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मनोरंजन/ शौर्यपथ / भारतीय सिनेमा जगत में पिछले सात दशक से लता मंगेश्कर ने अपनी मधुर आवाज से लोगों को अपना दीवाना बनाया हुआ है, लेकिन उनके बारे में कुछ ऐसे दिलचस्प फैक्ट्स हैं जिनसे आप आज तक अंजान हैं। आज लता मंगेशकर अपना 91वां बर्थडे सेलिब्रेट कर रही हैं। मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में जन्मीं लता एक मध्यम वर्गीय मराठी परिवार से हैं।
उन्होंने साल 1942 में 'किटी हसाल' के लिए अपना पहला गाना गाया, लेकिन उनके पिता दीनानाथ मंगेश्कर को लता का फिल्मों के लिए गाना पसंद नहीं आया और उन्होंने उस फिल्म से लता के गाए गीत को हटवा दिया था। हालांकि, इसी साल लता को 'पहली मंगलगौर' में अभिनय करने का मौका मिला। लता की पहली कमाई 25 रुपये थी जो उन्हें एक कार्यक्रम में स्टेज पर गाने के दौरान मिली थी। बचपन में उन्हें काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा था। जब वह 13 साल की थीं तभी दिल का दौरा पड़ने से उनके पिता की मौत हो गई थी।
लता मंगेशकर ने 36 भाषाओं में 50 हजार से ज्यादा गीत गाए हैं। लता मानती हैं, “पिता का गायन सुन-सुनकर ही मैंने सीखा था, लेकिन मुझ में कभी इतनी हिम्मत नहीं थी कि उनके साथ गा सकूं।” मास्टर गुलाम हैदर ने लता को फिल्म 'मजबूर' के गीत 'अंग्रेजी छोरा चला गया' में गायक मुकेश के साथ गाने का मौका दिया था। यह लता का पहला बड़ा ब्रेक था। इसके बाद उन्हें काम की कभी कमी नहीं हुई। बाद में लता मंगेशकर ने चांदनी, राम लखन, सनम बेवफा, लेकिन, फरिश्ते, पत्थर के फूल, डर, हम आपके हैं कौन, दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे, माचिस, दिल तो पागल है, वीर जारा, कभी खुशी कभी गम, रंग दे बसंती और लगान जैसी फिल्मों में गाने गाए।
लता ने क्यों नहीं की शादी
पिता के गुजर जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारियां लता मंगेशकर पर आ गईं थीं। एक इंटरव्यू में लता मंगेशकर ने कहा था कि घर के सभी सदस्यों की जिम्मेदारी मुझ पर थी। ऐसे में कई बार शादी का ख्याल आता भी तो उस पर अमल नहीं कर सकती थी। बेहद कम उम्र में ही मैं काम करने लगी थी। सोचा कि पहले सभी छोटे भाई बहनों को सेटल कर दूं। फिर बहन की शादी हो गई। बच्चे हो गए। तो उन्हें संभालने की जिम्मेदारी आ गई। इस तरह से वक्त निकलता चला गया और मैंने शादी नहीं की।
जब किशोर कुमार से यूं हुई थी मुलाकात
किशोर कुमार के साथ लता की अनबन का वाकया काफी दिलचस्प है। इस घटना के बारे में बताते हुए लता ने बताया था कि 'बॉम्बे टॉकीज' की फिल्म 'जिद्दी' के गाने की रिकॉर्डिंग पर जाने के लिए वह लोकल ट्रेन से सफर कर रही थीं। उस समय उन्होंने देखा कि एक शख्स भी उसी ट्रेन में सफर कर रहा है। स्टूडियो जाने के लिए जब उन्होंने तांगा लिया तो देखा कि वह शख्स भी तांगा लेकर उसी ओर जा रहा है। जब वह बॉम्बे टॉकीज पहुंचीं तो उन्होंने देखा कि वह शख्स भी बॉम्बे टॉकीज पहुंचा हुआ है। बाद में उन्हें पता चला कि वह शख्स किशोर कुमार हैं। बाद में 'जिद्धी' में लता ने किशोर कुमार के साथ 'ये कौन आया रे करके सोलह सिंगार' गाना गाया था।
रफी से बातचीत कर दी थी बंद
लता ने पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के साथ सैकड़ों गीत गाए थे, लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया था जब उन्होंने रफी से बातचीत तक बंद कर दी थी। लता गानों पर रॉयल्टी की पक्षधर थीं, जबकि मोहम्मद रफी ने कभी भी रॉयल्टी की मांग नहीं की। दोनों का विवाद इतना बढ़ा कि मोहम्मद रफी और लता के बीच बातचीत भी बंद हो गई और दोनों ने एक साथ गीत गाने से इनकार कर दिया। हालांकि, चार साल बाद अभिनेत्री नरगिस के प्रयास से दोनों ने एक साथ एक कार्यक्रम में 'दिल पुकारे' गीत गाया।
एक दिन में 12 मिर्चे तक खा लेती हैं लता
बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि लता का असली नाम हेमा हरिदकर है। बचपन के दिनों से उन्हें रेडियो सुनने का बड़ा ही शौक था। 18 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला रेडियो खरीदा था और रेडियो ऑन करते ही उन्हें के. एल. सहगल की मृत्यु की खबर मिली थी, जिसके बाद उन्होंने वह रेडियो दुकानदार को वापस लौटा दिया था। लता को अपने बचपन के दिनों में साइकल चलाने का काफी शौक था जो पूरा नहीं हो सका। बता दें कि उन्होंने अपनी पहली कार 8000 रुपये में खरीदी थी। स्पाइसी खाने की शौकीन लता एक दिन में तकरीबन 12 मिर्चे तक खा लेती हैं। उनका मानना है कि मिर्च खाने से गले की मिठास बढ़ती है। लता को किक्रेट देखने का भी काफी शौक रहा है। लार्डस में उनकी एक सीट हमेशा रिजर्व रहती है।
सिर्फ एक दिन के लिए गईं स्कूल
बहुत कम लोगों को पता होगा कि लता महज एक दिन के लिए स्कूल गई थीं। इसकी वजह यह रही कि जब वह पहले दिन अपनी छोटी बहन आशा भोंसले को स्कूल लेकर गई तो टीचर ने आशा को यह कहकर स्कूल से निकाल दिया कि उन्हें भी स्कूल की फीस देनी होगी। बाद में लता ने निश्चय किया कि वह कभी स्कूल नहीं जाएंगी। इसके बाद उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा घर में ही रहकर अपने नौकर से प्राप्त की। हालांकि, बाद में उन्हें न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी सहित छह विश्वविधालयों से मानक उपाधि से नवाजा गया।
भारत रत्न से नवाजा गया
लता को अपने सिने करियर में मान-सम्मान बहुत मिला। वह फिल्म इंडस्ट्री की पहली महिला हैं जिन्हें भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त हुआ।
शौर्यपथ लेख । सरोज पाण्डेय छत्तीसगढ़ की भाजपा नेत्री जिसने राजनैतिक शुरुवात दुर्ग निगम के महापौर पद से शुरू की और एक ही समय मे महापौर , विधायक , सांसद होने का गौरव प्राप्त किया । राजनीतिक घटनाक्रम में एक ऐसा समय भी आया जब डॉ सरोज पाण्डेय ना ही महापौर थी ना विधायक थी और ना सांसद थी तब भी दुर्ग और छत्तीसगढ़ में चर्चा तेज हो गई कि अब सरोज पाण्डेय का राजनैतिक सफर का अंत हो गया अब सक्रिय राजनीति से दूर हो गई तभी अचानक केंद्रीय संगठन में सरोज पाण्डेय को महासचिव के पद से नवाजा गया और महाराष्ट्र का प्रभारी बना दिया गया लगातार 5 साल तक निर्विवाद एक मात्र महिला महासचिव होने का गौरव सरोज पाण्डेय को प्राप्त हुआ । और एक बार फिर विरोधियों की बोलती बंद हो गई । संगठन में डॉ सरोज पाण्डेय के कद को जब जब छोटा समझने की कोशिश हुई तब तब उनका कद बढ़ते गया । वर्तमान में भी ऐसा ही समय आया है जब भाजपा के अध्यक्ष ने डॉ सरोज पाण्डेय को संगठन में कोई जगह नही दी भाजपा अध्यक्ष के जम्बो टीम में से डॉ पाण्डेय के नाम नही होने की खबर लगते ही एक बार फिर राजनैतिक चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया कि अब सरोज पाण्डेय को संगठन में कोई महत्त्व नही दिया जा रहा विपक्षी इसे छत्तीसगढ़ की महिला का अपमान बता रहे तो खुद की पार्टी के लोग इसे घमंड का अंत बता रहे थे किंतु इन सब बातों में लोग ये भूल गए कि सालो पहले जिस सरोज पाण्डेय ने निगम से राजनीतिक जीवन का सफर आरंभ किया और केंद्र की राजनीति तक का सफर किया जिसमें बहुतेरे विरोध के बाद भी सीढ़ी दर सीढ़ी अपना सफर तय किया वो आज जिस मुकाम पर है वहाँ तक पहुंचने में छत्तीसगढ़ का कोई भी भाजपा नेता सफलता हांसिल नही कर सका । सरोज पाण्डेय जिस संगठन का हिस्सा है वह एक पद एक व्यक्ति की बात परिभाषित होती है । विरोधी शायद इस बात को भी भूल गए कि जब भी डॉ सरोज पाण्डेय को संगठन एक कदम पीछे करती है तो भविष्य में दो कदम आगे बढ़ा देती है । आज सरोज को संगठन ने महासचिव पद से हटाया तो हो सकता है आगे कोई बड़ा पद उनके लिए बना रही हो । वर्तमान में मोदी सरकार के मंत्री मंडल में 57 सदस्य है और 81 सदस्य मंत्री मंडल शामिल हो सकते है उस लिहाज से 24 पद पर मंत्री बनाया जा सकता है । जैसा कि सभी को मालूम है कि सरोज पाण्डेय अभी राज्य सभा सदस्य है और 