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दुर्ग शहर की अव्यवस्था से जनता निराश, अतिक्रमण और गंदगी ने बढ़ाई परेशानी; कैबिनेट मंत्री बने गजेंद्र यादव से विकास की नई गाथा लिखने की आस
दुर्ग / शौर्यपथ / नगरीय निकाय चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी प्रत्याशी श्रीमती अलका बाघमार ने शहरवासियों से अतिक्रमण मुक्त दुर्ग, स्वच्छ और व्यवस्थित बाजार, भ्रष्टाचार पर कड़ी कार्रवाई जैसी कई बड़ी घोषणाएँ की थीं। इन वादों पर भरोसा जताते हुए दुर्ग की जनता ने मतदान के माध्यम से उन्हें महापौर के रूप में चुना। लेकिन महज़ कुछ महीनों के कार्यकाल में ही नगर सरकार की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है।
शहर के मुख्य मार्गों पर आवारा पशुओं का जमावड़ा, जवाहर नगर से सुराना कॉलेज तक फैली गंदगी और कचरे के ढेर, सड़कों के किनारे अवैध अतिक्रमण, जगह-जगह बुझी पड़ी स्ट्रीट लाइटें और थोड़ी-सी बारिश में ही पूरे शहर का जलभराव जैसी समस्याओं ने जनता को निराश किया है। दो महीने तक चले 'महासफाई अभियानÓ का परिणाम भी कुछ घंटों की बारिश में ही धुल गया।
इन हालातों ने न केवल महापौर की कार्यशैली पर बल्कि महापौर चयन में निर्णायक भूमिका निभाने वाले दुर्ग लोकसभा सांसद विजय बघेल की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। जनता का मानना है कि जिस प्रत्याशी को उन्होंने सांसद के प्रभाव से चुना, वही अब अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही हैं।
जनता की आवाज़
व्यापारीयो का कहना है – "बाजार क्षेत्र में हर दिन ट्रैफिक जाम और गंदगी से जूझना पड़ता है। हम उम्मीद कर रहे थे कि महापौर बनने के बाद कुछ सुधार होगा, परंतु हालात जस के तस हैं।"
स्थानीय निवासियों ने कहा – "महज कुछ घंटों की बारिश में ही पूरा इलाका जलमग्न हो जाता है। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। जनता पूछ रही है कि आखिर सफाई और नालों की देखरेख का जिम्मा किसका है?"
सुराना कॉलेज के छात्र बोले – "हमारे कॉलेज के सामने कचरे के ढेर और आवारा मवेशियों की समस्या महीनों से बनी हुई है। प्रशासन और नगर निगम दोनों ही सिर्फ आश्वासन देते हैं।"
अब नजरें टिकी हैं मंत्री गजेंद्र यादव पर
ऐसे में अब उम्मीद की किरण दिख रही है दुर्ग शहर के विधायक गजेंद्र यादव से, जिन्हें हाल ही में प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। यह संयोग स्वर्गीय हेमचंद यादव के बाद पहली बार आया है जब दुर्ग शहर विधानसभा का कोई विधायक मंत्री पद से सुशोभित हुआ है।
जनता को विश्वास है कि गजेंद्र यादव के मंत्री बनने से शहर के विकास की नई गाथा लिखी जाएगी। बड़े पद के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है और अब नागरिकों की अपेक्षा है कि मंत्री गजेंद्र यादव गुटबाजी और राजनीतिक खींचतान से ऊपर उठकर दुर्ग के लिए ठोस कार्य करेंगे।
दुर्ग की जनता चाहती है कि—
सड़कों और नालों की तत्काल मरम्मत हो,
अतिक्रमण पर कड़ी कार्रवाई की जाए,
स्वच्छता और प्रकाश व्यवस्था को प्राथमिकता मिले,
और जिला मुख्यालय के रूप में दुर्ग का विकास पूरे प्रदेश में मिसाल बने।
