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रायपुर / शौर्यपथ /
विश्व कैंसर दिवस के अवसर पर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज), रायपुर के बाल रोग विभाग द्वारा एक गरिमामय एवं भावनात्मक समारोह का आयोजन कर कैंसर से सफलतापूर्वक उपचार प्राप्त कर चुके बच्चों एवं किशोरों के साहस, धैर्य और दृढ़ संकल्प को सम्मानित किया गया। “आशा और संकल्प की कहानियाँ” विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में मरीजों, उनके परिजनों, चिकित्सकों तथा सामाजिक संगठनों की सक्रिय सहभागिता रही। कार्यक्रम के माध्यम से यह सशक्त संदेश दिया गया कि समय पर पहचान और निरंतर उपचार से कैंसर पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त), कार्यकारी निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, रायपुर द्वारा किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि चिकित्सा विज्ञान उपचार के प्रभावी साधन उपलब्ध कराता है, किंतु वास्तविक विजय उन मरीजों की होती है जो पूरे उपचार काल में असाधारण साहस, धैर्य और आत्मविश्वास का परिचय देते हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ की क्षेत्रीय स्वास्थ्य चुनौतियों पर केंद्रित अनुसंधान को प्रोत्साहित करने तथा उच्च गुणवत्ता वाली ऑन्कोलॉजी सेवाएं उपलब्ध कराने के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता दोहराई।
डॉ. एली महापात्रा, डीन (शैक्षणिक), ने कहा कि कैंसर से उबर चुके बच्चों और उनके परिजनों की उपस्थिति इस बात का सशक्त प्रमाण है कि कैंसर अब अजेय रोग नहीं रहा। बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार गोयल ने बताया कि इस आयोजन का उद्देश्य वर्तमान में उपचाररत बच्चों और उनके परिवारों को यह विश्वास दिलाना है कि कठिन उपचार यात्रा के बाद एक स्वस्थ, सकारात्मक और उज्ज्वल भविष्य संभव है।
कार्यक्रम में निरामयाह कैंसर फाउंडेशन की सक्रिय सहभागिता भी रही। संस्था की प्रतिनिधि सुश्री सुदेशना रुहहान ने वंचित परिवारों को उपचार के दौरान लॉजिस्टिक सहायता एवं पोषण संबंधी सहयोग उपलब्ध कराने में गैर-सरकारी संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।
डॉ. सुनील जोंधले ने बाल चिकित्सा ऑन्कोलॉजी में हुई हालिया प्रगति पर प्रकाश डालते हुए शीघ्र निदान, समयबद्ध उपचार तथा उपचार को बीच में छोड़ने की समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं, डॉ. सरोज बाला और डॉ. अमित कुमार अग्रवाल, एसोसिएट प्रोफेसर, ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, रायपुर में उपलब्ध कैंसर उपचार सेवाओं की विस्तृत जानकारी दी तथा दीर्घकालिक देखभाल के लिए संरचित उपचारोपरांत देखभाल (सर्वाइवर्शिप) कार्यक्रमों की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण “आशा की आवाज़” सत्र रहा, जिसमें कैंसर से उबर चुके बच्चों एवं किशोरों ने अपने उपचार, संघर्ष और नई आशा से भरी जीवन यात्राएं साझा कीं। इस अवसर पर लगभग 50 बच्चों और किशोरों को शैक्षणिक उपहार एवं खिलौने प्रदान कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में उपचार के प्रति निरंतरता के महत्व को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए परिवारों से अपील की गई कि वे उपचार को बीच में न छोड़ें, क्योंकि पूर्ण और नियमित उपचार ही सफल स्वास्थ्य परिणाम की कुंजी है।
रायपुर / शौर्यपथ / केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह 07 से 09 फ़रवरी, 2026 तक तीन दिवसीय दौरे पर छत्तीसगढ़ प्रवास पर रहेंगे। अपने दौरे के दौरान श्री शाह राज्य में आंतरिक सुरक्षा, वामपंथी उग्रवाद की समीक्षा, विकासात्मक विमर्श तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेंगे।
दौरे के पहले दिन 07 फ़रवरी, 2026 को केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह आगमन के पश्चात होटल मेफेयर, रायपुर में रात्रि 08:00 बजे वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक करेंगे, जिसमें राज्य से जुड़े विभिन्न प्रशासनिक एवं सुरक्षा विषयों पर चर्चा की जाएगी।
