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May 31, 2026
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शौर्यपथ

शौर्यपथ

        मनोरंजन/ शौर्यपथ / ट्विंकल खन्ना इन दिनों अपने बच्चों के साथ बहुत सारा क्वालिटी टाइम बिता रही हैं। कुछ ही दिनों पहले उनकी बेटी ने उन्हें एक फनी मेकओवर दिया था। अब उनके बेटे ने एक स्वादिष्ट केक बेक किया। ट्विंकल और अक्षय कुमार के बेटे आरव सिंगापुर मे पढ़ते हैं। लॉकडाउन के चलते वो अपने घर आये हुए हैं। ऐसे में वो भी हम सभी की तरह कुकिंग और बेकिंग मे हाथ आजमा रहे हैं। आरव ने ब्राउनी केक बनाया। उनकी मम्मी ट्विंकल के लिये ये बहुत गर्व का मौका था। ऐसा शायद इसलिये क्योंकि वो अक्सर अपने पोस्ट्स और इंटरव्यूज में बताती हैं कि उन्हें खाना बनाना नहीं आता।

केक की फोटो शेयर करते हुए ट्विंकल ने अपने मजेदार अंदाज में लिखा, “जब ये बन (आरव) मेरे ओवन (टमी) में था तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं एक फ्यूचर बेकर डिलीवर करूंगी। मैंने उसे बनाया और 17 साल बाद उनसे ये शानदार चॉकलेट ब्राउनी केक बनाया चेरी के साथ। प्राउड मदर।

इस फोटो पर कई लोगों ने कमेंट करते हुए कहा कि आरव में ये गुण अपने पापा से आये हैं। दरअसल फिल्मों में आने से पहले अक्षय कुमार कनाडा में एक शेफ से रूप में काम करते थे। उन्हें खाना बनाने में महारथ हासिल है और शायद उन्हीं से आरव ने भी ये चीजें सीखी हैं।

बता दें कि ट्विंकल काफी समय से फिल्मों में एक्टिंग से दूरी बना चुकी हैं। वो एक राइटर हैं और अपनी मजेदार टिप्पणियों के लिए जानी जाती हैं। वो अक्सर ही हमें अपने घर और अपने पर्सनल जीवन की झलक दिखाती रहती हैं।

 

           नजरिया / शौर्यपथ / अक्सर कहा जाता है कि भारतीयों की घरेलू बचत ने देश को वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी से बचाया था। एक बार फिर 2020 में कोविड-19 से जंग में घरेलू बचत भारत का विश्वसनीय हथियार दिखाई दे रही है। अब जब कमाई पर असर पड़ा है, तब आम लोगों के लिए उनकी छोटी-छोटी बचत आर्थिक सहारा बन गई है। चूंकि हमारे देश में विकसित देशों की तरह सामाजिक सुरक्षा का उपयुक्त ताना-बाना नहीं है, इसलिए छोटी बचत योजनाएं ही देश के अधिकांश लोगों की सामाजिक सुरक्षा का आधार हैं।
नेशनल सेविंग्स इंस्टीट्यूट (एनएसआई) द्वारा भारत में निवेश की प्रवृत्ति से संबंधित रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां देश के लोगों के लिए छोटी बचत योजनाएं लाभप्रद हैं, वहीं इनका बड़ा निवेश अर्थव्यवस्था के लिए भी लाभप्रद है। वर्ष 2011-12 में जहां छोटी बचत योजनाओं के समूह राष्ट्रीय लघु बचत निधि (एनएसएसएफ) में कुल निवेश महज 31 अरब रुपये था, वहीं यह 2018-19 में बढ़ते हुए 1,600 अरब रुपये से अधिक हो गया है। हालांकि देश में छोटी बचत योजनाओं में ब्याज दर के घटने से उनका आकर्षण कुछ कम हुआ है। वर्ष 2012-13 के बाद सकल घरेलू बचत दर (ग्रास डोमेस्टिक सेविंग रेट) लगातार घटती गई है, लेकिन अभी भी दुनिया के कई विकासशील देशों की तुलना में भारत की सकल घरेलू बचत दर अधिक है। देश में वित्त वर्ष 2007-08 के दौरान जो सकल घरेलू बचत दर 36.80 फीसदी थी, वह घटते हुए वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान 32.10 फीसदी तथा 2018-19 में 30.14 फीसदी रह गई है। चाहे देश में बचत दर घटी हो, लेकिन छोटी बचत योजनाएं अपनी विशेषताओं के कारण निम्न और मध्यमवर्गीय परिवारों के विश्वास व निवेश का माध्यम बनी हुई हैं।
यह साफ दिखाई दे रहा है कि लॉकडाउन और ठप हुए उद्योग-कारोबार ने मध्यमवर्ग की मुस्कराहट छीन ली है। देश के लाखों दफ्तरों में दिन-रात पसीना बहाकर देश को नई पहचान और नई ताकत देने वाला भारतीय मध्यमवर्ग कोविड-19 के दौर में अपनी छोटी बचतों से अपने परिवार की गाड़ी आगे बढ़ा रहा है, लेकिन इस वर्ग के लोगों की आर्थिक चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। कोविड-19 के बीच मध्यमवर्ग के करोड़ों लोगों के चेहरे पर हाउसिंग लोन, ऑटो लोन, कंज्यूमर लोन आदि की किस्तें देने की चिंताएं, बच्चों की शिक्षा और कर्ज पर बढ़ते ब्याज जैसी कई चिंताएं बढ़ गई हैं।
देश में छोटी बचत करने वाले करोड़ों लोगों के सामने नई चिंता 1 अप्रैल, 2020 से सरकार द्वारा छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर में की गई कटौती से भी संबंधित है। पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ) पर ब्याज दर अब 7.1 फीसदी है, जबकि पहले यह 7.9 फीसदी थी। नेशनल सेविंग्स स्कीम्स (एनएससी) में अब 6.8 फीसदी ब्याज मिलेगा, जबकि पहले इस पर 7.9 फीसदी का ब्याज मिल रहा था। सुकन्या समृद्धि योजना में निवेश पर ब्याज दर 8.4 फीसदी से घटाकर 7.6 फीसदी कर दी गई है। कम ब्याज दर के बावजूद बचत योजनाओं को मध्यमवर्ग लाभप्रद मान रहा है। खासतौर से पीपीएफ, एनएससी, डाकघर सावधि जमा जैसी छोटी बचत योजनाएं निश्चित प्रतिफल देती हैं। दीर्घकालिक वित्तीय लक्ष्य हासिल करने के लिहाज से इन योजनाओं में निवेश अहम है। इतना ही नहीं, पीपीएफ और सुकन्या समृद्धि योजना पर मिलने वाली रकम पूरी तरह कर मुक्त भी है।
साफ दिखाई दे रहा है कि जैसे-जैसे लॉकडाउन की अवधि बढ़ती गई है, वैसे-वैसे छोटी बचत करने वाले, नौकरी-पेशा वर्ग एवं मध्यमवर्ग के करोड़ों लोगों की मुश्किलें बढ़ती गई हैं। ऐसे में, सरकार ने आत्मनिर्भर भारत के तहत आर्थिक पैकेज की घोषणा करते समय मध्यमवर्ग को भी कुछ राहत दी है। आवास कर्ज से जुड़ी सब्सिडी योजना (सीएलएसएस) को एक और वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया है। यह योजना 31 मार्च, 2020 को समाप्त हो गई थी। सरकार के आर्थिक पैकेज और कर रियायतों से निश्चित ही आम लोगों को फायदा होगा। ज्यादा से ज्यादा आम लोगों को फिर काम-धंधे में लगाना होगा, ताकि उनकी कमाई लौटे। कमाई लौटेगी, तो बचत भी लौटेगी। जितने ज्यादा लोगों की बचत लौटेगी, अर्थव्यवस्था को उतना ही लाभ होगा। बेशक, छोटी बचतों का संरक्षण, संवद्र्धन सरकार को भी करना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री

