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धर्म संसार / शौर्यपथ /विश्व की अमूल्य धरोहर श्रीमद् भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक भाग है। महाभारत की रचना महर्षि वेदव्यास ने और लेखन भगवान श्री गणेश ने किया।
युद्ध के समय जब सेनाएं आमने-सामने खड़ी हो गईं ....तो अर्जुन के विषाद को दूर करने के लिए योगेश्वर श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया जो आज भी व्यवहारिक जीवन की समस्याओं के लिए समाधानकारक है।
१. साहसी होना
क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।
(अध्याय 2, श्लोक 3)
कायरता, कायरता है। चाहे वह करुणाजनित हो, या भय जनित। अत: अपने स्वत्व और अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। अन्याय का सदैव प्रतिकार करना चाहिए और पलायन नहीं पुरुषार्थ का चयन करना चाहिए।
२. कर्मठ होना
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
माकर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संड्गोत्स्वकर्माणि।।
(अध्याय 2, श्लोक 47)
केवल मनुष्य को ही यह सौभाग्य प्राप्त है कि वह नए कर्म करने के लिए स्वतंत्र है। जिससे उन्नति के शिखर पर आरूढ़ होकर उपलब्धियों के कीर्तिमान रचकर इतिहास में अद्वितीय स्थान प्राप्त कर सकता है। अत: अकर्मण्य नहीं, कर्मठता से कार्य करते रहना चाहिए।
३. स्वविवेक से निर्णय लेना
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैमदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।
(अध्याय 18, श्लोक 6३)
सलाह और विचार-विमर्श तथा मार्गदर्शन भले ही सबसे लेते रहें, लेकिन निर्णय स्वयं की
बुद्धि से लेना चाहिए। श्री कृष्ण ने अर्जुन को पूरा ज्ञान देने के बावजूद यह स्वतंत्रता दी थी कि वह स्वविवेक से निर्णय ले और कार्य करे। पराश्रित नहीं, स्वआश्रित होने का आह्वान कर व्यक्ति को स्वावलंबी एवं आत्मनिर्भर बनने का संदेश दिया है।
४. मधुर और हितकर वाणी
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्भ्यसनं चैव वांगमयं तप उच्यते।।
(अध्याय 17, श्लोक 15)
तप तीन प्रकार के बताए गए है- शरीर, वाणी और मन। तीनों का उपयोग लोकहित में करना चाहिए। वाणी मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र है। इससे व्यक्ति सारे संसार को अपना मित्र बना सकता है या शत्रु बना सकता है। अत: बोली की महत्ता, शब्दों का प्रभाव और वाणी को नियंत्रित और मर्यादित रखें।
५. दुर्गुणों का त्याग करना
दंभो दर्पोभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदामासुरीम्।।
(अध्याय 16, श्लोक 4)
पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान- इनसे मनुष्य को दूर रहना चाहिए। सदगुणों को अपने जीवन में उतारना चाहिए जिससे जीवन में परम शांति का अनुभव होता है।
६. ज्ञान पिपासु और जिज्ञासु होना
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिन: ।।
(अध्याय 4, श्लोक 34)
सच्चा ज्ञान आसानी से नहीं मिलता क्योंकि केवल सूचनाओं को पढ़ कर ज्ञानी नहीं बना जा सकता। इसके लिए विशेषज्ञों के पास तथा विधा पारंगतों के पास विनम्रता और श्रद्धापूर्वक हमें जाना चाहिए। तभी सही लक्ष्य एवं वास्तविक शिखर स्पष्ट दिखाई देने लगेगा।
नहि ज्ञानेने सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
(अध्याय 4, श्लोक 38)
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला दूसरा कोई साधन नहीं है।
श्रद्धावॉंल्लभते ज्ञानं... (अध्याय 4, श्लोक 39)
ज्ञान के प्रति जिज्ञासा होगी तभी ज्ञान प्राप्त होगा।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति। (अध्याय 4, श्लोक 39)
क्योंकि शांति साधनों से नहीं ज्ञान से प्राप्त होती है।
७. व्यवहारिक ज्ञान में कुशल
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्म्यहम्।।
(अध्याय 4, श्लोक 11)
मनुष्य को व्यवहार करते समय बहुत सावधान रहना चाहिए क्योंकि जैसा व्यवहार करोगे, वैसा ही तुम्हारे साथ भी होगा।
८. निर्भय होना
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चय:।।
(अध्याय 2, श्लोक 37)
निर्भीक होकर कर्म करने से असफलता भी कीर्ति
यश और मान दिलाती है। भयग्रस्त मन-मस्तिष्क से किए कए काम में सफलता मिल भी जाए तो वह सम्मानीय, वंदनीय नहीं हो सकती।
९. व्यक्तित्व का विकास
दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह:।
वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते।।
(अध्याय 2, श्लोक 56)
आदर्श व्यक्तित्व वाला व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में विचलित नहीं होता। राग, भय, क्रोध- जब समाप्त हो जाते हैं तो व्यक्ति स्थिर बुद्धि वाला हो जाता है। तथा वह संकट और संतापों से प्रतिकूलता और अनुकूलता में संतुलन बनाए रखेगा।
१०. स्वयं के प्रति उत्तरदायी
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:।।
(अध्याय 6, श्लोक 5)
अपने उत्कर्ष एवं अपकर्ष के लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी होता है। दूसरे का अहित किए बिना स्वयं का उद्धार अपने प्रयत्न और बुद्धि बल से करना चाहिए। क्योंकि मनुष्य आप ही अपना मित्र और आप ही अपना शत्रु है।
११. वफादारी से कार्य करना
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
(अध्याय 9, श्लोक 22)
यह एक व्यवहारिक सत्य है। जो व्यक्ति अपने स्वामि की कृपा का चिंतन करते हुए पूरी ईमानदारी और निष्ठा से काम करता है उसे स्वामि का पूर्ण संरक्षण मिलता है और स्वामि सदैव उसकी सुख-सुविधा का ध्यान रखता है।
१२. एकाग्रचित्त कार्य करना
असंशयं महाबाहो मनोदुर्निग्रहं चलम्।
