July 26, 2026
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    “दुर्ग बाल संप्रेक्षण गृह में सुरक्षा की साख दाव पर: 25 दिन में दूसरी बड़ी फरारी — 7 नाबालिग भागे, सभी पकड़े गए पर उठे गंभीर सवाल” Featured

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    दुर्ग/shouryapath / 

    पुलिस और महिला एवं बाल विकास विभाग के समक्ष दुर्ग जिले के पुलगांव स्थित बाल संप्रेक्षण गृह की सुरक्षा व संचालन व्यवस्था एक बार फिर कटघरे में आ गई है। शुक्रवार रात, 28 नवम्बर 2025 की रात यहां से सात नाबालिग आपराधिक प्रवृत्ति के बालक दीवार फांदकर फरार हो गए। तेज़ कार्रवाई में पुलिस ने अगले दिन यानी 29 नवम्बर को चार बालक पकड़ लिए; शेष तीन के जिले से बाहर जाने की सूचनाओं के बाद खोजबीन तेज हुई और आज तिल्दा से उन तीनों को भी पकड़कर सुधार गृह वापस लाया गया — यह जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक विजय अग्रवाल ने दी।


    बार-बार हो रही फरारियों से उठ रहे हैं बड़े सवाल

    यह मौका सिर्फ 25 दिनों के भीतर दूसरी बार आया है जब उसी संस्थान से बड़े पैमाने पर फरारियों की घटना हुई। पहले 3 नवम्बर 2025 को भी इसी सुधार गृह से 3 नाबालिग भागे थे — जिनमें कुछ ऐसे बालक भी शामिल थे जिनके विरुद्ध हत्या व लूट जैसे गंभीर आरोप दर्ज थे। पिछले वर्षों के रिकॉर्ड पर भी यह संस्थान चिंताजनक रूप से बार-बार चर्चा में रहा है:

    • 1 जून 2024 — एक 13 वर्षीय बालक फरार; तब सुधार गृह के स्टाफ को बच्चे के गायब होने का भी पता नहीं चला।

    • 19 जुलाई — (वर्ष का उल्लेख प्राप्त नहीं) पाँच अपचारी बालक फरार।

    • 2 मार्च 2018 — दो बालक फरार।

    • जुलाई 2019 — पाइप से पिटाई के गंभीर आरोपों के बाद बाल कल्याण अधिकारी सहित 7 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया था।

    • 1 नवम्बर 2017 — गुटबंदी व मारपीट के परिणामस्वरूप एक 17 वर्षीय बालक पार्थ साहू की मृत्यु; घटना के बाद बड़े स्तर पर हंगामा और जांच के आदेश दिए गए थे।

    • 24 नवम्बर 2014 — झगड़े और मारपीट के बाद 37 बच्चे सुधार गृह से भाग निकले थे।

    इन लगातार घटनाओं ने संप्रेक्षण गृह की सुरक्षा, स्टाफ की निगरानी, तथा विभागीय जवाबदेही पर गम्भीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


    पुलिस व प्रशासन की कार्रवाई — राहत के साथ सतर्कता

    पुलिस के अनुसार, फरार बालक अक्सर सुधार गृह की पीछे की ऊँची दीवार फांदकर भागते हैं। इस बार भी रात में ही अलर्ट जारी हुआ और खोज अभियान शुरू कराया गया। प्रारम्भिक दौर में चार बच्चे आसपास के इलाकों से मिले और सुधार गृह लौटाए गए। शेष तीन के जिले पार करने की सूचनाओं पर पुलिस ने अन्य जिलों में भी तलाशी बढ़ाई और अंततः तिल्दा से उन्हें पकड़कर वापस लाया गया। SSP विजय अग्रवाल ने बताया कि सभी भागे हुए आपराधिक बच्चे अब पुनः सुधार गृह में हैं और महिला एवं बाल विकास विभाग तथा प्रशासन ने राहत की सांस ली है।


    मूल कारण और व्यवस्थागत कमियाँ

    विश्लेषण बताते हैं कि संप्रेक्षण गृह से बार-बार भागने के कारण कई स्तरों पर हैं — इनमें प्रमुख हैं:

    1. सुरक्षा व्यवस्था की खामियाँ: दीवारों पर मॉनीटरिंग, चौकीदारी, प्रवेश-निकास रिकॉर्ड, CCTV तथा अंदरूनी पेट्रोलिंग में निरंतरता का अभाव।

    2. स्टाफ की लापरवाही व प्रशिक्षण की कमी: कुछ घटनाओं में स्टाफ निगरानी में चूक हुई; साथ ही कर्मियों के व्यवहार (मारपीट, कठोरता) संबंधी गंभीर आरोप भी समय-समय पर आए हैं।

    3. अनुशासन व सुधारात्मक माहौल का अभाव: कुछ बालक यह मानते हैं कि सुधार गृह जेल जैसा कठोर स्थान है; आवश्यक ‘कॉमन रूम’ या सकारात्मक गतिविधियाँ न होने पर वे भागने का जोखिम बढ़ाते हैं।

    4. गुटबंदी व मारपीट: संस्थान के भीतर आपस में गुट बनना और आपसी मारपीट भी भागने की एक बड़ी वजह बताई जा रही है।

    साभार में रहने, पढ़ाई व मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसी सुविधाओं के साथ-साथ स्टाफ के व्यवहार में सुधार आवश्यक बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सुधार गृह संस्थागत सुधार और पुनर्वास के उद्देश्यों पर केंद्रित रहना चाहिए—जेल जैसा दंडात्मक माहौल बन जाने पर परिणाम विपरीत होते हैं।


    विभागीय जवाबदेही व मांगें

    महिला एवं बाल विकास विभाग तथा सुधार गृह प्रशासन पर बार-बार ऐसी घटनाएँ हो जाने के बावजूद ठोस सुधार न करने के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और कुछ बाल अधिकार कार्यकर्ताओं की मांग है कि—

    • स्वतंत्र जांच कराना चाहिए और दोषी स्टाफ पर कड़ी कार्रवाई हो।

    • संप्रेक्षण गृह की दीवारें, CCTV कवरेज, रात्री गश्त और प्रवेश-निकास रेकॉर्ड को तुरंत सुदृढ़ किया जाए।

    • स्टाफ का नियमित मनोवैज्ञानिक व मानवाधिकार आधारित प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।

    • बालकों के लिए शिक्षा, कौशल और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का सुनिश्चित प्रावधान हो ताकि पुनर्वास संभव हो।

    • किशोर न्याय बोर्ड और प्रशासन के बीच समन्वय सुदृढ़ हो और गृह में पारदर्शिता हेतु बाहरी ऑडिट की व्यवस्था हो।


    निष्कर्ष — सुधार नहीं तो समस्या बनी रहेगी गम्भीर

    बाल संप्रेक्षण गृह का उद्देश्य सामाजिक पुनर्संरचना और सुधार है, न कि कठोर कारावास। परंतु बार-बार हो रही फरारियां, मारपीट के आरोप और स्टाफ की संभावित लापरवाही इस संस्थान की विश्वसनीयता को लगातार हिला रही हैं। यदि तत्काल और ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो न केवल बच्चों का हित प्रभावित होगा, बल्कि समाज में सुरक्षा व पुनर्वास दोनों ही लक्ष्यों की पूर्ति भी संभव नहीं रहेगी। स्थानीय प्रशासन, महिला एवं बाल विकास विभाग और किशोर न्याय बोर्ड को मिलकर त्वरित, पारदर्शी और स्थायी सुधार योजनाएँ लागू करनी होंगी ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों।

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