 

        सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / प्रकृति के कोप का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। यह न केवल दुखद, बल्कि चिंताजनक है कि तमाम आफतों के बीच टिड्डियों ने भी भारत में पांच से ज्यादा राज्यों में कहर बरपा दिया है। ये दल तपती धरती पर बची हुई फसल को चट करने में लगे हैं। यह तो भला हो कि देश के ज्यादातर खेतों से गेहूं की फसल कट चुकी है, लेकिन ऐसे किसानों की संख्या लाखों में है, जो साल भर कुछ न कुछ अपने खेतों में लगाते ही रहते हैं। विशेष रूप से फल उत्पादकों पर मानो मुसीबत ही टूट पड़ी है। महाराष्ट्र के नारंगी उत्पादकों की चिंता का कोई ठिकाना नहीं है। विदर्भ में पड़ने वाले 11 जिलों में अलर्ट जारी है। पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा में भी किसानों को चेताया गया है। प्रभावित राज्यों में गन्ने, आम, सरसों, सौंफ, जीरा, आलू, रतनजोत जैसी नकदी फसलें टिड्डियों के निशाने पर हैं। बताया जा रहा है कि ऐसा हमला इन्होंने लगभग दो दशक बाद किया है।
इसमें कोई शक नहीं कि कोरोना की त्रासदी ने भी टिड्डियों को मौका दिया है। आम तौर पर ईरान, पाकिस्तान की ओर से भारत में आने वाली इन करोड़ों टिड्डियों को पंजाब, राजस्थान इत्यादि राज्यों में रोक लिया जाता है और उससे पहले ईरान और पाकिस्तान में भी किसान व सरकारें मुकाबला करती हैं। इस बार इन सरकारों ने कोरोना के खिलाफ जंग में लगे होने के कारण टिड्डियों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। नतीजा यह कि भारत में एक बड़ी आबादी है, जिसने ऐसा टिड्डी हमला पहले कभी नहीं देखा था। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि टिड्डियों की ओर से ऐसे हमले की आशंका पहले से ही जताई जा रही थी, लेकिन हमारे यहां भी सरकारें कोरोना से जंग में लगी हैं, तो टिड्डियों को मौका मिल गया। केंद्र सरकार इसी सप्ताह सक्रिय हुई है और उन राज्य सरकारों की मदद की जा रही है, जो नुकसान झेल रही हैं। अपनी फसल को लेकर चिंतित हर किसान अपनी-अपनी तरह से इनसे जूझ ही रहा है, लेकिन यह किसी एक या दो किसानों के लड़ने योग्य लड़ाई नहीं है। ये पतंगे करोड़ों की तादाद में होते हैं। अनुमान है कि एक दल में एक समय में इनकी संख्या आठ करोड़ तक हो सकती है।
बहरहाल, इस साल के भयावह हमले से हमें हमेशा के लिए कुछ सबक सीखने चाहिए। जो 20 से ज्यादा देश टिड्डियों से हर साल परेशान होते हैं, उन्हें एक समूह या संगठन बनाना चाहिए। इस संगठन में अफ्रीका के गरीब देश भी शामिल हों और एशिया के विकासशील देश भी। टिड्डयों को उनके मूल प्रजनन स्थलों पर ही रोकना होगा। जो रेगिस्तानी इलाके या देश अब नमी से लैस हो गए हैं, उनकी जिम्मेदारी ज्यादा है। इधर भारत में हरसंभव कोशिश करनी चाहिए कि जल्द से जल्द इन टिड्डियों को खत्म किया जाए। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने चेताया है कि जुलाई महीने तक यह हमला जारी रहेगा। बताया जा रहा है कि टिड्डियों की एक विशाल आबादी दक्षिणी ईरान और दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान में तैयार हो रही है। अत: यह जरूरी है कि भावी हमलावरों को उनके मूल स्थान पर ही जवाब दिया जाए। यह तभी होगा, जब हमारी सरकार आगे बढ़कर ईरान व पाकिस्तान को प्रेरित करेगी। साथ ही, हमें यह भी तैयारी रखनी होगी कि हम इन टिड्डियों को सीमा पर ही रोक दें।

