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May 31, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

मेलबॉक्स / शौर्यपथ / धरती पर मानव ही ऐसा प्राणी है, जो अच्छे और बुरे का भेद कर सकता है। मगर केरल की घटना ने ईश्वर की सबसे सुंदर रचना पर शक की चादर चढ़ा दी है। वहां एक गर्भवती हथिनी के साथ किया गया व्यवहार दुखी करने वाला है। इस घटना से यह समझ नहीं आ रहा कि वास्तव में जानवर कौन है? वह हथिनी, जो पीड़ा में भी शांत होकर पानी में खड़ी रही या फिर वे इंसान, जिन्होंने इस बेजुबान को फल में बम खिला दिया। हथिनी के पेट में पल रहे बच्चे ने भी शायद यही सोचा होगा कि अगर मानव ऐसे होते हैं, तो ठीक है कि मैं धरती पर नहीं आया। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब-जब मानव इंसानियत से दूर हुआ है, तब-तब उसे इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ा है।
ललित शंकर, मावना, मेरठ

सबकी है दुनिया
विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रकाशित अनिल प्रकाश जोशी का लेख ‘यह दुनिया सिर्फ इंसानों की नहीं’ पढ़ा। वाकई, इस दुनिया पर जितना हमारा अधिकार है, उतना ही उन लाखों जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों का भी है, जिनको प्रकृति ने हमारे साथ जीवन दिया है। चूंकि इंसान सबसे बुद्धिमान प्राणी है, इसलिए उसे पर्यावरण संरक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। लेकिन दुखद यह है कि हम पर्यावरण को बचाने के लिए समय-समय पर बातें तो खूब करते हैं, लेकिन जिस तरह से उन पर काम होना चाहिए, वह नहीं करते। हमें अपने आसपास की आबोहवा साफ रखनी ही होगी, अन्यथा मानव जीवन शायद ही बचा रह सकेगा।
विजय कुमार धनिया, नई दिल्ली

बढ़ता तनाव
केरल के एक गांव में नौवीं कक्षा की एक छात्रा ने जिस तरह से आत्महत्या की, उससे कई सवाल उठ खड़े होते हैं। कहा जा रहा है कि ऑनलाइन पढ़ाई न कर पाने की वजह से वह दबाव में थी। यह बेहद अफसोस की बात है कि एक बच्ची पढ़ना चाहती थी, पर संसाधन के अभाव में हताशा के गर्त में चली गई और अपनी जान दे बैठी। सचमुच, सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे इतने संपन्न नहीं होते कि उनके पास स्मार्टफोन, टीवी, केबल आदि हों। ऑनलाइन पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन और इंटरनेट की जरूरत पड़ती है। उस बच्ची के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। संभवत: पिता की आर्थिक मजबूरी रही होगी कि वह अपनी बेटी की ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी संसाधन नहीं जुटा पाया। दिक्कत यह है कि सरकार ने ऑनलाइन पढ़ाई शुरू तो कर दी, लेकिन इसके लिए अपनी तैयारी पूरी नहीं की। कुछ समय लगाकर पहले अभिभावकों को तैयार करना जरूरी था। यह घटना सबक दे रही है कि हमें अपने आसपास ऐसे परिवारों की खोज-खबर जरूर लेनी चाहिए, जिनके मुखिया की आजीविका इस लॉकडाउन में चली गई हो और बुनियादी जरूरतें भी वह पूरी नहीं कर पा रहा हो।
विनय मोहन, सेक्टर 18, जगाधरी

अमानवीय कृत्य
केरल में गर्भवती हथिनी के साथ हुई बर्बरता हृदय-विदारक है। हमारे संविधान में सभी जीवों के प्रति दया की भावना रखने की बात मौलिक कर्तव्यों में कही गई है। हमारी संस्कृति में भी कई जीवों को पूजनीय माना जाता है और अहिंसा को महत्व दिया जाता है। ऐसे में, देश के सबसे शिक्षित राज्य में ऐसी अमानवीय घटना हमें चिंतित करती है। शत-प्रतिशत साक्षरता का भला क्या उद्देश्य होना चाहिए? क्या शिक्षा-व्यवस्था में सुधार की जरूरत है? जानवरों के अधिकारों को लेकर हमें ज्यादा गंभीर होना चाहिए। यह सही है कि देश में हर व्यक्ति को उनके अधिकार नहीं मिल पाते हैं, लेकिन मानवाधिकार और अन्य जीवों के अधिकार की बात एक साथ होनी चाहिए। ऐसा क्रूरतापूर्ण काम करने वालों से भला मानवता की क्या उम्मीद की जाए!
प्रीतीश पाठक
बलवाहाट, सहरसा

 

