January 08, 2026
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दुर्ग। शौर्यपथ विशेष

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जहां प्रदेश में सुशासन का ढोल पीट रहे हैं, वहीं दुर्ग नगर पालिक निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की कार्यप्रणाली जमीनी हकीकत को पूरी तरह झुठलाती नजर आ रही है। शहर में अवैध कब्जाधारियों और गैर अनुमति प्राप्त बाजारों पर जिस तरह निगम प्रशासन ने मौन समर्थन की मुद्रा अपना ली है, वह न केवल प्रशासनिक निष्क्रियता का प्रमाण है बल्कि आने वाले समय में एक बड़े शहरी विवाद की पटकथा भी लिख रही है।
दुर्ग जिले के नागरिक सुपेला संडे बाजार की कहानी से भलीभांति परिचित हैं—जब बाजार छोटा था तब प्रशासन ने आंख मूंद ली, और जब वह विकराल हो गया तो हटाने में जिला प्रशासन और भिलाई नगर निगम को पसीने आ गए। व्यापारियों में विवाद हुआ, कानून व्यवस्था प्रभावित हुई, लेकिन आज भी वह बाजार वैधानिक अनुमति के बिना संचालित होता दिखाई देता है।
अब वही गलती दुर्ग में दोहराई जा रही है
दुर्ग नगर निगम मुख्य कार्यालय के पीछे चर्च रोड क्षेत्र में शनिवार को बिना किसी अनुमति के अवैध बाजार का संचालन प्रारंभ हो चुका है। महज दो महीनों में यह बाजार चर्च चौक से सुराना कॉलेज मार्ग तक फैल चुका है। शुरुआत छोटे स्तर पर हुई, लेकिन अब इसमें भिलाई के व्यापारियों का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय व्यापार और यातायात दोनों पर असर पडऩे लगा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि निगम प्रशासन को इस अवैध बाजार की पूरी जानकारी होने के बावजूद अतिक्रमण विभाग द्वारा व्यापारियों से गंदगी के नाम पर ?50 शुल्क वसूली शुरू कर दी गई है। सवाल यह उठता है कि जब बाजार अवैध है, तो निगम किस अधिकार से शुल्क वसूल रहा है? क्या यह अवैध गतिविधियों को वैधानिक जामा पहनाने की कोशिश नहीं है?
छोटे कर्मचारियों पर सख्ती, बड़े अतिक्रमण पर मौन
शहर में यह चर्चा आम है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल छोटी-छोटी बातों पर कर्मचारियों को नोटिस थमाने में अपनी प्रशासनिक व संवैधानिक शक्तियों का भरपूर उपयोग करते हैं, लेकिन अवैध बाजार और बढ़ते अतिक्रमण के मामलों में उनकी भूमिका पूरी तरह निष्क्रिय दिखाई देती है।
पिछले छह महीनों से कपड़ा लाइन का अतिक्रमण हटाने में निगम प्रशासन पूरी तरह विफल रहा है, जबकि 'मोर शहर मोर जिम्मेदारीÓ योजना के तहत सौंदर्यीकरण कार्य कर रही संस्था को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। शहर के लगभग हर क्षेत्र में अतिक्रमण का बोलबाला है, लेकिन प्रेस विज्ञप्तियों में "सख्त कार्रवाई" के दावे किए जा रहे हैं।
आखिर किसे गुमराह कर रहे हैं आयुक्त?
सवाल यह है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल इन दावों से किसे गुमराह कर रहे हैं—शहर की जनता को, जिला प्रशासन को या प्रदेश सरकार को? एक प्रशासनिक अधिकारी का कार्यकाल भले ही अधिकतम तीन वर्ष का हो, लेकिन इस दौरान जो अतिक्रमण जड़ जमा लेगा, उसे हटाने में आने वाले समय में प्रशासन को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
राजनीतिक मौन भी सवालों के घेरे में
और भी आश्चर्यजनक यह है कि जब शहर में भाजपा की शहरी सरकार है, स्थानीय विधायक प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, तब भी अतिक्रमण के बढ़ते स्तर पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले विधानसभा चुनावों में यही अतिक्रमण सत्ताधारी दल के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
सुशासन की कसौटी पर दुर्ग नगर निगम
यदि मुख्यमंत्री का सुशासन केवल फाइलों और मंचों तक सीमित नहीं है, तो दुर्ग नगर निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा अनिवार्य है। अन्यथा यह कहा जाना गलत नहीं होगा कि दुर्ग में सुशासन नहीं, बल्कि 'मौन समर्थन का शासनÓ चल रहा है, जहां अवैध कब्जाधारी फल-फूल रहे हैं और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।