 

            मेलबॉक्स / शौर्यपथ / कोरोना संकट का यह काल केवल जान की हानि तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आर्थिक संकट के साथ-साथ कई उद्योग-धंधों और रोजगार का अस्तित्व भी फिलहाल खत्म होता दिख रहा है। नतीजतन, उनमें काम करने वाले मजदूर, कर्मचारी-अधिकारी, सभी एकाएक बेरोजगार हो गए हैं। ऐसे में, उन्हें दूसरी राह तलाशनी पड़ रही है, जिसे खोजना मौजूदा वक्त में काफी मुश्किल भरा काम है। इस बढ़ती बेरोजगारी दर से निपटने के लिए आर्थिक पैकेज की घोषणा की गई है। अभी इसे हकीकत बनने में कुछ वक्त लगेगा, लिहाजा बीपीएल जैसे कार्डधारकों को कुछ न कुछ सरकारी मदद तो मिल ही जाएगी। जिनको कोई राहत नहीं मिलेगी, वे हैं गैर-कार्डधारक। आज जब कई देश अपने बेरोजगार नौजवानों को भत्ता दे रहे हैं, तब हमारे देश में भी बिना भेदभाव और आरक्षण के यह बांटा जाना चाहिए। नौकरी गंवा चुके लोगों को बचाने का इससे बेहतर शायद ही कोई दूसरा उपाय है।
विकास पंडित, बड़वानी, मध्य प्रदेश

चीन की चाल
चीन की विस्तारवादी नीति हमेशा से विश्व के लिए संकट की वजह रही है। अब जो नया विवाद चीन ने वास्तविक नियंत्रण-रेखा (एलएसी) पर अपने सैनिकों की गतिविधियां बढ़ाकर पैदा किया है, उससे तो ऐसा लगता है कि बीजिंग को अपने अजेय होने का घमंड है। अपनी कुत्सित मानसिकता के कारण चीन हमेशा से ही भारत एवं समस्त विश्व के लिए मुश्किलें पैदा करता रहता है। यदि चीन अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आया, तो उसे मुंहतोड़ जवाब दिया जाना चाहिए। भारत सरकार को भी चीन के साथ ‘जैसे को तैसा’ की नीति अपनानी चाहिए।
ज्योतिरादित्य शर्मा, जयपुर

तंग होते हाथ
आज पूरा देश कोरोना की मार झेल रहा है, लेकिन आम जनता की परेशानी यह है कि पैसों की कमी कैसे दूर की जाए? सरकार द्वारा योजनाएं चलाई गईं, पर उसका लाभ कितने लाभार्थियों को मिल रहा है, यह जगजाहिर है। ऐसे में, आर्थिक तंगी ने सबको हिलाकर रख दिया है। सरकारी नौकरी कर रहे लोगों का भी मानो यही हाल है कि किसी तरह गुजारा हो रहा है। आखिर कब तक यह तकलीफ आम लोगों के जीवन का हिस्सा बनी रहेगी? आलम यह है कि कुछ लोग अपना पेट पालने के लिए सब्जी, फल या दुग्ध विक्रेता बन गए हैं। हालांकि, सड़कों पर रोज काम मांगने वाला तबका यह भी नहीं कर सकता। माना जाता है कि देश में करीब 30 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करती है। लॉकडाउन से उनकी हालत तो और भी खराब हो गई है। कोरोना से उनकी जान जाए या न जाए, भूख से जरूर जा रही है। आखिर आम आदमी अपनी इन तकलीफों को किससे साझा करे? उम्मीद की किरण कहीं से नजर नहीं आ रही।
नीतिशा शेखर, जहानाबाद

हाईटेक किसान
पहले गेहूं, और अब लीची व आम ई-बाजार में बिकने लगे हैं। लॉकडाउन की वजह से परंपरागत बाजार और मंडियों के बंद होने से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि इस वर्ष किसान भयंकर आर्थिक तंगी से गुजरने वाले हैं। मगर, ई-कॉमर्स की ओर रुख करते हुए किसानों ने प्रधानमंत्री के ‘वोकल फॉर लोकल’ के सपने को पूरा करने के लिए अपना पहला कदम बढ़ा दिया है। चाहे उन्नाव हो या भागलपुर, किसानों ने यह साबित किया है कि समय के साथ सही दिशा में बदलाव करने से न सिर्फ मुनाफा बढ़ता है, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होते हैं। किसानों के इस कदम से उन्हें उपज का सही दाम मिलेगा। सरकार को किसानों के इस फैसले की सराहना करनी चाहिए। साथ ही, उन्हें ई-कॉमर्स के नए प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान इससे जुड़ सकें।
सोनाली सिंह, रांची

