शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार
भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर हाल के दिनों में एक अजीब-सी बहस सार्वजनिक विमर्श में छा गई है — “भारत में एक डॉलर में छह समोसे मिल जाते हैं, जबकि अमेरिका में एक डॉलर में केवल एक पेन।” यह तुलना सुनने में भले ही चुटीली लगे, लेकिन यह आर्थिक यथार्थ को समझने के बजाय उसे सरलीकरण और भावनात्मक तर्कों में उलझाने का प्रयास अधिक प्रतीत होती है। असल सवाल समोसे या पेन का नहीं, बल्कि आय, गरीबी, क्रय शक्ति और जीवन स्तर का है।
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा 7 जनवरी 2026 को जारी प्रथम अग्रिम अनुमान इस वास्तविकता को स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में स्थिर मूल्यों पर भारत की प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी ₹1,42,119 रहने का अनुमान है, जो बीते वर्ष की तुलना में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि अवश्य दर्शाता है। यह वृद्धि स्वागतयोग्य है, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि वित्त वर्ष 2024-25 में प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय (NNI) ₹1,14,710 रही — एक ऐसा आंकड़ा जो भारत की विशाल आबादी के जीवन स्तर की सीमाओं को उजागर करता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलना और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार 2026 में भारत की नॉमिनल प्रति व्यक्ति आय लगभग $3,051 रहने का अनुमान है। क्रय शक्ति समानता (PPP) के आधार पर यह आंकड़ा $12,964 तक पहुँचता है, किंतु इसके बावजूद नॉमिनल प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत का वैश्विक स्थान 144वां है। यह रैंकिंग इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि भारत की आर्थिक वृद्धि अभी भी औसत नागरिक की आय में पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं हो पा रही है।
देश के भीतर आय की असमानता और भी गहरी है। गोवा, सिक्किम और महाराष्ट्र जैसे राज्य प्रति व्यक्ति आय में आगे हैं, जहाँ महाराष्ट्र की अनुमानित प्रति व्यक्ति आय ₹2.89 लाख तक पहुँचने वाली है। इसके विपरीत बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य आज भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं। यह क्षेत्रीय असंतुलन भारत की आर्थिक संरचना की एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
अब यदि तुलना अमेरिका से की जाए, तो अंतर लगभग खाई का रूप ले लेता है। IMF के अनुसार 2026 में अमेरिका की प्रति व्यक्ति नॉमिनल आय लगभग $92,880 (करीब ₹77.5 लाख) रहने का अनुमान है। अमेरिका दुनिया के शीर्ष 10 देशों में शामिल है, जहाँ औसत मासिक आय $5,000 और औसत घरेलू आय $78,538 के आसपास है। वहीं 2026 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कुल जीडीपी $30.50 ट्रिलियन को पार करने की संभावना है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत और अमेरिका की तुलना केवल वस्तुओं की कीमत से नहीं, बल्कि आय और अवसरों की संरचना से होनी चाहिए।
सबसे चिंताजनक पहलू गरीबी का अंतर है। भारत में आज भी अनुमानतः लगभग 80 करोड़ लोग गरीबी रेखा के आसपास या नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। अत्यधिक गरीबी — जहाँ प्रतिदिन की आय कुछ ही रुपयों तक सीमित है — में जीवन बिताने वाली आबादी करीब 12 प्रतिशत बताई जाती है। इसके विपरीत अमेरिका में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या 10–12 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन वहाँ गरीबी की परिभाषा ही $15,000 वार्षिक आय जैसे स्तर से जुड़ी है। यह तुलना बताती है कि प्रतिशत के आंकड़े समान दिख सकते हैं, पर जीवन की वास्तविक परिस्थितियाँ पूरी तरह अलग हैं।
अर्थशास्त्रियों की राय में भारत की समस्या केवल विकास दर नहीं, बल्कि आय असमानता, रोजगार की गुणवत्ता और वास्तविक क्रय शक्ति है। जब तक आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक नहीं पहुँचेगा, तब तक समोसे और पेन जैसी तुलना केवल हकीकत से ध्यान भटकाने वाला शोर बनी रहेगी।
आज जरूरत इस बात की है कि भारत अपनी आर्थिक बहस को प्रतीकों और जुमलों से निकालकर आम आदमी की आय, रोजगार और जीवन स्तर पर केंद्रित करे। सवाल यह नहीं कि एक डॉलर में क्या मिलता है, सवाल यह है कि एक भारतीय की मेहनत की कीमत क्या है — और क्या वह उसे सम्मानजनक जीवन दे पा रही है या नहीं। यही बहस भारत को आगे ले जाएगी, बाकी सब केवल दिखावटी तर्क हैं।