ओपिनियन / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के बीच हुई शिखर-वार्ता समोसा और गुजराती खिचड़ी की चर्चा के साथ खत्म हुई; इस वादे के साथ कि समोसे और खिचड़ी साझा किए जाएंगे। लेकिन फिलहाल यह मुमकिन नहीं था, क्योंकि वार्ता वर्चुअल (आभासी) थी, एक डिजिटल माध्यम के जरिए दोनों देशों के नेता एक-दूसरे से रूबरू हो रहे थे।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह शिखर-वार्ता द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण थी। दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए, दोनों ने एक-दूसरे के मिलिट्री बेस के इस्तेमाल का बेहद महत्वपूर्ण समझौता भी किया। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे व्यापार और साझेदारी का एक नया मॉडल बताते हुए शिखर-वार्ता के बाद ट्वीट भी किया। लेकिन यह सब बेहद सादगी से हुआ। इसमें पारंपरिक शिखर-वार्ता की रौनक गायब थी। न तो कोई भोज था, न फोटो-अप, न ही डिनर डिप्लोमेसी। एक स्क्रीन थी, और इस डिजिटल दीवार के आर-पार दोनों प्रधानमंत्री थे। उनमें बातचीत हुई और कई समझौते भी हुए। हालांकि, द्विपक्षीय रिश्तों की गरमी डिजिटल बंटवारे के आर-पार महसूस की गई।
कोरोना-काल के पूर्व की परंपरागत शिखर-वार्ताओं को याद कीजिए। पहले किसी शिखर-वार्ता का मतलब होता था- शासनाध्यक्ष के आने की तैयारियां, कई भोज, कई दौर की बातचीत, फिर कुछ समझौते, साझा बयान और फोटो-अप। ऐसे में, कहा जा सकता है कि असल की जगह अब वर्चुअल ले रहा है और इसकी अहमियत अब बढ़ती ही जाएगी। हां, इसमें आमने-सामने मिलने की गर्मजोशी और ‘पर्सनल टच’ की कमी जरूर महसूस होगी, लेकिन कोरोना-काल की यही असलियत है और इसमें भविष्य के संकेत भी हैं। वर्चुअल डिप्लोमेसी अब एक ऐसी सच्चाई है, जो आगे भी बनी रहेगी। ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर बैरी ओ फैरेल ने इसी दौरान अपना कार्यभार संभाला और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को डिजिटल माध्यम से ही अपना परिचय-पत्र पेश किया। इस मौके पर उन्होंने कहा भी कि कोरोना ने जीवन के हर क्षेत्र में बाधाएं खड़ी की हैं, कूटनीति इसका अपवाद नहीं।
दरअसल, कोरोना-काल की कूटनीति में द्विपक्षीय संवादों, शिखर-सम्मेलनों या किसी भी प्रकार के आदान-प्रदान के नियम बदल चुके हैं। असल की जगह वर्चुअल ने ले ली है। राजनयिकों ने एक-दूसरे के साथ संपर्क व सहयोग बनाए रखने का नया तरीका अपना लिया है, जिसमें शून्य शारीरिक नजदीकी अपनाई जा रही है। नाराजगी जाहिर करने का तरीका भी वर्चुअल हो गया है। अप्रैल महीने में भारत-पाक सीमा पर मारे गए नागरिकों को लेकर नई दिल्ली ने नाराजगी जताते हुए इस्लामाबाद को वर्चुअल आपत्ति-पत्र भेजा। फोन कॉल और फिर ई-मेल के जरिए आपत्ति दर्ज की गई।
वैश्विक कूटनीति इस दौरान कैसे डिजिटल माध्यम से काम कर रही है, इसकी एक दिलचस्प मिसाल है संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन की सेवानिवृत्ति। वह रिटायर हुए और पद से उनकी विदाई एक आभासी नमस्ते के साथ हुई। इसी तरह, पिछले माह लगभग 20 सम्मेलन आभासी माध्यम से हुए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की महासभा भी ऑनलाइन हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 4 मई को नाम शिखर-वार्ता में ऑनलाइन ही शिरकत की। कोरोना के शुरुआती दौर में ही प्रधानमंत्री ने सार्क देशों के नेताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए एक अहम बैठक की थी। यह सब सिर्फ भारत में नहीं हो रहा, सभी देश तकनीक के जरिए अब अपनी कूटनीति कर रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि वर्चुअल माध्यम से कूटनीति पहले नहीं हुई। मोहित मुसद्दी और संजय पुलिपका ने देल्ही पॉलिसी ग्रुप के लिए लिखे अपने शोधपत्र में लिखा है कि कूटनीति के लिए वर्चुअल माध्यम अपनाना असामान्य नहीं है। जब से टेलीफोन ने कूटनीति में अपनी जगह बनाई है, वह वहां जम गया। उसकी भरपाई किसी अन्य चीज से नहीं की जा सकी। 1963 में शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच हॉटलाइन की शुरुआत हुई थी, ताकि दोनों शीर्ष नेताओं के बीच सीधी बातचीत हो सके। देखते-देखते दूसरे देश भी कूटनीति के इस वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल करने लगे। शीत युद्ध के बाद टेलीफोन द्वारा कूटनीति में गति आ गई। अब तो संयुक्त राष्ट्र भी वर्चुअल महासभा की संभावना पर गौर कर रहा है, जिसमें रिकॉर्ड किए गए भाषण चलाए जाएं।
डिजिटल माध्यम से कूटनीति के कई फायदे हैं। यह काफी किफायती है। शिखर सम्मलेन हो या फिर बहुपक्षीय बैठक, इनसे जुड़ी यात्राओं और आयोजनों का खर्च वर्चुअल माध्यम में काफी कम हो जाता है। यह पर्यावरण संरक्षण की नजर से भी बेहतर है, क्योंकि ऐसे में हवाई यात्राओं की संख्या में काफी कमी आएगी, जिसका सीधा असर ग्लोबल वार्मिंग पर पड़ता है। इन सभी फायदों को देखते हुए लगता है कि संबंधों के तार जोड़ने के लिए डिजिटल माध्यम ही भविष्य है।
लेकिन वर्चुअल डिप्लोमेसी पारंपरिक कूटनीति की जगह पूरी तरह से ले लेगी, यह मुश्किल है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच तो यह कामयाब हो सकती है, जहां दोनों पक्षों में कोई टकराव या मतभेद की स्थिति नहीं, लेकिन जहां मुश्किल परिस्थितियों से जूझना पड़ता है, वहां बंद दरवाजों के पीछे की कूटनीति और व्यक्तिगत संबंधों की अपनी अहमियत है। मिसाल के तौर पर, डोका ला टकराव के बाद भारत और चीन के रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की वुहान में हुई पारंपरिक-वार्ता की अहम भूमिका थी। इसमें नदी किनारे की सैर, पारंपरिक भोज जैसी चीजों की अपनी जगह है, जो दोनों पक्षों के बीच एक आत्मीयता को जन्म देती है।
याद कीजिए, इंदिरा गांधी ने अपने दौर में अलफांसो आम की कूटनीति की थी, प्रधानमंत्री मोदी ने तत्कालीन पाकिस्तानी वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ के साथ शॉल डिप्लोमेसी की थी। रूस तो वोदका डिप्लोमेसी के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी और उनके ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष के बीच भी समोसा और खिचड़ी की बात हुई, पर वह सिर्फ बात थी। जब उनकी आमने-सामने की मुलाकातें होंगी, तो बात आगे बढ़ेगी। संबंधों की जटिलताओं को सुलझाने के लिए या रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने के लिए पुराने पारंपरिक तरीके जरूरी बने रहेंगे। हां, सामान्य बातचीत और कूटनीति के लिए वर्चुअल डिप्लोमेसी ही आगे का रास्ता है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)नगमा सहर, टीवी पत्रकार व सीनियर फेलो, ओआरएफ