08 फ़रवरी, 2026 को श्री अमित शाह प्रातः होटल मेफेयर, रायपुर में वामपंथी उग्रवाद (LWE) पर एक उच्चस्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक की अध्यक्षता करेंगे। इस बैठक में केंद्र एवं राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी तथा सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसी दिन सायं 04:30 बजे केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री साप्ताहिक पत्रिका ‘ऑर्गेनाइज़र’ के ‘भारत प्रकाशन’ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय कॉनक्लेव ‘छत्तीसगढ़ @ 25 : शिफ्टिंग द लेंस’ में मुख्य अतिथि के रूप में सहभागिता करेंगे।
अपने दौरे के अंतिम दिन 09 फ़रवरी, 2026 को श्री अमित शाह जगदलपुर, बस्तर में आयोजित बस्तर पंडूम महोत्सव – 2026 के समापन समारोह में शामिल होंगे। यह महोत्सव बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और लोक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन का प्रतीक है।
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री का यह दौरा छत्तीसगढ़ में सुरक्षा सुदृढ़ीकरण, विकासात्मक दृष्टिकोण तथा जनजातीय संस्कृति के प्रति केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है।
साभार - लेखक सौरभ गर्ग
महंगाई देश के सबसे अहम आर्थिक संकेतकों में से एक है, जिसे आम लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सीधे महसूस करते हैं, जैसे घर का राशन, किराया और पेट्रोल-डीज़ल के खर्च में बढ़ोतरी से।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) इसी महंगाई को मापता है। यह उन चीज़ों और सेवाओं के दाम देखता है, जिनका इस्तेमाल आम परिवार रोज़ करता है। सरल शब्दों में, सीपीआई आम आदमी की ज़िंदगी का आईना है। यह बताता है कि थाली में खाने का खर्च कितना बढ़ा, घर का किराया कितना हुआ, और काम पर जाने के लिए ईंधन कितना महंगा हुआ।
सीपीआई भले ही एक आंकड़ा लगता हो, लेकिन यह सरकार को यह समझने में मदद करता है कि लोगों पर महंगाई का असली असर क्या है। इसी आधार पर वेतन, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े फैसले किए जाते हैं, ताकि ज़रूरी चीज़ें आम लोगों की पहुंच में बनी रहें।
भारतीय रिज़र्व बैंक भी ब्याज दर और महंगाई को नियंत्रित करने जैसे फैसलों के लिए सीपीआई आधारित महंगाई को ही सबसे मुख्य पैमाना मानता है। इसलिए जब सीपीआई ज़मीन की हकीकत सही तरीके से दिखाता है, तब सरकार और आरबीआई की नीतियाँ भी लोगों की असली परेशानियों के अनुसार बेहतर बन पाती हैं।
महंगाई सिर्फ दाम बढ़ने का नाम नहीं है, बल्कि यह भी है कि दामों में बदलाव से घर के बजट पर कितना असर पड़ता है। इसलिए जितना ज़रूरी दामों को मापना है, उतना ही ज़रूरी यह भी है कि महंगाई का सूचकांक लोगों की आज की खर्च करने की आदतों को सही तरीके से दिखाए। इसी संदर्भ में भारत में सीपीआई के आधार वर्ष को 2012 से बदलकर 2024 किया जा रहा है।
पिछली बार आधार बदले जाने के बाद देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बदलाव आया है। शहरों की आबादी बढ़ी है, सेवाओं का क्षेत्र बढ़ा है, डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण खरीदारी का तरीका बदला है और घरों का खर्च अब कई नई चीजों पर होने लगा है।
इसीलिए नया सीपीआई 2024 तैयार करने में 2023-24 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।
समय के साथ लोगों की ज़रूरतें और खर्च बदलते हैं, इसलिए सीपीआई में अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं को दी जाने वाली अहमियत भी बदली गई है। जिन चीजों पर अब परिवार ज़्यादा खर्च करते हैं, उन्हें सीपीआई में ज़्यादा महत्व दिया गया है,
और जिन पर खर्च कम हो गया है, उन्हें कम महत्व दिया गया है।
इससे सीपीआई वही महंगाई दिखाता है, जो सच में आम परिवार के बजट को प्रभावित करती है। साथ ही, उपभोग की टोकरी (कंजम्पशन बास्केट) को भी बदला गया है, ताकि सेवाओं पर बढ़ते खर्च जैसे नए रुझान दिखाई दे सकें, जो बढ़ती आय और बदलती जीवनशैली की वजह से बढ़ रहे हैं। सीपीआई को मापने का तरीका अपडेट करना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना यह तय करना कि उसमें क्या-क्या शामिल किया जाए।
नया संशोधित सीपीआई अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के ज्यादा करीब है, लेकिन इसमें भारत से जुड़ी खास बातें भी बनी हुई हैं। इससे भारत की महंगाई की तुलना दूसरे देशों से करना आसान हो जाता है।
