July 31, 2026
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    बंगाल चुनाव 2026 के बाद बड़ा घटनाक्रम : SIR ट्रिब्यूनल से पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणनम का इस्तीफा, उठे कई संवैधानिक सवाल

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    कोलकाता/शौर्यपथ।

    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों और चुनाव बाद उभरे राजनीतिक तनाव के बीच एक बड़ा संवैधानिक घटनाक्रम सामने आया है। कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टीएस शिवगणनम ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) अपीलीय ट्रिब्यूनल के पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने त्यागपत्र में “व्यक्तिगत कारणों” का उल्लेख किया है, लेकिन इस्तीफे के समय और पृष्ठभूमि ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    क्या था SIR ट्रिब्यूनल का उद्देश्य?

    SIR यानी Special Intensive Revision प्रक्रिया के तहत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण किया गया था। इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। जिन लोगों ने इस कार्रवाई को चुनौती दी, उनकी अपील सुनने के लिए एक विशेष अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किया गया था, जिसकी जिम्मेदारी जस्टिस शिवगणनम संभाल रहे थे।

    90 लाख नाम हटने का दावा, 27 लाख अपीलें

    सूत्रों और चुनावी बहसों में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, SIR प्रक्रिया के दौरान 90 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची से हटाए गए, जबकि लगभग 27 लाख लोगों ने इस निर्णय के खिलाफ अपील दाखिल की। विपक्षी दलों ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर बड़ा प्रहार बताते हुए प्रक्रिया की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठाए थे।

    “चार साल लग जाएंगे” — काम के बोझ पर जताई थी चिंता

    इस्तीफे से पहले जस्टिस शिवगणनम ने कथित रूप से यह चिंता व्यक्त की थी कि जिस गति और तरीके से अपीलों की जांच हो रही है, उस हिसाब से केवल कोलकाता क्षेत्र की अपीलों को निपटाने में ही लगभग चार वर्ष लग सकते हैं। इससे यह संकेत मिला कि ट्रिब्यूनल के सामने मामलों का अत्यधिक बोझ था और पूरी प्रक्रिया प्रशासनिक तथा कानूनी चुनौती बन चुकी थी।

    चुनाव बाद हिंसा के बीच आया इस्तीफा

    यह इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणामों के बाद कई जिलों से हिंसा, राजनीतिक झड़पों और तनाव की खबरें आ रही हैं। ऐसे संवेदनशील माहौल में एक वरिष्ठ न्यायिक व्यक्ति का इस्तीफा राजनीतिक और संवैधानिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

    विपक्ष ने उठाए नए सवाल

    विपक्षी दलों का कहना है कि यह इस्तीफा केवल “व्यक्तिगत कारणों” तक सीमित नहीं माना जा सकता। विपक्ष का आरोप है कि यदि लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित हैं और ट्रिब्यूनल प्रमुख स्वयं प्रक्रिया की गति पर सवाल उठा चुके हैं, तो इससे पूरी SIR प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

    कई सामाजिक संगठनों और चुनावी अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी मांग की है कि मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया और अपील निपटान की संपूर्ण व्यवस्था की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए।

    लोकतंत्र और मताधिकार पर बहस तेज

    विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटना और उसके बाद अपीलों का वर्षों तक लंबित रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकता है। चुनावी पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही और नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा को लेकर अब बहस और तेज होने की संभावना है।

    फिलहाल जस्टिस टीएस शिवगणनम के इस्तीफे ने बंगाल की चुनावी राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है, जिसके दूरगामी राजनीतिक और संवैधानिक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।

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