 

   दुर्ग / शौर्यपथ / आयुक्त बर्मन द्वारा सहायक राजस्व निरीक्षक को बाज़ार विभाग का प्रभार तो दे दिया गया किन्तु पहले दिन ही शहर के मुख्य बाज़ार इंदिरा मार्केट मुख्य मार्ग में अव्यवस्था का आलम दिखा और आम जनता परेशान होती रही किन्तु निगम के नवनियुक्त बाज़ार प्रभारी थान सिंह द्वारा किसी भी तरह की कोई कार्यवाही का ना करना समझ से परे है जबकि शाम के समय बाज़ार प्रभारी इंदिरा मार्केट प्रेस काम्प्लेक्स में ही अपनी टीम के साथ थे .
   बता दे कि इन दिनों शहर में अमृत मिशन योजना के तहत पाइप लाइन बिछाने का कार्य तीव्र गति से चल रहा है उसी कड़ी में आज पाइप लाइन का कार्य इंदिरा मार्किट मुख्य मार्ग होटल शीला के सामने पाइप लाइन बिछाने का कार्य प्रगति पर था जिसके कारण वन वे वाले मार्ग में एक तरफ ( शीला होटल के सामने ) के मार्ग को बंद कर दिया गया था जिसके कारण यातायात का दबाव दुसरे मार्ग पर जयादा बढ़ गया था . दुसरे मार्ग तरह निगम काम्प्लेक्स है जिसमे ऐसी कई दुकाने है जिनके सामान सड़क तक फैले रहते है . सामानों को इस तरह सड़क तक फैला कर व्यापार करने वालो के बारे में बाज़ार प्रभारी सहायक राजस्व निरीक्षक थान सिंह अच्छे से जानते है किन्तु वर्तमान में जब कार्य प्रगति पर था और एक ही तरफ से आने जाने वालो का रेला लगा हुआ था बावजूद इसके बाज़ार प्रभारी द्वारा मामले को किसी भी तरह संज्ञान नहीं लेना दुर्ग की आम जनता जो बाज़ार क्षेत्र में इस तरह के यातायात के दबाव से परेशांन थी निगम प्रशासन की कार्य शैली पर ऊँगली उठा रही थी किन्तु इतना सब होने के बाद भी बाज़ार विभाग द्वारा किसी भी तरह संज्ञान ना लेना सड़क तक सामान फैला कर व्यापार करने वाले व्यापारियों के हौसले ही बुलंद करता है . क्या नए बाज़ार प्रभारी इंदिरा मार्किट की दशा और दिशा सुधारेंगे या सिर्फ प्रभारी मुखिया बनकर मौन रहेंगे ?