आम परिवार के लिए इसका मतलब यह है कि सरकार और नीति बनाने वाले लोग यह बेहतर समझ पाते हैं कि भारत में दामों में होने वाला बदलाव दुनिया के हालात से कैसे जुड़ा है, और साथ ही यह भी ध्यान रहता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ रहा है।
सीपीआई के लिए आंकड़े जुटाने का तरीका भी अब लोगों की बदलती खरीदारी और खर्च की आदतों के अनुसार बेहतर बनाया गया है। जहां पहले की तरह बाजारों से दाम इकट्ठा किए जाते रहेंगे, खासकर खाने-पीने और ज़रूरी चीज़ों के, वहीं 2024 के नए ढांचे में अब कुछ सेवाओं के ऑनलाइन दाम भी शामिल किए जा रहे हैं। जैसे मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं, हवाई टिकट और कुछ अन्य सेवाओं के दाम अब ऑनलाइन स्रोतों से भी लिए जाएंगे।
नई सीपीआई श्रृंखला में अब कंप्यूटर की मदद से दाम इकट्ठा किए जा रहे हैं। इससे हाथ से होने वाली गलतियाँ कम हुई हैं और तुरंत जाँच भी हो जाती है। इससे दामों से जुड़े आंकड़ों की गुणवत्ता और समय पर उपलब्धता दोनों बेहतर हुई हैं। सीपीआई के आंकड़े सही और समय पर मिलना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इसी के आधार पर ऐसे फैसले होते हैं, जो सीधे आम आदमी की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं, जैसे कर्ज कितना महंगा होगा, बचत पर कितना ब्याज मिलेगा, और बढ़ती महंगाई से घर का बजट कैसे प्रभावित होगा।
नए आधार वर्ष की सीपीआई में अब कई मामलों में सरकारी स्रोतों से मिलने वाले आधिकारिक आंकड़ों का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे रेल किराया, डाक शुल्क, ईंधन के दाम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बिकने वाली चीजें। इससे इन दामों को पहले से ज्यादा सही तरीके से दर्ज किया जा रहा है और बाजार सर्वे में होने वाली गलती या पक्षपात की संभावना भी कम हो जाती है।
अब सर्वे के आंकड़े, सरकारी रिकॉर्ड और डिजिटल माध्यमों से मिलने वाले दाम, तीनों को मिलाकर सीपीआई तैयार की जा रही है। यह पुरानी व्यवस्था की तुलना में बड़ा सुधार है और इससे दामों में होने वाले बदलाव की ज्यादा भरोसेमंद तस्वीर मिलती है।
इतने बड़े स्तर पर सीपीआई के आधार वर्ष में बदलाव करना एक बहुत बड़ा संस्थागत प्रयास होता है। इसमें देश भर के फील्ड दफ्तरों, सांख्यिकी विभागों और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ संस्थाओं के बीच तालमेल जरूरी होता है। इस पूरी प्रक्रिया में मेथडोलॉजी की गहराई से जाँच की जाती है, अलग-अलग विकल्पों को परखा जाता है और अर्थशास्त्रियों व विषय-विशेषज्ञों से सलाह ली जाती है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने विशेषज्ञ समूहों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अन्य संबंधित पक्षों से बातचीत की है, ताकि किए गए बदलाव साफ, समझने में आसान और वैज्ञानिक रूप से सही हों।
टोकरी, वेटेज और आंकड़ों के स्रोत बदलने के बाद भी सीपीआई का मूल उद्देश्य वही रहता है-यानी एक परिवार की नज़र से दामों में होने वाले बदलाव को दिखाना। यह निरंतरता इसलिए ज़रूरी है, ताकि हम समय के साथ महंगाई की तुलना कर सकें।
सीधे शब्दों में, सीपीआई को बेहतर बनाया जा रहा है, लेकिन उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़कर ही रखा गया है, ताकि वह नीति बनाने वालों के लिए एक भरोसेमंद मार्गदर्शक बना रहे।सीपीआई हमें यह याद दिलाता है कि हर आंकड़े के पीछे करोड़ों लोगों की असली ज़िंदगी छिपी होती है। आखिरकार, आंकड़े लोगों के लिए ही होते हैं। यह चुपचाप यह दिखाता है कि दामों में बदलाव हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कैसे प्रभावित करता है और सरकार की नीतियों को दिशा देता है।
आधार वर्ष में चल रहे संशोधन के ज़रिये सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने यह सुनिश्चित किया है कि सीपीआई सही, समय के अनुसार अपडेट और लंबे समय तक एक-जैसे तरीके से मापा गया रहे। ताकि सीपीआई सिर्फ एक संख्या न होकर, पूरे देश के लोगों की असली ज़िंदगी की सच्चाई दिखाने वाला आईना बना रहे।
(लेखक सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव हैं, यह उनके निजी विचार हैं)
बिलासपुर / शौर्यपथ /