2022-23 तक इस पद में रहेंगी । महासचिव पद से हटाने के बाद इस बात की भी चर्चा जोरों पर है कि उन्हें संगठन से हटा कर मंत्री मंडल में शामिल किया जा सकता है । डॉ पाण्डेय प्रखर प्रवक्ता है और वर्तमान में छत्तीसगढ़ में कोई भी ऐसा भाजपा नेता भूपेश सरकार को घेरने में उतना सफल नही हो पा रहा जितनी उम्मीद केंद्रीय संगठन को है ऐसे में ये भी कयास लगाए जा रहे है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देने के साथ संगठन छत्तीसगढ़ में डॉ सरोज पाण्डेय को मुख्य चेहरा बना सकती है । वर्तमान में भले ही महासचिव पद से सरोज पाण्डेय को हटा दिया गया किन्तु इसका ये मतलब निकलना कि अब डॉ पाण्डेय का कद घट गया जल्दबाजी होगी । ये राजनीति है यह एक कदम पीछे हटने का मतलब हार नही किसी बड़ी जीत की तैयारी माना जाता है । आगे जो भी हो किन्तु इतना तो तय है कि सरोज पाण्डेय का कद संगठन में आज भी बड़ा है और ये सूची आने वाले बड़े फेरबदल का एक आगाज़ मात्र है ..( शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार पत्र )
पटना / शौर्यपथ / बिहार विधान सभा चुनाव में नेता विपक्ष तेजस्वी यादव ने बड़ा दांव खेला है. उन्होंने युवाओं को रिझाने के लिए ऐलान किया है कि अगर उनकी सरकार बनी तो पहली कैबिनेट मीटिंग में ही पहला फैसला राज्य में 10 लाख लोगों को रोजगार देने पर लेंगे. उन्होंने ट्वीट किया है, "पहली कैबिनेट में पहली कलम से बिहार के 10 लाख युवाओं को नौकरी देंगे..बिहार में 4 लाख 50 हज़ार रिक्तियाँ पहले से ही है.. शिक्षा, स्वास्थ्य, गृह विभाग सहित अन्य विभागों में राष्ट्रीय औसत के मानकों के हिसाब से बिहार में अभी 5 लाख 50 हज़ार नियुक्तियों की अत्यंत आवश्यकता है.."
रविवार को पटना में एक संवाददाता सम्मेलन में तेजस्वी ने कहा कि राजद द्वारा विगत 5 सितंबर को लॉन्च बेरोज़गारी हटाओ पोर्टल पर अब तक 9 लाख 47 हज़ार 324 बेरोज़गार युवाओं और 13 लाख 11 हज़ार 626 लोगों ने टोल फ़्री नम्बर पर Missed Call किया है. यानि अब तक कुल 22 लाख 58 हज़ार 950 लोगों ने निबंधन किया है. उनके अनुसार बिहार में 4 लाख 50 हज़ार रिक्तियाँ पहले से ही हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, गृह विभाग सहित अन्य विभागों में राष्ट्रीय औसत एवं तय मानकों के हिसाब से बिहार में अभी भी 5 लाख 50 हज़ार नियुक्तियों की अत्यंत आवश्यकता है.
उन्होंने कहा कि उदाहरण के तौर पर स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा तय मानक पर बिहार आख़िरी पायदान पर है. बिहार की आबादी लगभग साढ़े बारह करोड़ है. WHO के स्वास्थ्य मानक के अनुसार प्रति 1000 आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए लेकिन बिहार में 17 हज़ार की आबादी पर एक डॉक्टर है. इस हिसाब से बिहार में एक लाख पचीस हज़ार डॉक्टरों की ज़रूरत है. उसी अनुपात में सपोर्ट स्टाफ़ जैसे नर्स,लैब टेक्निशियन, फ़ार्मसिस्ट की ज़रूरत है. सिर्फ़ स्वास्थ्य विभाग में ही ढाई लाख लोगों की ज़रूरत है.
राज्य में पुलिसकर्मियों के 50 हजार से अधिक पद रिक्त हैं. यह तब है, जब बिहार में पुलिस-पब्लिक का अनुपात न्यूनतम स्तर पर पहुंचा हुआ है, यहां प्रति एक लाख की आबादी पर सिर्फ 77 पुलिसकर्मी हैं, जबकि मणिपुर जैसे राज्य में पुलिसकर्मियों की संख्या प्रति एक लाख की आबादी पर एक हजार से अधिक है. राष्ट्रीय औसत 144 पुलिसकर्मी प्रति एक लाख आबादी पर है. बिहार में पुलिसकर्मियों की टोटल स्ट्रैंथ 1.26 लाख है लेकिन अभी सिर्फ 77 हजार कार्यरत पुलिस कर्मियों के भरोसे इतना बड़ा और अपराध की दृष्टि से गंभीर माना जाने वाल राज्य चल रहा है. उन्होंने कहा कि अभी पुलिस विभाग में लगभग 50 हज़ार रिक्तियाँ है. राष्ट्रीय औसत से भी देखें तो बिहार में 1.72 लाख पुलिसकर्मियों की ज़रूरत है. इसके बावजूद पुलिसकर्मियों की नियुक्ति में आनाकानी चलती रहती है और आज तक बहाली की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई.