राम रसोई के नाम पर सड़क पर कब्जा, धर्म स्थल के सामने कब्ज़े की दीवार , और प्रशासन की चुप्पी — क्या यही है सुशासन ?

शौर्यपथ विशेष
एक ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय लगातार सुशासन की बात कर रहे हैं,धर्म रक्षा की बात कर रहे है सुशासन पर्व मनाया जा रहा है, और जनता को यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि सरकार पारदर्शिता, न्याय और कानून के राज के लिए प्रतिबद्ध है प्रदेश में राम राज्य की स्थापना हो रही है । वहीं दूसरी ओर, उन्हीं की सरकार में नियुक्त अधिकारी ज़मीनी स्तर पर सुशासन को खुलेआम आईना दिखाते नजर आ रहे हैं , हिन्दुओ के आराध्य प्रभु राम की सत्य और निति की बातो का विरोध करते नजर आ रहे है । दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में सामने आया मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक है, बल्कि सरकार के दावों पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह और धर्म व प्रभु राम के नाम पर अवैध कब्ज़े सन्देश खड़ा करता है।


दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में गणेश मंदिर के सामने स्थित एक सार्वजनिक मार्ग और श्रद्धालुओं के लिए उपयोग में आने वाला स्थल, राम रसोई के संचालक द्वारा सड़क पर कब्जा कर लिया गया है। यह कोई खाली भूमि नहीं थी, बल्कि वर्षों से आम जनता के आवागमन और त्योहारों के दौरान प्रार्थना स्थल के रूप में प्रयुक्त होती रही है। इसके बावजूद यह अवैध कब्जा आज भी जस का तस बना हुआ है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल को इस अवैध कब्जे की पूरी जानकारी होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई? आम जनता ने विरोध दर्ज कराया, आवाज उठाई, लेकिन धनवानों के प्रभाव और गैर-जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी के सामने जनता की आवाज दबती चली गई। यह चुप्पी केवल लापरवाही नहीं, बल्कि कहीं न कहीं अवैध कब्जाधारियों को दिया गया मौन समर्थन प्रतीत होती है।


एक तरफ शहर के चौक-चौराहों पर अतिक्रमण की भरमार है, दूसरी ओर निगम प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने के लिए गरीबों की छोटी-छोटी गुमटियों पर बुलडोज़र चलाकर कार्रवाई का ढोल पीटता है। प्रश्न यह है कि कानून सिर्फ कमजोरों के लिए ही क्यों सक्रिय होता है? धनवानों और प्रभावशाली लोगों के सामने प्रशासन की कलम क्यों सूख जाती है?
राम रसोई जैसे पवित्र नाम का उपयोग कर शासकीय भूमि और सड़क पर कब्जा करना न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि धार्मिक आस्था पर भी प्रहार है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने कभी अन्याय और नियमों के विरुद्ध आचरण नहीं किया, लेकिन उन्हीं के नाम पर आज अवैध कब्जा किया जा रहा है — और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।
यह और भी चिंताजनक है कि यह सब उस दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में हो रहा है, जहाँ प्रदेश सरकार के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री ललित चंद्राकर, भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडे, प्रदेश संगठन मंत्री जितेंद्र वर्मा और दुर्ग जिला भाजपा अध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक जैसे बड़े नेताओं के निवास हैं। इन सबके बीच खुलेआम अवैध कब्जे पर कार्रवाई न होना क्या इस बात का संकेत नहीं है कि मुख्यमंत्री का सुशासन दुर्ग में सिर्फ काग़ज़ों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित है?


निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल द्वारा शहर की बिगड़ती व्यवस्था पर मौन, अवैध कब्जाधारियों पर कार्रवाई से परहेज और चुनिंदा कार्रवाई की नीति, यह स्पष्ट करती है कि संवैधानिक शक्तियों का उपयोग जनहित में नहीं, बल्कि मनमर्जी और प्रभाव के आधार पर किया जा रहा है।
दुर्ग नगर निगम की यह स्थिति सरकार के लिए चेतावनी है। यदि समय रहते ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो सुशासन का दावा जनता की नजर में खोखला साबित होगा। सवाल साफ है — क्या सरकार सच में सुशासन चाहती है, या फिर कुछ अधिकारी अपनी चुप्पी से पूरे शासन को कठघरे में खड़ा करने पर आमादा हैं?

दुर्ग।शौर्यपथ ख़ास रिपोर्ट
    दुर्ग नगर पालिक निगम क्षेत्र आज "स्मार्ट सिटी" नहीं बल्कि "गंदगी सिटी" की पहचान से जाना जाने लगा है। जनता ने बड़े भरोसे के साथ भाजपा प्रत्याशी अलका बाघमार को महापौर और निगम की कमान सौंपी थी, परंतु अब यही जनता गंदगी, कचरे और दुर्गंध से जूझ रही है।

महापौर की पोस्टरबाज़ी बनाम जनता की नाराज़गी

   महापौर अलका बाघमार ने चुनाव से पहले स्वच्छ और व्यवस्थित दुर्ग का सपना दिखाया था। लेकिन सत्ता में आते ही उनका ध्यान जनता की समस्याओं से हटकर केवल पोस्टरबाज़ी और उत्सवों की राजनीति तक सिमट गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर "स्वच्छता सेवा पखवाड़ा" का आयोजन कर निगम शहर को स्वच्छ बताने की कोशिश कर रहा है, जबकि ज़मीनी हकीकत यह है कि हर गली और मोहल्ले में गंदगी और बदबू ने डेरा जमा लिया है। जनता पूछ रही है—"पोस्टर से पेट नहीं भरता और बदबू से जीना दूभर है, महापौर साहिबा ये कैसा सुशासन?"

स्वास्थ्य प्रभारी नीलेश अग्रवाल: अनुभवहीनता का प्रतीक

  महापौर ने सफाई और स्वास्थ्य व्यवस्था की जिम्मेदारी निगम के स्वास्थ्य प्रभारी नीलेश अग्रवाल को सौंपी है। लेकिन अग्रवाल का प्रदर्शन शहर के लिए निराशाजनक और शर्मनाक रहा है। शहर के प्रमुख स्थानों—पुलिस अधीक्षक का बंगला, छात्रावास, गर्ल्स हॉस्टल और आम नागरिकों के ठहरने-बैठने वाले स्थानों तक—हर जगह कचरे के ढेर लगे हुए हैं। नालियों से निकलती दुर्गंध और सड़कों पर बिखरे कचरे ने नागरिकों का जीना मुश्किल कर दिया है। स्वास्थ्य प्रभारी की भूमिका केवल बैठकों और बातों तक सीमित रह गई है।
  जनता कह रही है कि अगर पहली बार विधायक बने और शिक्षा मंत्री का पद संभालते ही गजेंद्र यादव सक्रियता से शिक्षा विभाग में नई ऊर्जा ला सकते हैं, तो फिर पहली बार पार्षद बने नीलेश अग्रवाल सफाई व्यवस्था में ऐसा असफल क्यों साबित हो रहे हैं? इसका जवाब शायद निगम की राजनीति के गलियारों में छिपा है।

मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की सोच को आईना

   प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार "सुशासन" और "स्वच्छ भारत" की बात करते हैं। लेकिन उनके ही नाम पर चुनी गई शहरी सरकार जब गंदगी और बदबू फैलाने में अव्वल साबित हो रही है, तो यह न केवल शहर की छवि धूमिल कर रहा है बल्कि प्रदेश और केंद्र सरकार की सोच को भी कटघरे में खड़ा कर रहा है।

सामान्य सभा की अग्निपरीक्षा

   अब पूरा शहर इस बात पर नज़र गड़ाए बैठा है कि दुर्ग नगर निगम की आगामी सामान्य सभा में क्या जनप्रतिनिधि जनता के स्वास्थ्य और सफाई जैसे गंभीर मुद्दे पर सवाल उठाएंगे? या फिर मौन रहकर केवल सत्ता सुख का आनंद लेंगे?