राष्ट्र निर्माण की दिशा में कौशल विकास को एक सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हुए एनटीपीसी लारा, जिला रायगढ़ ने अपनी कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) पहल के अंतर्गत स्थानीय बेरोजगार युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इस क्रम में एनटीपीसी लारा द्वारा गुरुवार को युवाओं के पहले बैच को रोजगारोन्मुख व्यावसायिक प्रशिक्षण हेतु सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीआईपीईटी), कोरबा के लिए रवाना किया गया।
प्रशासनिक परिसर में आयोजित कार्यक्रम में इस पहल को औपचारिक रूप से श्री सुभाष ठाकुर, परियोजना प्रमुख, एनटीपीसी लारा द्वारा हरी झंडी दिखाकर शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर श्री केशव चंद्र सिंघा रॉय, महाप्रबंधक (प्रचालन एवं अनुरक्षण), श्री हेमंत पावगी, महाप्रबंधक (परियोजना), श्री जाकिर खान, अपर महाप्रबंधक (मानव संसाधन), श्री मनीष कुमार, अपर महाप्रबंधक (तकनीकी सेवाएं) सहित एनटीपीसी के अन्य वरिष्ठ अधिकारी, प्रशिक्षुओं के अभिभावक एवं चयनित युवा उपस्थित रहे।
तीन माह की अवधि का यह गहन प्रशिक्षण कार्यक्रम सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, कोरबा में “असिस्टेंट मशीन ऑपरेटर – इंजेक्शन मोल्डिंग” ट्रेड में संचालित किया जाएगा। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य युवाओं को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप व्यावहारिक एवं रोजगारपरक कौशल प्रदान करना है, जिससे वे शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाटते हुए आत्मनिर्भर बन सकें तथा औद्योगिक क्षेत्र में प्रभावी योगदान दे सकें।
प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए श्री सुभाष ठाकुर, परियोजना प्रमुख, एनटीपीसी लारा ने कहा कि कौशल विकास आज के समय में केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता और दीर्घकालीन रोजगार क्षमता का मजबूत आधार है। उन्होंने युवाओं से अनुशासन, समर्पण और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रशिक्षण का पूर्ण लाभ उठाने का आह्वान किया।
एनटीपीसी लारा की यह पहल कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के माध्यम से स्थानीय समुदायों के सतत एवं समावेशी विकास की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। ऐसे प्रयासों से न केवल युवाओं को कौशल और अवसर प्राप्त हो रहे हैं, बल्कि क्षेत्रीय विकास को गति देते हुए राष्ट्र की प्रगति को भी सुदृढ़ आधार मिल रहा है।
रायपुर, 05 फरवरी 2026।
छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों के अवैध शिकार को रोकने के लिए वन विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘सामाजिक बहिष्कार’ की रणनीति अब एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक विवाद का रूप ले चुकी है। जहां वन विभाग इसे समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल बता रहा है, वहीं कांग्रेस ने इसे संविधान विरोधी, जंगलराज और भीड़तंत्र को बढ़ावा देने वाला फैसला करार दिया है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के अनुसार, केवल जेल और जुर्माने के डर से शिकार पूरी तरह नहीं रुक पा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में विभाग ने Community for Conservation मॉडल के तहत सामाजिक दबाव की अवधारणा सामने रखी है।
वन विभाग की रणनीति के प्रमुख उद्देश्य:
नैतिक दबाव: गांव-समाज में शिकारी की पहचान उजागर होने से लोक-लाज का डर पैदा करना
सामुदायिक निगरानी: ग्रामीणों को वन्यजीव संरक्षण में भागीदार बनाना
युवाओं में संदेश: शिकार को ‘वीरता’ नहीं, बल्कि ‘सामाजिक अपराध’ के रूप में स्थापित करना
प्रस्तावित कदमों में शामिल हैं:
सार्वजनिक कार्यक्रमों में शिकारियों की भागीदारी सीमित करना
शिकार में पकड़े गए व्यक्तियों के नाम सार्वजनिक करना
शिकार बढ़ने पर संबंधित गांव की संयुक्त वन प्रबंधन समिति (JFMC) को मिलने वाले लाभों में कटौती
वन विभाग स्पष्ट कर रहा है कि यह कोई आधिकारिक दंडात्मक आदेश नहीं, बल्कि सामुदायिक संकल्प के रूप में लागू किया जाएगा।
प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने इस फैसले पर तीखा हमला बोलते हुए वन मंत्री केदार कश्यप से सवाल किया—
“क्या छत्तीसगढ़ में अब कानून नहीं, जंगलराज चलेगा? क्या शिकारियों को अदालत नहीं, गांव की भीड़ सजा देगी?”