         ओपिनियन / शौर्यपथ / अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को दी जाने वाली आर्थिक मदद बंद करने और इस संगठन से बाहर निकलने की धमकी दी। इस खबर को देख-सुनकर मैं करीब 40 साल पहले के दिनों में लौट गया, जब अमेरिका से आए इसी तरह के एक खतरे से मेरा वास्ता पड़ा था। उस वक्त मैं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में अपनी सेवा दे रहा था।
वह 1982 की मई थी, जब मैं विश्व स्वास्थ्य महासभा के सालाना सत्र में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए जिनेवा गया था। उस समय संगठन के 160 के अधिक सदस्य देश बैठक में भाग ले रहे थे और दो हफ्ते तक स्वास्थ्य व चिकित्सा से जुडे़ कई अहम मुद्दों पर चर्चा करने वाले थे। बैठक के मुख्य एजेंडे को दो समितियों के अधीन कर दिया गया था, जिनके नाम ‘ए’ और ‘बी’ रखे गए थे।
सन 1982 की उस विश्व स्वास्थ्य महासभा में मुझे सर्वसम्मति से ‘बी’ समिति की अध्यक्षता सौंपी गई। जिनेवा में नियुक्त हमारे तत्कालीन राजदूत एपी वेंकटेश्वरन ने इस घटना को भारत की ‘कूटनीतिक जीत’ बताई, खासतौर से इसलिए, क्योंकि इसके लिए अपने पक्ष में जनमत बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई थी। संयुक्त राष्ट्र के किसी भी अन्य संगठन की तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन में भी सदस्य देश स्वास्थ्य संबंधी मसलों पर चर्चा करते हुए ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते, ताकि उन्हें तात्कालिक राजनीतिक विवाद पर अपने विचार रखने का मौका मिल जाए। विश्व स्वास्थ्य महासभा की कार्यवाही शुरू होने से पहले मैंने अपनी समिति को सौंपी गई कार्य-सूची को ध्यान से पढ़ा। न तो मुझे, और न ही मेरे अनुभवी सचिवालय कर्मियों को यह एहसास हुआ कि सूची में ऐसा कोई मसला है, जिससे विवाद होगा और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अस्तित्व पर ही खतरा आ जाएगा।
वह दरअसल, एक ड्राफ्ट रिजॉल्यूशन यानी मसौदा प्रस्ताव था, जो अफ्रीकी-अरब देशों के एक समूह द्वारा पेश किया गया था। उस प्रस्ताव में इजरायल के कब्जे वाले इलाके में फलस्तीनियों की खराब सेहत पर ध्यान देने की मांग की गई थी। प्रस्ताव पर विवाद होने का मुझे कतई अंदेशा नहीं था, क्योंकि इसी तरह के कई अन्य प्रस्ताव भी थे, जिनमें साइप्रस और लेबनान में शरणार्थियों और यमन के बाढ़-प्रभावित इलाकों में लोगों को स्वास्थ्य-संबंधी मदद करने की मांग की गई थी।
जब यह एजेंडा सामने रखा गया, विश्व स्वास्थ्य संगठन के पूर्व महानिदेशक हाफडेन महलर उस समय मंच पर मेरे साथ थे। फलस्तीन के प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख को मैंने इसे पेश करने की अनुमति दी। अन्य बातों के साथ-साथ एजेंडा नोट में इस विषय से जुड़ी एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का संदर्भ दिया गया था, और फलस्तीन मुक्ति संगठन, इजरायल के स्वास्थ्य मंत्रालय और फलस्तीनी शरणार्थियों को राहत देने के लिए बनी एक खास संयुक्त राष्ट्र एजेंसी की रिपोर्टों का जिक्र था। प्रस्ताव में न सिर्फ कब्जे वाले क्षेत्र में विश्व स्वास्थ्य संगठन की निगरानी में स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना की मांग की गई थी, बल्कि इस मामले में संयुक्त राष्ट्र महासभा के पहले के प्रस्ताव का भी संदर्भ दिया गया था। इससे पहले कि मैं इस विषय पर संबोधित करने के लिए अगले प्रतिनिधि को बुलाता, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख डॉ जॉन ब्रायंट (वह कार्यकारी समिति के सदस्य भी थे) तुरंत अपनी बात रखने की मांग करने लगे, जबकि आमतौर पर प्रस्ताव पेश करने वाले देश के सभी प्रतिनिधियों के संबोधन के बाद ही कोई अन्य सदस्य टिप्पणी करता है।
ब्रायंट को प्रस्ताव के एक हिस्से पर गंभीर आपत्ति थी। उनका मानना था कि यदि इसे स्वीकार कर लिया जाता है, तो इजरायल की सदस्यता से जुड़े अधिकार प्रभावित होंगे। उन्होंने एलान कर दिया कि इस मामले पर यदि और चर्चा की गई, तो उनका देश इसी समय अपनी आर्थिक सहायता रोक देगा और विश्व स्वास्थ्य संगठन से बाहर निकल जाएगा। उस समय विश्व स्वास्थ्य संगठन का आधा बजट अमेरिकी इमदाद पर निर्भर था। जैसे ही ब्रायंट ने अपनी बात पूरी की, इजरायल और कई अन्य देशों के प्रतिनिधि खड़े होकर अमेरिकी रुख का समर्थन करने लगे। जवाब में, फलस्तीन और कई अरब व अफ्रीकी देशों के प्रतिनिधि भी खड़े होकर फलस्तीन के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करने लगे। यह एक अप्रत्याशित स्थिति थी।
चूंकि बार-बार अनुरोध के बावजूद शांति नहीं बन पा रही थी, इसलिए मैंने सत्र को थोड़ी देर के लिए रोक दिया। महलर के साथ एक संक्षिप्त चर्चा करने के बाद मैं असेंबली हॉल में गया और अगले डेढ़ घंटे तक उन तमाम प्रतिनिधियों से बात की, जो इस विवाद में शामिल थे। बातचीत में मैंने पाया कि वे सहमति बनाने को तैयार नहीं हैं। मुझे लगा कि यदि स्थिति को यूं ही बेकाबू होने दिया गया, तो मेरी अध्यक्षता में विफलता का दाग लगेगा, साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। मंच पर वापस आकर, मैंने घोषणा की कि मेल-मिलाप का मेरा प्रयास जारी रहेगा और समिति अगली सुबह तय वक्त पर बैठेगी। अगले 12 घंटे तक मैंने दोनों पक्षों के प्रमुखों के साथ गंभीर विचार-विमर्श किया और महासभा में शामिल कई ख्यात स्वास्थ्य मंत्रियों से भी मिला। देर शाम वहां पहुंचे फलस्तीन के सम्मानित नेता यासर अराफात से भी मैंने मुलाकात की।
अरब, अफ्रीकी, इजरायली, अमेरिकी और अन्य तमाम संबंधित प्रतिनिधिमंडलों के साथ कई दौर की बातचीत के बाद मुझे उनके रुख को नरम करने में सफलता मिली। मूल प्रस्ताव को नए सिरेसे तैयार करने पर मैंने उन्हें राजी कर लिया। अगली सुबह जब मैंने बैठक की शुरुआत की, तब तक हॉल में शांति छा चुकी थी। मैंने पिछले दिन के अपने प्रयासों और मूल प्रस्ताव में किए गए बदलाव के बारे में संक्षिप्त में बताया। उसके बाद संशोधित प्रस्ताव पढ़ा और पूछा कि किसी को आपत्ति तो नहीं? कहीं से कोई विरोध नहीं हुआ। लिहाजा, मैंने प्रस्ताव के पारित होने की घोषणा की और अगले एजेंडा पर बात करने के लिए अपना गैवल (बेंच को पीटने वाला हथौड़ा) मारा। हम सभी ने राहत की सांस ली, और इस तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन को बचा लिया गया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) एनएन वोहरा, पूर्व राज्यपाल