कटाक्ष :

"शहर डूबा कचरे में, पोस्टरों में चमक रही सरकार!"
"जनता मांगे सफाई, निगम दे रहा बदबू की कमाई!"
"अलका बाघमार की निष्क्रियता और नीलेश अग्रवाल की अनुभवहीनता ने दुर्ग को बना दिया बदबूगंज!"

  मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के संभावित विदेश दौरे से पहले विस्तार की चर्चा तेज़
  90-सदस्यीय विधानसभा में संवैधानिक सीमा अनुसार अधिकतम 14 मंत्री (मुख्यमंत्री सहित) संभव—वर्तमान में 11
  क्या 33% महिला भागीदारी की ‘आदर्श परिपाटी’ मंत्रिमंडल में दिखेगी?

 रायपुर/विशेष संवाददाता शौर्यपथ
  छत्तीसगढ़ में कैबिनेट विस्तार की अटकलें एक बार फिर परवान चढ़ गई हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि 18 से 21 अगस्त के बीच किसी भी दिन मंत्रिमंडल में नए चेहरों को जगह मिल सकती है। फिलहाल सरकार में मुख्यमंत्री सहित 11 मंत्री हैं; संवैधानिक सीमा के अनुरूप तीन रिक्त पद भरे जा सकते हैं। चर्चा यह भी है कि इस विस्तार में महिला प्रतिनिधित्व को प्रमुखता दी जाएगी ताकि 33% आरक्षण की ‘आदर्श परिपाटी’ का संदेश कैबिनेट स्तर पर भी जाए।

मुख्य विवरण
संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 164(1A) के तहत 90-सदस्यीय विधानसभा में मंत्रिपरिषद की अधिकतम संख्या 14 तय है (मुख्यमंत्री सहित)।
वर्तमान स्थिति: सरकार में 11 मंत्री कार्यरत; 3 स्थान रिक्त।
चर्चा: 18–21 अगस्त के बीच विस्तार की संभावना—आधिकारिक घोषणा शेष।
राजभवन के ‘दरबार हॉल’ का नाम ‘छत्तीसगढ़ मंडपम’ किए जाने व यहीं शपथ समारोह की तैयारी की चर्चा—औपचारिक पुष्टि प्रतीक्षित।

महिला प्रतिनिधित्व: नारा नहीं, नीति
   वर्तमान मंत्रिपरिषद में महिला मंत्रियों की संख्या 1 है। यदि कैबिनेट 14 तक भरता है, तो 33% के आदर्श मानक के हिसाब से कम-से-कम 5 महिलाओं की हिस्सेदारी का लक्ष्य प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर नीतिगत भागीदारी का संकेत देगा। विस्तार में कम-से-कम 1–2 नई महिला चेहरों को शामिल किए जाने की चर्चा है। बस्तर से लता उसेंडी और दुर्ग संभाग से भावना बोहरा (जिन्हें 2024 में ‘उत्कृष्ट विधायक’ के रूप में सम्मानित किए जाने का उल्लेख है) जैसे नाम सियासी चर्चा में हैं।
  केंद्र स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘नारी शक्ति वंदन’ (33% आरक्षण) के पैरोकार रहे हैं और यह विधेयक संसद से पारित हो चुका है। ऐसे में छत्तीसगढ़ के लिए यह विस्तार ‘आदर्श राज्य’ की छवि गढ़ने का अवसर बन सकता है।

संभावित दावेदारों की भूमिका: दिए गए नाम सियासी चर्चाओं में चल रहे संभावित विकल्प हैं; आधिकारिक सूची/घोषणा शेष है। उद्देश्य सभी प्रमुख दावेदारों की भूमिका और संभावित संकेत को समग्रता से रखना है।

