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दुर्ग। शौर्यपथ।
दुर्ग कांग्रेस की राजनीति आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सवाल सिर्फ नेतृत्व का नहीं, बल्कि विपक्ष की भूमिका, उसकी धार और उसकी ईमानदारी पर भी खड़े हो रहे हैं। लगभग पाँच दशक तक दुर्ग कांग्रेस पर एक ही परिवार का वर्चस्व रहा। वोरा परिवार की राजनीति के साये में न जाने कितने कांग्रेसी कार्यकर्ता और नेता उभरने से पहले ही हाशिये पर धकेल दिए गए। प्रदेश स्तर तक पहुंचने की उम्मीद लिए बैठे कार्यकर्ताओं के सपने इसी वर्चस्व में दबकर रह गए।
करीब 50 वर्षों बाद जब प्रदेश कांग्रेस ने दुर्ग कांग्रेस की कमान वोरा बंगले से बाहर निकालकर धीरज बाकलीवाल को सौंपी, तब यह निर्णय सिर्फ एक नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्जागरण के संकेत के रूप में देखा गया। उम्मीद थी कि दुर्ग कांग्रेस में नई ऊर्जा आएगी, जमीनी स्तर पर संघर्ष दिखेगा और भाजपा शासित नगर निगम के खिलाफ आक्रामक विपक्ष खड़ा होगा। लेकिन दुर्भाग्यवश, चेहरा बदलाज् व्यवस्था नहीं।
विपक्ष की सबसे बड़ी जिम्मेदारी, जो निभाई नहीं गई
वर्तमान समय में दुर्ग शहर और दुर्ग नगर निगम लगभग समान राजनीतिक और प्रशासनिक दायरे में आते हैं। ऐसे में नगर निगम की बदहाल कार्यप्रणाली के खिलाफ आवाज बुलंद करना कांग्रेस की प्राथमिक जिम्मेदारी थी।
शहर अतिक्रमण से जूझ रहा है,अवैध बाजार फल-फूल रहे हैं,जल संकट आमजन को परेशान कर रहा है,अंधेरे और गड्ढों से भरी सड़कें हादसों को न्योता दे रही हैं,गंदगी और दुर्गंध शहर की पहचान बनती जा रही है।
इन तमाम मुद्दों पर विपक्ष को सड़क से सदन तक संघर्ष करते दिखना चाहिए था। लेकिन दुर्ग कांग्रेस की चुप्पी, उसकी निष्क्रियता और नेतृत्व की कमजोरी ने आम जनता में यह धारणा बना दी है कि विपक्ष केवल नाम का रह गया है।
अध्यक्ष की कमजोरी और नेता प्रतिपक्ष की निष्क्रियता
शहर कांग्रेस अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल से यह अपेक्षा थी कि वे संगठन को एकजुट कर आक्रामक रणनीति अपनाएंगे। मगर उनकी कार्यप्रणाली शुरुआती दौर से ही सवालों के घेरे में है। संगठनात्मक कमजोरी, आंदोलन की कमी और मुद्दों पर स्पष्ट स्टैंड का अभाव उनकी सबसे बड़ी विफलता बनता जा रहा है।
वहीं दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष संजय कोहले की भूमिका भी गंभीर सवाल खड़े करती है। वार्ड स्तर पर लोकप्रियता अलग विषय हो सकता है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष के रूप में बीते एक वर्ष में उनकी भूमिका लगभग निष्क्रिय रही है। जिस तरह से अपने कक्ष और प्रोटोकॉल को लेकर आवाज बुलंद की गई, उससे यह संदेश गया कि पद की चिंता ज्यादा है, जनता की पीड़ा कम।
आज दुर्ग की राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि "विपक्ष भी सत्ता पक्ष की कठपुतली बन चुका है।"परदे के पीछे किसी तरह की 'सेटिंगÓ की आशंका इसलिए भी गहराती है क्योंकि शहर की बदहाली पर नेता प्रतिपक्ष का मौन रहना स्वाभाविक नहीं माना जा सकता।
क्या यह नेतृत्व परिवर्तन एक भूल साबित हो रहा है?
धीरज बाकलीवाल की संगठनात्मक कमजोरी और संजय कोहले की निष्क्रियता ने दुर्ग कांग्रेस को एक बार फिर अस्तित्व की लड़ाई में ला खड़ा किया है। जिन कार्यकर्ताओं ने नए नेतृत्व से उम्मीदें लगाई थीं, आज वही निराश और हताश नजर आ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
// क्या प्रदेश कांग्रेस ने दुर्ग की कमान सौंपते समय जमीनी हकीकत का सही आकलन किया था?
// क्या पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद एक बार फिर दुर्ग कांग्रेस के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है?
भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई क्यों कमजोर पड़ गई?
छत्तीसगढ़ की राजनीति में कांग्रेस हमेशा खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्षरत पार्टी बताती रही है। लेकिन जब प्रमुख शहरों में ही विपक्ष कमजोर, मौन और निष्क्रिय हो जाए, तो यह दावा खोखला नजर आने लगता है।
अगर विपक्ष ही मजबूत नहीं होगा, तो सत्ता से सवाल कौन पूछेगा?
अगर विपक्ष ही संघर्ष नहीं करेगा, तो जनता की आवाज कौन बनेगा?
दुर्ग कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपनी ही निष्क्रियता है। नेतृत्व में बदलाव केवल नाम बदलने से नहीं होता, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, संघर्ष और सड़क पर उतरने की हिम्मत से होता है।
यदि समय रहते प्रदेश कांग्रेस ने दुर्ग की स्थिति पर गंभीर मंथन नहीं किया, तो यह तय है कि दुर्ग कांग्रेस का पतन और गहराएगा—और इसका खामियाजा सीधे-सीधे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और आम जनता को भुगतना पड़ेगा।
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
