
CONTECT NO. - 8962936808
EMAIL ID - shouryapath12@gmail.com
Address - SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)
Google Analytics —— Meta Pixel
दुर्ग। शौर्यपथ विशेष
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जहां प्रदेश में सुशासन का ढोल पीट रहे हैं, वहीं दुर्ग नगर पालिक निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की कार्यप्रणाली जमीनी हकीकत को पूरी तरह झुठलाती नजर आ रही है। शहर में अवैध कब्जाधारियों और गैर अनुमति प्राप्त बाजारों पर जिस तरह निगम प्रशासन ने मौन समर्थन की मुद्रा अपना ली है, वह न केवल प्रशासनिक निष्क्रियता का प्रमाण है बल्कि आने वाले समय में एक बड़े शहरी विवाद की पटकथा भी लिख रही है।
दुर्ग जिले के नागरिक सुपेला संडे बाजार की कहानी से भलीभांति परिचित हैं—जब बाजार छोटा था तब प्रशासन ने आंख मूंद ली, और जब वह विकराल हो गया तो हटाने में जिला प्रशासन और भिलाई नगर निगम को पसीने आ गए। व्यापारियों में विवाद हुआ, कानून व्यवस्था प्रभावित हुई, लेकिन आज भी वह बाजार वैधानिक अनुमति के बिना संचालित होता दिखाई देता है।
अब वही गलती दुर्ग में दोहराई जा रही है
दुर्ग नगर निगम मुख्य कार्यालय के पीछे चर्च रोड क्षेत्र में शनिवार को बिना किसी अनुमति के अवैध बाजार का संचालन प्रारंभ हो चुका है। महज दो महीनों में यह बाजार चर्च चौक से सुराना कॉलेज मार्ग तक फैल चुका है। शुरुआत छोटे स्तर पर हुई, लेकिन अब इसमें भिलाई के व्यापारियों का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय व्यापार और यातायात दोनों पर असर पडऩे लगा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि निगम प्रशासन को इस अवैध बाजार की पूरी जानकारी होने के बावजूद अतिक्रमण विभाग द्वारा व्यापारियों से गंदगी के नाम पर ?50 शुल्क वसूली शुरू कर दी गई है। सवाल यह उठता है कि जब बाजार अवैध है, तो निगम किस अधिकार से शुल्क वसूल रहा है? क्या यह अवैध गतिविधियों को वैधानिक जामा पहनाने की कोशिश नहीं है?
छोटे कर्मचारियों पर सख्ती, बड़े अतिक्रमण पर मौन
शहर में यह चर्चा आम है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल छोटी-छोटी बातों पर कर्मचारियों को नोटिस थमाने में अपनी प्रशासनिक व संवैधानिक शक्तियों का भरपूर उपयोग करते हैं, लेकिन अवैध बाजार और बढ़ते अतिक्रमण के मामलों में उनकी भूमिका पूरी तरह निष्क्रिय दिखाई देती है।
पिछले छह महीनों से कपड़ा लाइन का अतिक्रमण हटाने में निगम प्रशासन पूरी तरह विफल रहा है, जबकि 'मोर शहर मोर जिम्मेदारीÓ योजना के तहत सौंदर्यीकरण कार्य कर रही संस्था को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। शहर के लगभग हर क्षेत्र में अतिक्रमण का बोलबाला है, लेकिन प्रेस विज्ञप्तियों में "सख्त कार्रवाई" के दावे किए जा रहे हैं।
आखिर किसे गुमराह कर रहे हैं आयुक्त?
