शौर्यपथ । आज 8 मार्च को पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रुप में मनाया जाता है। भारत वर्ष में महिलाओ को आदिशक्ति के रुप में देखा गया है। महिला दिवस पर श्रुति पाठकों के लिए एक लेख समर्पित
अक्सर हम जाने अंजाने बहुत सारे बंधनों में बांधकर स्वयं को संचालित करते रहते हैं और इन बंधनों को सामाजिक बन्धन का नाम दे देते हैं। इन अवांछित को ढोते ढोते स्वयं को मानसिक शारीरिक थकाते रहते हैं , टूटते रहते हैं। वास्तव में हमें अपनी सीमाओं से स्वयं को संचालित तो करना होता है पर वह सीमा असीमित हैं ।हम एक संपूर्ण व्यक्तित्व तभी हो सकते हैं जब हम अपने आप को असीमित बना लें । एक स्त्री होना बहुत मुश्किल है और स्त्री का स्त्री बने रहना और भी मुश्किल। स्त्री में स्त्रीत्व का परिपालन करते-करते स्त्री स्त्री बनी रह भी जाती है पर सामाजिक, घरेलू परिप्रेक्ष में स्त्री का इंसान बने रहना ही मुश्किल हो जाता है । पुरुषों से अपेक्षाकृत अधिक जटिल और बल में अपेक्षा थोड़ा कम बनाया है । यूं तो स्त्री स्वयं प्रकृति है और असीमित शक्ति की मालकिन है पर उसे खुद को संरक्षण देना और खुद को स्थापित करना होता है। वह स्वयं तेज पुंज होकर निस्तेज रहते हुए सीमित मैं भी खुद को असीमित कर लेती है।
**एक समंदर आंचल में छुपा रक्खा है।
तूफ़ा खामोश हो गए।
लहरों को भी दवा रखा है।
पानी को भी जमीं चाहिए ठहरने के लिए ।
मैंने हवाओं में आशियाना बना रखा है ।
क्या बिगड़ेंगे आंधियां मेरा ।
मैंने बवंडर को आंखों में उठा रखा है**
यहां मैंने समुद्र की गहराई को स्त्री के मन और उसमें से निकलने वाले अमूल्य रत्नों को उसके गुण की और बवंडर की उपमा उसकी सहनशक्ति से की है।
साभार : अनुराधा *अनु*
दुर्ग छत्तीसगढ़