August 02, 2026
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    राष्ट्रपति ने अलचिकि लिपि के शताब्दी महोत्सव का उद्घाटन किया

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    नई दिल्ली / एजेंसी /
    राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (16 फरवरी, 2026) नई दिल्ली में संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित अलचिकि लिपि के शताब्दी महोत्सव का उद्घाटन किया।
    इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि संताल समुदाय की अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति है। हालांकि, अपनी लिपि के अभाव में संताली भाषा को प्रारंभ में रोमन, देवनागरी, उड़िया और बंगाली लिपियों में लिखा जाता था। नेपाल, भूटान और मॉरीशस में रहने वाले संताल समुदाय के लोग भी वहाँ प्रचलित लिपियों का उपयोग करते थे। ये लिपियां संताली भाषा के मूल शब्दों का सही उच्चारण सही तरीके से नहीं कर पा रही थीं. साल 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मु ने अलचिकि लिपि का आविष्कार किया। तब से यह संताली भाषा के लिए उपयोग में लाई जा रही है। आज यह लिपि विश्वभर में संताल पहचान का सशक्त प्रतीक बन चुकी है और समुदाय में एकता स्थापित करने का प्रभावी माध्यम भी है।
    राष्ट्रपति ने कहा कि अलचिकि की शताब्दी समारोह इस लिपि के व्यापक प्रचार-प्रसार का संकल्प लेने का अवसर होना चाहिए। बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी, उड़िया, बंगाली या किसी अन्य भाषा में शिक्षा मिल सकती है, लेकिन उन्हें अपनी मातृभाषा संताली भी अलचिकि लिपि में सीखनी चाहिए।

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    राष्ट्रपति ने खुशी जाहिर की कि अनेक लेखक अपने साहित्यिक कार्यों से संताली साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। उन्होंने लेखकों को अपने लेखन के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने की सलाह दी।

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    राष्ट्रपति ने कहा कि भारत अनेक भाषाओं का उपवन है। भाषा और साहित्य समुदायों के भीतर एकता को बनाए रखने वाले सूत्र हैं। साहित्य के आदान-प्रदान से भाषाएं समृद्ध होती हैं। संताली साहित्य को अन्य भाषाओं के विद्यार्थियों तक अनुवाद और लेखन के माध्यम से पहुंचाने तथा अन्य भाषाओं के साहित्य को संताली में उपलब्ध कराने के प्रयास किए जाने चाहिए।
    इस अवसर पर राष्ट्रपति ने अलचिकि लिपि के 100 वर्ष पूरे होने पर स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया। साथ ही, संताल समुदाय के 10 विशिष्ट व्यक्तियों को संताली लोगों के बीच अलचिकि लिपि के व्यापक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सम्मानित किया।

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