1) गजेन्द्र यादव: दुर्ग से कांग्रेस के पिछले तीस सालो से लगातार हार / जीत के बावजूद प्रत्याशी रहे अरुण वोरा को चुनावी मैदान में आसान शिकस्त दी आसान इसलिए कहा जा सकता है कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ कांग्रेसी ही मैदान में परदे के पीछे खड़े रहे शहर की जनता भी लगातार एक ही कांग्रेस प्रत्याशी के नामांकन से उब चुकी थी निष्क्रियता और चाटुकारिता से घिरे विधायक की छवि के कारण दुर्ग विधान सभा में चुनावी मौसम में यह चर्चा रही कि भाजपा से कोई भी प्रत्याशी मैदान में होगा जीत निश्चित है ऐसे में भाजपा प्रत्याशी गजेन्द्र यादव को आसान और बड़ी जीत मिली.वर्तमान समय में विधायक यादव और महापौर बाघमार की राजनैतिक दुरी संगठन के कार्यकर्ताओ की विधायक से दुरी के साथ साथ दल्बद्लुओ की फौज का करीबी होना चर्चा का विषय है तो सामाजिक स्तर पर यादव समाज के प्रतिनिधितत्व एक बड़ा फेक्टर साथ दे रहा है .

2) राजेश अग्रवाल (सरगुजा)

क्षेत्रीय महत्व: सरगुजा संभाग का प्रतिनिधित्व मज़बूत करता है, जहाँ संतुलन साधना आवश्यक माना जा रहा है। उत्तरी छत्तीसगढ़ की प्राथमिकताओं—सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई—पर फोकस।
3) गुरु खुशवंत साहिब (रायपुर संभाग ): गुरु खुशवंत साहिब प्रदेश के एक बड़े वर्ग के धार्मिक guru के रूप में जाने जाते है ऐसे में प्रदेश सरकार इस बड़े वर्ग को भी साधने के लिए इन्हें मौका दे सकती है . एससी /एसटी वर्ग को प्रतिनिधितव मिलने से इस वर्ग के मतदाता का रुझान भी पार्टी की तरफ ज्यादा रहेगा ऐसे में इनकी दावेदारी की भी प्रबल संभावना व्यक्त की जा रही है और इन्हें केबिनेट में जगह मिलने की बात से चर्चो का बाजार गर्म है .
4) राजेश मूणत : लंबे समय से सक्रिय और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी रखने वाले वरिष्ठ नेता।अनुभवी हाथों से विभागीय डिलीवरी में तेजी लाने का संकेत। किन्तु पिछली बार भाजपा की सत्ता में रहने के दौरान महत्तवपूर्ण विभाग कीई जिम्मेदारी सँभालने वाले पूर्व मंत्री राजेश मुड़त के कई विभागीय कार्यो में अनियमितता और कमीशनखोरी की चर्चो से पूर्व की भाजपा सरकार को काफी नुकसान हुआ था और सत्ता हाथ से जाने का एक बड़ा कारण भी मुड़त को माना गया .
5) अमर अग्रवाल: भाजपा के कद्दावर नेता के रूप में पहचान अनुभवी होने के साथ साथ प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ विधायक व लम्बे प्रशासनिक कार्यो का अनुभव किन्तु बड़ी अड़चन यह कि प्रदेश सरकार की वर्तमान राजनितिक गलियारों में चर्चा के अनुसार नए एवं युवा विधायको को यह मौका देने का जोर कही ना कही अमर अग्रवाल जैसे वरिष्ठ भाजपा विधायक को दरकिनार करता नजर आ रहा है वर्तमान समय में मंत्री मंडल में नए विधायको को जिम्मेदारी मिली जो सरकार की मंशा के अनुरूप जोश के साथ कार्य को अंजाम दे रहे है वही नै पीढ़ी को आगे करने की रणनीति कार्यकर्ताओ में भी उम्मीद की किरण के रूप में एक सार्थक माहौल को जन्म दे रही जो संगठन के लिए भी काफी महत्तवपूर्ण है भविष्य की राजनीती के
6) भावना बोहरा (दुर्ग संभाग ): भावना बोहरा : महिला सशक्तिकरण की नई पहचान

