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May 01, 2026
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  रायपुर / शौर्यपथ / मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से आज विधानसभा स्थित उनके कार्यालय कक्ष में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में राजनांदगांव जिला क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने सौजन्य मुलाकात की।
इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल ने मंत्रिपरिषद द्वारा आधुनिक खेल मैदान एवं अत्याधुनिक क्रिकेट अकादमी के निर्माण हेतु सूर्यमुखी देवी राजगामी संपदा के नाम दर्ज भूमि में से 5 एकड़ भूमि रियायती दर पर आबंटित करने के महत्वपूर्ण निर्णय के लिए मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस पहल से जिले की खेल प्रतिभाओं को बेहतर प्रशिक्षण सुविधाएं मिलेंगी और क्रिकेट के क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खुलेंगे।
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने क्षेत्र की बहुप्रतीक्षित मांग पर मंत्री परिषद की बैठक में त्वरित निर्णय लेने के लिए मुख्यमंत्री का धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि इस निर्णय से राजनांदगांव में अत्याधुनिक स्टेडियम का निर्माण संभव होगा, जिससे प्रदेश के खिलाड़ियों को उच्च स्तरीय अवसर प्राप्त होंगे। साथ ही, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण यहां की प्रतिभाओं को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का बेहतर मंच मिलेगा।
इस दौरान विधायक धरम लाल कौशिक, विधायक पुरन्दर मिश्रा, विधायक ललित चंद्राकर, छत्तीसगढ़ ओलम्पिक संघ के महासचिव विक्रम सिसोदिया, राजनांदगांव जिला क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव योगेश बागड़ी सहित अन्य पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित रहे।

दुर्ग। शौर्यपथ विशेष

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जहां प्रदेश में सुशासन का ढोल पीट रहे हैं, वहीं दुर्ग नगर पालिक निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की कार्यप्रणाली जमीनी हकीकत को पूरी तरह झुठलाती नजर आ रही है। शहर में अवैध कब्जाधारियों और गैर अनुमति प्राप्त बाजारों पर जिस तरह निगम प्रशासन ने मौन समर्थन की मुद्रा अपना ली है, वह न केवल प्रशासनिक निष्क्रियता का प्रमाण है बल्कि आने वाले समय में एक बड़े शहरी विवाद की पटकथा भी लिख रही है।
दुर्ग जिले के नागरिक सुपेला संडे बाजार की कहानी से भलीभांति परिचित हैं—जब बाजार छोटा था तब प्रशासन ने आंख मूंद ली, और जब वह विकराल हो गया तो हटाने में जिला प्रशासन और भिलाई नगर निगम को पसीने आ गए। व्यापारियों में विवाद हुआ, कानून व्यवस्था प्रभावित हुई, लेकिन आज भी वह बाजार वैधानिक अनुमति के बिना संचालित होता दिखाई देता है।
अब वही गलती दुर्ग में दोहराई जा रही है
दुर्ग नगर निगम मुख्य कार्यालय के पीछे चर्च रोड क्षेत्र में शनिवार को बिना किसी अनुमति के अवैध बाजार का संचालन प्रारंभ हो चुका है। महज दो महीनों में यह बाजार चर्च चौक से सुराना कॉलेज मार्ग तक फैल चुका है। शुरुआत छोटे स्तर पर हुई, लेकिन अब इसमें भिलाई के व्यापारियों का दखल लगातार बढ़ रहा है, जिससे स्थानीय व्यापार और यातायात दोनों पर असर पडऩे लगा है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि निगम प्रशासन को इस अवैध बाजार की पूरी जानकारी होने के बावजूद अतिक्रमण विभाग द्वारा व्यापारियों से गंदगी के नाम पर ?50 शुल्क वसूली शुरू कर दी गई है। सवाल यह उठता है कि जब बाजार अवैध है, तो निगम किस अधिकार से शुल्क वसूल रहा है? क्या यह अवैध गतिविधियों को वैधानिक जामा पहनाने की कोशिश नहीं है?
छोटे कर्मचारियों पर सख्ती, बड़े अतिक्रमण पर मौन
शहर में यह चर्चा आम है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल छोटी-छोटी बातों पर कर्मचारियों को नोटिस थमाने में अपनी प्रशासनिक व संवैधानिक शक्तियों का भरपूर उपयोग करते हैं, लेकिन अवैध बाजार और बढ़ते अतिक्रमण के मामलों में उनकी भूमिका पूरी तरह निष्क्रिय दिखाई देती है।
पिछले छह महीनों से कपड़ा लाइन का अतिक्रमण हटाने में निगम प्रशासन पूरी तरह विफल रहा है, जबकि 'मोर शहर मोर जिम्मेदारीÓ योजना के तहत सौंदर्यीकरण कार्य कर रही संस्था को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। शहर के लगभग हर क्षेत्र में अतिक्रमण का बोलबाला है, लेकिन प्रेस विज्ञप्तियों में "सख्त कार्रवाई" के दावे किए जा रहे हैं।
आखिर किसे गुमराह कर रहे हैं आयुक्त?
सवाल यह है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल इन दावों से किसे गुमराह कर रहे हैं—शहर की जनता को, जिला प्रशासन को या प्रदेश सरकार को? एक प्रशासनिक अधिकारी का कार्यकाल भले ही अधिकतम तीन वर्ष का हो, लेकिन इस दौरान जो अतिक्रमण जड़ जमा लेगा, उसे हटाने में आने वाले समय में प्रशासन को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
राजनीतिक मौन भी सवालों के घेरे में
और भी आश्चर्यजनक यह है कि जब शहर में भाजपा की शहरी सरकार है, स्थानीय विधायक प्रदेश सरकार में मंत्री हैं, तब भी अतिक्रमण के बढ़ते स्तर पर जनप्रतिनिधियों की चुप्पी शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है। आने वाले विधानसभा चुनावों में यही अतिक्रमण सत्ताधारी दल के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
सुशासन की कसौटी पर दुर्ग नगर निगम
यदि मुख्यमंत्री का सुशासन केवल फाइलों और मंचों तक सीमित नहीं है, तो दुर्ग नगर निगम में आयुक्त सुमित अग्रवाल की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा अनिवार्य है। अन्यथा यह कहा जाना गलत नहीं होगा कि दुर्ग में सुशासन नहीं, बल्कि 'मौन समर्थन का शासनÓ चल रहा है, जहां अवैध कब्जाधारी फल-फूल रहे हैं और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।