 

//कंटेनमेंट जोन को छोड़कर जिले में सभी शासकीय कार्यालय संचालित होंगे
//विवाह समारोह में अधिकतम 50 और अंतिम संस्कार में अधिकतम 20 व्यक्तियों को शामिल होने की मिलेगी अनुमति: एसडीएम और तहसीलदार देंगे अनुमति
//दुकानें और व्यावसायिक संस्थान सप्ताह के छह दिन सवेरे 7 बजे से शाम 7 बजे तक खुले रहेंगे
//स्ट्रीट वेंडरों के लिए स्थानीय निकाय तय करेंगे स्थान और समय
//अंतर्राज्यीय बसों का परिचालन प्रतिबंधित रहेगा
रेड और आरेंज जोन का निर्धारण स्वास्थ्य विभाग द्वारा किया जाएगा
//प्रत्येक क्वारेंटीन सेंटर के लिए प्रभारी अधिकारी और क्वारेंटीन सेंटर के समूहों की निगरानी के लिए जोनल अधिकारी तैनात किए जाएंगे

    रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री बघेल की अध्यक्षता में गत दिवस आयोजित उच्च स्तरीय बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार राज्य शासन द्वारा आर्थिक गतिविधियों के संचालन, क्वारेंटीन सेंटर्स की व्यवस्थाओं, रेड, आरेंज जोन निर्धारण के संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए है। जारी निर्देशों के अनुसार मई माह के अंतिम शनिवार-रविवार को होने वाले पूर्ण लॉकडाउन को निरस्त कर दिया गया है। इसलिए आगामी शनिवार और रविवार को पूर्ण लॉकडाउन नहीं रहेगा। सभी दुकानें और संस्थान जो भारत सरकार के गृह मंत्रालय अथवा राज्य सरकार द्वारा प्रतिबंधित नहीं हैं वे सप्ताह के छह दिन सुबह सात बजे से शाम सात बजे तक खुली रहेंगी।
दुकानें और व्यावसायिक संस्थान पहले की तरह खुलेंगी लेकिन वर्तमान में जारी समय सीमा और सप्ताहिक अवकाश का पालन करना होगा। बाजार पूर्व में निर्धारित दिनों और व्यवस्था के अनुसार वर्तमान में तय समय के अनुसार खोले जाएंगे। बहुत घने बाजारों में भीड़ को कम करने के लिए स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएंगी। सड़क किनारे सामान बेचने वालों (स्ट्रीटवेंर्डस) के लिए स्थानीय निकायों द्वारा स्थान और समय का निर्धारण कर फिजिकल डिस्टेंस का पालन सुनिश्चित किया जाएगा। इन व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय व्यापारी संघों के साथ चर्चा के निर्देश दिए गए हैं।
व्यावसायिक आटो और टैक्सियों का परिचालन 28 मई से परिवहन विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार शुरू हो गया है। अंतर्राज्यीय व्यावसायिक बसों और अंतर्राज्यीय व्यावसायिक टैक्सियों का परिचालन आगामी आदेश तक प्रतिबंधित रहेगा। अंतर्राज्यीय आवागमन ई-पास के जरिए हो सकेगा। ई-पास एप को विभिन्न श्रेणियों के लिए स्वचालित रूप से ई-पास जारी करने के लिए अपडेट किया गया है। टेऊन, टैक्सी, ऑटो एवं बस से यात्रियों को चिन्हित मार्ग से उनके गंतव्य तक जाने की अनुमति दी जाएगी। इन वाहनों में यात्रियों की संख्या बैठक क्षमता से अधिक न हो और यात्रियों को अनिवार्य रूप से मॉस्क पहनना होगा और फिजिकल डिस्टेंस बनाए रखना होगा।
रेड और आरेंज जोन का निर्धारण स्वास्थ्य विभाग द्वारा किया जाएगा, लेकिन कंटेनमेंट जोन की सीमा का निर्धारण जिला कलेक्टरों द्वारा किया जाएगा। बैठक में यह निर्णय भी लिया गया कि क्वारेंटीन सेंटर्स में सुरक्षा के सभी उपाय सुनिश्चित किए जाए। भवनों के बाहर आवागमन नियंत्रित किया जाए। क्वारेंटीन सेंटर्स में रूकने वालों को बरामदे में खुले में नही सोने दिया जाए। दरवाजे के नीचे खुले हिस्से को ढक कर रखा जाए। सांप और बिच्छु से बचाव के उपाय सुनिश्चित किए जाए। असुरक्षित क्वारेंटीन सेंटर्स को सुरक्षित भवनों और स्थानों पर शिफ्ट किया जाए। क्वारेंटीन सेंटर्स में कमरों के अंदर आवश्यकतानुसार कुलर और अतिरिक्त पंखों की व्यवस्था सुनिश्चित किया जाए। खाने की गुणवत्ता, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छ शौचालय आदि सुविधाओं का ध्यान रखा जाए। क्वारेंटीन सेंटर्स पर योग प्रशिक्षण और आउटडोर एक्टिविटी और खेल गतिविधियां भौतिक दूरी का ध्यान रख आयोजित की जा सकती हैं। इसके लिए कलेक्टर, एनजीओ और वालेंटियर्स की मदद ले सकते हैं। क्वारेंटीन सेंटर्स में रहने वालों के लिए दैनिक गतिविधियां तय की जाए। क्वारेंटीन सेंटरों की निगरानी के लिए जोनल अधिकारी नियुक्त किए जाए। प्रत्येक क्वारेंटीन सेंटर के लिए प्रभारी अधिकारी रखा जाए जो वहां उपलब्ध सुविधाओं के साथ-साथ सेंटर में रहने वाले की स्वास्थ्य जांच और कोरोना टेस्ट की निगरानी रखेंगे। इन निर्देशों के पालन के लिए प्रभारी अधिकारी जिम्मेदार होंगे। इन कार्यो में स्थानीय ग्राम पंचायत सचिव और स्थानीय लोगों की सहायता ली जा सकती है।
