दुर्ग। शौर्यपथ विशेष
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जहां प्रदेश में सुशासन का ढोल पीट रहे हैं, वहीं दुर्ग नगर पालिक निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की कार्यप्रणाली जमीनी हकीकत को पूरी तरह झुठलाती नजर आ रही है। शहर में अवैध कब्जाधारियों और गैर अनुमति प्राप्त बाजारों पर जिस तरह निगम प्रशासन ने मौन समर्थन की मुद्रा अपना ली है, वह न केवल प्रशासनिक निष्क्रियता का प्रमाण है बल्कि आने वाले समय में एक बड़े शहरी विवाद की पटकथा भी लिख रही है।
दुर्ग जिले के नागरिक सुपेला संडे बाजार की कहानी से भलीभांति परिचित हैं—जब बाजार छोटा था तब प्रशासन ने आंख मूंद ली, और जब वह विकराल हो गया तो हटाने में जिला प्रशासन और भिलाई नगर निगम को पसीने आ गए। व्यापारियों में विवाद हुआ, कानून व्यवस्था प्रभावित हुई, लेकिन आज भी वह बाजार वैधानिक अनुमति के बिना संचालित होता दिखाई देता है।
अब वही गलती दुर्ग में दोहराई जा रही है
दुर्ग नगर निगम मुख्य कार्यालय के पीछे चर्च रोड क्षेत्र में शनिवार को बिना किसी अनुमति के अवैध बाजार का संचालन प्रारंभ हो चुका है। महज दो महीनों में यह बाजार चर्च चौक से सुराना कॉलेज मार्ग तक फैल चुका है। शुरुआत छोटे स्तर पर हुई, लेकिन अब इसमें भिलाई के व्यापारियों का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय व्यापार और यातायात दोनों पर असर पडऩे लगा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि निगम प्रशासन को इस अवैध बाजार की पूरी जानकारी होने के बावजूद अतिक्रमण विभाग द्वारा व्यापारियों से गंदगी के नाम पर ?50 शुल्क वसूली शुरू कर दी गई है। सवाल यह उठता है कि जब बाजार अवैध है, तो निगम किस अधिकार से शुल्क वसूल रहा है? क्या यह अवैध गतिविधियों को वैधानिक जामा पहनाने की कोशिश नहीं है?
छोटे कर्मचारियों पर सख्ती, बड़े अतिक्रमण पर मौन
शहर में यह चर्चा आम है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल छोटी-छोटी बातों पर कर्मचारियों को नोटिस थमाने में अपनी प्रशासनिक व संवैधानिक शक्तियों का भरपूर उपयोग करते हैं, लेकिन अवैध बाजार और बढ़ते अतिक्रमण के मामलों में उनकी भूमिका पूरी तरह निष्क्रिय दिखाई देती है।
पिछले छह महीनों से कपड़ा लाइन का अतिक्रमण हटाने में निगम प्रशासन पूरी तरह विफल रहा है, जबकि 'मोर शहर मोर जिम्मेदारीÓ योजना के तहत सौंदर्यीकरण कार्य कर रही संस्था को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। शहर के लगभग हर क्षेत्र में अतिक्रमण का बोलबाला है, लेकिन प्रेस विज्ञप्तियों में "सख्त कार्रवाई" के दावे किए जा रहे हैं।
आखिर किसे गुमराह कर रहे हैं आयुक्त?
सवाल यह है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल इन दावों से किसे गुमराह कर रहे हैं—शहर की जनता को, जिला प्रशासन को या प्रदेश सरकार को? एक प्रशासनिक अधिकारी का कार्यकाल भले ही अधिकतम तीन वर्ष का हो, लेकिन इस दौरान जो अतिक्रमण जड़ जमा लेगा, उसे हटाने में आने वाले समय में प्रशासन को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
राजनीतिक मौन भी सवालों के घेरे में
और भी आश्चर्यजनक यह है कि जब शहर में भाजपा की शहरी सरकार है, स्थानीय विधायक प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, तब भी अतिक्रमण के बढ़ते स्तर पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले विधानसभा चुनावों में यही अतिक्रमण सत्ताधारी दल के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
सुशासन की कसौटी पर दुर्ग नगर निगम
यदि मुख्यमंत्री का सुशासन केवल फाइलों और मंचों तक सीमित नहीं है, तो दुर्ग नगर निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा अनिवार्य है। अन्यथा यह कहा जाना गलत नहीं होगा कि दुर्ग में सुशासन नहीं, बल्कि 'मौन समर्थन का शासनÓ चल रहा है, जहां अवैध कब्जाधारी फल-फूल रहे हैं और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।