सवाल यह है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल इन दावों से किसे गुमराह कर रहे हैं—शहर की जनता को, जिला प्रशासन को या प्रदेश सरकार को? एक प्रशासनिक अधिकारी का कार्यकाल भले ही अधिकतम तीन वर्ष का हो, लेकिन इस दौरान जो अतिक्रमण जड़ जमा लेगा, उसे हटाने में आने वाले समय में प्रशासन को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
राजनीतिक मौन भी सवालों के घेरे में
और भी आश्चर्यजनक यह है कि जब शहर में भाजपा की शहरी सरकार है, स्थानीय विधायक प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, तब भी अतिक्रमण के बढ़ते स्तर पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले विधानसभा चुनावों में यही अतिक्रमण सत्ताधारी दल के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
सुशासन की कसौटी पर दुर्ग नगर निगम
यदि मुख्यमंत्री का सुशासन केवल फाइलों और मंचों तक सीमित नहीं है, तो दुर्ग नगर निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा अनिवार्य है। अन्यथा यह कहा जाना गलत नहीं होगा कि दुर्ग में सुशासन नहीं, बल्कि 'मौन समर्थन का शासनÓ चल रहा है, जहां अवैध कब्जाधारी फल-फूल रहे हैं और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।
नगर निगम की राजनीति में ‘पोस्टर से गायब चेहरा’ बन गया नया संकेत;
शहर की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक छिड़ी बहस — क्या टूट रही है सरकार और निगम की साझी तालमेल की डोर?
दुर्ग। शौर्यपथ।
राजनीति में चेहरे बहुत कुछ कह जाते हैं — खासकर तब, जब किसी आयोजन या उत्सव की तस्वीरों में कोई चेहरा जानबूझकर गायब किया गया हो। ऐसी ही एक तस्वीर ने आज दुर्ग की नगर राजनीति में नए विवाद को जन्म दे दिया है। नगर निगम दुर्ग की महापौर श्रीमती अलका बाघमार ने हाल ही में जीएसटी-2 बी फार्मा उत्सव पर सोशल मीडिया पर खुशी जाहिर करते हुए एक पोस्ट साझा की। लेकिन इस पोस्ट में सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि उसमें प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री और दुर्ग विधानसभा क्षेत्र के विधायक गजेन्द्र यादव की तस्वीर नदारद थी — जबकि उसी पोस्ट में दूसरे नेताओं और जनप्रतिनिधियों को स्थान मिला।
इस एक ‘गायब चेहरे’ ने अब पूरे शहर में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक चर्चा यही है कि आखिर महापौर और मंत्री के बीच ठंडी जंग क्यों चल रही है?
? क्या यह दूरी सिर्फ राजनीतिक है या व्यक्तिगत भी?
महापौर अलका बाघमार और मंत्री गजेन्द्र यादव, दोनों ही एक ही दल से आते हैं। इसके बावजूद दोनों के बीच संबंधों में रंजिश और दूरी लंबे समय से सुर्खियों में रही है। जानकारों का कहना है कि नगर निगम के कई विकास कार्यों और बजट अनुमोदन के दौरान भी महापौर ने मंत्री की सिफारिशों को नज़रअंदाज़ किया था।
अब जब महापौर ने सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया पोस्ट में मंत्री को दरकिनार कर दिया, तो यह संकेत काफी गहरे हैं — मानो यह कहा जा रहा हो कि “निगम अब अपने बूते चलेगा।”
? क्या विकास की गाड़ी अब पटरी से उतर रही है?
शहर की मौजूदा स्थिति इस राजनीतिक खींचतान की कीमत चुका रही है।
मुख्य मार्गों पर फैला कचरा, सड़कों के गड्ढे, जगह-जगह जलभराव, और स्ट्रीट लाइटों के बंद रहने से नागरिक परेशान हैं।
आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या, निर्माण कार्यों की धीमी रफ्तार और भ्रष्टाचार के आरोपों ने नगर निगम की छवि को इतिहास की सबसे बदहाल स्थिति में पहुँचा दिया है।
दीपावली के ठीक पहले ठेकेदारों को बकाया भुगतान में भी भारी कटौती ने हालात और बिगाड़ दिए। ठेकेदारों को “10–20 प्रतिशत” भुगतान कर संतोष कराने की कोशिश हुई, परंतु बाकी राशि के अभाव में कई काम ठप पड़ गए।
? जनता के मन में सवाल – “क्या अकेले महापौर शहर संभाल लेंगी?”