पंडरिया विधानसभा से पहली बार चुनाव जीतने वाली विधायक भावना बोहरा ने अपने सामाजिक और विकास कार्यों से जनता के बीच गहरी छाप छोड़ी है। धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाने वाली बोहरा को 2024 में उत्कृष्ट विधायक सम्मान भी मिला। व्यावसायिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उन्होंने क्षेत्र की समस्याओं पर पकड़ बनाकर प्रशासनिक दक्षता दिखाई है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि यदि प्रदेश सरकार उन्हें मंत्रिमंडल में स्थान देती है तो यह न केवल महिला आरक्षण और महिला सशक्तिकरण की दिशा में कदम होगा, बल्कि भाजपा संगठन को भी महिलाओं के बीच सशक्त नेतृत्व प्रदान करेगा।
  निष्कर्षक संकेत: यदि तीन रिक्त स्थान में 2 पुरुष + 1 महिला या 1 पुरुष + 2 महिलाएँ का फार्मूला अपनता है, तो क्षेत्रीय-सामाजिक संतुलन के साथ महिला प्रतिनिधित्व का संदेश भी जाता है। दूसरी ओर 3 पुरुष विकल्प चुनने की स्थिति में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने का रोडमैप अगले फेरबदल में स्पष्ट करना होगा।
‘हरियाणा मॉडल’ का संदर्भ
 चर्चित ‘हरियाणा मॉडल’ का आशय संख्या-संतुलन और कार्य-वितरण वाले संकुचित-सक्षम कैबिनेट से है। छत्तीसगढ़ पहले से 14 की संवैधानिक सीमा में आता है; अतः यहाँ ‘मॉडल’ का अर्थ प्रशासनिक कार्यकुशलता और संतुलित प्रतिनिधित्व की कार्यशैली से है, न कि किसी कानूनी अपवाद से।
चुनावी गणित बनाम शासन-प्राथमिकताएँ
 विधानसभा चुनावों के चक्र में प्रायः अंतिम वर्ष चुनावी मोड में बीतता है। ऐसे में इस विस्तार के बाद नए मंत्रियों के पास करीब दो वर्ष होंगे—अपने विभागीय प्रदर्शन से संदेश देने के लिए। क्षेत्रीय संतुलन (रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, सरगुजा, बस्तर), सामाजिक संतुलन (ST/SC/OBC/सामान्य/धार्मिक-भाषाई समुदाय) और राजनीतिक योगदान/संगठनात्मक सक्रियता—इन तीनों कसौटियों पर संतुलित चयन सरकार की प्राथमिकताओं का संकेत देगा।

कैबिनेट विस्तार सरकार के राजनीतिक मनोविज्ञान और शासन-दृष्टि की परीक्षा है। यदि महिला प्रतिनिधित्व को अर्थपूर्ण ढंग से बढ़ाया जाता है, तो यह संदेश जाएगा कि छत्तीसगढ़ में नारी शक्ति केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं, बल्कि निर्णय-निर्माण की मेज़ पर बराबरी से बैठी है।आधिकारिक निर्णय आते ही नामों/तिथियों/स्थल का उल्लेख अद्यतन किया जाएगा।

रायपुर / शौर्यपथ।

    स्वतंत्रता दिवस 2025 पर गृह मंत्रालय द्वारा जारी सम्मान सूची में छत्तीसगढ़ पुलिस का नाम गर्व के साथ दर्ज हुआ है। राज्य के कुल 25 पुलिसकर्मियों को उनके असाधारण साहस, उत्कृष्ट सेवा और जनसुरक्षा में योगदान के लिए गैलेंट्री मेडल (GM), प्रेसिडेंट्स मेडल फॉर डिस्टिंग्विश्ड सर्विस (PSM) और मेडल फॉर मेरिटोरियस सर्विस (MSM) से अलंकृत करने की घोषणा की गई है।
ये सम्मान न केवल राज्य पुलिस की कार्यकुशलता और वीरता को उजागर करते हैं, बल्कि वामपंथी उग्रवाद से जूझते हुए आंतरिक सुरक्षा को मजबूत बनाने में छत्तीसगढ़ की निर्णायक भूमिका को भी रेखांकित करते हैं।

