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दुर्ग। शौर्यपथ विशेष
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जहां प्रदेश में सुशासन का ढोल पीट रहे हैं, वहीं दुर्ग नगर पालिक निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की कार्यप्रणाली जमीनी हकीकत को पूरी तरह झुठलाती नजर आ रही है। शहर में अवैध कब्जाधारियों और गैर अनुमति प्राप्त बाजारों पर जिस तरह निगम प्रशासन ने मौन समर्थन की मुद्रा अपना ली है, वह न केवल प्रशासनिक निष्क्रियता का प्रमाण है बल्कि आने वाले समय में एक बड़े शहरी विवाद की पटकथा भी लिख रही है।
दुर्ग जिले के नागरिक सुपेला संडे बाजार की कहानी से भलीभांति परिचित हैं—जब बाजार छोटा था तब प्रशासन ने आंख मूंद ली, और जब वह विकराल हो गया तो हटाने में जिला प्रशासन और भिलाई नगर निगम को पसीने आ गए। व्यापारियों में विवाद हुआ, कानून व्यवस्था प्रभावित हुई, लेकिन आज भी वह बाजार वैधानिक अनुमति के बिना संचालित होता दिखाई देता है।
अब वही गलती दुर्ग में दोहराई जा रही है
दुर्ग नगर निगम मुख्य कार्यालय के पीछे चर्च रोड क्षेत्र में शनिवार को बिना किसी अनुमति के अवैध बाजार का संचालन प्रारंभ हो चुका है। महज दो महीनों में यह बाजार चर्च चौक से सुराना कॉलेज मार्ग तक फैल चुका है। शुरुआत छोटे स्तर पर हुई, लेकिन अब इसमें भिलाई के व्यापारियों का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय व्यापार और यातायात दोनों पर असर पडऩे लगा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि निगम प्रशासन को इस अवैध बाजार की पूरी जानकारी होने के बावजूद अतिक्रमण विभाग द्वारा व्यापारियों से गंदगी के नाम पर ?50 शुल्क वसूली शुरू कर दी गई है। सवाल यह उठता है कि जब बाजार अवैध है, तो निगम किस अधिकार से शुल्क वसूल रहा है? क्या यह अवैध गतिविधियों को वैधानिक जामा पहनाने की कोशिश नहीं है?
छोटे कर्मचारियों पर सख्ती, बड़े अतिक्रमण पर मौन
शहर में यह चर्चा आम है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल छोटी-छोटी बातों पर कर्मचारियों को नोटिस थमाने में अपनी प्रशासनिक व संवैधानिक शक्तियों का भरपूर उपयोग करते हैं, लेकिन अवैध बाजार और बढ़ते अतिक्रमण के मामलों में उनकी भूमिका पूरी तरह निष्क्रिय दिखाई देती है।
पिछले छह महीनों से कपड़ा लाइन का अतिक्रमण हटाने में निगम प्रशासन पूरी तरह विफल रहा है, जबकि 'मोर शहर मोर जिम्मेदारीÓ योजना के तहत सौंदर्यीकरण कार्य कर रही संस्था को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। शहर के लगभग हर क्षेत्र में अतिक्रमण का बोलबाला है, लेकिन प्रेस विज्ञप्तियों में "सख्त कार्रवाई" के दावे किए जा रहे हैं।
आखिर किसे गुमराह कर रहे हैं आयुक्त?
सवाल यह है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल इन दावों से किसे गुमराह कर रहे हैं—शहर की जनता को, जिला प्रशासन को या प्रदेश सरकार को? एक प्रशासनिक अधिकारी का कार्यकाल भले ही अधिकतम तीन वर्ष का हो, लेकिन इस दौरान जो अतिक्रमण जड़ जमा लेगा, उसे हटाने में आने वाले समय में प्रशासन को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
राजनीतिक मौन भी सवालों के घेरे में
और भी आश्चर्यजनक यह है कि जब शहर में भाजपा की शहरी सरकार है, स्थानीय विधायक प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, तब भी अतिक्रमण के बढ़ते स्तर पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले विधानसभा चुनावों में यही अतिक्रमण सत्ताधारी दल के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
सुशासन की कसौटी पर दुर्ग नगर निगम
यदि मुख्यमंत्री का सुशासन केवल फाइलों और मंचों तक सीमित नहीं है, तो दुर्ग नगर निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा अनिवार्य है। अन्यथा यह कहा जाना गलत नहीं होगा कि दुर्ग में सुशासन नहीं, बल्कि 'मौन समर्थन का शासनÓ चल रहा है, जहां अवैध कब्जाधारी फल-फूल रहे हैं और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।
राम रसोई के नाम पर सड़क पर कब्जा, धर्म स्थल के सामने कब्ज़े की दीवार , और प्रशासन की चुप्पी — क्या यही है सुशासन ?