अभ्याभ्सेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।
(अध्याय 6, श्लोक 35)
किसी भी संकल्प को पूरा करने के लिए मन का स्थिर और अचल होना आवश्यक है। उद्देश्य प्राप्ति के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए। मन को बार बार अन्य बिंदुओं से हटाकर अपने लक्ष्य पर केंद्रित करने की प्रक्रिया को दोहराते रहना चाहिए। इस प्रक्रिया का चमत्कारिक प्रभाव देखने को मिलता है। और कार्य तल्लीनता से संपन्न होता है। इसलिए लक्ष्य के प्रति रुचि जागरुक करना चाहिए।
१३. तनाव रहित रहें
अश्योच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता:।।
(अध्याय 2, श्लोक 11)
आगत-विगत कि चिंता से मुक्त होकर कर्मपथ पर आगे बढ़ते जाना चाहिए। घटनाएं प्रकृति के घटनाक्रम की कड़ी हैं और वे समयानुसार घटती रहती हैं। अनावश्यक चिंताओं में उलझना जीवन के अमूल्य समय को नष्ट करना है। इसलिए तनाव रहित होकर अपना कर्म करते जाना चाहिए।
१४. प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व:।
परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ।।
(अध्याय 3, श्लोक 11)
पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्रि, वनस्पति आदि जीवन के आधार स्तंभ हैं। इनके बिना जीवन संभव नहीं। और हमारी संस्कृति में इन्हें देवता माना गया है। सृष्टि में साम्य बनाए रखने के लिए जीवन, जगत एवं प्रकृति में साम्य जरूरी है। इसलिए प्रकृति का सम्मान करो और पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त करो।
१५. स्वकर्म को प्राथमिकता
स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।
(अध्याय 18, श्लोक 45)
दूसरे का कर्म यदि अपने कर्म से श्रेष्ठ भी प्रतीत हो तो भी अपना कर्म त्याग कर उसे अपनाने के लिए आतुर नहीं होना चाहिए। अपने कर्म में प्रवीणता हासिल कर के उसी में अपनी पहचान बनानी चाहिए। स्वकर्म को करते हुए ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है।
१६. संचयवृत्ति का त्याग
यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।
(अध्याय 3, श्लोक 13)
जीवन में परोपकार और समाज कल्याण का व्रत भी लेना चाहिए क्योंकि मनुष्य जो भी अर्जित करता है उसमें समाज का योगदान होता है। इसलिए समाज का भी उसपर अधिकार है। इसलिए उसका कुछ अंश समाजसेवा में भी लगाया जाना चाहिए। यह एक आदर्श समाजवाद का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
१७. राग-द्वेष रहित जीवन
अद्वेष्टा सर्वभूतानां (अध्याय 12, श्लोक 13)
किसी भी प्राणी से राग-द्वेष न रखें
निर्वैर: सर्वभूतेषु (अध्याय 11, श्लोक 55)
बैर-भाव रहित होकर रहो
सर्वभूतहितेरता: (अध्याय 5, श्लोक 25)
सभी प्राणियों का कल्याण करो
ये तीनों सूत्र तीन महा मंत्र हैं। जिनके आचरण करने से व्यक्ति और समाज शांत और सुखी रहेगा। क्योंकि बैर-भाव, राग-द्वेष सारे झगड़े-फसाद की जड़ है।
१८. कठोर प्रभावी नीति से प्रतिद्वंद्वता का सामना
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युभ्त्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्म्यहम्।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
(अध्याय 4, श्लोक 7,8)
दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं- सज्जन और दुर्जन। जब तक सज्जन जागरुक और सक्रीय होते हैं तब दुष्ट अपनी दुष्ट प्रवृतियों से समाज को त्रस्त नहीं कर पाते। लेकिन सज्जनों की थोड़ी सी निष्क्रीयता और उदासीनता दुष्टों का प्रभाव बढ़ाने लगती है। फिर सज्जन बचाव का मार्ग अपनाने लगते हैं और हताश और निराश होकर सदकार्यों को छोड़ समाज को दुष्टों के भरोसे छोड़ देते हैं। दुष्टों पर नियंत्रण रखने और अपना कार्य जारी रखने के लिए कठोर और प्रभावी नीति अपनानी चाहिए।
१९. स्वस्थ तन, स्वस्थ मन
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्त स्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा।।
(अध्याय 6, श्लोक 17)
जीवन में प्रगति के लिए मन-मस्तिष्क के साथ साथ तन का स्वस्थ रहना भी जरूरी है। कोई भी कार्य शरीर के द्वारा किया जाता है। यदि शरीर अस्वस्थ है तो वह कभी भी कोई कार्य नहीं कर पाएगा। अत: शरीर साधना बेहद जरूरी है।
२०. कर्म और लोक कल्याण में समन्वय
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मनुस्मर युद्ध च।
(अध्याय 8, श्लोक 7)
जीवन में यदि सफलता चाहते हैं तो कर्म और लोक कल्याण में समन्वय जरूरी है। तभी जीवन का समग्र विकास हो पाएगा। दोनों में से यदि कोई एक ही कार्य करते रहें या तो लोक कल्याण या कर्म , तो दोनों ही स्थितियां कभी भी आदर्श नहीं मानी जाती । इसलिए इनमें सामन्जस्य होना जरूरी है।
२१. चारित्रिक बल से आदर्श नेतृत्व
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
(अध्याय 3, श्लोक 21)
कोई भी राष्ट्र केवल आर्थिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रकृति से उन्नत नहीं हो जाता। जब तक कि वह आध्यात्मिक एवं नैतिक रूप से सबल नहीं हो उसकी प्रगति अधूरी है। वर्तमान में भारत के पास सब कुछ है परंतु धीरे-धीरे नैतिक और चारित्रिक बल की कमी हमें महसूस होने लगी है। अत: चरित्रवान बनकर आदर्श नेतृत्व प्रदान करना होगा, क्योंकि जो श्रेष्ठ पुरुष आचरण करते हैं लोग भी उनका अनुसरण करते हैं। अपने आचरण से ऐसे मूल्य स्थापित करने चाहिए जिनसे अन्य लोग प्रेरणा ले सकें।
आपका जीवन मंगलमय हो।
दुर्ग / शौर्यपथ / शनिवार का दिन दमोदा बोरई निवासी शंकरलाल साहू के लिए काला दिन साबित हो गया . एक दुर्घटना में साहू की धर्म पत्नी झामवती साहू उम्र ५८ वर्ष की मौत हो गयी वही पुत्र की भी जान जाते जाते बची .