दुर्ग / शौर्यपथ राजनीती लेख / राजेन्द्र साहू दुर्ग का जाना पहचाना नाम . कांग्रेस के बड़े नेताओ में राजेन्द्र साहू की गिनती होती है . प्रदेश कांग्रेस सरकार के मुखिया के करीबी माने जाने वाले राजेन्द्र साहू का दुर्ग के युवा वर्ग में खासी पकड है . राजेन्द्र साहू वर्षो से कांग्रेस के सक्रीय कार्यकर्ता और संगठन में कई पदों पर कार्य कर चुके है . मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र पतन का प्रभारी पद का बखूबी निर्वहन कर चुके राजेन्द्र साहू वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस में महामंत्री के पद पर है . इन दिनों राजेन्द्र साहू केंद्र की नीतियों का विरोध करने में दुर्ग कांग्रेस के बड़े चेहरे बन गए है .
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने हुए ढेढ़ साल हो गया किन्तु राजेन्द्र साहू संगठन की राजनीती में ही समय देते रहे किन्तु पिछले कुछ दिनों से लगातार मिडिया के माध्यम से राजेन्द्र साहू लगातार केंद्र की मोदी सरकार की जनहित विरोधी नीतियों का लगातार विरोध कर रहे है और खबरों में छाए हुए है क्या सोशल मिडिया क्या प्रिंट मिडिया क्या इलेक्ट्रोनिक मिडिया हर क्षेत्र में लगातार कांग्रेस की तरफ से दुर्ग शहर में कांग्रेस की मुखर आवाज़ बन कर उभरे है .
          राजेन्द्र साहू के यु अचानक सक्रीय होने से दुर्ग कांग्रेसियों सहित भाजपा में भी चर्चा का विषय है . वैसे तो वर्तमान में भिलाई निगम , रिसाली निगम ,और जामुल निगम में ही चुनाव होने वाले है किन्तु देखा जाए तो इन तीनो निकाय के किसी पद की दौड़ में राजेन्द्र साहू कही नहीं नजर आते . वही चर्चा का विषय है कि क्या ये भविष्य की तैयारी तो नहीं .
      मुझे अच्छे से याद है कि २०१५ में जब हाल ही में छत्तीसगढ़ के विधान सभा चुनाव संपन्न हुए थे और प्रदेश में भाजपा की सरकार तीसरी बार बनी थी और मुख्यमंत्री बघेल तब नए प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाले थे और राजनंदगांव के घुमका क्षेत्र में सभा ली थी उसी सभा में उनके द्वारा इस आक्रामक तरीके से कांग्रेसियों का उत्साह वर्धन किया था मानो चुनाव ४ साल बाद नहीं चार दिन बाद हो . पद सँभालते ही तात्कालिक प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ने जिस तरह से पुरे छत्तीसगढ़ में सभाए लेनी शुरू कर दी थी और कार्यकर्ताओ को ऐसे तैयार कर रहे थे जैसे चुनाव अगले माह हो प्रदेश अध्यक्ष बनते ही तात्कालिक प्रदेश अध्यक्ष व वर्तमान मुख्यमंत्री बघेल ने आक्रामकता के साथ प्रदेश सरकार के खिलाफ राजनितिक जंग का बिगुल बजा दिया था और उसी का परिणाम २०१९ की विधान सभा में कांग्रेस की बम्फर जीत का तोहफा था .
     कुछ ऐसा ही नजारा आज उनके राजनैतिक शिष्य राजेन्द्र साहू में देखने को मिल रहा है . शहर में चर्चा का विषय है कि भविष्य में प्रदेश कांग्रेस द्वारा राजेन्द्र साहू को कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है . राजेन्द्र साहू वर्तमान में दुर्ग संसदीय क्षेत्र के एक ऐसे कांग्रेस नेता है जो आम जनता सहित संगठन की नजर में सौम्य , सहज , सरल और निर्विवाद नेता के तौर पर जाने जाते है .दुर्ग के और उनके जानने वाले कहते है कि राजेन्द्र साहू ने राजनितिक जीवन में अभी तक सिर्फ व्यक्ति ही कमाए है जो उनके समर्थक के रूप में जाने जाते है विरोधी भी उनके व्यवहार की तारीफ़ करते है . खैर राजनीती में एक पल में कौन कहा पहुँच जाए कुछ कहा नहीं जा सकते किन्तु वर्तमान में यही चर्चा है राजनितिक हलको में कि भविष्य में राजेन्द्र साहू को कोई महत्तवपूर्ण जिम्मेदारी मिल सकती है .

दुर्ग। शौर्यपथ । दुर्ग NSUI शहर अध्यक्ष हितेश सिन्हा के नेतृत्व में आज नगर पुलिस अधीक्षक श्री विवेक शुक्ला जी को दुर्ग शहर के साथ ही आस पास के ग्रामीण आंचलों में हर गाली मोहल्ले में चल रहे अवैध कारोबार सट्टा,जुआ के साथ ही प्रतिबंधित चीजे गांजा शराब बिक्री को तत्काल बंद करवाने के लिए ज्ञापन सौप करके पुलिस प्रशासन को जानकारी देकर चल रहे अवैध कारोबार जो भयंकर रूप से फलफूल रहा है जिसके को लेकर दुर्ग NSUI ने तत्काल बंद कराने एवं जो भी व्यक्ति इस कारोबार को बढ़ावा देने में लिप्त है ऐसे लोगो को चिंहित कर जल्द से जल्द कार्यवाही करने की मांग की किए एक सप्ताह के अंदर अवैध कारोबार पर अंकुश नही लगा तो प्रदेश के मुखिया श्री भूपेश बघेल जी,गृहमंत्री श्री ताम्रध्वज साहू से मिल करके इसकी शिकायत कर उचित कार्यवाही करने की मांग करेंगे.।।