क्वारेंटीन सेंटर में रहने वाले जो लोग 14 दिनों की क्वारेंटीन अवधि सफलतापूर्वक पूरी कर लिए हो और जिनमें कोई लक्षण नहीं हैं उन्हें घर जाने की अनुमति दी जाए। यदि किसी में लक्षण मिलते हैं तो उनका टेस्ट निर्धारित एसओपी के अनुसार सुनिश्चित किया जाए। स्थानीय सरपंच और ग्राम पंचायत सचिव यह सुनिश्चित करेंगे कि घर जाने वाले लोग अगले सात से दस दिन तक अपने घरों में ही रहें। कलेक्टर क्वारेंटीन सेंटर्स में रहने वाले लोगों को तनाव मुक्त करने के लिए काउंसलर्स और मनोवैज्ञानिकों की सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास करेंगे। क्वारेंटीन सेंटर्स में लोगों के मनोरंजन के लिए टेलीविजन उपलब्ध कराए जाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
क्वारेंटीन कैम्प में रूके श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उनकी स्किल मेपिंग की जाएगी। इनमें से बहुत से श्रमिकों के कौशल के बारे में जानकारी रजिस्ट्रेशन के समय दी गई है। इस संबंध में श्रम, कौशल विकास विभाग और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के सचिव द्वारा आवश्यक कार्यवाही की जाएगी। श्रम विभाग द्वारा ऐसे श्रमिकों का रजिस्ट्रेशन किया जाएगा जिनका अब तक रजिस्ट्रेशन नही हुआ है। श्रमिकों का मनरेगा कार्ड, राशन कार्ड, श्रमिक कार्ड बनाए जाएंगे। श्रमिकों का स्किल डेव्हलपमेंट, स्थानीय उद्योगों में रोजगार और सड़क निर्माण जैसे काम दिलाने के लिए रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। श्रमिकों के बच्चों के स्कूली शिक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन किया जाएगा। जिला पंचायतों को मनरेगा के अंतर्गत धान उपार्जन केन्द्रों पर पक्के चबूतरे निर्धारित मापदंड के अनुसार स्वीकृत करने के साथ मनरेगा में अधिक से अधिक कार्य प्रारंभ करने के निर्देश दिए गए हैं, जिससे अधिक से अधिक श्रमिकों को बारिश के पहले रोजगार दिया जा सके।
औद्योगिक एवं व्यापारिक गतिविधियों के लिए आने वाले यात्रियों को यदि वे बताते हैं कि वे फैक्ट्री के मेंटेनेेस आदि कार्य के आ रहे हैं, उनके आने जाने के स्थान की जानकारी देने तथा आवेदन करने पर अनिवार्य क्वारेंटीन से छूट दी जा सकती है। कम समय के लिए आने वाले यात्रियों के लिए जिनके पास वापस जाने का कंफर्म टिकट है। उन्हें भी जानेे की अनुमति दी जा सकती है। यह भी प्रस्तावित किया गया है कि स्कूलों को एक जुलाई से प्रारंभ किया जाए इसलिए स्कूल खुलने के पहले स्कूलों को क्वारेंटीन सुविधा हटाकर भवन का सेनेटाईजेशन स्वास्थ्य विभाग से कराना सुनिश्चित किया जाए। विवाह और अंतिम संस्कार के लिए अनुमति देने के अधिकार एसडीएम और तहसीलदारों को देने का निर्णय लिया गया है। विवाह समारोह में अधिकतम 50 लोगों को और अंतिम संस्कार में अधिकतम 20 लोगों को शामिल होने की अनुमति दी जाएगी। प्रदेश के एक जिले से दूसरे जिले में जाने वाले श्रमिकों को क्वारेंटीन में नही रखा जाए। पिछले कुछ दिनों में छत्तीसगढ़ से दूसरे राज्यों में जा चुके श्रमिकों को यह छूट नही मिलेगी। कंटेनमेंट जोन को छोड़कर जिले में सभी शासकीय कार्यालय संचालित होंगे।

दुर्ग / शौर्यपथ / विधायक अरुण वोरा ने पटरीपार क्षेत्र का औचक दौरा किया जहां आदित्य नगर व जवाहर नगर क्षेत्र के निवासियों ने पेयजल संकट की शिकायत की। वार्ड वासियों ने बताया कि तीन दिन से पेयजल आपूर्ति बाधित है नल 10 मिनट से कम समय के लिए खुल रहा है साथ ही अमृत मिशन से पाइप लाइन डालने का कार्य भी बेहद धीमी गति से चल रहा है। जगह जगह खोदे गए गड्ढों का मलबा भी नहीं उठाया जा रहा है।
विधायक वोरा ने तत्काल टैंकर बुलवा कर लोगों की समस्या का निराकरण किया साथ ही निगम अधिकारियों को निर्देश दिए कि भीषण गर्मी के समय में कहीं भी पेयजल के लिए भटकाव की स्थिति नहीं बननी चाहिए। फिल्टर प्लांट में बार बार खराब होने वाले पम्प की जगह नए पम्प खरीदे जाएं। अमृत मिशन के कार्यों में लगातार मिल रही शिकायत पर उन्होंने नगरीय निकाय सचिव अलरमेल मंगई डी से चर्चा कर कहा कि मिशन के कार्यों में लेटलतीफी से आम जनता को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
26 माह में किसी भी वार्ड में नल कनेक्शन प्रदाय सौ प्रतिशत पूर्ण नहीं हो सका है। जिसपर निकाय सचिव ने राज्य स्तरीय टीम भेज कर मॉनिटरिंग करवाने आश्वस्त किया।