तेजस्वी ने कहा, शिक्षा क्षेत्र में 3 लाख शिक्षकों की ज़रूरत है. प्राइमरी और सेकंडेरी लेवल पर ढाई लाख से अधिक स्थायी शिक्षकों के पद रिक्त हैं. कॉलेज और यूनिवर्सिटी स्तर पर लगभग 50 हज़ार प्रोफ़ेसर की आवश्यकता है. बिहार में 35 हज़ार के लगभग ऐसे विद्यालय हैं जहाँ एक ही शिक्षक हैं. बिहार के 67.94 फीसदी ऐसे प्राइमरी स्कूल हैं जहाँ विद्यार्थी शिक्षक अनुपात अस्वीकार्य ति में है. इसके ऊपर के विद्यालयों की स्थिति और भी बदतर है. 77.86 फीसदी माध्यमिक विद्यालयों में विद्यार्थी शिक्षक अनुपात बिल्कुल आपत्तिजनक अवस्था में है.
नेता प्रतिप क्ष ने कहा कि राज्य में जूनियर इंजीनियर के 66% पद ख़ाली हैं. पथ निर्माण, जल संसाधन, भवन निर्माण, बिजली विभाग तथा अन्य अभियांत्रिक विभागों में लगभग 75 हज़ार अभियंताओं की ज़रूरत है. इसके अलावा लिपिकों, सहायकों, चपरासी और अन्य वर्गों के लगभग 2 लाख पद भरने की आवश्यकता है ताकि काम-काज सुचारू रूप से चल सके और कार्य में निपुणता और गुणवता आ सके. उन्होंने कहा कि हमारी सरकार की पहली प्राथमिकता रिक्तियों के साथ-साथ नयी नौकरियाँ सृजित करने की होगी. इसके लिए हम वचनबद्ध हैं. हमारी पहली कैबिनेट बैठक में इन पदों को भरने की क़वायद शुरू होगी, विज्ञापन निकाला जाएगा और एक तय समय सीमा के नियुक्तियाँ की जाएँगी.
नई दिल्ली / शौर्यपथ / दिल्ली में हत्या करने के इरादे से आए लड़कों को पेट्रोलिंग करती पुलिस ने बहादुरी दिखाते हुए दबोच लिया. एक युवक पर चाकूबाजी की जा रही थी. पूरी वारदात सीसीटीवी में कैद हो गई. घटना रात 9:30 बजे आनंद पर्वत स्थित नई बस्ती की है. पुलिस के मुताबिक, आनंद पर्वत थाने में तैनात हेड कांस्टेबल दामोदर और कांस्टेबल विजय डूडी पेट्रोलिंग कर रहे थे. तभी उन्होंने देखा कि दो समूहों में झगड़ा हो रहा है और कुछ लड़के एक लड़के पर चाकू से हमला कर रहे हैं.
हेड कांस्टेबल ने अपनी लाठी से हमलावरों को काबू किया और दोनों पुलिसकर्मियों ने मिलकर दो हमलावरों को पकड़ लिया. जांच में पता चला कि घायल गौरव अपने 2 दोस्तों थान सिंह और प्रेम सागर के साथ श्रीधाम ढाबा गया था. यह ढाबा हमला करने वाले आकाश और उसके भाई नीलेश का है.
खाने में देरी को लेकर गौरव और ढाबा मालिक के बीच झगड़ा हो गया और फिर ढाबे के पूरे स्टाफ और ढाबा मालिक ने मिलकर गौरव पर चाकू और रॉड से हमला कर दिया. इसी बीच पुलिसकर्मियों ने बहादुरी दिखाते हुए नीलेश और उसके भाई आकाश को गिरफ्तार कर लिया और गौरव की जान बच गई. गौरव को अस्पताल में भर्ती कराया गया है. दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर आगे की कार्यवाही की गई.
नई दिल्ली / शौर्यपथ / आमतौर पर जब आप एक डाइनिंग टेबल के बारे में सोचते हैं तो आपकी कल्पना शायद बहुत सीधी और सपाट हो. लेकिन डाइनिंग टेबल को भी कल्पना की मिसाल बनाया जा सकता है. इसका एक उदाहरण सामने आया है. दरअसल नागालैंड के एक मूर्तिकार ने टेबल के ऊपर गांव का एक प्राकृतिक नजारा पेश किया है. लकड़ी के टेबल पर झोपड़ी, पुल और झरने की कलाकारी बनाई है. नागालैंड के मूर्तिकार निंगवोन ज़िंगखाई ने लकड़ी के टेबल पर गांव की ये खूबसूरती पेश की है. टेबल पर उन्होंने नदी, तालाब, झरना, पुल और झोपड़ी बनाई है.
मूर्तिकारी का काम करने वाले जिंगखाई बताते हैं कि उनको इस कलाकृति को पूरा करने में लगभग साल भर का समय लग गया. उन्होंने लकड़ी के एक बड़े टुकड़े से ये डाइनिंग टेबल तैयार किया है.
जिंगखाई की पत्नी ने बताया कि उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि उनके पति क्या कर रहे हैं. दरअसल उनकी हमेशा पति से शिकायत रहती थी कि वे क्या करते रहते हैं. जिंगखाई और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है.
मूर्तिकारी के जरिए जिंगखाई अपना घर परिवार चलाते हैं. उन्होंने एक दोस्त से मदद लेकर ये लकड़ी का टुकड़ा खरीदा था और उससे कहा था कि काम पूरा होने पर वे पैसे लौटा देंगे.