राम रसोई के नाम पर सड़क पर कब्जा, धर्म स्थल के सामने कब्ज़े की दीवार , और प्रशासन की चुप्पी — क्या यही है सुशासन ?

शौर्यपथ विशेष
एक ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय लगातार सुशासन की बात कर रहे हैं,धर्म रक्षा की बात कर रहे है सुशासन पर्व मनाया जा रहा है, और जनता को यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि सरकार पारदर्शिता, न्याय और कानून के राज के लिए प्रतिबद्ध है प्रदेश में राम राज्य की स्थापना हो रही है । वहीं दूसरी ओर, उन्हीं की सरकार में नियुक्त अधिकारी ज़मीनी स्तर पर सुशासन को खुलेआम आईना दिखाते नजर आ रहे हैं , हिन्दुओ के आराध्य प्रभु राम की सत्य और निति की बातो का विरोध करते नजर आ रहे है । दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में सामने आया मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक है, बल्कि सरकार के दावों पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह और धर्म व प्रभु राम के नाम पर अवैध कब्ज़े सन्देश खड़ा करता है।


दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में गणेश मंदिर के सामने स्थित एक सार्वजनिक मार्ग और श्रद्धालुओं के लिए उपयोग में आने वाला स्थल, राम रसोई के संचालक द्वारा सड़क पर कब्जा कर लिया गया है। यह कोई खाली भूमि नहीं थी, बल्कि वर्षों से आम जनता के आवागमन और त्योहारों के दौरान प्रार्थना स्थल के रूप में प्रयुक्त होती रही है। इसके बावजूद यह अवैध कब्जा आज भी जस का तस बना हुआ है।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल को इस अवैध कब्जे की पूरी जानकारी होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई? आम जनता ने विरोध दर्ज कराया, आवाज उठाई, लेकिन धनवानों के प्रभाव और गैर-जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी के सामने जनता की आवाज दबती चली गई। यह चुप्पी केवल लापरवाही नहीं, बल्कि कहीं न कहीं अवैध कब्जाधारियों को दिया गया मौन समर्थन प्रतीत होती है।