मुख्यमंत्री ने रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव, जांजगीर-चांपा और रायगढ़ कलेक्टर को दिए निर्देश

      रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि छत्तीसगढ़ से होकर गुजरने वाली श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के राज्य में ठहरने वाले स्टेशनों में प्रवासी श्रमिकों के लिए बिस्किट और पानी पाउच की समुचित व्यवस्था की जाएगी। मुख्यमंत्री ने इसके लिए रायपुर, बिलासपुर, राजनांदगांव, जांजगीर-चांपा और रायगढ़ कलेक्टर को निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा है कि लॉकडाउन के कारण प्रवासी श्रमिकों के लिए रेल्वे स्टेशनों में भोजन-पानी की कोई व्यवस्था नही है और न ही वो टेऊनों से उतर पा रहे है। ऐसी स्थिति में उन्हें बिस्किट और पानी के पाउच आदि मुहैया कराने से काफी राहत मिलेगी।
मुख्यमंत्री ने जिला कलेक्टरों से कहा है कि अन्य राज्यों में फंसे प्रवासी श्रमिकों की उनके गृह राज्यों में वापसी के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलायी जा रही है। ऐसी श्रमिक स्पेशल ट्रेने जो छत्तीसगढ़ से होकर गुजरेंगी यदि आपके जिले में रूकती है तो कम से कम एक मुख्य स्टेशन में इन प्रवासी श्रमिकों के लिए पर्याप्त संख्या में बिस्किट और पानी पाउच की व्यवस्था की जाए। ट्रेन के स्टेशन पर रूकते ही तत्काल यात्रियों को इसके वितरण की व्यवस्था की जाए।
वितरण के लिए आवश्यक दल गठित कर लिए जाएं, साथ ही इस कार्य में वालिंटियर्य का सहयोग भी लिया जाए। सामग्री के वितरण का सुपरविजन जिला प्रशासन के अधिकारियों द्वारा किया जाएगा। बिस्किट या अन्य खाद्य सामग्रियों को उचित ढंग से संग्रहित किया जाए ताकि वो खराब न हो सके। मुख्यमंत्री ने कहा है कि यह व्यवस्था तत्काल सुनिश्चित की जाए।

// राजीव भवन में कांग्रेस संचार विभाग से भी अनेक नेता लाइव से जुड़े
गरीबों जरूरतमंदों को प्रति परिवार 10000 रू. की तत्काल सहायता की मांग
// 6 माह तक प्रतिमाह 7500 रू. न्याय की मदद की मांग
20 लाख करोड़ के कोरोना पैकेज से मोदी के चंद चहेते उद्योगपतियों की सहायता हुयी : सरकारी कंपनियां इन्हीं को बेचने का फैसला कोरोना पैकेज से है
// मध्यम वर्ग, गरीबों, मजदूर, किसानो, रिक्शे, ठेले वालो, खोमचा वालो, आटो वालो, निजी नौकरी करने वालों, रोज कमाने खाने वालों को क्या मिला?
// कांग्रेस की मांग : मदद की जरूरत जिनको है उनको मदद दी जाये


    रायपुर / शौर्यपथ / इंडिया स्पीक कार्यक्रम में पूरे देश के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम सहित सभी राज्यसभा सदस्य, लोकसभा सांसद, महापौर, विधायक, वरिष्ठ नेता, कांग्रेसजन, सभी मोर्चा संगठन एनएसयुआई, युवा कांग्रेस, महिला कांग्रेस, सेवादल, जिला कांग्रेस अध्यक्ष, ब्लाक कांग्रेस अध्यक्ष, प्रदेश संचार विभाग के सदस्यगण एवं प्रवक्तागण फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम सहित सभी सोशल प्लेटफार्म में मोदी सरकार से जरूरतमंदों की मांग रखी। राजीव भवन में कांग्रेस संचार विभाग से भी अनेक नेता लाइव से जुड़े। प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने कहा है कि 20 लाख करोड़ के कोरोना पैकेज से सिर्फ मोदी के चंद चहेते उद्योगपतियों की सहायता हुयी। सरकारी कंपनियां इन्हीं को बेचने का फैसला कोरोना पैकेज से है।
प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने पूछा है कि मध्यम वर्ग, छोटे दुकानदारों, काम धंधा करने वालों, गरीबों, मजदूर, किसानो, रिक्शे, ठेले वालो, खोमचा वालो, आटो वालो, निजी नौकरी करने वालों, रोज कमाने खाने वालों को क्या मिला? कांग्रेस की मांग है कि मदद की जरूरत जिनको है उनको दी जाये। आज फेसबुक लाइव में जाके हम कांग्रेस के लोगों ने 10 हजार रू. की तत्काल सहायता गरीबों को जरूरतमंदों को देने की मांग की है। इसके साथ-साथ 7500 रू. 6 महिनों तक गरीबों को देने की मांग हम केन्द्र की मोदी सरकार से करते है। 20 लाख करोड़ का पैकेज और इस पैकेज में गरीबों को क्या मिला? छोटे दुकानदारों को क्या मिला? मध्यम वर्ग को क्या मिला? रोज खाने वाले रोज कमाने वाले, निजी नौकरी करने वालों को क्या मिला? इन लोगो को आज पैसा दिया जाना समय की जरूरत है।
जो मजदूर बेबसी में भूखे प्यासे बिना रोजी रोटी के अपनी गाढ़ी पूंजी गंवा के प्रदेश में फंसे हुये है, बाहर के प्रदेशों में फंसे हुये है। वे अपने घर, गांव और प्रदेश आना चाहते है, केन्द्र की मोदी सरकार तत्काल उन्हें घर गांव तक पहुंचाने की व्यवस्था करें। ये मांग कांग्रेस पार्टी के लाखों कार्यकर्ता सोशल मीडिया में कर रहे है। लाइव जाके कर रहे है। ये एक प्रकार की सोशल रिवाल्यूशन है। सोशल मीडिया में जाके गरीब मजदूर बेबस जरूरतमंद की आवाज उठाने का फैसला कांग्रेस पार्टी ने लिया है। जिसे आज व्यापक समर्थन मिला।