जिंगखाई के पड़ोसियों ने बताया कि जब वे उनसे पूछते थे कि वे क्या कर रहे हैं तो जिंगखाई बताते थे कि वे एक डाइनिंग पर अपनी कल्पनाओं को पूरा कर रहे हैं. ये सब सुनकर उनका मजाक ही उड़ाया करते थे. लेकिन आज सब को यकीन हो गया कि उन्होंने जो सोचा वो कर दिखाया.
जिंगखाई ने बताया कि उन्होंने इस कल्पना को पूरा करने में एक लाख 70 हजार रुपये की राशि खर्च की है. वे इस कलाकृति को 20 लाख रुपये में बेचना चाहते हैं. उनका कहना है कि इसके पीछे उनकी बहुत मेहनत और समय लगा है.
चेन्नई / शौर्यपथ/ अभिनेता-नेता कमल हासन ने विवादास्पद कृषि विधेयकों को समर्थन देने पर तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी अन्नाद्रमुक की आलोचना की है और इसे राज्य के किसानों के साथ धोखा करार दिया है. हासन ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार द्वारा लाए गए ये बिल राज्यों की स्वायत्तता पर हमला है. उन्होंने कहा कि नए कानून के बाद राज्य कुछ नहीं कर सकेंगे और इससे राज्यों में खतरनाक स्थिति उत्पन्न होगी. हासन ने कहा कि राज्य सरकारें न तो कृषि वस्तुओं की कीमतें घटा-बढ़ा सकेंगी न ही उसकी कमी दूर कर सकेंगी. हासन ने राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद से बिलों को वापस करने का आग्रह किया है, जिसे पिछले हफ्ते संसद ने पारित किया था.
एक बयान जारी कर कमल हासन ने कहा, "मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी ने विवादित बिलों का समर्थन कर तमिलनाडु के किसानों को धोखा दिया है." उन्होंने चेतावनी दी है कि जो किसान आपको सत्ता की कुर्सी पर बिठाते हैं, वो आपको धूल में भी मिला सकते हैं.
तमिलनाडु में अगले साल 2021 में विधान सभा चुनाव होने हैं. AIADMK बीजेपी की सहयोगी पार्टी है जिसकी केंद्र में सरकार है. हासन ने अपने बयान में कहा कि संघीय ढांचे में खेती केंद्र और राज्य का विषय हमेशा से रहा है लेकिन राज्य अपने-अपने हिसाब से कानून बनाते रहे हैं. नए कानून से सभी राज्यों के प्रत्येक किसान कोखतरा पहुंचने का अंदेशा है.
हासन ने कहा, "प्रस्तावित कानून देश के किसी भी हिस्से में माल की आवाजाही की अनुमति देता है; यह खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा है और एक खतरनाक स्थिति पैदा करेगा क्योंकि राज्य माल की कमी या उसके मूल्य वृद्धि के बीच कुछ भी नहीं कर पाएगा."
नई दिल्ली / शौर्यपथ / जयपुर पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह का आज 82 वर्ष की आयु में दिल्ली में निधन हो गया. जसवंत सिंह ने राजनीति में शामिल होने के लिए सेना में अपना करियर छोड़ दिया था, अजमेर के मेयो कॉलेज के पूर्व छात्र , उन्होंने अपने करियर में एक सुधार किया क्योंकि उन्हें लगा कि वह सेना में रहते हुए कुछ अलग नहीं कर पाएंगे. भारतीय सेना की सेंट्रल इंडिया होर्स (आर्म्ड रेजिमेंट) में उन्होंने अपना पहला चुनाव राजस्थान के ओसियां से निर्दलीय विधायक के रूप में लड़ा - जो अपने गृह नगर जसोल के करीब था. लेकिन 1980 के दशक में राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
उन्होंने चार लोकसभा चुनाव जीते और पांच बार राज्यसभा के सदस्य रहे. जोधपुर के पूर्व राजघरानों के घरों में से यह उनका समय था. उन्हें भैरोसिंह शेखावत जैसे राज्य के उभरते राजनीतिक नेताओं के संपर्क में रखा.
वाजपेयी से मुलाकात के बाद...
उनके राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने 1970 के दशक में विजयराजे सिंधिया के करीबी सरदार आंग्रे से अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाकात की.उनकी दोस्ती जीवन भर चली.दोनों ने साहित्यिक चीजों के लिए स्वाद साझा किया,और जसवंत सिंह के करीबी याद करते हैं कि कैसे उन्होंने और वाजपेयी ने आम हितों - राजनीति, गद्य और विदेशी मामलों को साझा करने में एक साथ शामें बिताईं.
जसवंत सिंह के बेटे मानवेंद्र ने एक लेख में याद किया था कि कैसे उनके पिता को अक्सर "अटलजी के हनुमान" कहा जाता था.जसवंत सिंह के पास आरएसएस की पृष्ठभूमि नहीं थी.लेकिन वाजयेपी और लालकृष्ण आडवाणी के साथ उनकी निकटता ने सुनिश्चित किया कि उनकी प्रतिभा को पहचान मिली.