शौर्यपथ विशेष
एक ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय लगातार सुशासन की बात कर रहे हैं,धर्म रक्षा की बात कर रहे है सुशासन पर्व मनाया जा रहा है, और जनता को यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि सरकार पारदर्शिता, न्याय और कानून के राज के लिए प्रतिबद्ध है प्रदेश में राम राज्य की स्थापना हो रही है । वहीं दूसरी ओर, उन्हीं की सरकार में नियुक्त अधिकारी ज़मीनी स्तर पर सुशासन को खुलेआम आईना दिखाते नजर आ रहे हैं , हिन्दुओ के आराध्य प्रभु राम की सत्य और निति की बातो का विरोध करते नजर आ रहे है । दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में सामने आया मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक है, बल्कि सरकार के दावों पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह और धर्म व प्रभु राम के नाम पर अवैध कब्ज़े सन्देश खड़ा करता है।
दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में गणेश मंदिर के सामने स्थित एक सार्वजनिक मार्ग और श्रद्धालुओं के लिए उपयोग में आने वाला स्थल, राम रसोई के संचालक द्वारा सड़क पर कब्जा कर लिया गया है। यह कोई खाली भूमि नहीं थी, बल्कि वर्षों से आम जनता के आवागमन और त्योहारों के दौरान प्रार्थना स्थल के रूप में प्रयुक्त होती रही है। इसके बावजूद यह अवैध कब्जा आज भी जस का तस बना हुआ है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल को इस अवैध कब्जे की पूरी जानकारी होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई? आम जनता ने विरोध दर्ज कराया, आवाज उठाई, लेकिन धनवानों के प्रभाव और गैर-जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी के सामने जनता की आवाज दबती चली गई। यह चुप्पी केवल लापरवाही नहीं, बल्कि कहीं न कहीं अवैध कब्जाधारियों को दिया गया मौन समर्थन प्रतीत होती है।
एक तरफ शहर के चौक-चौराहों पर अतिक्रमण की भरमार है, दूसरी ओर निगम प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने के लिए गरीबों की छोटी-छोटी गुमटियों पर बुलडोज़र चलाकर कार्रवाई का ढोल पीटता है। प्रश्न यह है कि कानून सिर्फ कमजोरों के लिए ही क्यों सक्रिय होता है? धनवानों और प्रभावशाली लोगों के सामने प्रशासन की कलम क्यों सूख जाती है?
राम रसोई जैसे पवित्र नाम का उपयोग कर शासकीय भूमि और सड़क पर कब्जा करना न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि धार्मिक आस्था पर भी प्रहार है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने कभी अन्याय और नियमों के विरुद्ध आचरण नहीं किया, लेकिन उन्हीं के नाम पर आज अवैध कब्जा किया जा रहा है — और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।
यह और भी चिंताजनक है कि यह सब उस दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में हो रहा है, जहाँ प्रदेश सरकार के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री ललित चंद्राकर, भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडे, प्रदेश संगठन मंत्री जितेंद्र वर्मा और दुर्ग जिला भाजपा अध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक जैसे बड़े नेताओं के निवास हैं। इन सबके बीच खुलेआम अवैध कब्जे पर कार्रवाई न होना क्या इस बात का संकेत नहीं है कि मुख्यमंत्री का सुशासन दुर्ग में सिर्फ काग़ज़ों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित है?
निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल द्वारा शहर की बिगड़ती व्यवस्था पर मौन, अवैध कब्जाधारियों पर कार्रवाई से परहेज और चुनिंदा कार्रवाई की नीति, यह स्पष्ट करती है कि संवैधानिक शक्तियों का उपयोग जनहित में नहीं, बल्कि मनमर्जी और प्रभाव के आधार पर किया जा रहा है।
दुर्ग नगर निगम की यह स्थिति सरकार के लिए चेतावनी है। यदि समय रहते ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो सुशासन का दावा जनता की नजर में खोखला साबित होगा। सवाल साफ है — क्या सरकार सच में सुशासन चाहती है, या फिर कुछ अधिकारी अपनी चुप्पी से पूरे शासन को कठघरे में खड़ा करने पर आमादा हैं?