मामला महमरा एनिकट का है जहां यह दुर्घटना घटित हुई . प्राप्त जानकारी के अनुसार मृतिका झामवती साहू ( नर्स स्वास्थ्य विभाग - नागपुर स्वास्थ्य केंद्र ) पुत्र तेज प्रकाश साहू के साथ जिला अस्पताल दुर्ग से अपने घर अपने निजी वाहन इंडिका cg/08 - 1486 से बोरई लौट रही थी तभी कार अनियंत्नरित होकर महमरा एनिकट पर नदी में गिर गयी . खबर की सुचना मिलते ही पुलगांव थाना हरकत में आई और आस पास के लोगो की मदद से झामवती साहू एवं तेज प्रकाश साहू को जिला अस्पाताल ले जाया गया .जहां चिकित्सक ने माँ को मृत घोषित किया और पुत्र तेज प्रकाश साहू को प्राथमिक उपचार बाद छुट्टी दे दी गयी .
पुलिस की सतर्कता से दूसरा हादसा होते होते बचा ..
पुलगांव पुलिस द्वारा दुर्घटना ग्रस्त वाहन को निकलने के लिए करें बुलवाया गया . करें द्वारा जब वाहन को निकाला जा रहा था तभी निकलते वक्त करें नदी में गिरते गिरते बची . पुलिस की सतर्कता का ही नतीजा है कि एक घटना के तुरंत बद हुई इस दूसरी घटना में कोई जान माल की हानि नहीं हुई जबकि दुर्घटना ग्रस्त वाहन को निकलते हुए देखने के लिए लोगो का हुजूम लगा हुआ था . साधुवाद उस सिपाही का जिसका ध्यान करें के झुकने की और गया और सभी को सावधान किया गया . एक पल की देरी भी एक बड़े घटना को अंजाम दे सकती थी .
दुर्ग / शौर्यपथ / शनिवार का दिन दमोदा बोरई निवासी शंकरलाल साहू के लिए काला दिन साबित हो गया . एक दुर्घटना में साहू की धर्म पत्नी झामवती साहू उम्र ५८ वर्ष की मौत हो गयी वही पुत्र की भी जान जाते जाते बची .
मामला महमरा एनिकट का है जहां यह दुर्घटना घटित हुई . प्राप्त जानकारी के अनुसार मृतिका झामवती साहू ( नर्स स्वास्थ्य विभाग - नागपुर स्वास्थ्य केंद्र ) पुत्र तेज प्रकाश साहू के साथ जिला अस्पताल दुर्ग से अपने घर अपने निजी वाहन इंडिका cg/08 - 1486 से बोरई लौट रही थी तभी कार अनियंत्नरित होकर महमरा एनिकट पर नदी में गिर गयी . खबर की सुचना मिलते ही पुलगांव थाना हरकत में आई और आस पास के लोगो की मदद से झामवती साहू एवं तेज प्रकाश साहू को जिला अस्पाताल ले जाया गया .जहां चिकित्सक ने माँ को मृत घोषित किया और पुत्र तेज प्रकाश साहू को प्राथमिक उपचार बाद छुट्टी दे दी गयी .
पुलिस की सतर्कता से दूसरा हादसा होते होते बचा ..
पुलगांव पुलिस द्वारा दुर्घटना ग्रस्त वाहन को निकलने के लिए करें बुलवाया गया . करें द्वारा जब वाहन को निकाला जा रहा था तभी निकलते वक्त करें नदी में गिरते गिरते बची . पुलिस की सतर्कता का ही नतीजा है कि एक घटना के तुरंत बद हुई इस दूसरी घटना में कोई जान माल की हानि नहीं हुई जबकि दुर्घटना ग्रस्त वाहन को निकलते हुए देखने के लिए लोगो का हुजूम लगा हुआ था . साधुवाद उस सिपाही का जिसका ध्यान करें के झुकने की और गया और सभी को सावधान किया गया . एक पल की देरी भी एक बड़े घटना को अंजाम दे सकती थी .