कंधार विमान हाईजैक
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में, जसवंत सिंह ने वित्त मंत्री, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया. वह योजना आयोग के उपाध्यक्ष, राज्यसभा में विपक्ष के नेता और लोकसभा में विपक्ष के उपाध्यक्ष थे. विदेश मंत्री के रूप में, वह पोखरण में परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने के लिए भारत के मामले को उठाने में सहायक बने. सिंह ने क्लिंटन प्रशासन में अमेरिकी विदेश मंत्री मैडलिन अलब्राइट के साथ घनिष्ठ व्यक्तिगत मित्रता साझा की.
लेकिन अपने कार्यकाल में सिंह को भी कंधार अपहरण प्रकरण से निपटने के लिए आलोचना झेलनी पड़ी, जब भारत सरकार ने मसूद अजहर जैसे आतंकवादियों को एयर इंडिया के यात्रियों को बंधक बनाकर रिहा करने के लिए रिहा कर दिया. जसवंत ने बंधकों को वापस लाने के लिए अफगान शहर के लिए उड़ान भरी थी.
जसवंत से जुड़ा जिन्ना विवाद
भाजपा के संस्थापक सदस्य, जसवंत सिंह पार्टी की विचारधारा के साथ तालमेल नहीं रखने के विचार व्यक्त करने से नहीं कतराते. उनकी पुस्तक "जिन्ना: इंडिया पार्टिशन इंडिपेंडेंस" 2009 में प्रकाशित हुई, जिसने जिन्ना की प्रशंसा की और विभाजन के लिए कांग्रेस को दोषी ठहराया, ऐसा ही एक उदाहरण है. पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना की जगह जसवंत सिंह ने जवाहरलाल नेहरू और वल्लभ भाई पटेल पर विभाजन का आरोप लगाया था.
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि जिन्ना विवाद में लालकृष्ण आडवाणी का समर्थन करने वाले नेता तब निराश हो गए थे जब आडवाणी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. लेकिन वह अपने विचारों और उस विशाल विवाद पर पीछे नहीं हटे जिसके कारण जसवंत सिंह का निष्कासन हुआ.
शिमला में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में, पार्टी गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के दबाव में आई, जिन्होंने कहा कि वल्लभभाई पटेल एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. गुजरात सरकार ने जसवंत सिंह की किताब पर प्रतिबंध लगा दिया था. उस समय दार्जिलिंग से जसवंत सिंह सांसद थे. उन्हें अपने मूल राजस्थान, बंगाल से दूर पहाड़ी जिले से चुनाव लड़ने के लिए भेजा गया था.
चूंकि उनकी सेना की पृष्ठभूमि निर्वाचन क्षेत्र में गोरखा मतदाताओं के साथ अच्छी थी. गोरखा दशकों से बंगाल सरकार के साथ अपनी राज्य की मांग पर अड़े हुए हैं.
मोदी को गुजरात सीएम पद से हटाना चाहते थे वाजपेयी
अपनी किताब में जसवंत सिंह ने यह भी दावा किया कि वाजपेयी नरेंद्र मोदी को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त करना चाहते थे, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें रोक दिया. उन्होंने यह भी दावा किया कि गुजरात के दंगों के बाद वाजपेयी ने पीएम पद से इस्तीफा देना चाहा था, लेकिन सिंह के हाथ पकड़ने के बाद उन्होंने अपना त्याग पत्र लिखना बंद कर दिया.
मई चुनाव के तुरंत बाद जसवंत सिंह को अगस्त में अपने दिल्ली निवास में अटैक का सामना करना पड़ा और वो कोमा में चले गए. उनका इलाज आर्मी रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में चल रहा था.
नरसिंह राव को रोकनी पड़ी अहम योजना
सैन्य और विदेशी मामलों में गहरी रुचि रखने वाले एक विद्वान और राजनयिक, जसवंत सिंह ने आठ से अधिक पुस्तकें लिखीं. उनकी पुस्तक "ए कॉल टू ऑनर" ने विवाद को आकर्षित किया जब उन्होंने 1995 में नरसिम्हा राव सरकार में एक गुप्तचर के बारे में लिखा था, जिसके कारण सरकार ने अमेरिका के दबाव में अपनी परमाणु योजना को आगे नहीं बढ़ाया.
जस्सू (उनके दोस्त उन्हें इसी नाम से बुलाते) को शब्दों के एक व्यक्ति के रूप में सबसे अच्छा याद किया जाएगा, एक राजनेता का एक दुर्लभ संयोजन, जो कभी भी अपनी राय व्यक्त करने से पीछे नहीं हटता, जो कि उसकी पार्टी का दृष्टिकोण हो सकता है.
नई दिल्ली / शौर्यपथ /दक्षिणी दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे एक छात्र को गिरफ्तार किया है जो फ़र्ज़ी फेसबुक प्रोफाइल बनाकर महिलाओं को अश्लील मैसेज भेजता था. दक्षिणी दिल्ली के डीसीपी अतुल ठाकुर के मुताबिक महरौली में रहने वाली एक महिला ने शिकायत दर्ज कराई कि उसे फेसबुक पर करण नाम एक लड़का भद्दे और अश्लील मैसेज भेजता है. दक्षिणी दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने जब केस दर्ज कर जांच शुरू की और उस फेसबुक प्रोफाइल का आईपी कॉल लॉग फ़ेसबुक से लिया तो तकनीकी जांच के बाद उसे पकड़ लिया गया.