जनता के बीच यह चर्चा तेज है कि अगर महापौर अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरियां बनाए रखेंगी, तो क्या निगम को प्रदेश सरकार का सहयोग मिल पाएगा?
राज्य सरकार की योजनाओं, निधियों और विकास कार्यों में तालमेल आवश्यक है — और यदि यह तालमेल टूट गया, तो उसका सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा।
? “पोस्टर पॉलिटिक्स” का संदेश क्या है?
राजनीति में कहा जाता है कि पोस्टर से गायब चेहरा, रिश्तों की सच्चाई बयान कर देता है।
महापौर की पोस्ट में मंत्री का नाम या तस्वीर शामिल न करना सिर्फ एक सोशल मीडिया घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश है। यह संदेश साफ है — दुर्ग नगर निगम की प्रमुख अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान गढ़ने के रास्ते पर हैं।
परंतु सवाल यह भी है कि क्या इस स्वतंत्रता का खामियाजा शहर भुगतेगा?
क्या दुर्ग का विकास अब राजनीतिक अहंकार और व्यक्तिगत टकराव के बीच कुर्बान हो जाएगा?
? निष्कर्ष:
दुर्ग की जनता ने महापौर अलका बाघमार को नगर निगम का नेतृत्व इस उम्मीद से सौंपा था कि वे शहर को विकास की नई दिशा देंगी।
परंतु आज शहर की तस्वीर कुछ और कहती है — सड़कों पर गड्ढे हैं, गलियों में अंधेरा है, और सोशल मीडिया पर ‘गायब चेहरे’ की बहस जारी है।
ऐसे में यह सवाल अब और गहरा हो गया है कि —
> “क्या महापौर अलका बाघमार अपनी ही सरकार के मंत्री से दूरी बनाकर, दुर्ग के विकास की धारा को आगे बढ़ा पाएंगी?”
दुर्ग। शौर्यपथ।
नगर निगम दुर्ग प्रशासन में एक बार फिर सख्ती के संकेत नजर आ रहे हैं। निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल ने सहायक ग्रेड-3 कर्मचारी शुभम गोईर को कंप्यूटर के आदान-प्रदान के दौरान उपकरण गायब होने के मामले में 24 घंटे के भीतर जवाब प्रस्तुत करने का नोटिस जारी किया है। जवाब नहीं देने पर दंडात्मक कार्यवाही के निर्देश दिए गए हैं।
यह नोटिस जारी होने के बाद अब निगम कर्मचारियों में चर्चा का विषय यह बन गया है कि क्या इसी तरह की सख्ती तात्कालिक बाजार अधिकारी थान सिंह यादव पर भी दिखाई जाएगी?
ज्ञात हो कि वर्ष 2021-22 में पार्किंग घोटाले से संबंधित प्रकरण में लगभग ₹80,000 की राजस्व वसूली के लिए तात्कालिक बाजार अधिकारी थान सिंह यादव को नोटिस जारी किया गया था, लेकिन अब तक उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इसके अलावा गौरव पथ पर विज्ञापन बोर्ड के गलत साइज और आकलन के मामले में भी थान सिंह यादव का नाम चर्चा में रहा है।
वहीं दूसरी ओर, शुभम गोईर पर बीते तीन-चार महीनों में आयुक्त अग्रवाल द्वारा लगभग डेढ़ दर्जन नोटिस जारी किए जा चुके हैं और वे वर्तमान में निलंबन की स्थिति में हैं। आयुक्त की यह कार्यवाही निगम प्रशासन में अनुशासन की कसावट के रूप में देखी जा रही है।
अब कर्मचारियों के बीच यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या यह सख्ती सिर्फ एक कर्मचारी तक सीमित रहेगी या फिर आयुक्त अग्रवाल निष्पक्ष प्रशासनिक सिद्धांतों का पालन करते हुए विवादित मामलों में शामिल अन्य अधिकारियों पर भी कार्रवाई करेंगे?
