शौर्यपथ लेख /
जिनको मेरे सामने आपने अस्तित्व को, अपने ओहदे को चीख चीख कर बताना पड़े मुझे उनसे सम्मान की क्या जरूरत है । जिनके काम मेरे से बनते हों क्या सचमुच मैं उनसे सम्मान की हकदार हूं । जहां मेरी उपस्थिति से काम बनते हो वो मुझे सम्मान क्या देंगें। सच में... खुद के लिए क्या कहूं, निःशब्द हूं.....हैरान हूं । एक स्त्री हूं मैं । एक बार फिर से कहूंगी कि मेरे जैसी सिर्फ मैं ही हूं.....नायाब। जब मुझ जैसा कोई नहीं इसलिए अक्सर आईने में खुदको देख लिया करती हूं । मैं खुद का मान हूं । पर इसमें मेरी उपलब्धि कैसी मुझे बनाने वाला तो कोई और है, जिसने सिर्फ इंसान बनाये थे । जिनमें कोई भेद नहीं था । खुदको एक इंसान से स्त्री तो मैंने खुद ही बनाया है और मुझसे कहीं अधिक पुरुष की खुदको वर्चस्व में रखने की सोच ने । एक इंसान से स्त्री बनने का रास्ता जितना भयावह रहा उससे बहुत अधिक भयानक सफर है एक स्त्री से फिर इंसान समझे जाने तक का । मैंने ही तो पुरुष को पुरुष बनने दिया,और खुदको कमजोर बनाती गई। पर अब मैं समझ गई हूं कि मैं एक इंसान हूं ।हां ....मुझ में ऐसी बहुत सी खूबियां है जो मुझे दूसरो से अलग करती हैं। हां सच है..... मुझे जरूरत नहीं किसी पुरुष की । मैं सक्षम हूं हर प्रकार से खुद के लिए । हां ..अगर किसी को जरूरत है मेरी , तो सबसे पहले मुझे एक इंसान की तरह देखे फिर मुझमें स्त्री को । हां ...मैं समझ चुकी हूं कि .. .... कि मैं एक इंसान हूं । मेरी इंसान होने की सोच पर मुझे नाज है जो मुझे औरों से अलग करती है। और मेरी यही सोच मेरी दुनियां बदल रही है। जिसमें मैं जी रही हूं अपने अनगिनत रूपों में और अपने ही कैनवास को अनगिनत रंगों से भर रही हूं। मेरी प्रतिस्पर्धा नहीं किसी से सिर्फ खुदको पहचान चुकी हूं । मेरे सफर ने मुझे मेरे अस्तित्व की पहचान करा दी है । मुझे गर्व है कि मैं एक स्त्री हूं ।
डॉ. अनुराधा बक्शी "अनु" दुर्ग छत्तीसगढ़