दुर्ग / शौर्यपथ
छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार जहां सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को अपनी प्राथमिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दुर्ग नगर पालिक निगम से सामने आया एक प्रकरण इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। मामला न केवल प्रशासनिक निर्णयों की असंगतता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार छोटे कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई और वरिष्ठ अधिकारियों पर महज औपचारिक माफी की नीति अपनाई जा रही है।
दो साल बाद पदोन्नति निरस्त : पीडि़त कौन, दोषी कौन?
दुर्ग नगर निगम में वर्षों से पंप अटेंडेंट के रूप में कार्यरत कर्मचारी राजू लाल चंद्राकर को तत्कालीन आयुक्त लोकेश चंद्राकर के कार्यकाल में विभागीय पदोन्नति समिति (ष्ठक्कष्ट) की संस्तुति पर जल कार्य निरीक्षक के पद पर पदोन्नति प्रदान की गई थी। यह पदोन्नति किसी एक अधिकारी के व्यक्तिगत निर्णय से नहीं, बल्कि विधिवत गठित समिति की अनुशंसा पर हुई थी।
इस समिति में —
दिनेश नेताम, कार्यपालन अभियंता
जितेंद्र सोमैया, सहायक अभियंता (वर्तमान में सेवानिवृत्त)
राजकमल बोरकर, कार्यालय अधीक्षक
जावेद अली, तत्कालीन स्वास्थ्य अधिकारी
भूपेंद्र गोईर, सहायक ग्रेड-3
शामिल थे। स्थापना प्रभारी बंजारे द्वारा आवश्यक अभिलेख समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे। समिति ने उपलब्ध पद, सेवा अभिलेख और नगरीय निकाय नियमों के आधार पर राजू लाल चंद्राकर को पदोन्नति देने का निर्णय लिया।
वर्तमान आयुक्त का आदेश और उठा विवाद
लगभग दो वर्ष तक जल कार्य निरीक्षक के पद पर कार्य करने के बाद, जुलाई 2025 में वर्तमान आयुक्त सुमित अग्रवाल ने एक आदेश जारी कर न केवल राजू लाल चंद्राकर की पदोन्नति निरस्त कर दी, बल्कि उन्हें पुन: पंप अटेंडेंट के पद पर डिमोशन दे दिया। साथ ही, पदोन्नति समिति के सभी सदस्यों को नोटिस जारी किया गया।
नोटिस के जवाब में समिति के सभी सदस्यों ने स्पष्ट किया कि —पदोन्नति नगरीय निकाय नियमों के अनुरूप थी,पद की उपलब्धता मौजूद थी,पूर्व में भी इसी प्रकार की पदोन्नतियां हो चुकी हैं। इसके बावजूद, समिति के उत्तरों को अस्वीकार कर दिया गया। परिणाम यह रहा कि — समिति के सदस्यों को केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया गया,जबकि कर्मचारी राजूलाल चंद्राकर को पदावनत कर दिया गया।यही बिंदु आज दुर्ग निगम में सबसे बड़ा सवाल बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक मामला
राजू लाल चंद्राकर ने वेतन और पद से जुड़े विवाद को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। एक शपथ पत्र में स्वयं आयुक्त सुमित अग्रवाल ने यह स्वीकार किया कि राजू लाल चंद्राकर उनके अधीनस्थ कर्मचारी हैं और जल कार्य निरीक्षक के रूप में कार्यरत रहे हैं।
प्रशासनिक कानून के जानकारों का कहना है कि — यदि पदोन्नति अवैध थी, तो दो वर्षों तक कार्य क्यों कराया गया? और यदि अवैध नहीं थी, तो डिमोशन का आधार क्या है? यही प्रश्न अब माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।
नियम विरुद्ध पदोन्नति थी तो अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
इस पूरे प्रकरण का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू यह है कि — यदि मान लिया जाए कि पदोन्नति नियमों के विरुद्ध थी, तो फिर:पदोन्नति समिति के सदस्यों पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं? ,स्थापना शाखा और फाइल आगे बढ़ाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं?
