नई दिल्ली ।
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर आज सुनवाई और फैसले को लेकर राजनीतिक तथा कानूनी हलकों में व्यापक चर्चा रही। हालांकि, इस संबंध में आधिकारिक आदेश की प्रमाणित प्रति और सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध विस्तृत आदेश का परीक्षण आवश्यक माना जा रहा है।
उपलब्ध दावों और सामने आई जानकारी के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने चुनाव आयोग की शक्तियों को संवैधानिक दायरे में मानते हुए SIR प्रक्रिया को वैध बताया है।
फैसले से जुड़ी प्रमुख बातें (दावों के अनुसार)
1. चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों को समर्थन
बताया जा रहा है कि अदालत ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण का अधिकार प्राप्त है।
पीठ ने माना कि आयोग ने अपने संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर रहते हुए कार्य किया और प्रक्रिया को “अल्ट्रा वायर्स” नहीं माना जा सकता।
2. नागरिकता और वोटर लिस्ट पर अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत द्वारा यह महत्वपूर्ण टिप्पणी किए जाने की चर्चा है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हटना उसकी नागरिकता समाप्त होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कथित रूप से यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग केवल चुनावी पात्रता तय कर सकता है, नागरिकता पर अंतिम निर्णय देना उसका अधिकार क्षेत्र नहीं है।
3. “वोट चोरी” और “NRC जैसे अभियान” के आरोप खारिज
याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों—जिनमें SIR को “वोट चोरी” अथवा “NRC जैसी प्रक्रिया” बताया गया था—को अदालत ने स्वीकार नहीं किया।
बताया जा रहा है कि कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची का शुद्ध और अद्यतन रहना आवश्यक है तथा प्रक्रिया में दावा, आपत्ति और अपील जैसे पर्याप्त वैधानिक प्रावधान मौजूद हैं।
अन्य महत्वपूर्ण सुनवाई
VVPAT स्लिप पर समय दर्ज करने वाली PIL खारिज
एक अन्य जनहित याचिका में वीवीपैट पर्चियों पर वोट डालने का समय अंकित करने की मांग की गई थी। अदालत ने इसे चुनाव आयोग के तकनीकी अधिकार क्षेत्र का विषय मानते हुए हस्तक्षेप से इनकार किया।
जातिगत जनगणना संबंधी याचिका पर सुनवाई से इनकार
जनसंख्या जनगणना में जातिगत गणना को बाहर रखने की मांग वाली PIL पर भी सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने से इनकार किया। अदालत ने इसे सरकार की नीतिगत व्यवस्था का विषय बताया।
राजनीतिक असर
यदि यह फैसला आधिकारिक रूप से इसी स्वरूप में जारी हुआ है, तो इसे चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के लिए बड़ी कानूनी राहत माना जाएगा। वहीं विपक्षी दलों द्वारा उठाए जा रहे “मतदाता सूची में हेरफेर” संबंधी आरोपों को भी बड़ा झटका लग सकता है।
साथ ही, अदालत की यह टिप्पणी कि “मतदाता सूची से नाम हटना नागरिकता समाप्त होने का प्रमाण नहीं है”, भविष्य की कानूनी और राजनीतिक बहस में महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।