खेल / शौर्यपथ / गृह मंत्रालय द्वारा शनिवार (30 मई) को नए दिशानिर्देश जारी किए गए। लॉकडाउन 4-0 आज यानी (31 मई) को खत्म हो रहा है। पिछले दो महीने से भी अधिक समय से लागू लॉकडाउन को अब अनलॉक किया जा रहा है। ऐसे में बीसीसीआई को उम्मीद है कि इस साल आईपीएल के आयोजन की योजना को पूरा किया जा सकता है। देश में लॉकडाउन खत्म करने का काम तीन चरणों में पूरा होगा। 8 जून से शुरू होने वाले पहले चरण को अनलॉक 1 नाम दिया गया है। इसमें जिसमें रेस्टोरेंट, होटल, मॉल, शॉपिंग सेंटर और धार्मिक स्थलों को खोलने की बात कही गई है।
गृह मंत्रालय के इस नए दिशा निर्देश में खेलों से जुड़ी रियायतें भी शामिल हैं। इसके मुताबिक, ''स्थिति के आकलन के आधार पर (चरण 3) में अंतरराष्ट्रीय यात्राओं को फिर से शुरू करने की तारीखें तय की जाएंगी। इसके साथ ही जिम, स्विमिंग पूल, सामाजिक / राजनीतिक / खेल / मनोरंजन कार्यों और बड़े आयोजनों को लेकर भी फैसले लिए जाएंगे।''
अनलॉक का दूसरा चरण जुलाई में शुरू होगा और बाद तीसरे चरण का अनलॉक कभी भी हो सकता है। ऐसे में आईपीएल और क्रिकेट के भविष्य पर बात करते हुए बीसीसीआई के कोषाध्यक्ष अरुण धूमल ने कहा, ''यह सकारात्मक कदम है। यदि अंतर्राष्ट्रीय यात्रा फिर से शुरू होती है और खेल गतिविधियों को अनुमति दी जाएगी तो हम भविष्य के लिए योजना बना सकते हैं।''
बीसीसीआई ने कुछ वक्त पहले कहा था कि वह मानसून खत्म होने तक आईपीएल का आयोजन करने पर विचार करने की स्थिति में नहीं है। इस टूर्नामेंट के सितंबर के अंत से पहले होने की संभावना नहीं है। फिर से अक्टूबर-नवंबर के लिए ऑस्ट्रेलिया में होने वाले टी- 20 विश्व कप पर आईपीएल के भाग्य को छोड़ दिया जाएगा। अगर टी-20 वर्ल्ड कप स्थगित होता है तो उन विंडो के बारे में कुछ तय किया जा सकता है। वहीं, आईसीसी ने टी-20 वर्ल्ड कप का फैसला 10 जून तक टाल दिया है।
खिलाड़ियों के लिए एक राष्ट्रीय शिविर का आयोजन करके उन्हें फिटनेस के स्तर पर लौटने में मदद मिलेगी। टीम इंडिया के बॉलिंग कोच भरत अरुण ने हाल ही में कहा था कि खिलाड़ियों को वापस लौटने में 6 से 8 हफ्तों का वक्त लगेगा। इसके साथ ही प्रैक्टिस गेम भी होंगे तभी वे दोबारा फिट होकर खेल पाएंगे।
अरुण धूमल ने कहा, ''जहां तक एक कैंप के लिए एक साथ खिलाड़ियों के इकट्ठा होने की बात है तो फिर से हमें चीजों को और सामान्य करने के लिए इंतजार करना होगा। फिलहाल अभी हम राज्य सरकारों की सलाह के आधार पर व्यक्तिगत लेवल पर खिलाड़ियों के अपने शहरों में सुविधाओं में काम कर रहे हैं।''
बीसीसीआई के कई अनुबंधित क्रिकेटरों को अभी घर के पास प्रैक्टिस के लिए लाइनअप नहीं किया गया है। मुंबई के बाहरी इलाके पालघर में रहने वाले सीमर शार्दुल ठाकुर की नेट प्रैक्टिस पर भी रोक लगा दी गई थी। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली, टेस्ट उप कप्तान अजिंक्य रहाणे और सीमित ओवरों के उप कप्तान रोहित शर्मा मुंबई में अपने घरों में फंसे हुए हैं। बता दें कि मुंबई देश के वायरस प्रभावित क्षेत्रों में नंबर एक पर है।
भारतीय बोर्ड की संचालन टीम सुरक्षित वातावरण में प्रशिक्षण को फिर से शुरू करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने की प्रक्रिया में है, जिसे सभी राज्य संघों को भेजा जाएगा।
मनोरंजन / शौर्यपथ/ सैफ अली खान और अमृता सिंह की बेटी सारा अली खान ने अभी तक 3 फिल्में की हैं और 3 फिल्मों से ही उन्होंने फैन्स के दिल में खास जगह बना ली है। बता दें कि सारा हर मुद्दे पर खुलकर बात करती हैं। कुछ दिनों पहले एक इंटरव्यू के दौरान अपने मम्मी-पापा के रिलेशन और पिता सैफ के साथ अपनी बॉन्डिंग पर बात की थी। सारा का यह इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
सारा ने अमृता और सैफ के बारे में कहा था, 'एक घर में एक दूसरे से नाखुश होकर रहने से अच्छा है कि आप अलग हो जाएं'। सारा ने कहा था कि तलाक के बाद दोनों अपनी-अपनी लाइफ में खुश हैं।
सारा से जब पूछा गया कि वह अपने पिता के साथ क्यों नहीं रहती हैं तो उन्होंने कहा था, 'मेरी मां ने मुझे बचपन से पाला है। इब्राहिम के होने के बाद से उन्होंने अपना पूरा समय हम दोनों को दे दिया था। मुझे किसी चीज की कोई कमी नहीं है। जब हम पापा से मिलते हैं तो उनके साथ भी अच्छा टाइम स्पेंड करते हैं।'
सारा ने कहा था, 'भले ही हम पापा के साथ नहीं रहते, लेकिन वह हमारी बहुत केयर करते हैं। ऐसा लगता ही नहीं कि वह हमसे दूर रहते हैं। एक फोन कॉल और वह हमारे पास होते हैं।'
बता दें कि एक इंटरव्यू में सारा ने सैफ और तैमूर की बॉन्डिंग को लेकर कहा था, 'अच्छा लगता है जब पापा तैमूर के साथ एंजॉय करते हैं। तैमूर के साथ वह फादरहुड अच्छे से एंजॉय करते हैं। तैमूर उनकी लाइफ में खुशियां लेकर आया है।'
मनोरंजन/ शौर्यपथ / रामायण में लक्ष्मण का किरदार निभा चुके सुनील लहरी इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते हैं। वह रामायण की शूटिंग के वक्त के कुछ मजेदार किस्से फैन्स से शेयर करते रहते हैं। अब सुनील ने उस सीन के बारे में बताया जिसमें हनुमान जी, श्रीराम और लक्ष्मण को कंधे पर बिठाकर ले जाते हैं।