कांग्रेस का आरोप है कि:
सामाजिक बहिष्कार संविधान के मूल अधिकारों के खिलाफ है
यह व्यवस्था घृणा, तिरस्कार, जातिगत भेदभाव और हिंसा को जन्म दे सकती है
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के संविधान में सामाजिक बहिष्कार जैसी कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प था, ऐसे में यह फैसला संविधान का अपमान है
धनंजय ठाकुर ने कहा कि वन विभाग अपनी प्रशासनिक विफलता छुपाने के लिए सामाजिक दंड जैसी व्यवस्था थोपना चाहता है। दिसंबर 2025 की विभागीय बैठक में धर्मगुरुओं, गांव के मुखिया और समाजसेवियों के जरिए बहिष्कार कराने का निर्णय वैमनस्य फैलाने वाला है।
यह पूरा विवाद दो विचारधाराओं के बीच टकराव को उजागर करता है—
| वन विभाग का दृष्टिकोण | कांग्रेस का दृष्टिकोण |
|---|---|
| समुदाय आधारित संरक्षण | संविधान आधारित दंड |
| नैतिक व सामाजिक दबाव | न्यायालय द्वारा सजा |
| सामूहिक जिम्मेदारी | व्यक्तिगत अधिकार |
| रोकथाम पर जोर | कानून के सख्त पालन पर जोर |
कांग्रेस ने सरकार से मांग की है कि:
सामाजिक बहिष्कार जैसे फैसले पर तत्काल रोक लगाई जाए
शिकारियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कड़ी कानूनी सजा दी जाए
ऐसे निर्णय लेने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए
वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए ठोस और संवैधानिक उपाय किए जाएं
रायपुर/ शौर्यपथ / प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि भाजपा सरकार एवं मिलरों के सांठ-गांठ के चलते गरीबों को इस माह चावल देने गोदामों में चावल नहीं है। कस्टम मिलिंग के बाद मिलरों के द्वारा पूरा चावल जमा नहीं कराना सरकार की कमजोरी है। सरकार ने इस माह एकमुश्त दो माह का चावल देने का आदेश जारी किया लेकिन वास्तविकता यह दो माह दूर की बात एक माह का चावल देने लायक स्टॉक सरकारी गोदाम में नहीं है। राशन दुकान में गुणवत्ताहीन खराब चावल मिलने की शिकायत लगातार हो रही है। बस्तर में 30 हजार टन सड़ा चावल वितरण करने दिया गया। जिसका विरोध हुआ, अकेले रायपुर जिला में 75 राईस मिलर ने 7,500 टन कस्टम मिलिंग का जमा नहीं किया गया। पूरे प्रदेश में यही स्थिति है। सरकार ने चावल जमा नहीं करने वाले राईस मिलर पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की? उन्हें ब्लैक लिस्टेड क्यों नहीं किया गया? उनसे चावल की रिकवरी क्यां नहीं की गई? इससे समझ में आ रहा है दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल काली है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि सरकारी गोदाम में चावल नहीं है, फोर्टिफाइड राइस का टेंडर नहीं हुआ है, फिर गरीबों को दो माह का चावल एकमुश्त देने का आदेश क्यों दिया गया? ये आदेश गरीबों के साथ भद्दा मजाक है, अपमान है। क्या खाद्य संचालनालय के अधिकारी बेसुध रहते है? उन्हें अपने विभाग की स्टॉक के बारे में जानकारी नहीं है? बड़ी अराजक स्थिति है? राशन कार्डधारी पहले ही खराब क्वालिटी की सड़ा हुआ चावल राशन दुकानों से मिलने की शिकायत कर रहे है। जिस पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। क्या विभाग, खाद्य मंत्री के बिना जानकारी इस प्रकार से आदेश दिया है? क्या ये आदेश विभागीय मंत्री के अनुमोदन से हुआ है? लाखों टन चावल जिसमें फोर्टिफाइड चावल कैसे मिलेगा?