आरोपी की पहचान महरौली के रहने वाले काफिल के तौर पर हुई. उसने करण नाम से फेसबुक पर फ़र्ज़ी प्रोफाइल बनाया हुआ था और वो आदतन महिलाओं को फेसबुक पर अश्लील मैसेज भेजता था.
पुलिस के मुताबिक काफिल दिल्ली विश्वविद्यालय से डिस्टेंस एजुकेशन से बीए कर रहा है. वो फर्स्ट ईयर का छात्र है. उसके पिता महरौली में ही मीट शॉप चलाते हैं. पुलिस ने आरोपी का मोबाइल भी जब्त कर लिया है.
नई दिल्ली / शौर्यपथ /बिहार के पूर्व DGP गुप्तेश्वर पांडे रविवार की शाम राज्य की सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइडेड में शामिल हो गए. गुप्तेश्वर पांडे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आवास पर पार्टी में शामिल हुए. पांडे शनिवार को भी जेडीयू दफ्तर गए थे और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की थी लेकिन पार्टी में शामिल नहीं हो सके थे. पांडे ने चुनावी पारी खेलने के लिए ही पिछले दिनो डीजीपी पद से इस्तीफा देते हुए स्वैच्छिक सेवानिवृति (वीआरएस) ली थी. माना जा रहा है कि गुप्तेश्वर पांडे अपने गृह जिले बक्सर से चुनाव लड़ सकते हैं.
शनिवार को पांडे जेडीयू दफ्तर में करीब 10 मिनट तक रहे थे. इसी दौरान उन्होंने सीएम से मुलाकात की थी. बाहर जब मीडिया ने उनसे पूछा था कि कब जेडीयू में शामिल हो रहे हैं, तब उन्होंने कहा था कि वह फिलहाल किसी भी दल में शामिल होने नहीं जा रहे. वह सिर्फ शिष्टाचार मुलाकात करने आए थे क्योंकि सीएम ने बतौर डीजीपी काम करने के लिए अच्छा माहौल दिया था.
हालांकि, पांडे ने इशारा किया था कि उनके समर्थक चाहते हैं कि वो चुनाव लड़ें. इस दौरान पांडे नेनीतीश सरकार की शराबबंदी से लेकर बिजली, सड़क और विकास के तमाम काम की खुलकर प्रशंसा की. पांडे के अलावा एक और पूर्व डीजी ने जेडीयू के साथ अपना सियासी सफऱ शुरू किया है. पूर्व डीजी (भवन निर्माणः सुनील कुमार ने पिछले महीने ही जेडीयू ज्वाइन किया था.
पिछले महीने पांडे तब सुर्खियों में थे, जब उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत मौत के केस में रिया चक्रवर्ती पर औकात से जुड़ी टिप्पणी की थी. गुप्तेशवर पहले पूर्व डीजी (महानिदेशक) नहीं है जो रिटायरमेंट के बाद सियासी पारी खेलने जा रहे हैं.
शौर्यपथ लेख । पत्रकार यानी कि चौथा स्तंभ जो कि अब नाम का ही चौथा स्तंभ है । कौन सा पत्रकार सुरक्षित रहेगा कौन सा पत्रकार असुरक्षित अब ये सत्ता के ऊपर निर्भर हो गया है । अगर पत्रकार सत्ता के अवैधानिक कार्यो को उजागर कर तो वह पत्रकार ज्यादा समय तक सुरक्षित नही हो सकता । आज पत्रकार को सुरक्षित रहना है तो सत्ता के हिसाब से चलना पड़ता है तभी पत्रकार सुरक्षित रह सकता है ये छोटे और बड़े बेनर के पत्रकार को अच्छे से मालूम है । किंतु आज भी ऐसे पत्रकार है जो 1947 से पहले की शैली अपना रहे है जब देश गुलाम था जब अंग्रेजो का शासन था तब के पत्रकार ऐसे थे जो कलमवीर थे और खुल कर अपनी बात लिखते थे गुलाम भारत मे भी पत्रकार उतने असुरक्षित नही थी जितने आज है । आज अधिकतर बेनर किसी ना किसी राजनैतिक पार्टी की विचारधारा के आगोश में है अगर वह विचारधारा सत्ताधारी के अनुसार हो तो सुरक्षित ही नही समृद्ध पत्रकार की श्रेणी में गिना जाएगा । ऐसा नही है कि सिर्फ छत्तीसगढ़ में ये हालात है पूरे देश मे यही आलम है तभी तो पत्रकार या तो किसी समिति के अध्यक्ष है किसी सदन के सदस्य है या फिर किसी दल के अघोषित प्रचारक । देश मे गरीबी , शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार के मुद्दे अब गायब हो गए है उसकी जगह ले ली है बेतुकी बातों ने फला हीरोइन कितने बार कपड़े बदली कितने बार रोइ कितने बार हंसी क्या पहनी क्यो पहनी , फला आदमी देश भक्त है या समाज का दुश्मन ये फैसला कुछ चापलूस पत्रकार अपने आकाओं को खुश करने के लिए उछलते रहते है और खुद को न्याय पालिका तक