सिर्फ एक कर्मचारी को दंडित कर देना और निर्णय लेने वाले अधिकारियों को "चेतावनी का गुलदस्ता" थमा देना, प्रशासनिक न्याय की अवधारणा पर सवाल खड़े करता है। निगम के भीतर इसे निजी द्वेष और भेदभावपूर्ण नीति के रूप में देखा जा रहा है।
चयनात्मक कार्रवाई का लंबा इतिहास
दुर्ग निगम में यह पहला मामला नहीं है। वर्तमान आयुक्त के कार्यकाल में उच्च अधिकारियों की प्रताडऩा से त्रस्त कर्मचारियों द्वारा आत्महत्या के मामले सामने आए,बाद में नियमों को शिथिल कर आनन-फानन में परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति दी गई,जबकि अन्य समान मामलों में कर्मचारी महीनों से निलंबन झेल रहे हैं।
इसी तरह, सहायक राजस्व निरीक्षक थान सिंह यादव पर पार्किंग घोटाले में पेनल्टी लगने और लॉलीपॉप विज्ञापन घोटाले में भौतिक सत्यापन के दौरान अनियमितता बरतने के आरोप हैं। इन मामलों में निगम को राजस्व हानि हुई, परंतु कार्रवाई का दायरा ठेकेदार तक सीमित रहा — कर्मचारी फिर बच निकले।
सुशासन पर आईना
दुर्ग नगर निगम की यह कार्यप्रणाली अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रही। यह मामला सीधे तौर पर राज्य सरकार के सुशासन के दावों पर असर डाल रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बार-बार सुशासन की बात करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ अधिकारी यदि अपनी संवैधानिक शक्तियों का चयनात्मक और मनमाना प्रयोग करते हैं, तो उसकी आंच सरकार तक पहुंचना स्वाभाविक है।
अब सबकी निगाहें माननीय उच्च न्यायालय के फैसले पर टिकी हैं। यह फैसला न केवल राजू लाल चंद्राकर के भविष्य का निर्धारण करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि प्रशासनिक निर्णयों की जवाबदेही किसकी होगी?और क्या वास्तव में दुर्ग निगम में 'कानून सबके लिए समानÓ है?फिलहाल, दुर्ग में चर्चा का बाजार गर्म है और सवाल एक ही है — क्या यह सुशासन है, या सत्ता की छाया में पनपता भेदभाव?
दुर्ग (शौर्यपथ)। जनवरी–फरवरी के निगम चुनावों में सुशासन का वादा कर जीत का दावा करने वाली ट्रिपल-इंजन सरकार का दुर्ग नगर निगम पर दिखता चेहरा अब सवालों के घेरे में है। स्थानीय नागरिकों, पार्षदों और विकास कार्यों से जुड़े ठेकेदारों का आरोप है कि निगम प्रशासन में भेदभाव और निष्क्रियता ऐसी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है कि शहर की रोज़मर्रा की समस्याएँ — अतिक्रमण, खुले नाले-पानी और अधूरे काम — सामान्य हो गए हैं।
नागरिकों का कहना है कि नगर आयुक्त सुमित अग्रवाल केवल कपड़ा लाइन पर बार-बार कार्रवाई कर के अपनी रिपोर्ट-कार्ड चमकाने में लगे हैं, जबकि गणेश मंदिर के सामने सड़क पर खुलेआम कब्जा और चर्च रोड पर बिना अनुमति लगा अवैध बाजार, समृद्धि बाजार में अवैध अतिक्रमण जैसे मामलों पर पर निगम आयुक्त का मौन रहना चिंता बढ़ाने वाला है। विभागीय सूत्रों की माने तो निगम के पास पिछले वर्ष से राजस्व वसूली में भारी वृद्धि हुई — लगभग ढाई गुना — और तमाम सरकारी राशि उपलब्ध होने के बाबजूद शहर के विकास कार्य रुकावटों का शिकार हैं।
ठेकेदारों व कर्मियों का आरोप है कि भुगतान महीनों तक रुके रहने से परियोजनाओं की रफ्तार ठप पड़ जाती है; इसके परिणामस्वरूप आम जनता को जहरीले पानी, अधूरी सड़कें , सड़कों पर आवारा पशुओं की फौज और अतिक्रमण वाली समस्याओं का दंश सहना पड़ रहा है। कई कर्मचारी व अधिकारी भी प्रशासनिक दमन व असमंजस की शिकायत करते हैं — “कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं, अधिकारी और कर्मचारी दहशत में हैं।”