सुनील ने बताया कि उस सीन को नीले पर्दे, नीले टेबल और एक रैंप की मदद से शूट किया था। सुनील ने कहा, जब हनुमान जी, राम और लक्ष्मण को कंधे पर बिठाकर ले जाते हैं, उस सीन को शूट करना बहुत ही ट्रिकी और टेक्निकल था। हमें उसके लिए स्पेशल इफेक्ट्स की जरूरत थी। उस वक्त स्पेशल इफेक्ट्स के लिए जो साधन था वो सिर्फ क्रोमा था। क्रोमा के लिए ब्लू कलर के 2 स्टूल लगाए गए और फिर उन्हें ब्लू कलर के कपड़े से ही कवर किया। बैकग्राउंड भी पूरा ब्लू कर दिया गया था।
सुनील ने कहा, 'हनुमान जी के जो हाथ थे, जिस पर चढ़कर हमें जाना था। उसके लिए रैंप जैसा बनाया गया। रैंप पर चढ़कर हम चढ़ रहे थे तो ऐसा लगता था जैसे हनुमान जी के हाथ के ऊपर ही चढ़कर जा रहे हैं। हनुमान जी के हाथ में एक कड़ा भी था और सीन के मुताबिक हमें उसे पार करना था और वह हमारे मुकाबले बहुत बड़ा दिखना था। तो हमें यह सब इमेजिन करके चलना था।'
सुनील ने आगे बताया, जब हम दोनों हनुमान जी के कंधे पर बैठे होते हैं तो हमें समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है और आगे क्या करना है। हम वही कर रहे थे जो रामानंद सागर साहब हमें कह रहे थे। वह कहते कि हनुमान जी की तरफ देखो तो हम उनकी तरफ देखते। लेकिन जब रिजल्ट देखा तो बहुत अच्छा लगा।'
मेरी कहानी / शौर्यपथ / तब मनोरंजन के चंद मौके मिलते थे। या तो कोई संगीत-नाट्य की छोटी-बड़ी मंडली इलाके से गुजरती थी या फिर स्थानीय मेले में डेरा डाल धूम मचाती थी। मेले का कोलाहल सबको खींच लाता और वह लड़का भी चला आता था। उसके दिलो-दिमाग पर संगीत का जुनून सवार था। सब मेले से लौटते, तो सामान, पकवान की चर्चा करते, पर यह लड़का संगीत में डूबा लौटता। मेला धीरे-धीरे पीछे छूटता जाता, कान उसकी आवाजों से दूर निकल आते, लेकिन दिल में संगीत बजता रहता और रूह तबले की थाप-ताल पर सिमट आती थी। ज्यादातर मंडलियां कहरवे में रहती थीं। लगभग आधे गाने तबले की इस ताल पर सजते थे- धा गे न ति न क धि ना, धा गे न...। और कुछ गीत दादरे में खिलते थे- धा धि ना धा ति ना, धा धि ना...। कभी आधे गले से, तो कभी पूरे गले से गीत गूंजते, लेकिन उस लड़के के मन में सिर्फ तबला रह जाता था। ताल से ताल तक का सिलसिला ऐसे बना रहता, मानो सांसों का सिलसिला।
जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले के घगवाल गांव में संगीत सुनने का शौक तो बहुतों को था, पर कोई भी उस लड़के जैसा जुनूनी चहेता नहीं हुआ था। गरीब परिवार में खूब सदस्य थे। हर मां-बाप के कुछ सपने होते हैं, तो उस लड़के के भी मां-बाप का सपना था, बेटा कुछ बड़ा होकर सेना में बहाल हो जाए। एक तरफ मां-बाप का सपना और दूसरी ओर तबला। सपना हावी होता, तो तबला गोल होता नजर आता। तबला हावी होता, तो सपना देखने वाले नाराज हो जाते। महज 12-13 की उम्र थी, पर समझ में आ गई थी कि तबला ताल में मुकम्मल बज गया, तो सपना देखने वाले भी नरम पड़ जाएंगे। यह भी तय था कि तबला छोड़ो, तो अपना दिल तोड़ो। छोटी उम्र में ही उसके दिमाग में जिरह-दलील के दौर चलते। गांव में ही किसी तरह तबले से संगत शुरू हुई, पर पूरा सीखना था।
लड़के ने सुन रखा था कि पंजाबी घराने के कोई नामी उस्ताद हैं लाहौर में, मियां कादिर बक्श। क्यों न उन्हीं से सीखा जाए? उस लड़के को सपने में एक संतनुमा शख्स बार-बार दिखते थे। एक बार उस्ताद कादिर बक्श की छपी हुई तस्वीर पर नजर गई, तो अचंभा हुआ कि यह तो वही शख्स हैं, जो सपने में दिखते हैं। दिल ने तय कर लिया, उस्ताद हो, तो ऐसा हो और दिमाग ने तैयारी शुरू कर दी। फिर वह दिन भी आ गया, जब ताल दिलो-दिमाग में बहुत गूंजने लगे - धा गे न ति न क धि ना, धा गे ना... और वह लड़का घर से भाग निकला। खाली हाथ, दिलो-दिमाग में सिर्फ तबले और ताल के साथ। गांव घगवाल से भागकर 100 किलोमीटर दूर गुरुदासपुर पहुंचा, वहां एक रिश्तेदार के यहां ठहरना हुआ। दिल के अरमान ने फरमान सुना दिया कि गांव नहीं लौटना, यहीं तबला सीखना है। वहां के स्थानीय उस्तादों से सीखना शुरू हुआ। गुरुदासपुर से लाहौर 110 किलोमीटर के आसपास था, लेकिन दिल में शक था कि मियां कादिर बक्श बहुत बडे़ उस्ताद हैं, जल्दी किसी को शागिर्द नहीं बनाते हैं। अत: पहले जरूरी है कि कुछ सीख लिया जाए और तब उस्ताद के दर पर दस्तक दी जाए। सीखते-सीखते दो साल बीत गए, कुछ लड़कों को कुछ-कुछ सिखाना भी शुरू कर दिया, लेकिन असली मंजिल तो लाहौर में बसे उस्ताद थे। एक दिन वह भी आया, जब एक मेले में बजाने का मौका मिला। वहां उस 15 साल के लड़के ने सतरह मात्राओं के कठिन ताल को तीन खंडों में बजा दिया। खुशनसीबी यह कि सुनने वालों में मियां कादिर बक्श भी तशरीफ लाए थे। उन्हें अच्छा लगा, तो उन्होंने पूछा, ‘तुम किसके शागिर्द हो?’ जवाब मिला, ‘आपका’।
‘लेकिन मैंने तो तुम्हें कभी नहीं देखा?’