गैलेंट्री मेडल (GM) – साहसिक पराक्रम का सम्मान

असाधारण वीरता और कठिन परिस्थितियों में उत्कृष्ट परिचालन क्षमता के लिए 14 पुलिसकर्मियों को गैलेंट्री मेडल प्रदान किया गया है। इनमें आईपीएस सुनील शर्मा (पुलिस अधीक्षक), संदीप कुमार मडिले (उप निरीक्षक), और आरक्षक मदकम पांडु, मदकम हदमा, मदकम देव, बरसे हुंगा, रोशन गुप्ता सहित कई अन्य जांबाज़ शामिल हैं।
कर्तव्यपालन के दौरान सर्वोच्च बलिदान देने वाले तीन शहीद – स्व. रामुराम नाग (सहायक उप निरीक्षक), स्व. कुंजाम जोगा (आरक्षक) और स्व. वंजाम भीमा (आरक्षक) – को मरणोपरांत यह सम्मान प्रदान किया गया है।
ये सभी पुरस्कार नक्सल प्रभावित इलाकों में जोखिमपूर्ण अभियानों के दौरान अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प के प्रतीक हैं।

प्रेसिडेंट्स मेडल फॉर डिस्टिंग्विश्ड सर्विस (PSM) – दीर्घकालिक उत्कृष्टता का सम्मान

उच्च कोटि की सेवा और लंबे समय तक बेदाग पेशेवर ईमानदारी बनाए रखने के लिए छत्तीसगढ़ पुलिस के निदेशक हिमांशु गुप्ता को प्रेसिडेंट्स मेडल से नवाजा गया है।
उनके नेतृत्व में राज्य में पुलिसिंग के स्तर, प्रशासनिक दक्षता और जनसुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

मेडल फॉर मेरिटोरियस सर्विस (MSM) – समर्पण और सेवा का गौरव

लगन, अनुकरणीय सेवा और निरंतर योगदान के लिए 10 पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों को मेरिटोरियस सर्विस मेडल से सम्मानित किया गया है। इनमें –
पुलिस महानिरीक्षक ध्रुव गुप्ता, पुलिस अधीक्षक प्रशांत कुमार ठाकुर, कमांडेंट श्वेता राजमणि, पुलिस अधीक्षक रवी कुमार कुर्रे, निरीक्षक (एमआईएन) कौशल्या भट्ट, सहायक पुलिस महानिरीक्षक रोहित कुमार झा, निरीक्षक (एमआईएन) कमलेश कुमार मिश्रा, प्लाटून कमांडर दल सिंह नामदेव, कंपनी कमांडर दिलीप कुमार साहू और सहायक उप निरीक्षक सुशील कुमार बरुआ – शामिल हैं।
इनका योगदान अभियान संचालन, सामुदायिक पुलिसिंग, प्रशासनिक उत्कृष्टता और आपातकालीन परिस्थितियों में तेज़ प्रतिक्रिया के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण रहा है।

राज्य के लिए गौरव का क्षण

इस वर्ष 14 गैलेंट्री मेडल, 1 प्रेसिडेंट्स मेडल और 10 मेरिटोरियस सर्विस मेडल के साथ छत्तीसगढ़ पुलिस ने राष्ट्रीय सम्मान सूची में शानदार उपस्थिति दर्ज कराई है।
ये उपलब्धियां राज्य पुलिस के साहस, नेतृत्व, त्याग और जनसेवा के उच्चतम मानकों की गवाही देती हैं। प्रदेश में कानून व्यवस्था बनाए रखने, अपराध नियंत्रण और समाज में शांति स्थापना में पुलिस प्रशासन के योगदान को ठुकराया नहीं जा सकता।

छत्तीसगढ़ के इन जांबाज़ों को मिला यह सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों का प्रतीक है, बल्कि यह पूरे राज्य की जनता के विश्वास और गर्व का भी प्रतीक है।

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