एक तरफ शहर के चौक-चौराहों पर अतिक्रमण की भरमार है, दूसरी ओर निगम प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने के लिए गरीबों की छोटी-छोटी गुमटियों पर बुलडोज़र चलाकर कार्रवाई का ढोल पीटता है। प्रश्न यह है कि कानून सिर्फ कमजोरों के लिए ही क्यों सक्रिय होता है? धनवानों और प्रभावशाली लोगों के सामने प्रशासन की कलम क्यों सूख जाती है?
राम रसोई जैसे पवित्र नाम का उपयोग कर शासकीय भूमि और सड़क पर कब्जा करना न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि धार्मिक आस्था पर भी प्रहार है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने कभी अन्याय और नियमों के विरुद्ध आचरण नहीं किया, लेकिन उन्हीं के नाम पर आज अवैध कब्जा किया जा रहा है — और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।
यह और भी चिंताजनक है कि यह सब उस दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में हो रहा है, जहाँ प्रदेश सरकार के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, दर्जा प्राप्त कैबिनेट मंत्री ललित चंद्राकर, भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सरोज पांडे, प्रदेश संगठन मंत्री जितेंद्र वर्मा और दुर्ग जिला भाजपा अध्यक्ष सुरेंद्र कौशिक जैसे बड़े नेताओं के निवास हैं। इन सबके बीच खुलेआम अवैध कब्जे पर कार्रवाई न होना क्या इस बात का संकेत नहीं है कि मुख्यमंत्री का सुशासन दुर्ग में सिर्फ काग़ज़ों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित है?


निगम आयुक्त सुमित अग्रवाल द्वारा शहर की बिगड़ती व्यवस्था पर मौन, अवैध कब्जाधारियों पर कार्रवाई से परहेज और चुनिंदा कार्रवाई की नीति, यह स्पष्ट करती है कि संवैधानिक शक्तियों का उपयोग जनहित में नहीं, बल्कि मनमर्जी और प्रभाव के आधार पर किया जा रहा है।
दुर्ग नगर निगम की यह स्थिति सरकार के लिए चेतावनी है। यदि समय रहते ऐसे अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो सुशासन का दावा जनता की नजर में खोखला साबित होगा। सवाल साफ है — क्या सरकार सच में सुशासन चाहती है, या फिर कुछ अधिकारी अपनी चुप्पी से पूरे शासन को कठघरे में खड़ा करने पर आमादा हैं?

दुर्ग / शौर्यपथ

छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार जहां सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही को अपनी प्राथमिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं दुर्ग नगर पालिक निगम से सामने आया एक प्रकरण इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। मामला न केवल प्रशासनिक निर्णयों की असंगतता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस प्रकार छोटे कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई और वरिष्ठ अधिकारियों पर महज औपचारिक माफी की नीति अपनाई जा रही है।

दो साल बाद पदोन्नति निरस्त : पीडि़त कौन, दोषी कौन?
दुर्ग नगर निगम में वर्षों से पंप अटेंडेंट के रूप में कार्यरत कर्मचारी राजू लाल चंद्राकर को तत्कालीन आयुक्त लोकेश चंद्राकर के कार्यकाल में विभागीय पदोन्नति समिति (ष्ठक्कष्ट) की संस्तुति पर जल कार्य निरीक्षक के पद पर पदोन्नति प्रदान की गई थी। यह पदोन्नति किसी एक अधिकारी के व्यक्तिगत निर्णय से नहीं, बल्कि विधिवत गठित समिति की अनुशंसा पर हुई थी।
इस समिति में —
दिनेश नेताम, कार्यपालन अभियंता
जितेंद्र सोमैया, सहायक अभियंता (वर्तमान में सेवानिवृत्त)
राजकमल बोरकर, कार्यालय अधीक्षक
जावेद अली, तत्कालीन स्वास्थ्य अधिकारी
भूपेंद्र गोईर, सहायक ग्रेड-3
शामिल थे। स्थापना प्रभारी बंजारे द्वारा आवश्यक अभिलेख समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए थे। समिति ने उपलब्ध पद, सेवा अभिलेख और नगरीय निकाय नियमों के आधार पर राजू लाल चंद्राकर को पदोन्नति देने का निर्णय लिया।