समझते है । ऐसी ऐसी बाते सामने लाते है कि कभी कभी ऐसा लगता है देश की इंटेलिजेंस एजेंसी सिर्फ टाइम पास कर रही असली काम यही कर रहे एक प्रश्नवाचक चिन्ह और सूत्र की बात कर किसी को बजी देशद्रोही , समाज का दुश्मन , देशभक्त , समाज सुधारक तक का तमगा दे देते है । कुछ ऐसे ही पक्षपात और एकतरफा स्थिति के कारण भूपेश सरकार ने चुनाव के समय पत्रकार सुरक्षा कानून की बात की थी और इस चुनावी वादों को मूर्त रूप देने का आश्वासन दिया था । आज भूपेश सरकार को सत्ता संभाले लगभग दो साल हो गए किन्तु आज भी छत्तीसगढ़ में पत्रकार सुरक्षित नही है जब भी पत्रकारों पर कोई हमला होता है तो इसे आपसी रंजिश की बात कह कर मामले को दूसरा रूप देने की बात चालू हो जाती है । ऐसे कई मामले सामने आ भी चुके है लेकिन हम वर्तमान मामले की ही बात करे तो कमल शुक्ला के साथ जिस तरह जी घटना हुई उससे एक बार फिर पत्रकार समूह को सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या सरकार गठन के दो साल बाद भी पत्रकारों के लिए सुरक्षा कानून पर कोई ठोस पहल होगी । कई अखबारों में गृह मंत्री का बयान प्रकाशित हुआ कि दोनों पार्टी में वादी परिवादी में जो भी गलत होगा उस पर कार्यवाही होगी गृह मंत्री का यह बयान एक दक्ष राजनैतिक बयान था जिसमे उनके द्वारा पत्रकारों की सुरक्षा की बात पर कोई जवाब नही दिया गया वही दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि घटना को अंजाम देने वालो को पार्टी से निष्काषित कर दिया गया क्या निष्कासन ही सही रास्ता है क्या कांग्रेस के मुखिया का वादा स्थानीय कांग्रेस संगठन भूल गया । वीडियो में देखने से साफ लग रहा है कि कमल शुक्ला पर आक्रमण करने वाला किस विश्वास के साथ बात कर रहा था जैसे कि शहर की प्रशासनिक व्यवस्था पर उसका ही राज हो और जब fir दर्ज हुई तो एक शिकायत कमल शुक्ला के खिलाफ प्रेषित कर दी ताकि मामला बराबर का हो जाये । हा भई हो भी सकता है क्योंकि सरकार के एक अपरोक्ष अंग हो सत्ताधारी दल के सक्रिय सदस्य हो इसलिए किसी बात का डर नही आज जब fir दर्ज हुई तो याद आ गया कि कमल शुक्ला ने पूर्व में कभी जान से मारने की धमकी दी थी । चलो याद तो आया पर तब क्यो मौन थे जब जान से मारने की धमकी दी थी तभी पहुंच जाते कानून के दरवाजे और शिकायत कर देते तब किस बात ने रोक रखा था महोदय आपको । एक पत्रकार को सरे आम मार कर कौन सी बहादुरी दिखा दिए पत्रकार ने तो कलम से लड़ाई लड़ी तुम भी कलम से लड़ लेते भाई तुम्हे तो किसी ने नही रोका था शिकायत से । आज जब चौतरफा वीडियो वायरल हुआ तो सब याद आ गया । वैसे तुम भी सही हो महोदय क्योकि पत्रकार एक नही है यहां तो पत्रकारिता में भी राजनीति जगजाहिर है पुराने और वरिष्ठ पत्रकार पर हमला होता है तो बवाल खड़ा हो जाता है किंतु जब मझोले और छोटे पत्रकार पर कोई विपदा आती है तो यही कुछ वरिष्ठ पत्रकार होते है जो समर्थन तो नही करते उल्टे विरोध के स्वर निकलते है । ऐसा नही कि सभी वरिष्ठ पत्रकार ऐसा करते है कुछ ऐसे वरिष्ठ आज भी है जो युवा पीढ़ी का दिल से स्वागत करते है और सही गलत के बारे में बताते है । आज जो भी घटना पत्रकारों के साथ हो रही उसमें कुछ हद तक जिम्मेदार पत्रकार भी है एकता में बल की बात तो करते है पर एकता में अभी भी अभाव है । आज पत्रकार अगर एक हो जाये तो मारपीट की बात तो दूर कोई तिरछी आंख भी नही करेगा । इस तरह की घटना से शासन को , पत्रकारों को भी सीख लेने की ज़रूरत है क्योंकि अगर देश के चार स्तम्भ में से एक स्तम्भ पत्रकार है तो उनकी मजबूती भी सबसे ज्यादा जरूरी है । बस एक बार दिल मे हांथ रखकर ज़रूरत है उस कल्पना की जिसमे ये देखे की तीन स्तम्भ के सहारे देश का लोकतंत्र कैसे और कब तक खड़ा रहेगा ...( शरद पंसारी - संपादक दैनिक शौर्यपथ समाचार पत्र )
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