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जब “हम ही पत्रकार हैं” का घमंड टूटा — और जन्म हुआ दूसरे प्रेस क्लब का Featured

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शौर्यपथ संपादकीय | दुर्ग

दुर्ग में दूसरे प्रेस क्लब का गठन कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं है।
यह न तो शौक का परिणाम है, न किसी साजिश का।
बल्कि यह वर्षों से पनप रहे अहंकार, एकाधिकार और बंद दरवाज़ों वाली व्यवस्था के खिलाफ हुआ स्वाभाविक विस्फोट है।

यह उस सोच का अंत है, जो स्वयं को पत्रकारिता का पर्याय और शेष सभी को नगण्य समझ बैठी थी।

सवाल सीधा और असहज है—
क्या पत्रकारिता किसी क्लब की बपौती है?
क्या किसी पत्रकार की पहचान कुछ लोगों की मोहर से तय होगी?

यदि जवाब “नहीं” है,
तो फिर दुर्ग में वह स्थिति क्यों बनी, जहाँ राष्ट्रीय और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को भी बार-बार “पत्रकार” साबित करना पड़ा?


पुराना प्रेस क्लब: अनुभव की ढाल या निजी हितों का किला?

इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि पुराने प्रेस क्लब में अनुभव है, वरिष्ठता है और पत्रकारिता का इतिहास है।

लेकिन जब यही वरिष्ठता—

  • नए पत्रकारों के लिए दीवार बन जाए

  • सदस्यता वर्षों तक लटकाई जाए

  • बैठकों से लोकतांत्रिक संवाद गायब हो जाए

  • और संगठन कुछ गिने-चुने लोगों की सुविधा व वसूली का माध्यम बन जाए

तो सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक हो जाता है।पत्रकारिता में सबसे खतरनाक नज़दीकी होती है— सत्ता से नहीं, आत्ममुग्धता से।


“हम ही हम हैं” का झूठा नैरेटिव

दुर्ग में वर्षों तक प्रशासन और राजनीतिक तंत्र के भीतर यह भ्रम बैठाया गया कि—“प्रेस क्लब मतलब यही लोग,इनके बाहर कोई पत्रकार नहीं।”

यह भ्रम इतना गहरा था कि कई अवसरों पर अन्य पत्रकारों को सार्वजनिक रूप से नकारा गया,जबकि वे ज़मीनी पत्रकारिता कर रहे थेऔर बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़े हुए थे।

यह पत्रकारिता नहीं थी— यह सूचना पर कब्ज़े की मानसिकता थी।


नया प्रेस क्लब: विद्रोह नहीं, विवशता

नया प्रेस क्लब किसी सत्ता-समर्थित षड्यंत्र का परिणाम नहीं है। यह उन पत्रकारों की आख़िरी चुप्पी-तोड़ प्रतिक्रिया है,जिन्हें वर्षों तक यही सुनाया गया—
“जगह नहीं है, नियम नहीं है, ज़रूरत नहीं है।”

जब संगठन परिवार न रहे,तो नए घर बनते ही हैं।


लेकिन एक कड़वा सच…

यहाँ एक सच नए प्रेस क्लब के लिए भी उतना ही ज़रूरी है—पत्रकारिता जितनी बँटेगी,उतनी ही कमज़ोर होगी।दो प्रेस क्लब,दो मंच,दो ध्रुव—इस बंटवारे का सीधा लाभ पत्रकारों को नहीं, सत्ता और प्रशासन को मिलेगा।

जो आज तालियाँ बजा रहे हैं,वही कल इसी विभाजन का इस्तेमाल पत्रकारों की आवाज़ दबाने में करेंगे।


जिम्मेदारी दोनों की है

  • वरिष्ठ पत्रकारों की — कि संगठन को निजी जागीर न बनाएं

  • नए पत्रकारों की — कि विद्रोह मर्यादा से बाहर न जाए

पत्रकारिता में न वरिष्ठ छोटा होता है,न कनिष्ठ कमज़ोर— कमज़ोर होती है केवल नीयत।


आख़िरी सवाल (जो सबसे ज़रूरी है)

क्या दुर्ग का पत्रकार क्लब से बड़ा बनेगा,या क्लब के नाम पर खुद को छोटा करता रहेगा? यदि पुराने प्रेस क्लब ने आत्ममंथन नहीं किया और नया प्रेस क्लब आत्मसंयम नहीं अपनाता—

तो इतिहास साफ़ है—
अहंकार से बना संगठन और जल्दबाज़ी से जन्मा विद्रोह,दोनों ही ज़्यादा देर तक नहीं टिकते। दुर्ग की पत्रकारिता आज चौराहे पर खड़ी है। अब फैसला पत्रकारों को करना है—

✒️ कलम एकजुट रखनी है
या
✒️ क्लबों में बाँट देनी है।

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