*नीचले बस्तियों में जल भराव ना हो, निगम ने की है तैयारी...* *निगम, नाला और नालियों से कचरा निकालने का चला रहा है अभियान....* *आम जनता से अपील अपने घर के आस-पास नालियों में घर का कचरा ना डाले....निगम*

 

    दुर्ग /शौर्यपथ/ बारिश के समय शहर के निचली बस्तियों में बारिश के पानी से जलभराव की स्थिति निर्मित ना हो इसके लिए विशेष अभियान चलाकर नगर पालिक निगम दुर्ग द्वारा शहर के सभी बड़े नाला और वार्ड बस्तियों में स्थित छोटी बड़ी नालियों से कचरा मलमा निकालकर तल से सफाई की जा रही है । समस्त आम जनता से अपील है कि आपके द्वारा अपने घरों का कचरा घर के आस- पास के नालियों में डाल दिए जाने के कारण छोटी नाली से होकर बड़े नाला में कचरा आकर फंस जाता है । जिससे निचली बस्तियों में पानी भरने की समस्या होती है । नगर निगम द्वारा सभी नालियों से कचरा और मलबा निकालने का कार्य किया जा रहा है अत: अनुरोध है कि कोई भी व्यक्ति अपने घरों का कचरा अपने घर के आस-पास की नालियों में बिल्कुल ना डालें । उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत स्वच्छता सर्वेक्षण के स्टार रेटिंग में केवल नालियों में कचरा मिलने के कारण ही दुर्ग निगम स्टार रेटिंग फेल हुआ है । पूरे शहर के छोटे बड़े नालियों से कचरा निकालने का अभियान निरंतर चलाया गया है । इसके साथ ही बड़े नाला से भी जेसीबी के माध्यम से मलमा और कचरा निकाला जा रहा है ताकि आने वाले समय में बारिश के दौरान किसी भी बस्ती व क्षेत्र में जलभराव की स्थिति ना हो और पानी सुगमता से निकास हो सके । इस कड़ी में नगर निगम दुर्ग द्वारा पोटिया कला वार्ड विवेकानंद नगर में स्थित बड़े नाला से कचरा मलमा निकाल कर जेसीबी से सफाई किया गया । इसी तरह से मग्गा होटल के पास से होकर मिलपारा की बड़ी नाली की सफाई की गई । इसी कड़ी में न्यू पुलिस लाइन वार्ड 48, गायत्री मंदिर वार्ड 25 गंजपारा वार्ड 36, नयापारा वार्ड 1, शंकर नगर वार्ड 10, --11, पोलसाय पारा वार्ड 27, संतरा बाड़ी वार्ड 26, आमदी मंदिर वार्ड 24, दीपक नगर वार्ड 23, शंकर नाल, गिरधारी नाला, पोटिया नाला, कसारीडीह नाला, केलाबाड़ी नाला, शक्ति नगर नाला, तकिया पारा, पोटियाकला वार्ड 54, आजाद वार्ड 37, आदि नालियों से कचरा निकाल कर सफाई की गयी । आयुक्त बर्मन ने बताया बारिश के दौरान किसी भी क्षेत्र में बारिश का पानी नालियों के कारण ना भरे इसके लिए अभियान चलाकर सभी नालियों से कचरा और मलमा निकाला जा रहा है । उन्होंने कहा शहर के बहुत से लोग अपने घरों का कचरा नालियों में डाल दे रहे हैं जिसके कारण कचरा छोटी नाली से होकर नाला में आकर फंसता है और इससे नाली में पानी निकासी रुक जाता है और संबंधित क्षेत्र में पानी भरने की समस्या होती है सभी लोगों से अपील है की वे नालियों में कचरा ना डालें शहर को साफ सुथरा रखने में नगर निगम को सहयोग प्रदान करे ।