आज दुर्ग की जनता जिस अव्यवस्था और उपेक्षा से गुजर रही है, उससे निकलने का रास्ता केवल मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और संवेदनशील नेतृत्व ही दिखा सकता है। ऐसे में शहरवासियों की निगाहें एक बार फिर अपने विधायक और अब मंत्री बने गजेंद्र यादव पर टिकी हैं कि वे दुर्ग की तकदीर बदलने की दिशा में निर्णायक कदम उठाएँ।
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राजनीतिक समीकरण:दुर्ग महापौर चुनाव में विजय बघेल की भूमिका ने भाजपा की स्थानीय राजनीति में हलचल मचाई थी। महापौर पर सवाल खड़े होने से उनकी साख भी प्रभावित हो रही है। गजेंद्र यादव की सक्रियता अब भाजपा के भीतर संतुलन साधने में अहम साबित हो सकती है।
मुख्य चुनौतियाँ:
नगरीय निकाय में भ्रष्टाचार और अव्यवस्था पर अंकुश लगाना
सफाई व्यवस्था और जलभराव की स्थायी समस्या का समाधान
शहर में अवैध अतिक्रमण और यातायात अव्यवस्था पर सख्त कार्रवाई
जनता की उम्मीदों को जल्द ठोस कामों में बदलना
संभावनाएँ:यदि गजेंद्र यादव अपने मंत्री पद का प्रभाव शहर के विकास में दिखा पाते हैं तो वे न केवल दुर्ग बल्कि प्रदेश स्तर पर भी एक मजबूत नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर सकते हैं। वहीं, यदि अव्यवस्था जस की तस रही तो इसका सीधा राजनीतिक असर आगामी चुनावों पर पड़ सकता है।
बड़ेकनेरा के स्वास्थ्य केंद्र की एम्बुलेंस जून 2024 से सीएमएचओ दफ्तर में खड़ी, कागजों में फंसी जनसेवा
ग्रामीणों ने विधायक, कलेक्टर से लेकर सीएमएचओ तक लगाई गुहार, लेकिन ‘सुधार’ के नाम पर मिली सिर्फ तारीखें
स्वास्थ्य मंत्री के दावे हकीकत से कोसों दूर, मरीज अब भी खुद का ‘रोगी वाहन’ बनने को मजबूर
कोंडागांव / शौर्यपथ / एक तरफ प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल बड़े गर्व से कह रहे हैं कि “स्वास्थ्य सुविधाओं में तेजी से सुधार हो रहा है”, वहीं हकीकत यह है कि ग्राम पंचायत बड़ेकनेरा के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डेढ़ साल से एम्बुलेंस नाम की कोई चीज नहीं है।
2019-20 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय रूर्बन मिशन योजना के तहत बड़ेकनेरा को मिली एम्बुलेंस जून 2024 में आरटीओ, इंश्योरेंस और सर्विसिंग के नाम पर सीएमएचओ कार्यालय कोंडागांव में जमा कर दी गई। तब से अब तक यह "कागजों की गाड़ी" वहीं अटकी पड़ी है।
ग्रामीण और पंचायत प्रतिनिधि थक-हारकर कभी विधायक से, कभी सीएमएचओ से और कभी कलेक्टर से गुहार लगाते रहे, लेकिन फाइलें आगे बढ़ने की रफ्तार घोंघे की चाल से भी धीमी रही। आखिरकार बड़ेकनेरा के सरपंच प्रकाश चुरगियां और प्रतिनिधि मंडल ने सीएमएचओ कार्यालय पहुंचकर सीधे पूछा—
अगर आरटीओ, इंश्योरेंस और फिटनेस पूरी है तो एम्बुलेंस क्यों नहीं लौटा रहे?
अगर पूरी नहीं है तो जिम्मेदार कौन है?
और उन पर कार्रवाई कब होगी, जिन्होंने लोगों की जान के साथ खिलवाड़ किया?
प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाएं ‘तेजी से सुधार’ के दावे कर रही हैं, लेकिन कोंडागांव में यह ‘तेज रफ्तार’ इतनी धीमी हो गई कि डेढ़ साल में भी एक एम्बुलेंस बड़ेकनेरा वापस नहीं पहुंच पाई।
अब सवाल सीधा है—क्या यह स्वास्थ्य विभाग का सुधार है या लोगों की जान को भगवान भरोसे छोड़ देने की नई सरकारी नीति?
"लगता है स्वास्थ्य विभाग के लिए एम्बुलेंस भी ‘आपातकालीन’ नहीं, बस एक लंबी दूरी की सरकारी कहानी है—जिसका गंतव्य कभी आता ही नहीं!"