फिलहाल, सभी की निगाहें आयुक्त सुमित अग्रवाल के अगले कदम पर टिकी हैं — क्या थान सिंह यादव जैसे विवादित अधिकारी पर भी कार्यवाही होगी या फिर निगम प्रशासन एक बार फिर मौन साध लेगा?
नगर निगम कार्यालय में फिलहाल यही चर्चा जोरों पर है।
कोंडागांव / शौर्यपथ /
कोंडागांव जिला मुख्यालय से महज 7–8 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत ककोडी में स्थित दंतेश्वरी मक्का प्लांट इन दिनों ग्रामीणों के लिए काल साबित हो रहा है। मंगलवार सुबह ग्रामवासियों ने प्लांट परिसर में घुसकर जोरदार प्रदर्शन किया और तत्काल इसे बंद करने की मांग की। मौके पर पहुंची प्रशासनिक टीम ने समझाइश देकर स्थिति को काबू में किया, लेकिन ग्रामीणों का गुस्सा और भय अभी भी बरकरार है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जो प्लांट किसानों और पशुपालकों के हित में लगाया गया था, वही अब ज़हर उगल रहा है। वेटकेक सड़ने से दुर्गंध फैल रही है, मवेशियों की मौत हो रही है, पेड़ सूख रहे हैं और खेत बर्बाद हो रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि लोगों का सांस लेना तक मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों का कहना है—"आज मवेशी मर रहे हैं, कल हमारी बारी होगी।"
आंतरिक सूत्रों के अनुसार, यह स्थिति प्लांट में लगा डायर मशीन बंद होने के कारण बनी है। मजदूरों ने बताया कि डायर चालू होता तो वेटकेक को पशु और पक्षियों के उत्तम आहार में बदल दिया जाता—मुर्गी, मछली, कछुआ और मवेशियों के लिए चारा तैयार होता। लेकिन मशीन के ठप होने से वेटकेक सड़ रहा है, जिससे कीटाणु और जहरीली बदबू फैल रही है।
मामले में कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं—
डायर चालू क्यों नहीं किया गया?
मक्का से एथनॉल बनाने का दावा कर चावल (कनकी) से उत्पादन क्यों हो रहा है?
पानी निकासी की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या यह प्लांट प्रदूषण नियंत्रण के मानकों का पालन कर रहा है?
ग्रामीणों की जान-माल की सुरक्षा के लिए प्रशासनिक कदम कब उठेंगे?
ग्रामीणों की मांग है कि जब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक प्लांट को बंद किया जाए। वहीं, प्रशासन ने जांच का भरोसा दिया है, लेकिन अब देखना यह है कि ज़िला प्रशासन इस लापरवाही पर क्या ठोस कार्रवाई करता है, क्योंकि मामला सीधे-सीधे पर्यावरण, पशुधन और मानव जीवन की सुरक्षा से जुड़ा है।
विशेष आलेख
बिलासपुर के सांसद-नेता और अनुभवी वकील अरुण साव का राजनीतिक उत्थान, 9 अगस्त 2022 के नेतृत्व वितरण से नवम्बर 2023 में उपमुख्यमंत्री बनने तक का क्रम — एक ऐसा अध्याय जो उनके समर्थकों और प्रदेश की राजनीति दोनों के लिए निर्णायक साबित हुआ।
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव (जन्म: 25 नवम्बर 1968) का राजनीतिक और वैधानिक सफर पारंपरिक पृष्ठभूमि से निकलकर राज्य के उच्चतम राजनीतिक मंच तक पहुंचने का प्रेरक अंकन है। रायपुर में जन्मे अरुण साव किसान परिवार से आते हैं; उनके पिता स्वर्गीय श्री अभय राम साव और माता श्रीमती प्रमिला साव हैं। उन्होंने 17 अप्रैल 2000 को श्रीमती मीना साव से विवाह किया और उनका एक पुत्र है। शिक्षा की दृष्टि से उन्होंने मुंगेली के शासकीय एस.एन.जी. कॉलेज से बी.कॉम. और बिलासपुर के कौशलेन्द्र राव लॉ कॉलेज से एल.एल.बी. की डिग्री हासिल की।