शौर्यपथ लेख । फेसबुक वॉल में एक विचार दिखा जिसे एक महिला द्वारा पोस्ट किया गया था । पोस्ट में लिखी बाते सोंचने पर मजबूर कर देती है कहने को तो भारत मे अभिव्यक्ति की आजादी है महिलाओं का सम्मान भी है किंतु ऐसे कई क्षेत्र है जहां महिलाओं का सिर्फ उपयोग ही किया जाता है उन्ही क्षेत्री में एक क्षेत्र है विज्ञपन कि दुनिया का । विज्ञपन की दुनिया मे शायद ही कोई विज्ञपन का निर्माण हुआ हो जिसमें महिलाओं की भागीदारी ना हो किन्तु इसमे से कई विज्ञपन ऐसे है जो महिलाओं की उपयोग की वस्तु ना होने के बाद भी उनमें भागीदारी दिखती है । मेंस शेविंग क्रीम , मेंस वियर , मेंस ऑटो , मेंस ड्रिंक्स जैसे कई प्रोडूक्त है जिनका महिलाओं से कोई परोक्ष सम्बन्ध नही होता किन्तु बावजूद इसके ऐसे विज्ञापनों में इनकी भागीदारी एक विशेष ड्रेसिंग सेंस के साथ दिखाई जाती है ऐसे ही कुछ विज्ञापनों के बारे में एक महिला ने अपने विचार प्रकट किए है जो सोंचने पर मजबूर कर देते है कि क्या ये सही है ... पोस्ट के अंश आप सम्मानित पाठकों को समर्पित यह एक ऐड है जिसमें स्कूटर दिख रहा है.. स्कूटर बिक रहा हैसच कहूँ तो पहली नजर में स्कूटर दिखा ही नहीं..क्योंकि सबकी नजर स्कूटर पर गयी ही नही होगी ...? क्यों सच छिपाऊं,, मैं सोच रही हूँ ,, आखिर ये हो क्या रहा है..?? नारी क्यों देख औेर समझ नहीं पा रही कि बाजार ने उसे एक वस्तु बना दिया है,, वो क्यों विरोध नही करती..?? अगरबत्ती के ऐड में महिला,, शेविंग क्रीम के ऐड में महिला,, डिओ के ऐड में महिला की अमुक डिओ लगाओगे तो,, खिंची चली आंती है ,, पुरुषों के इनर वियर में महिला.. 18-20 साल के लड़के ओर लड़कियों पर इसका क्या असर हो रहा है? उसका समाज पर क्या असर होगा..?? एक परफ्यूम का विज्ञापन है जिसमें लड़की अपने पुरूष मित्र का परिचय माता पिता से कराती है। जब लड़का लड़की की माँ को आण्टी कहकर संबोधित करता है तो प्रौढ़ महिला उसे उसका नाम लेकर पुकारने को कहती है। उधर उसके पति के हाथ में पकड़े हुये पॉपकार्न के पैकेट भिंच जाते हैं, यह विज्ञापन क्या संदेश दे रहा है, समाज को..?? क्या परफ्यूम इतना प्रभाव कारी है कि एक अधेड़ महिला उससे प्रभावित होकर पति और बेटी के सामने इतनी निर्लज्ज हो जाती है..?? कुछ लड़कियां कहती है कि हम क्या पहनेंगे ये हम तय करेंगे, पुरुष नहीं..मैं आपकी बात से सहमत हो सकती हूँ लेकिन वुमन empowerment के नाम जो समाज के सामने जो अश्लीलता परोसी जा रही है उसके कारण देश के युवाओं और समाज पर जो इफेक्ट आ रहा है उसका जिम्मेदार कौन है..?? वह जो जिसे दिखाया जा रहा है या वह जो यह दिखा कर फायदा अपना फायदा उठा रहा। किसी भी प्रोडक्ट को बेचने के लिए किसी औरत या लड़की को अश्लील तरीके से दिखाना कहाँ तक वुमन इंपावरमेंट के अंदर आता है..?? समय बदल रहा है ...कहकर अंग प्रदर्शन करना कहा तक उचित है .. हा मानती हूँ समय अनुसार चलना चाहिए ..पर किस किताब मे लिखा है की ..अंग प्रदर्शन करो .. आज लड़के और लड़कियों मे कोई भेद नही बल्कि मे तो कहूँगी लड़कियां हर फिल्ड मे आगे है आज समाज मे .. आधुनिकता को इतना मत ओढ़ लो की अपनी सभ्यता ही भूल जाओ .. मे भी एक पढ़ी लिखी डॉक्टर हूँ .. पर पैसा कमाने के लिए देह प्रदर्शन का विरोध करती हूँ . सत्य ये है की अश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधों की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दूकान है।ऊंचा उठने के लिए अंग प्रदर्शन नही ...बल्कि अपने अंग को ढककर ऊंचा बनकर दिखाओ आपकी पहचान आपके कम कपड़ों के फोटो से नही ..बल्कि नाम से होनी चाहिए .असल मे वहीं आपकी सच्ची सफलता है

बेमेतरा । शौर्यपथ । संत आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित युवा सेवा संघ जिला बेमेतरा ने विश्व पर्यावरण दिवस एवं वट पूर्णिमा व कबीरजी जयंती के उपलक्ष्य पर विभिन्न जगहों में किया वृक्षारोपण । युवा सेवा संघ जिला बेमेतरा के अध्यक्ष सोनू साहू ने बताया पीपल का वृक्ष दमानाशक, हृदयपोषक, ऋण-आयनों का खजाना, रोगनाशक, आह्लाद व मानसिक प्रसन्नता का खजाना तथा रोगप्रतिकारक शक्ति बढानेवाला है । बुद्धू बालकों तथा हताश-निराश लोगों को भी पीपल के स्पर्श एवं उसकी छाया में बैठने से अमिट स्वास्थ्य-लाभ व पुण्य-लाभ होता है । पीपल की जितनी महिमा गायें, कम है । पर्यावरण की शुद्धि के लिए जनता-जनार्दन एवं सरकार को बबूल, नीलगिरी (यूकेलिप्टस) आदि जीवनशक्ति का ह्रास करनेवाले वृक्ष सडकों एवं अन्य स्थानों से हटाने चाहिए और पीपल, आँवला, तुलसी, वटवृक्ष व नीम के वृक्ष दिल खोलके लगाने चाहिए । इससे अरबों रुपयों की दवाइयों का खर्च बच जायेगा । ये वृक्ष शुद्ध वायु के द्वारा प्राणिमात्र को एक प्रकार का उत्तम भोजन प्रदान करते हैं । पूज्य बापूजी कहते हैं कि ये वृक्ष लगाने से आपके द्वारा प्राणिमात्र की बडी सेवा होगी । यह लेख पढने के बाद सरकार में अमलदारों व अधिकारियों को सूचित करना भी एक सेवा होगी । खुद वृक्ष लगाना और दूसरों को प्रेरित करना भी एक सेवा होगी । जिसमे प्रदीप साहू, शिद्धान्त चौहान,कुश कश्यप, हेमलाल साहू, महेश, रेवाराम,राधेश्याम,सुमन साहू,अनूप, खेमलाल ,प्रह्लाद साहू,आदि पदाधिकारी उपस्थित रहे।*