अवधेश टंडन की रिपोर्ट
जांजगीर-चांपा(हसौद) / शौर्यपथ / जांजगीर-चांपा जिले के जैजैपुर ब्लाक अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत हसौद सहित आसपास के किसान व ग्रामीण इन दिनों काफी परेशान नजर आ रहे हैं और हो भी क्यों ना क्योंकि पिछले कई महीनों से हसौद उपतहसील अंतर्गत पटवारी हल्का नम्बर 38 में पटवारी को प्रभार नही मिला है जिससे किसानों का जमीन संबंधी काम नही हो पा रहा है।
आपको बता दें कि जैजैपुर ब्लॉक अंतर्गत हसौद एक बड़ा ग्राम पंचायत है,साथ ही उपतहसील भी है। जिससे कई ग्राम पंचायतों का काम यही से होता है और यहां हर रोज कई किसान सहित ग्रामीण अपनी जमीन संबंधी कामों को कराने आते है। परंतु यह इस क्षेत्र का दुर्भाग्य हैं कि पिछले कई महीनों से उपतहसील के पास बने कार्यालय में हसौद पटवारी हल्का नम्बर 38 में पटवारी देव कश्यप को प्रभार नही मिला है जिससे किसानों सहित आम ग्रामीणों का जमीन संबंधी कोई काम नही हो पा रहा है। वही पटवारी देव कश्यप पहले से ग्राम पंचायत धमनी के पटवारी पद पर नियुक्त है। साथ ही उनको हसौद जैसे बड़े ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी दी गयी है हालांकि अब तक उन्हें पूर्व पटवारी द्वारा प्रभार नही दिया गया है जिससे जाति ,आमदनी,निवास जैसे छोटे कामो को छोड़कर अन्य जमीन संबंधी काम नही कर पा रहे है उप तहसील हसौद के ठीक बगल में पटवारी कार्यालय होने के बाद भी अधिकारी कुम्भकर्णी निद्रा में सोए हुए है। जिसके कारण अब तक पटवारी देव कश्यप को हसौद हल्का नम्बर 38 का प्रभार नही मिला है ।
यहां पूर्व में आर आई व पटवारी के पद पर एक ही अधिकारी पदस्थ थे जिनके साले के द्वारा हसौद पटवारी कार्यालय में ही ग्रामीणों से प्रत्येक काम के लिए अवैध वसूली किए जाने की खबर लगने के बाद प्रशासन हरकत में आया और पटवारी पर कार्रवाई करते हुए उन्हें सस्पेंड किया गया जिसके बाद देव कश्यप को हसौद हल्का नम्बर 38 की जिम्मेदारी दी गई पर अब तक उन्हें प्रभार नही दिया गया जिससे कई तरह के सवाल खड़ा होता है। क्या अधिकारियों को हसौद के ग्रामीणों को होने वाली परेशानियों से कोई सरोकार नही है।
वैसे भी किसान और ग्रामीण जिनको जमीन खरीदी बिक्री या जमीन संबंधित अन्य काम के लिए भटकना पड़े इससे अधिकारियों को क्या मतलब, वो तो एसी के कमरे में बैठ कर अपना काम करते है। एक तो किसान और ग्रामीण कोविड 19 के कारण परेशान है तो वही दूसरी ओर हसौद उपतहसील में हल्का नम्बर 38 में पटवारी के पास प्रभार न होने से लोगों का जमीन संबंधी कामों के लिए भटकना पढ़ रहा है जिससे किसानों एवं ग्रामीणों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है।
जिम्मेदारो को नही है, प्रभार नही दिए जाने की जानकारी या बन रहे अनजान
हसौद उपतहसील के जिम्मेदार अधिकारी को भी मालूम नही है कि देव कश्यप को अब तक हल्का नम्बर 38 का प्रभार मिला है या नहीं, नियुक्ति आदेश जारी कर अधिकारी अपनी जिम्मेदारीयों से पल्ला झाड़ लिये शायद यही वजह है कि जिम्मेदार अधिकारी पटवारी को कोविड 19 के कारण व्यस्त और अन्यत्र जिम्मेदारी निभाने की बात कही जा रही है।
कार्यालय के दीवाल में लिखा है अब तक पूर्व पटवारी का नाम
हसौद के हल्का नम्बर 38 के पटवारी कार्यालय में अब तक पूर्व पटवारी श्यामसिंह मरकाम का नाम व नम्बर लिखा हुआ है जिससे किसान भ्रमित होते हैं। और आज भी उन्हें पटवारी मरकाम का इंतजार रहता है।

 

हसौद हल्का नम्बर 38 में देव कश्यप पटवारी के प्रभार में है और अभी कोविड-19 के महामारी के कारण कही कही ड्यूटी लगने से नही आ पा रहे होंगे।
के के पाटनवार
हसौद तहसीलदार

हसौद पटवारी हल्का नम्बर 38 की जिम्मेदारी मुझे मिली है पर पूर्व पटवारी द्वारा अब तक प्रभार नही दिया गया है जिस कारण किसानों का जमीन संबंधी काम नही हो पा रहा है जाती, आमदनी, निवास जैसे कामों को कर रहा हूं।
देव कश्यप
प्रभारी पटवारी हसौद

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