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि जिस प्रकार से खाद्य विभाग की कार्यशैली है इस बात का प्रमाण है विभागीय मंत्री के नियंत्रण में कुछ भी नहीं है? खाद्य मंत्री को इसका जवाब देना चाहिए कि खाली गोदाम से गरीबों के घर तक दो माह का चावल कब पहुंचेगा? सरकार के अजीबोगरीब फरमान से खाद्य अधिकारी एवं राशन दुकान संचालक सभी परेशान है। गरीबों को चावल देने के नाम से भाजपा सरकार गुमराह कर रही है। सरकार तत्काल फोर्टिफाइड मिला चावल की व्यवस्था कर, राशन कार्डधारियों को दे।
कोंडागांव में गुटखा-सिगरेट की अवैध बिक्री,
नए टैक्स से पहले थोक व्यापारियों की जमाखोरी,
विभागीय चुप्पी से पनप रहा काला कारोबार**
कोंडागांव | दीपक वैष्णव की विशेष रिपोर्ट
एक ओर आम आदमी महंगाई की मार से जूझ रहा है, तो दूसरी ओर कोंडागांव का बाजार नए नियम लागू होने से पहले ही मनमानी महंगाई और कालाबाजारी का गवाह बन चुका है। नगर में गुटखा, जर्दा और सिगरेट बिना रेट प्रिंट, तय मूल्य से कहीं अधिक दामों पर खुलेआम बेचे जा रहे हैं, जबकि संबंधित विभाग कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ नजर आ रहा है।
भारत सरकार द्वारा 1 फरवरी 2026 से तंबाकू उत्पादों पर नए उत्पाद शुल्क, स्वास्थ्य उपकर और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर लागू किया जाना है। साथ ही चबाने वाले तंबाकू, जर्दा व पान-मसाला के लिए नए पैकिंग नियम अधिसूचित किए जा चुके हैं।
लेकिन कोंडागांव में नियम लागू होने से पहले ही
? थोक व्यापारियों ने जमाखोरी शुरू कर दी है
? पुराने स्टॉक को नए दामों पर खपाया जा रहा है
? छोटे दुकानदार मजबूरी में अधिक कीमत पर बेचने को विवश हैं
यह स्थिति केवल महंगाई नहीं, बल्कि संगठित कालाबाजारी का संकेत देती है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देश के कई राज्यों में गुटखा के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद कोंडागांव के हर चौक-चौराहे, ठेले-गुमटी और किराना दुकानों में
थोक और चिल्लर दोनों स्तर पर प्रतिबंधित गुटखा खुलेआम बिक रहा है।
यह सवाल खड़ा करता है कि
➡️ यह माल आ कहां से रहा है?
➡️ किसकी मिलीभगत से बाजार तक पहुंच रहा है?
➡️ और विभाग की निगाहें आखिर कहां टिकी हैं?
लेकिन गुटखा पर ‘अघोषित संरक्षण’?**
विभाग की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है।
त्योहारी सीजन में
✔️ मिठाई दुकानों पर लगातार दबिश
✔️ सैंपल लेकर ‘खाना-पूर्ति’ की कार्रवाई
लेकिन शहर भर में चल रहे गुटखा-सिगरेट के अवैध कारोबार पर न कोई छापा, न कोई कार्रवाई।
यह चयनात्मक सक्रियता स्पष्ट रूप से विभागीय लापरवाही या मौन सहमति की ओर इशारा करती है।
बिना रेट प्रिंट, बिना वैध टैक्स और तय मूल्य से अधिक दामों पर बिक्री
? सीधे-सीधे सरकारी राजस्व की चोरी है
? स्वास्थ्य कानूनों की खुली अवहेलना है
? और सुशासन के दावों पर करारा तमाचा है
प्रदेश सरकार भले ही सुशासन की बात करे,
लेकिन कोंडागांव की जमीनी हकीकत बताती है कि नियम सिर्फ कागजों में जिंदा हैं।
अब सवाल यह नहीं कि
❓ गुटखा बिक रहा है या नहीं
बल्कि सवाल यह है कि
❓ कब जागेगा संबंधित विभाग?
❓ किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय होगी?
❓ या फिर यह अवैध कारोबार यूं ही फलता-फूलता रहेगा?
यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ कानून की हार नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और राजस्व दोनों के साथ खुला अपराध माना जाएगा।
व्यापार केवल आयात–निर्यात का खेल नहीं होता, वह राष्ट्रों की रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक हैसियत और भविष्य की दिशा तय करता है।
3 फरवरी 2026 को अमेरिका और भारत के बीच हुआ नया व्यापार समझौता इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब 2025 में लगाए गए 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय निर्यात की रीढ़ तोड़ दी थी। उस पृष्ठभूमि में 18 प्रतिशत पर पहुँचना निश्चित रूप से राहत है—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भारत की जीत है, या हालात के आगे झुककर निकाला गया रास्ता?
इस समझौते के बाद अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क पूरी तरह हट गया है और पारस्परिक टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत रह गया है।
कपड़ा, रत्न-आभूषण, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह जीवनदान से कम नहीं।
लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
2024 तक यही टैरिफ मात्र 3 प्रतिशत के आसपास था।
इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत आज भी उस स्थिति से नीचे खड़ा है, जहाँ वह दो साल पहले था।
संपादकीय दृष्टि से इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि टैरिफ 18 प्रतिशत हुआ,
बल्कि यह है कि भारत 50 प्रतिशत के दंडात्मक व्यापार युद्ध से बाहर निकल पाया।
2025 में अमेरिकी प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब व्यापार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है।
ऐसे माहौल में भारत का समझौते की मेज़ पर लौटना एक व्यावहारिक निर्णय था।
यह समझौता भारत को एक ऐसे लाभकारी मोड़ पर ले आया है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती—
चीन पर आज भी 30–35% या उससे अधिक अमेरिकी टैरिफ लागू है
वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर लगभग 20% शुल्क है
जबकि भारत अब 18% पर है
यह स्थिति भारतीय निर्यात को अमेरिकी बाज़ार में स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है।
यह बढ़त 2024 में भारत के पास नहीं थी।
हर समझौते की एक कीमत होती है—और यह डील भी अपवाद नहीं।
भारत ने:
रूसी तेल की खरीद धीरे-धीरे बंद करने
अमेरिकी LNG और तकनीक के आयात बढ़ाने
तथा लगभग 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता ली है
यह सब भारत की ऊर्जा लागत और व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ा सकता है।
सस्ती ऊर्जा छोड़कर महँगे विकल्प अपनाना, अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।
यह समझौता भारत की उस रणनीतिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े करता है,
जिस पर वह लंबे समय से गर्व करता आया है।
क्या वैश्विक दबावों के सामने भारत को बार-बार आर्थिक रियायतें देनी पड़ेंगी?
और क्या भविष्य में व्यापारिक फैसले विदेश नीति के दबाव में लिए जाते रहेंगे?
इन सवालों के उत्तर आसान नहीं हैं।
यह कहना गलत होगा कि भारत इस समझौते में हार गया।
यह कहना भी सच नहीं होगा कि भारत ने सब कुछ जीत लिया।
सच्चाई यह है कि—
भारत ने टकराव के दौर से निकलकर समझौते का रास्ता चुना है।
यह रास्ता महँगा है, समझौतों से भरा है,
लेकिन वैश्विक व्यापार की वर्तमान वास्तविकताओं में
शायद यही सबसे व्यावहारिक विकल्प भी था।
अब चुनौती यह है कि भारत इस मिली हुई प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को
निर्यात विस्तार, घरेलू उद्योग संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा में बदल पाए—
वरना यह समझौता केवल राहत बनकर रह जाएगा, उपलब्धि नहीं।
भिलाई। शौर्यपथ /
इस्पात नगरी भिलाई के लिए यह गर्व का क्षण है। भिलाई निवासी एवं अमेरिका में कार्यरत सॉफ्टवेयर इंजीनियर मयंक जैन के नेतृत्व में हिंदी भाषा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है। उनकी संस्था हिंदी-यूएसए को अमेरिका की प्रतिष्ठित वैधानिक संस्था एक्रीडिटिंग कमीशन फॉर स्कूल्स – वेस्टर्न एसोसिएशन ऑफ स्कूल्स एंड कॉलेजेस (्रष्टस्-ङ्ख्रस्ष्ट) से प्रारंभिक मान्यता प्राप्त हुई है।