         दुर्ग / शौर्यपथ / दुर्ग नगर पालिक निगम में अधिकारियों कर्मचारियों के अनियमितता के मामले आये दिन उजागर होते ही रहते है भर्ष्टाचार / अनियमितता का दूसरा पर्याय के रूप में दुर्ग निगम की पहचान बनते जा रही है . एक तरफ निगम की नाक के नीचे घटिया पेंट ( एम् आई सी भवन ) के नज़ारे के बाद भी अधिकारियों के ख़ास बने ठेकेदारों को ऑफलाइन ठेके पद्दति से नित नए काम मिल रहे है और घटिया निर्माण / कार्य पर अधिकारी आँख बंद रखे हुए है वही ठ्केदारो की फाइल जो नियमतः कार्यालय में होनी चाहिए किन्तु अधिकतर ठेकेदार अपनी फाइल अपने पास ही रखते है और बिना निरिक्षण दस्खत करने का कार्य इंजिनियर अपने केबिन में बैठ कर करते है . स्थल जाँच कार्यो में हो इसकी संभावना कम ही नजर आती है . हो सकता है कोई बड़ा कमीशन का खेल हो ठेकेदारों और इंजीनियरों में क्योकि साल भर पहले ही ऐसे ही एक मामले में सब इंजिनियर व्ही.पी. मिश्रा द्वारा सड़क पर सडक का निर्माण हुआ और ठेकेदारों को दोनों ही कार्यो के बिल का भुगतान हुआ . क्योकि  जिनकी शिकायत के बाद भी किसी तरह की कार्यवाही नहीं हुई .
          वर्तमान समय में निगम प्रशासन के मुखिया के तौर पर आयुक्त बर्मन द्वारा एक अहम् फैसला लिया गया जिसके तहत सहायक राजस्व निरीक्षक थान सिंह को बाज़ार प्रभारी के रूप में नियुक्त किया गया . किन्तु सबसे बड़ा सवाल यह है कि थान सिंह जो सालो से बाज़ार विभाग का कार्य देख रहे है अब जबकि प्रभारी है तो क्या इनके द्वारा इंदिरा मार्केट में सडको तक सामान फैला कर व्यापार करने वाले बड़े बड़े व्यापारियों पर कार्यवाही की जाएगी या सिर्फ निगम प्रशासन को कार्यवाही के नाम पर गुमराह करते रहेंगे और पद की गरिमा को धूमिल करेंगे ? क्या थान सिंह इंदिरा मार्केट में निगम के द्वारा लीज में दी गयी दुकाने जो बिना अनुमति के अपने मूल स्वरूप में परिवर्तन कर बरामदे तक सामन फैला कर व्यापार कर रहे है उन व्यापारियों पर कार्यवाही करेंगे या फिर ऐसे व्यापारियों पर विशेष कृपा दृष्टी रहेगी ? क्या थान सिंह शहर के ऐसे व्यापारी जो नियमो की अवहेलना करते हुए व्यापार कर रहे है उन पर कार्यवाही करेंगे या निगम प्रशासन का जोर एक बार फिर गरीबो पर ही मेहरबान रहेगा . निगम आयुक्त बर्मन द्वारा एक महत्तवपूर्ण फैसला लिया गया है और थान सिंह को बड़ी जिम्मेदारी दी गयी है क्या आयुक्त के फैसले पर थान सिंह खरे उतरेंगे या सिर्फ दिखावा में ही कार्य होगा . थान सिंह बाज़ार विभाग के सभी कार्यो से भलीभांति परिचित है बस अब समय है अपने पद की गरिमा को बनाए रखने की और निष्पक्ष ( भर्ष्टाचार से परे )होकर निगम के शासकीय कार्यो को करने की तथा ये साबित करने की सहायक क को महत्तवपूर्ण प्रभार देकर आयुक्त ने कोई गलती नहीं की .

