाव की पृष्ठभूमि में यह सवाल और भी दिलचस्प हो गया है कि जनसेवा की ऐसी पहल चुनावी राजनीति से कितनी अलग और कितनी जुड़ी हुई है। इसका जवाब आने वाला समय और जनता दोनों देंगे।

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