अमेरिका के सेंट लुइस, मिसूरी में रह रहे मयंक जैन ने बताया कि यह मान्यता विस्तृत आत्म-मूल्यांकन और ङ्ख्रस्ष्ट की आधिकारिक निरीक्षण टीम द्वारा शैक्षणिक संरचना, शिक्षण पद्धतियों और नेतृत्व क्षमता के गहन परीक्षण के बाद दी गई। उन्होंने कहा कि यह लगभग दो वर्षों के निरंतर प्रयासों का परिणाम है, जो अमेरिका में हिंदी के प्रचार-प्रसार को नई मजबूती देगा।
ङ्ख्रस्ष्ट निरीक्षण समिति की सदस्य एलिज़ाबेथ ओबरराइटर ने हिंदी-यूएसए के पाठ्यक्रम और शिक्षकों की सराहना करते हुए कहा कि यहाँ के पूर्व छात्र आज स्वयं शिक्षक बनकर समाज को योगदान दे रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि हिंदी-यूएसए अमेरिका के 29 स्कूलों में संचालित एक पंजीकृत गैर-लाभकारी संस्था है, जो 4,000 से अधिक छात्रों को हिंदी शिक्षा प्रदान कर रही है। यह उपलब्धि भिलाई, छत्तीसगढ़ और पूरे देश के लिए गौरव का विषय है।
डबल इंजन सरकार का ऐतिहासिक तोहफा, प्रधानमंत्री मोदी व रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का जताया आभार
रायपुर । शौर्यपथ ।
छत्तीसगढ़ में रेलवे अधोसंरचना के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत करते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए राज्य को ?7,470 करोड़ का ऐतिहासिक बजट प्रावधान दिया है। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव के प्रति प्रदेश की जनता की ओर से हार्दिक आभार व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने इसे डबल इंजन सरकार की दूरदर्शी सोच और निरंतर प्रयासों का परिणाम बताया।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि वर्ष 2009-14 के दौरान जहां छत्तीसगढ़ को रेलवे विकास के लिए वार्षिक औसतन मात्र ?311 करोड़ प्राप्त होते थे, वहीं वर्ष 2026-27 में यह राशि बढ़कर ?7,470 करोड़ हो गई है, जो लगभग 24 गुना वृद्धि को दर्शाती है। वर्तमान में राज्य में ?51,080 करोड़ की लागत से रेलवे से जुड़े विभिन्न कार्य प्रगति पर हैं, जिनमें नए रेल ट्रैक का निर्माण, रेलवे स्टेशनों का पुनर्विकास और सुरक्षा व्यवस्था का उन्नयन प्रमुख रूप से शामिल है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सुदूर वनांचल बस्तर अंचल के विकास के लिए रावघाट–जगदलपुर रेल परियोजना का प्रारंभ होना जनजातीय समाज के लिए केंद्र सरकार का अमूल्य उपहार है। यह परियोजना न केवल आवागमन को सुगम बनाएगी, बल्कि क्षेत्रीय विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसर भी सृजित करेगी।
उन्होंने बताया कि परमलकसा–खरसिया रेल कॉरिडोर के साथ-साथ नए फ्रेट कॉरिडोर को भी स्वीकृति प्रदान की गई है। इन परियोजनाओं के पूर्ण होने से राज्य में यात्री रेल सेवाओं की संख्या आने वाले समय में लगभग दोगुनी हो जाएगी और माल परिवहन को भी नई गति मिलेगी।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि अमृत स्टेशन योजना के तहत छत्तीसगढ़ के 32 रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। इनमें डोंगरगढ़ (फेज-ढ्ढ), अंबिकापुर, भानुप्रतापपुर, भिलाई और उरकुरा जैसे स्टेशन पूर्ण होकर यात्रियों को आधुनिक सुविधाएं प्रदान कर रहे हैं। इसके साथ ही राज्य में वंदे भारत एक्सप्रेस की दो जोडिय़ां तथा अमृत भारत एक्सप्रेस की एक जोड़ी सेवाएं प्रारंभ होने से यात्रियों को तेज, सुरक्षित और विश्वस्तरीय रेल सुविधा मिल रही है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 2014 से अब तक छत्तीसगढ़ में लगभग 1,200 किलोमीटर नए रेल ट्रैक का निर्माण, 100 प्रतिशत विद्युतीकरण, 170 से अधिक फ्लाईओवर एवं अंडरपास तथा 'कवचÓ जैसी अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणालियों की स्थापना की गई है। इन प्रयासों से छत्तीसगढ़ आज रेलवे विकास के क्षेत्र में देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में शामिल होता जा रहा है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि यह विकास केवल रेल पटरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे प्रदेश के व्यापार, पर्यटन, उद्योग, रोजगार और आम नागरिकों के जीवन में नई ऊर्जा और अवसरों का सृजन हो रहा है। उन्होंने एक बार फिर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव को इन युगांतकारी पहलों के लिए छत्तीसगढ़ की जनता की ओर से हृदय से धन्यवाद ज्ञापित किया।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