दुर्ग / शौर्यपथ / आज से करीब साल भर पहले यही जून का महिना था और छावनी क्षेत्र में तेज आंधी तूफ़ान से एक बड़ी दुर्घटना घटने से बच गयी जिसके बाद मामला सामने आया ठेकेदार की कार्य में लापरवाही का .
मामला है आज  से एक साल पहले का छावनी क्षेत्र के शासकीय स्कूल का मैदान जहां छावनी क्षेत्र के बच्चो का खेलने का एक मात्र बड़ा स्थान था . इस स्कूल के मैदान में भाजपा शासन के समय तात्कालिक मंत्री प्रेम प्रकाश पाण्डेय की अनुशंषा पर छावनी स्कूल के मैदान को बच्चो के खेलने के लिए तैयार किया गया था . इस मैदान में फल्ड लाइट की व्यवस्था की गयी थी और मैदान के चारो ओर 6 खम्बे लगाए गए थे जिसमे प्रत्येक खम्बे में 16 लाइट  लगाई गयी थी . जिसके जलने से रात में भी दिन का नजारा होता था . यह मैदान वर्तमान में भिलाई निगम के महापौर देवेन्द्र यादव का विधान सभा क्षेत्र भी आता है और वार्ड में कांग्रेस पार्षद तुलसी जनप्रतिनिधि के तौर पर कार्य कर रही है . इस वार्ड में एक मात्र बड़े मैदान में लगी फ्लड लाइट पिछले साल जून के प्रथम सप्ताह में तेज आंधी तूफ़ान से क्षति ग्रस्त हो गयी थी जिसकी खबर शौर्यपथ समाचार ने १० जून के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित की थी और वार्ड के जों आयुक्त संजय बांगडे व इंजिनियर अखिलेश चंद्राकर से मामले को संज्ञान में लेने का निवेदन किया गया था तब इंजिनियर चंद्राकर द्वारा ये विश्वास दिलाया गया था कि जल्द ही मैदान की लाइट की व्यवस्था दुरुस्त की जाएगी और इन विद्युत् व्यवस्था के लिए निगम द्वारा परमानेंट बिजली कनेक्शन के लिए आवेदन दिया जाएगा किन्तु आज साल भर बाद भी लाखो खर्च करके क्षेत्र के मासूम बच्चो के सुविधा के लिए बनाया गया मैदान आज बद्दतर स्थिति में है . आलम यह है खम्बो को जो उघड गया था उसे तो लगा दिया गया किन्तु उसमे लगने वाले फ्लड लाइट अब गायब हो गए . यही नहीं करीब के एक और खंबे की सभी फ्लड लाइट को भी निकाल कर ले जाया जा चूका है . स्कूल की केयर टेकर से प्राप्त जानकारी के अनुसार निगम प्रशासन द्वारा ये लाइट उतरवा कर ले जाया गया है . इस बारे में जब इंजिनियर चंद्राकर से संपर्क किया गया तो उनके अनुसार इस तरह के किसी भी कार्यवाही की जानकारी उन्हें नहीं होना बताया गया .
एक तरफ महापौर देवेन्द्र यादव द्वारा शहर में जगह जगह मैदान बनाने की बात कर रहे है वही दूसरी ओर छावनी क्षेत्र के एकमात्र बड़े मैदान से सुविधाए हटाई जा रही है . क्या महापौर देवेन्द्र यादव नित नए कार्यो का उद्घाटन कर जनता में अपने आप को भिलाई की भली वाले जनप्रतिनिधि बताने की कोशिश में लगे हुए है वही दूसरी तरफ जिस मैदान में सुविधाए है उसे हटवा रहे है या फिर निगम के अधिकारियों द्वारा महापौर को अँधेरे में रखा जा रहा है . क्या जोन आयुक्त संजय बांगडे इन सब कार्यो से अनजान है ? क्योकि वार्ड के इंजिनियर और पार्षद को भी नहीं मालुम की इस मैदान की लाइट कौन ले गया . क्या लाखो के सामन के गायब या अन्यंत्र कही ले जाने पर किसी ऐसे व्यक्ति का हाँथ तो नहीं जो महापौर या निगम प्रशासन की छवि को धूमिल करना चाहता है .

बड़ा सवाल ....
मैदान में निम्नं स्तर का कार्य करने वाले ठेकेदार पर निगम प्रशासन द्वारा क्या कार्यवाही की गयी ?
मैदान से फल्ड लाइट कौन ले गया और निगम प्रशासन अभी तक मौन क्यों है ?
वार्ड पार्षद द्वारा आखिर इस मामले को संज्ञान क्यों नहीं लिया गया ?
क्या महापौर देवेन्द्र यादव जो इस क्षेत्र के विधायक होने के साथ ही निगम क्षेत्र के महापौर है इस अनियमितता पर कोई कार्यवाही / निष्पक्ष जाँच का आदेश करेंगे ?
क्या महापौर के समर्थको या निगम के फिल्ड का कोई अधिकारी बिना जानकारी दिए इस मैदान की लाइट को अन्यत्र ले गया ?
क्या निगम के आयुक्त रघुवंशी मामले की निष्पक्ष जाँच करवाएंगे ?
क्या कांग्रेस राज में भाजपा के शासन में दी गयी सुविधाओ को बर्बाद किया जाएगा ?

मैदान की वर्तमान स्थिति के लिए देखे  निचे अपलोड किये गए विडिओ को ..... 

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