दुर्ग / शौर्यपथ विशेष
राजनीति में कुछ लोग आते हैं, पद पाते हैं और समय के साथ गुमनाम हो जाते हैं। लेकिन कुछ ऐसे होते हैं जो पद से नहीं, अपने कार्य से पहचाने जाते हैं। दुर्ग भाजपा के निर्वतमान जिलाध्यक्ष जितेंद्र वर्मा ऐसे ही नेता हैं, जिन्होंने संगठन को केवल चलाया नहीं, बल्कि उसमें नई ऊर्जा भर दी। आज, 10 अगस्त, उनका जन्मदिन है—और यह तारीख न केवल उनके जीवन का, बल्कि दुर्ग भाजपा के इतिहास का भी एक अहम दिन है।
जब चुनौती थी पहाड़ जैसी…
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का गृह जिला दुर्ग, और भाजपा की स्थिति—पांच विधानसभा में से एक भी सीट अपने पास नहीं। ऐसे कठिन समय में पार्टी ने पाटन के एक छोटे से गांव से उठाकर जितेंद्र वर्मा को दुर्ग जिले की कमान सौंपी। चुनौती केवल कांग्रेस को टक्कर देने की नहीं थी, बल्कि टूटे-बिखरे संगठन को एकजुट कर नई राह पर ले जाने की थी।
संगठन को दी नई दिशा, कार्यकर्ताओं में जगाई आग
जिला अध्यक्ष बनने के बाद जितेंद्र वर्मा ने हर गुट के कार्यकर्ताओं को बराबरी से महत्व दिया। अपने राजनीतिक गुरुओं के साथ जुड़े कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपी और "एक आवाज, एक लक्ष्य" का मंत्र दिया। परिणाम—सड़कों पर आंदोलन की कतारें लंबी हुईं, कार्यकर्ताओं में जोश लौटा, और दुर्ग भाजपा एकजुट होकर मैदान में उतरी।
विधानसभा में रचा जीत का इतिहास
उनकी रणनीति और नेतृत्व में हुए विधानसभा चुनावों में दुर्ग भाजपा ने चमत्कार कर दिखाया—
साजा से ईश्वर साहू
अहिवारा से डोमन लाल कोर्सेवाड़ा
दुर्ग ग्रामीण से ललित चंद्राकर
दुर्ग शहर से गजेंद्र यादव
इन नए चेहरों ने जीत दर्ज की, जबकि सांसद विजय बघेल ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को उनके गढ़ पाटन में बांधे रखा, जिससे अन्य सीटों पर भाजपा की जीत आसान हुई।
रिकॉर्ड सदस्यता और सामंजस्य की मिसाल
अपने कार्यकाल में जितेंद्र वर्मा ने संगठनात्मक स्तर पर नए आयाम गढ़े। हाल के सदस्यता अभियान में दुर्ग भाजपा ने पूरे प्रदेश में प्रथम स्थान प्राप्त किया। मंडल अध्यक्षों के चुनाव में जिस सामंजस्य और आपसी तालमेल का प्रदर्शन हुआ, वह कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया।
व्यक्तिगत कठिनाइयों में भी निभाई जिम्मेदारी
नगरीय निकाय चुनाव के दौरान जब उनके प्रिय पिताजी गंभीर रूप से बीमार थे और वे स्वयं स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे, तब भी उन्होंने चुनावी मैदान में डटे रहकर जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। नतीजा—निकाय चुनाव में दुर्ग भाजपा की चारों ओर जीत।
धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव
कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों के माध्यम से उन्होंने जिले की धार्मिक भावनाओं को एक सूत्र में पिरोया। इससे न केवल संगठन, बल्कि समाज के हर वर्ग में उनकी स्वीकार्यता बढ़ी।
एक मजबूत विरासत छोड़कर गए