वर्तमान आयुक्त का आदेश और उठा विवाद
लगभग दो वर्ष तक जल कार्य निरीक्षक के पद पर कार्य करने के बाद, जुलाई 2025 में वर्तमान आयुक्त सुमित अग्रवाल ने एक आदेश जारी कर न केवल राजू लाल चंद्राकर की पदोन्नति निरस्त कर दी, बल्कि उन्हें पुन: पंप अटेंडेंट के पद पर डिमोशन दे दिया। साथ ही, पदोन्नति समिति के सभी सदस्यों को नोटिस जारी किया गया।
नोटिस के जवाब में समिति के सभी सदस्यों ने स्पष्ट किया कि —पदोन्नति नगरीय निकाय नियमों के अनुरूप थी,पद की उपलब्धता मौजूद थी,पूर्व में भी इसी प्रकार की पदोन्नतियां हो चुकी हैं। इसके बावजूद, समिति के उत्तरों को अस्वीकार कर दिया गया। परिणाम यह रहा कि — समिति के सदस्यों को केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया गया,जबकि कर्मचारी राजूलाल चंद्राकर को पदावनत कर दिया गया।यही बिंदु आज दुर्ग निगम में सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक मामला
राजू लाल चंद्राकर ने वेतन और पद से जुड़े विवाद को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। एक शपथ पत्र में स्वयं आयुक्त सुमित अग्रवाल ने यह स्वीकार किया कि राजू लाल चंद्राकर उनके अधीनस्थ कर्मचारी हैं और जल कार्य निरीक्षक के रूप में कार्यरत रहे हैं।
प्रशासनिक कानून के जानकारों का कहना है कि — यदि पदोन्नति अवैध थी, तो दो वर्षों तक कार्य क्यों कराया गया? और यदि अवैध नहीं थी, तो डिमोशन का आधार क्या है? यही प्रश्न अब माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है।

नियम विरुद्ध पदोन्नति थी तो अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
इस पूरे प्रकरण का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू यह है कि — यदि मान लिया जाए कि पदोन्नति नियमों के विरुद्ध थी, तो फिर:पदोन्नति समिति के सदस्यों पर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नहीं? ,स्थापना शाखा और फाइल आगे बढ़ाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं?
सिर्फ एक कर्मचारी को दंडित कर देना और निर्णय लेने वाले अधिकारियों को "चेतावनी का गुलदस्ता" थमा देना, प्रशासनिक न्याय की अवधारणा पर सवाल खड़े करता है। निगम के भीतर इसे निजी द्वेष और भेदभावपूर्ण नीति के रूप में देखा जा रहा है।

चयनात्मक कार्रवाई का लंबा इतिहास
दुर्ग निगम में यह पहला मामला नहीं है। वर्तमान आयुक्त के कार्यकाल में उच्च अधिकारियों की प्रताडऩा से त्रस्त कर्मचारियों द्वारा आत्महत्या के मामले सामने आए,बाद में नियमों को शिथिल कर आनन-फानन में परिजनों को अनुकंपा नियुक्ति दी गई,जबकि अन्य समान मामलों में कर्मचारी महीनों से निलंबन झेल रहे हैं।
इसी तरह, सहायक राजस्व निरीक्षक थान सिंह यादव पर पार्किंग घोटाले में पेनल्टी लगने और लॉलीपॉप विज्ञापन घोटाले में भौतिक सत्यापन के दौरान अनियमितता बरतने के आरोप हैं। इन मामलों में निगम को राजस्व हानि हुई, परंतु कार्रवाई का दायरा ठेकेदार तक सीमित रहा — कर्मचारी फिर बच निकले।

सुशासन पर आईना
दुर्ग नगर निगम की यह कार्यप्रणाली अब केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रही। यह मामला सीधे तौर पर राज्य सरकार के सुशासन के दावों पर असर डाल रहा है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बार-बार सुशासन की बात करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ अधिकारी यदि अपनी संवैधानिक शक्तियों का चयनात्मक और मनमाना प्रयोग करते हैं, तो उसकी आंच सरकार तक पहुंचना स्वाभाविक है।
अब सबकी निगाहें माननीय उच्च न्यायालय के फैसले पर टिकी हैं। यह फैसला न केवल राजू लाल चंद्राकर के भविष्य का निर्धारण करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि प्रशासनिक निर्णयों की जवाबदेही किसकी होगी?और क्या वास्तव में दुर्ग निगम में 'कानून सबके लिए समानÓ है?फिलहाल, दुर्ग में चर्चा का बाजार गर्म है और सवाल एक ही है — क्या यह सुशासन है, या सत्ता की छाया में पनपता भेदभाव?