विधिक जीवन में अरुण साव ने मुंगेली सिविल कोर्ट में प्रैक्टिस से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में बिलासपुर उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्य करते हुए राज्य की सेवा में भी गहन भूमिका निभाई। उनकी सरकारी सेवा-भूमिका इस प्रकार रही: मार्च 2005 से फरवरी 2006 तक उप शासकीय अधिवक्ता, मार्च 2006 से अगस्त 2013 तक शासकीय अधिवक्ता, और सितम्बर 2013 से जनवरी 2018 तक छत्तीसगढ़ के उप महाधिवक्ता के रूप में उन्होंने दायित्व निभाये — एक ऐसा क्रम जो उन्हें विधिक विशेषज्ञता के साथ प्रशासनिक अनुभव भी देता है।
सामाजिक और छात्र-जीवन में वे 1990 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद व अन्य संगठनों से सक्रिय रहे, तथा साहू समाज के तहसील, जिला और प्रादेशिक स्तर पर विभिन्न जिम्मेदारियाँ निभाईं। खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति उनकी रुचि—कबड्डी, वॉलीबाल, क्रिकेट और बैडमिंटन—उन्हें जमीनी स्तर से जोड़ती है और संगठनात्मक क्षमता के विकास में मदद करती है।
राजनीतिक रूप से अरुण साव का बड़ा पड़ाव 2019 में आया जब वे बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। 17वीं लोकसभा में वे कोयला व खान मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति तथा कोयला और इस्पात संबंधी स्थायी समिति के सदस्य रहे — जिनसे उनके संसदीय अनुभव और क्षेत्रीय उद्योगों के साथ जुड़ाव को मजबूती मिली।
उनके राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ था 9 अगस्त 2022 — जिस दिन उन्हें भारतीय जनता पार्टी, छत्तीसगढ़ का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उस समय प्रदेश में सत्तारूढ़ सरकार के बावजूद संगठनात्मक मजबूती और विरोधी राजनीति को संगठित करने की जिम्मेदारी अरुण साव के हाथों सौंपी गई। भाजपा संगठन ने 9 अगस्त 2022 के बाद संगठनात्मक पुनर्रचना और सक्रियता बढ़ाकर लगभग चौदह माह के भीतर वह राजनीतिक माहौल तैयार कर दिया, जिसका फल नवम्बर 2023 में भाजपा की प्रदेश में सत्ता वापसी के रूप में सामने आया। परिणामस्वरूप राज्य सरकार बनने पर अरुण साव को उपमुख्यमंत्री का महत्त्वपूर्ण पद भी सोंपा गया — एक पद जिसे वे अपने व्यापक संगठनात्मक और विधिक अनुभव के साथ निभा रहे हैं।
9 अगस्त 2022 का सोशल मीडिया संदेश और नियुक्ति पत्र
उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने इस दिन को अपने जीवन का अहम मोड़ मानते हुए अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा—
"आज के ही दिन 9 अगस्त 2022 को भारतीय जनता पार्टी केंद्रीय नेतृत्व ने मुझे जैसे सामान्य कार्यकर्ता को छत्तीसगढ़ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की कमान संभालने का अवसर दिया था।
पूरे प्रदेश का दौरा कर, बूथ से लेकर प्रदेश स्तर के कार्यकर्ताओं को उनकी शक्ति का अहसास दिलाया और प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं और साथी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर हमने कांग्रेस सरकार के भ्रष्ट किले को ढहा दिया।
और 14 माह के सामूहिक परिश्रम और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की मोदी की गारंटी की आधार पर प्रदेश की जनता ने भाजपा की सुशासन सरकार को चुना।"
इसके साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह द्वारा जारी आधिकारिक नियुक्ति पत्र भी साझा किया, जिसमें 9 अगस्त 2022 से प्रभावी रूप से उन्हें छत्तीसगढ़ भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
आलेख - शरद पंसारी
संपादक - दैनिक समाचार
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