बहुत नरमी से उस लड़के ने कहा, ‘मैंने आपको देखा है, आपने ही मेरे हाथ तबले पर रखे हैं’। उस्ताद मुस्कराए, ‘सीखो, लेकिन ढंग से।’ जवाब में वह लड़का बिल्कुल बिछ गया, ‘नाचीज आपके कदमों में है।’
हजारों शागिर्दों वाले उस्ताद सख्ती से सिखाते थे, आठ घंटे से बारह घंटे तक रियाज कराते। बनियान, लूंगी का पसीने से तर होना रोज की बात थी। गुजारे और उस्ताद को पैसे देने के लिए एक ढाबे में तपना-खटना पड़ता था। तपस्या का यह दौर पांच साल चला और संगीत की दुनिया में एक ऐसे बेमिसाल उस्ताद तैयार हुए, जिन्हें दुनिया अल्ला रक्खा खां के नाम से बहुत याद करती है। वह घर से भागे तो, पर संगीत, हुनर, प्यार, इल्म व इंसानियत के दूत बन गए। ऑल इंडिया रेडियो से लेकर फिल्मों में संगीत देने तक और पंडित रविशंकर के साथ दुनिया को भारतीय संगीत का रसास्वादन कराने तक, उनके थाप और ठेके हमेशा राह दिखाएंगे। तीन ताल, चार ताल या झप ताल- धी ना धी धी ना ती ना धी धी ना...।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय
अल्ला रक्खा खां मशहूर तबलावादक
जीना इसी का नाम / शौर्यपथ /कोई मां अपनी ग्यारह साल की बेटी को मजदूरी करने के वास्ते साथ चलने को कहे, तो उसे कैसा लगा होगा? मां को भी और उस मासूम को भी? मगर कहना पड़ता है। दुनिया की बहुत सारी माओं को उनकी किस्मत इस आजमाइश में डालती रही है। ढाका की एक बेहद गरीब बस्ती में पैदा हुई नजमा को जब उनकी मां ने अपने साथ गारमेंट फैक्टरी चलने को कहा, तब उन्हें बहुत दुख हुआ था, मगर उनके पास तो इसरार करने का भी विकल्प न था।
घर से फैक्टरी के रास्ते में नजमा जब अपनी हमउम्र बच्चियों को स्कूल जाते या खेलते देखतीं, तो उनका बालमन उदास हो जाता, मगर ऐसी तमाम हसरतें घर की दहलीज पर पहुंच दम तोड़ देतीं, क्योंकि अंदर एक बड़ा कुनबा इस इंतजार में होता कि मां-बेटी बाजार से कुछ सौदा लेकर आई हैं या नहीं? दादी-नानी और छोटे भाई-बहनों की आंखें उन दोनों पर ही टिकी होती थीं, क्योंकि नजमा के पिता की कमाई इतनी भी न थी कि वह सबका पेट भर पाते।
वर्षों के संघर्ष ने जिंदगी से शिकायतों का जैसे पन्ना ही फाड़ दिया। घरवालों को अभावों से कुछ राहत मिले, इसकी एक ही सूरत थी कि घर में पैसे आएं और इसके लिए नजमा ने दिल लगाकर काम सीखा। फिर वह लंबे-लंबे वक्त तक काम करने लगीं। किसी-किसी दिन तो चौदह घंटे तक सिलाई करती रह जातीं। मगर हासिल क्या होता? पगार में देरी, किसी न किसी बहाने उसमें कटौती, बल्कि कई बार तो बेवजह ही कम भुगतान किया जाता और सुपरवाइजरों, मालिकों के हाथों बेइज्जती सहनी पड़ती थी।
नजमा के भीतर इस शोषण और नाइंसाफी के खिलाफ गुस्सा गहराता रहा। फिर एक मोड़ आया, जब उन्होंने कुछ महिला कामगारों के साथ मिलकर इस सबका मुखर विरोध किया। जाहिर है, फैक्टरी प्रबंधन को यह नागवार गुजरा और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। यही नहीं, नजमा का नाम काली सूची में डाल दिया गया, ताकि उन्हें फिर कभी काम पर नहीं रखा जा सके।
औरत की बगावत सामंती समाजों को हजम नहीं होती। फिर नजमा तो जिस फैक्टरी में काम करती थीं, वह एक स्थानीय बाहुबली की थी। वह अक्सर अपने कामगारों को डराता-धमकाता रहता। लेकिन इस बार सामने नजमा थीं। बदलाव के संकल्प से भरी एक युवती। फिर उनकी मांग भी कुछ ऐसी थी, जो ज्यादातर कामगारों को अपील कर रही थी। दरअसल, बांग्लादेश में रेडीमेड वस्त्र बनाने वाली फैक्टरियों में ज्यादातर औरतें काम करती हैं। बकौल नजमा इस क्षेत्र के कामगारों में महिलाओं की भागीदारी 80 प्रतिशत से भी ज्यादा है। फिर भी उनके साथ अच्छा सुलूक नहीं होता था।
नजमा की उम्र तब 27-28 साल रही होगी। उन्होंने कई मजदूर संघों से संपर्क किया। कुछ के लिए तो बाद में काम भी किया, मगर वे सब किसी न किसी सियासी जमात के हित-पोषक ज्यादा थे। इन मजदूर संगठनों में भी औरतों के अधिकारों को लेकर नजमा को दोहरापन महसूस हुआ। तब उन्होंने कुछ साथी कामगारों के साथ मिलकर अपना संगठन बनाने का फैसला किया। नाम रखा- ‘सम्मिलतो गारमेंट्स श्रमिक फेडरेशन।’ आज सत्तर हजार से अधिक महिला कामगार इसकी सदस्य हैं। नजमा ने इसके जरिए महिला कामगारों को समान तनख्वाह, फैक्टरियों के निर्णायक बोर्ड में उनकी नुमाइंदगी और उनके खिलाफ यौन हिंसा समेत हर तरह के दुव्र्यवहार पर रोक की मांग जोरदार तरीके से उठाई।