दुर्ग। शौर्यपथ।
दुर्ग शहर का प्रशासन इस समय जिस तरह की निष्क्रियता और अनदेखी का परिचय दे रहा है, वह न केवल जनता के लिए चिंता का विषय है बल्कि शासन की छवि पर भी गहरा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
इंदिरा मार्केट से बस स्टैंड के बीच स्थित प्रसिद्ध गणेश मंदिर के सामने, जहां हर बुधवार को हजारों की भीड़ उमड़ती है, वहां राम रसोई संचालक द्वारा सड़क पर ही अवैध कब्ज़ा कर होटल संचालन की तैयारी प्रशासन की नाकामी की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आई है।
गणेश पक्ष के दौरान लगातार 10 दिनों तक यहां श्रद्धालुओं का भारी आवागमन बना रहता है। ऐसे समय और ऐसी संवेदनशील जगह पर सड़क घेरकर कब्ज़ा करना सीधे-सीधे जनता के जीवन, धार्मिक आस्था और शहर की यातायात सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।

लेकिन सवाल उठता है—
क्या यह सब शहर की प्रथम नागरिक को नहीं दिख रहा?
क्या महापौर अलका बाघमार की नजर सिर्फ कुर्सी की सुविधाओं, विशेष चाय और प्रशासकीय दिखावे तक सीमित रह गई है?

धार्मिक आस्था के सामने होटल संचालन का समर्थन?

जहां जनता गणेश मंदिर में आस्था लेकर आती है,वहीं महापौर बाघमार की निष्क्रियता ने ऐसा वातावरण बना दिया है कि प्रभु राम के नाम का उपयोग कर होटल चलाने वाले संचालक अब सड़क को अपनी निजी संपत्ति समझने लगे हैं।
यह स्थिति सिर्फ दुर्ग शहर के नागरिकों का अपमान नहीं है बल्कि छत्तीसगढ़ की साय सरकार और केंद्र की मोदी सरकार की धर्म और आस्था के प्रति गहरे प्रेम की छवि को भी धूमिल करती है। यह वही सरकार है जो “अवैध कब्ज़ों पर जीरो टॉलरेंस” की बात करती है, लेकिन दुर्ग में उसके ही महापौर के रहते सड़क पर कब्ज़ा कर धार्मिक स्थल के सामने धंधा चलना आम बात बन गया है।

भीड़, अराजकता और महापौर की चुप्पी

गणेश मंदिर के सामने प्रतिदिन और विशेष दिनों में बढ़ती भीड़ के बावजूद महापौर बाघमार की ओर से
न कोई कार्रवाई, न चेतावनी, न रोकथाम—कुछ भी नहीं। ऐसा लगता है कि शहर की समस्याएँ उनके प्रशासनिक एजेंडे में कहीं हैं ही नहीं। शहर जाम से भर जाए, श्रद्धालु परेशान हों, सड़क पर अफरातफरी हो—लेकिन महापौर की प्राथमिकताएँ कुछ और ही हैं।

जनता यह सवाल पूछ रही है—
क्या हमने महापौर चुना था या अवैध कब्ज़ों का संरक्षण करने वाली प्रशासकीय ढाल?
क्या महापौर की सक्रियता सिर्फ कर्मचारियों पर दबाव बनाने, छोटी-मोटी दिखावे की बैठकों तक सीमित है?
क्या दुर्ग शहर एक निष्क्रिय नेतृत्व की वजह से अपने सबसे बुरे दौर में प्रवेश कर चुका है?

गणेश मंदिर जैसे धार्मिक स्थल के सामने सड़क पर कब्ज़ा कोई साधारण मामला नहीं है। यह शहर की संस्कृति, श्रद्धा, यातायात सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न है। और इन सभी मोर्चों पर महापौर अलका बाघमार की पूर्ण असफलता और निष्क्रियता अब जनता के लिए असहनीय होती जा रही है।

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