5 जनवरी को नए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के साथ वे पद से मुक्त हुए, लेकिन वे संगठन को मजबूती, सामंजस्य और जीत की परंपरा का खजाना सौंप गए—एक ऐसी विरासत जिसे आने वाले वर्षों तक याद रखा जाएगा।
आज उनके जन्मदिन पर मित्र, संगठन के साथी और शुभचिंतक लगातार शुभकामनाएं दे रहे हैं। शौर्यपथ परिवार भी उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई और दीर्घायु की शुभकामनाएं देता है।
— शौर्यपथ विशेष संपादकीय टीम
दुर्ग। शौर्यपथ।
दुर्ग नगर पालिक निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल लगातार प्रशासनिक कसावट और सुशासन की दिशा में निर्णायक कदम उठा रहे हैं। उनके कई फैसले जहां पारदर्शिता और जिम्मेदारी की मिसाल पेश कर रहे हैं, वहीं कुछ निर्णय चर्चा का विषय भी बन रहे हैं। ऐसा ही एक ताज़ा मामला है—इंदिरा मार्केट सहित नगर के बाजार प्रबंधन की कमान एक बार फिर ईश्वर वर्मा को सौंपना।
पूर्व आयुक्त लोकेश चंद्राकर के कार्यकाल में भी ईश्वर वर्मा को बाजार प्रभारी बनाया गया था, लेकिन कुछ ही महीनों में उनके कार्यों में अनियमितताओं के आरोप लगने के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया था हालाँकि पद से हटाने का कारण प्रशासनिक व्यवस्तथा बताई गई किन्तु चंद महीनो में ही मूल पद में स्थानातरण चर्चा का विषय रहा । सूत्रों के अनुसार, उनके उस कार्यकाल में बाजार व्यवस्था में सुधार की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई। उनकी प्रमुख गतिविधि केवल पेंडिंग पड़ी नामांतरण एवं पंजीयन फाइलों को निपटाने तक सीमित रही, जबकि बाजार में दुकानों के मूल स्वरूप में बड़े पैमाने पर हुए बदलाव और बरामदों तक फैली दुकानदारी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इंदिरा मार्केट की स्थिति किसी से छिपी नहीं है—बरामदों को दुकानों में बदलना, सड़कों तक अतिक्रमण, और निगम अधीन दुकानों में बिना अनुमति संरचनात्मक परिवर्तन वर्षों से जारी हैं। सहायक राजस्व निरीक्षक के रूप में लंबे समय तक जिम्मेदारी संभालने वाले ईश्वर वर्मा ने इन मामलों में कार्रवाई की अनुशंसा तक नहीं की, जिससे उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
यही कारण था कि पूर्व आयुक्त लोकेश चंद्राकर ने उन्हें महज़ कुछ महीनों में ही प्रभार से मुक्त कर दिया था। अब, आयुक्त सुमित अग्रवाल ने एक बार फिर उनके ऊपर भरोसा जताते हुए उन्हें बाजार प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी है। प्रशासनिक मुखिया के रूप में सुमित अग्रवाल की छवि सख्त और सुशासनप्रिय अधिकारी की रही है, लेकिन इस नियुक्ति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह निर्णय बाजार व्यवस्था सुधारने में कारगर होगा या फिर अतीत की गलतियां दोहराई जाएंगी।
जनता की निगाह अब ईश्वर वर्मा पर है—क्या वे उन दुकानदारों पर कार्रवाई करेंगे जिन्होंने अपने मूल स्वरूप को बदला और बरामदों तक कब्जा जमाया? क्या वे न्यू जनता बूट हाउस, बजाज बूट हाउस जैसे बड़े नामों के खिलाफ भी सख्त कदम उठाएंगे, या फिर बाजार विभाग की कुर्सी एक बार फिर "मौन स्वीकृति" की गवाही देगी?