लड़ाई आसान न थी। नजमा ने एक जमे-जमाए सिस्टम को चुनौती दी थी। उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जाने लगीं। जब नजमा इससे नहीं डरीं, तो फिर जैसा कि अक्सर महिलाओं के मामले में होता है, उनके चरित्र पर कीचड़ उछाला जाने लगा। बिरादरी में उनके बारे में तरह-तरह की अफवाहें उड़ाई गईं।
मेहनतकश लोगों को रोटी से कुछ कम अजीज अपनी आबरू नहीं होती। नजमा पर उनके बाबा और चाचा का दबाव पड़ने लगा कि वह इस सबमें और मुब्तला न हों। मगर उन्होंने अपने घर वालों को समझाया कि अगर वह झुक गईं, तो यह न सिर्फ अपने खिलाफ जारी दुष्प्रचार को सही ठहराना होगा, बल्कि उनके ऐसा करने से अनेक साथियों की उम्मीदें भी टूट जाएंगी। नजमा ने अपना संघर्ष जारी रखा। समूचे रेडीमेड गारमेंट सेक्टर के मजदूरों को उनका अधिकार दिलाने के इरादे से साल 2003 में नजमा ने आवाज फाउंडेशन की बुनियाद रखी। उनका यह संगठन ढाका और चिटगांव इलाके के हजारों मजदूरों को अब तक लगभग 19 करोड़ टका का बकाया हक दिला चुका है।
औपचारिक शिक्षा और स्कूल का कभी मुंह न देखने वाली नजमा अख्तर आज धारा प्रवाह अंग्रेजी बोलती हैं। उन्होंने स्वाध्याय से यह ज्ञान अर्जित किया है। वह साल 2006 से ही ‘बांग्लादेश मिनिमम वेज बोर्ड’ की सदस्य हैं। उनके प्रेरक संघर्ष और योगदान को सम्मान देते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2018 में उन्हें सुनने के लिए बुलाया। वह कहती हैं- इतने कम समय में इतना कुछ मिल गया कि जिंदगी से अब कोई शिकायत नहीं रही!
प्रस्तुति : चंद्रकांत सिंह नजमा अख्तर, बांग्लादेशी मजदूर नेता
bhilai / shouryapath news / छत्तीसगढ़ चेम्बर ऑफ कॉमर्स भिलाई के पदाधिकारियों के एक प्रतिनिधि मंडल ने आज एडीएम प्रकाश सर्वे से मुलाकात की। बाजारों में होलसेल मालवाहक वाहनों के कारण बिगड़ रही स्थिति को देखते हुए इनका समय निर्धारित करने की मांग की। प्रतिनिधि मंडल ने ज्ञापन देकर होलसेल दुकानों के माल वाहक वाहनों का भी समय सुबह 10 बजे तक निर्धारित करने की मांग की। 10 बजे के बाद सभी बड़े मालवाहक बाजारों से बाहर चले जा सके। ऐसा करने से भी बाजारों में ट्रैफिक की स्थिति सामान्य रहेगी।
मुलाकात के दौरान युवा चेंबर के प्रदेश अध्यक्ष अजय भसीन व प्रदेश चेम्बर के उपाध्यक्ष गार्गी शंकर मिश्रा ने कोरोना संकट के समय व्यापारियों द्वारा किए गए कार्यों को उनके सामने रखा। एडीएम प्रकाश सर्वे ने चेम्बर के कार्यों की सराहना की। साथ ही आश्वस्थ किया कि वे जल्द ही इस पर सकारात्मक कदम उठाएंगे। भिलाई चैंबर के संयोजक अजय भसीन ने जानकारी दी कि भिलाई चैम्बर सभी बाजारों में उन व्यापारियों को सम्मानित कर रहा है जिन्होंने करोना महामारी के दौरान शासन के निर्देशों का पूर्णत पालन किया है। एडीएम से मुलाकात के दौरान शंकर सचदेव, अंकुर शर्मा रवि विजवानी, सागर, संतोष गोयल व चिंटू कथूरिया उपस्थित रहे।
कोरोना के कर्मवीर का सम्मान
चेंबर द्वारा कोराना काल में अपना काम करने के लिए व्यापारियों का सम्मान किया जा रहा है। इसी कड़ी में आज लिंक रोड स्थित राजस्थान तेल एवम विजय ट्रेडिंग कंपनी को स्मृति चिन्ह देकर करोना के कर्मवीर पद से नवाजा गया। गार्गी शंकर मिश्रा ने जानकारी दी कि लॉक डाउन के समय सबसे पहले सोशल डिस्टेंस का पालन करने दुकान के बाहर चुने की मार्किंग राजस्थान तेल द्वारा की गई। क्रमबद्ध ग्राहकों को समान देने बेरिकेट जैसी व्यवस्था से एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया। होलसेल मार्किट से लिंक रोड के ही विजय ट्रेडिंग को भी बेहतर व्यवस्था हेतु सम्मा न दिया गया। सुपेला मार्किट से निर्मल हैंडलूम को भी करोना के कर्मवीर का सम्मान दिया गया। स्मृति चिन्ह एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश मल्होत्रा व नरेश जसवानी ने ग्रहण किया।