एक ओर जहाँ स्थानीय सूत्रों का आरोप है कि ठेके व अनुबंधों में अनियमितताएँ हैं — खासकर ‘लॉलीपॉप’ अनुबंध से जुड़े मामलों में जिसमेंखुलेआम राजस्व की हानि हुई बावजूदइसकेजिम्मेदार अधिकारी पर निगम प्रशासन द्वारा कार्यवाही न होने से “नैतिकता और जवाबदेही की कमी” के सन्देश जनता तक जा रहे हैं। निगम कार्यालय में कंप्यूटरों की अदला-बदली और अन्य व्यवस्थागत गड़बड़ियों के कारण विभागीय जवाबदेही भी प्रश्नचिह्न के नीचे आ चुकी है — नागरिकों का मत है कि जहरीले पानी मामले में प्लेसमेंट-कर्मचारी पर कार्रवाई कर के कागजी कार्यवाही दिखाई जा रही है, असल जिम्मेदारी अनछुई रह जाती है।
इन सभी आरोपों व शिकायतों के बीच सबसे अहम सवाल यह उठता है कि जब नगरीय निकाय विभाग उपमुख्यमंत्री अरुण साव के पास है तो क्या मंत्रालय स्तर पर किसी सख्त हस्तक्षेप की जरूरत नहीं दिखती? चुनावी मंचों पर सुशासन की बातें करने वाले उपमुख्यमंत्री के पास विभाग होने के बावजूद दुर्ग में प्रशासनिक बदहाली जारी रहना सीधे तौर पर उनकी नीतिगत जवाबदेही पर भी प्रश्न खड़ा करता है।
नगर पालिक निगम के मौजूदा आयुक्त को स्थानीय गतिविधियों व शिकायतों से अवगत कराया जा चुका है — लेकिन हालात में कोई ठोस सुधार न होना जनता के मन में यह आशंका पैदा कर रहा है कि क्या प्रशासन कुछ खास लोगों के प्रति नरम रवैया अपनाकर समग्र जनता की समस्याओं को अनदेखा कर रहा है। पार्षदों और नागरिक समूहों की मांग है कि या तो तुरंत सघन निरीक्षण कर दोषियों को कड़ी सजा दी जाए या फिर स्वतंत्र जांच कराई जाए ताकि शहर के विकास और सुशासन की बातें सिर्फ चुनावी बयानों तक सीमित न रहें।
दुर्ग। शौर्यपथ।
नगर निगम दुर्ग प्रशासन में एक बार फिर सख्ती के संकेत नजर आ रहे हैं। निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल ने सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी शुभम गोईर को कंप्यूटर के आदान-प्रदान के दौरान उपकरण गायब होने के मामले में 24 घंटे के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का नोटिस जारी किया है। जवाब नहीं देने पर दंडात्मक कार्यवाही के निर्देश दिए गए हैं।
यह नोटिस जारी होने के बाद अब निगम कर्मचारियों में चर्चा का विषय यह बन गया है कि क्या इसी तरह की सख्ती तात्कालिक बाजार अधिकारी थान सिंह यादव पर भी दिखाई जाएगी?
ज्ञात हो कि वर्ष 2021-22 में पार्किंग घोटाले से संबंधित प्रकरण में लगभग ₹80,000 की राजस्व वसूली के लिए तात्कालिक बाजार अधिकारी थान सिंह यादव को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन अब तक उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इसके अलावा गौरव पथ पर विज्ञापन बोर्ड के गलत साइज और आकलन के मामले में भी थान सिंह यादव का नाम चर्चा में रहा है।
वहीं दूसरी ओर, शुभम गोईर पर बीते तीन-चार महीनों में आयुक्त अग्रवाल द्वारा लगभग डेढ़ दर्जन नोटिस जारी किए जा चुके हैं और वे वर्तमान में निलंबन की स्थिति में हैं। आयुक्त की यह कार्यवाही निगम प्रशासन में अनुशासन की कसावट के रूप में देखी जा रही है।
अब कर्मचारियों के बीच यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या यह सख्ती सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित रहेगी या फिर आयुक्त अग्रवाल निष्पक्ष प्रशासनिक सिद्धांतों का पालन करते हुए विवादित मामलों में शामिल अन्य अधिकारियों पर भी कार्रवाई करेंगे?
फिलहाल, सभी की निगाहें आयुक्त सुमित अग्रवाल के अगले कदम पर टिकी हैं — क्या थान सिंह यादव जैसे विवादित अधिकारी पर भी कार्यवाही होगी या फिर निगम प्रशासन एक बार फिर मौन साध लेगा?
नगर निगम कार्यालय में फिलहाल यही चर्चा जोरों पर है।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