दुर्ग के नागरिक यह देखने को आतुर हैं कि क्या ईश्वर वर्मा इस बार आयुक्त सुमित अग्रवाल के भरोसे पर खरे उतरेंगे और बिगड़ी बाजार व्यवस्था को पटरी पर लाएंगे, या फिर बाजार की सूरत सुधारने का सपना फिर अधूरा रह जाएगा।
विशेष आलेख
बिलासपुर के सांसद-नेता और अनुभवी वकील अरुण साव का राजनीतिक उत्थान, 9 अगस्त 2022 के नेतृत्व वितरण से नवम्बर 2023 में उपमुख्यमंत्री बनने तक का क्रम — एक ऐसा अध्याय जो उनके समर्थकों और प्रदेश की राजनीति दोनों के लिए निर्णायक साबित हुआ।
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव (जन्म: 25 नवम्बर 1968) का राजनीतिक और वैधानिक सफर पारंपरिक पृष्ठभूमि से निकलकर राज्य के उच्चतम राजनीतिक मंच तक पहुंचने का प्रेरक अंकन है। रायपुर में जन्मे अरुण साव किसान परिवार से आते हैं; उनके पिता स्वर्गीय श्री अभय राम साव और माता श्रीमती प्रमिला साव हैं। उन्होंने 17 अप्रैल 2000 को श्रीमती मीना साव से विवाह किया और उनका एक पुत्र है। शिक्षा की दृष्टि से उन्होंने मुंगेली के शासकीय एस.एन.जी. कॉलेज से बी.कॉम. और बिलासपुर के कौशलेन्द्र राव लॉ कॉलेज से एल.एल.बी. की डिग्री हासिल की।
विधिक जीवन में अरुण साव ने मुंगेली सिविल कोर्ट में प्रैक्टिस से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में बिलासपुर उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्य करते हुए राज्य की सेवा में भी गहन भूमिका निभाई। उनकी सरकारी सेवा-भूमिका इस प्रकार रही: मार्च 2005 से फरवरी 2006 तक उप शासकीय अधिवक्ता, मार्च 2006 से अगस्त 2013 तक शासकीय अधिवक्ता, और सितम्बर 2013 से जनवरी 2018 तक छत्तीसगढ़ के उप महाधिवक्ता के रूप में उन्होंने दायित्व निभाये — एक ऐसा क्रम जो उन्हें विधिक विशेषज्ञता के साथ प्रशासनिक अनुभव भी देता है।
सामाजिक और छात्र-जीवन में वे 1990 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद व अन्य संगठनों से सक्रिय रहे, तथा साहू समाज के तहसील, जिला और प्रादेशिक स्तर पर विभिन्न जिम्मेदारियाँ निभाईं। खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति उनकी रुचि—कबड्डी, वॉलीबाल, क्रिकेट और बैडमिंटन—उन्हें जमीनी स्तर से जोड़ती है और संगठनात्मक क्षमता के विकास में मदद करती है।
राजनीतिक रूप से अरुण साव का बड़ा पड़ाव 2019 में आया जब वे बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। 17वीं लोकसभा में वे कोयला व खान मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति तथा कोयला और इस्पात संबंधी स्थायी समिति के सदस्य रहे — जिनसे उनके संसदीय अनुभव और क्षेत्रीय उद्योगों के साथ जुड़ाव को मजबूती मिली।
उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ था 9 अगस्त 2022 — जिस दिन उन्हें भारतीय जनता पार्टी, छत्तीसगढ़ का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उस समय प्रदेश में सत्तारूढ़ सरकार के बावजूद संगठनात्मक मजबूती और विरोधी राजनीति को संगठित करने की जिम्मेदारी अरुण साव के हाथों सौंपी गई। भाजपा संगठन ने 9 अगस्त 2022 के बाद संगठनात्मक पुनर्रचना और सक्रियता बढ़ाकर लगभग चौदह माह के भीतर वह राजनीतिक माहौल तैयार कर दिया, जिसका फल नवम्बर 2023 में भाजपा की प्रदेश में सत्ता वापसी के रूप में सामने आया। परिणामस्वरूप राज्य सरकार बनने पर अरुण साव को उपमुख्यमंत्री का महत्त्वपूर्ण पद भी सोंपा गया — एक पद जिसे वे अपने व्यापक संगठनात्मक और विधिक अनुभव के साथ निभा रहे हैं।
9 अगस्त 2022 का सोशल मीडिया संदेश और नियुक्ति पत्र
उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने इस दिन को अपने जीवन का अहम मोड़ मानते हुए अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा—
"आज के ही दिन 9 अगस्त 2022 को भारतीय जनता पार्टी केंद्रीय नेतृत्व ने मुझे जैसे सामान्य कार्यकर्ता को छत्तीसगढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की कमान संभालने का अवसर दिया था।
पूरे प्रदेश का दौरा कर, बूथ से लेकर प्रदेश स्तर के कार्यकर्ताओं को उनकी शक्ति का अहसास दिलाया और प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं और साथी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर हमने कांग्रेस सरकार के भ्रष्ट किले को ढहा दिया।
और 14 माह के सामूहिक परिश्रम और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की मोदी की गारंटी की आधार पर प्रदेश की जनता ने भाजपा की सुशासन सरकार को चुना।"
इसके साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह द्वारा जारी आधिकारिक नियुक्ति पत्र भी साझा किया, जिसमें 9 अगस्त 2022 से प्रभावी रूप से उन्हें छत्तीसगढ़ भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
आलेख - शरद पंसारी
संपादक - दैनिक समाचार
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