नजरिया / शौर्यपथ / पिछले महीने और इस महीने भी, जब दुनिया भर के तमाम देश कोरोना वायरस से जूझने में जुटे हैं, हांगकांग में एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा, जब वहां चीन की सरकार के खिलाफ प्रदर्शन न हुए हों। बीते दिनों कई प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया है, पुलिस से लोगों की झड़पें हुई हैं। बीजिंग में बैठी सरकार ने हांगकांग की स्वायत्तता को खत्म करने के लिए नई-नई घोषणाएं की हैं और हांगकांग में जन-साधारण के लिए जो बातें पहले सामान्य मानी जाती थीं, उन सभी पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। दरअसल, हांगकांग में पहले के लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों को देखते हुए चीन ने पिछले सप्ताह अपनी संसद में हांगकांग से जुडे़ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का मसौदा पेश किया था, जो गुरुवार को पारित हो गया। इससे जनतंत्र समर्थक कानूनविद्, राजनेता और हांगकांग के 74 लाख लोग स्तब्ध हैं। उन्होंने सोचा न था कि चीन, जो 2047 में हांगकांग को पूरी तरह से नियंत्रण में लेने वाला था, वह दो दशक पहले ही इस प्रकार उसको डकार जाएगा।
कोरोना वायरस के कारण तमाम देशों में जिंदगी वैसे ही ठहर-सी गई है, लेकिन स्थानीय इलाकों पर धीरे-धीरे कब्जा करने की चीन की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। चीन ने हांगकांग की स्वायत्तता समाप्त करने की ऐसी ही कोशिश 2003 में भी की थी, लेकिन उस समय हुए जबर्दस्त जन-विद्रोह के कारण उसे पीछे हटना पड़ा था। मगर अब नए कानून के लागू हो जाने के बाद हांगकांग में लोकतंत्र समर्थक ताकतों पर रोक लगाने के साथ ही वहां बाहरी शक्तियों का आना भी रोक दिया जाएगा। हालांकि, हांगकांग बेशक चीन का भाग है, लेकिन उसके पास अब तक अपने कानून, अपनी अदालतें और पुलिस हैं। साफ है, चीन का यह कदम एक प्रकार से उसकी तानाशाही है। यह उस संयुक्त घोषणापत्र को पूरी तरह खत्म किए जाने के समान है, जिसके तहत इस पूर्व बिटिश उपनिवेश को 1997 में ‘एक देश, दो प्रणाली’ के साथ चीन को लौटाया गया था। यह घोषणापत्र हांगकांग को 2047 तक पश्चिम जैसी आजादी और अपनी कानून प्रणाली प्रदान करता है। अब राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के बहाने चीन ने इस अद्र्ध-स्वायत्त क्षेत्र पर अपना नियंत्रण कर लिया है, जबकि वह अब तक हांगकांग से ऐसा कोई काम न करने का वादा करता आया था।
हांगकांग में ज्यादातर लोग चीनी नस्ल के हैं, लेकिन वे आमतौर पर चीन की पहचान नहीं रखना चाहते, खासकर युवा वर्ग। सिर्फ 11 फीसदी हांगकांगवासी खुद को चीनी कहते है, जबकि 71 फीसदी चीनी नागरिक होने पर गर्व महसूस नहीं करते। यही कारण है कि हांगकांग में हर रोज आजादी के नारे बुलंद होते रहते हैं। सन 1997 में जब हांगकांग को चीन के हवाले किया गया था, तब उसने कम से कम 2047 तक वहां के लोगों को स्वायत्तता और अपनी कानून-व्यवस्था बनाए रखने की गारंटी दी थी, लेकिन 2014 में वहां 79 दिनों तक चले ‘अंब्रेला मूवमेंट’ के बाद लोकतंत्र का समर्थन करने वालों के खिलाफ चीन सरकार कार्रवाई करने लगी। हांगकांग का अपना कानून है, साथ ही खुद की विधानसभा भी, लेकिन वहां मुख्य कार्यकारी अधिकारी को 1,200 सदस्यीय चुनाव समिति चुनती है, जिसमें ज्यादातर चीन समर्थक सदस्य ही होते हैं। यही नहीं, विधायी निकाय के सभी 70 सदस्य हांगकांग के मतदाताओं द्वारा सीधे नहीं चुने जाते हैं। मनोनयन वाली सीटों पर बीजिंग समर्थक सांसदों का कब्जा रहता है।
जाहिर है, चीन के ताजा कदम के बाद हांगकांग में अब और भी विरोध होना स्वाभाविक है। पिछले वर्ष की घटनाओं को देखते हुए आशंका यह भी है कि पुलिस अब और कडे़ कदम उठाएगी। बीजिंग को इस बात की कतई चिंता नहीं है कि उसके इस कार्य पर दूसरे देश क्या प्रतिक्रिया देते हैं। हालांकि, इस नए कानून के विरोध में दुनिया भर में आवाजें उठने लगी हैं।
कानूनी पर्यवेक्षकों और मानवाधिकार के पैरोकारों का मानना है कि इस कानून का सर्वाधिक दुरुपयोग मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बोलने की आजादी के विरुद्ध किया जाएगा। ऐसे मुखर लोगों को गिरफ्तार किया जाएगा और उन्हें जेल में बंद कर दिया जाएगा। फिर भी, माना यही जा रहा है कि प्रदर्शनकारी कहीं ज्यादा इसका विरोध करेंगे, क्योंकि पिछले वर्ष की अपेक्षा वे अधिक संगठित हुए हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)महेंद्र राजा जैन, वरिष्ठ हिंदी लेखक
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
