January 26, 2026
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नैतिकता बेच कर चाटुकारिता पर उतरती मीडिया ... Featured

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शौर्यपथ लेख । मीडिया किसी भी देश की छवि को राष्ट्रीय ही नही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाती है । मीडिया एक आईना की तरह होती है जो दुनिया को अपने देश की स्थिति चाहे अच्छी हो , गलत हो प्रसारित कर सत्ता पक्ष विपक्ष को उनके कार्यो को बता कर जनता को अवगत कराने का कार्य , उपलब्धि हो , असफलता हो सामने लाने का कार्य ही मीडिया का होता है । कहने का तातपर्य सच को सामने लाना वर्तमान स्थिति को सामने लाना , ज्वलंत मुद्दों को निष्पक्षता से रखना , देश की ज़रूरत को समझना , देश की वास्तविक हालत को सरकार के सामने रखना और प्रशासन की दबंगई , कुशल कार्य , उपलब्धि , भ्र्ष्टाचार पर खुलकर चर्चा करने का माध्यम मीडिया के रूप में स्थापित है । भारत मे भी मीडिया का अस्तित्व है किंतु विगत कुछ सालों से जितने आरोप सरकार पर लग रहे उतने आरोप मीडिया के पक्षपात पर भी लग रहे है । कहने को मीडिया देश का चौथा स्तंभ है किंतु इस चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठने लगे है । देश का अधिकतर मीडिया ग्रुप आज चाटुकारिता की आगोश में आकर आम जनता को ज्वलंत मुद्दों की बात ना बता कर , देश की वर्तमान हालत ना बता कर चाटुकारिता की भाषा बोल रहा है । भारतीय मीडिया की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठ रहे है किंतु मीडिया ग्रुप इन सबसे पर अपनी ही दुनिया मे मस्त है । सच्चाई को सामने लाने की बात तो बहुत दूर अब वही परोसा जा रहा है जो उनके आका चाहते है । पहले मीडिया तथ्यों के साथ सच्चाई सामने लाती थी और सम्मानित व शालीन भाषा जिसमे व्यंग कटाक्ष का मिश्रण होता था का प्रयोग किया जाता था किंतु वर्तमान में मीडिया आपसी रंजिश , झूठे आत्मसम्मान की बात करती नजर आ रही है । अब मीडिया सच तो नही बता रही वो जो भी बता रही उसे आपके जेहन में थोप रही ये बताने की कोशिश कर रही कि वो जो कह रही वहीं सच है । बातों की जलेबी बना कर , तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर किसी भी हद में जाकर अपने आका के तलुवे चाटने का पुरजोर प्रयास करती नजर आ रही है । अब पत्रकारिता स्वतंत्र नही रह गए इस चौथे स्तंभ को भी सरकार के सहारे की ज़रूरत हो गई है । वर्तमान समय की ही बात करे तो वर्तमान समय देश के लिए एक मुश्किल भरा समय है भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है । देश मे भुखमरी चरम पर है , बेरोजगारी चरम पर है , महंगाई चरम पर है , स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है , शिक्षा का स्तर लगातार गिर रहा है किन्तु देश की मीडिया एक एक्टर के हत्या या आत्महत्या पर व्यस्त है , देश की मीडिया धर्म पर व्यस्त है , देश की मीडिया पड़ोसी मुल्कों की हरकत और बर्बादी पर व्यस्त है , देश की मीडिया अपने आकाओं की गुलामी पर व्यस्त है , देश की मीडिया तथ्यहीन बातों पर व्यस्त है । अब मीडिया आईना दिखने की बजाए गुलामी की जिंदगी पर व्यस्त है अब वही दिखा रही है जो उनके आका चाहते है फिर चाहे वो गलत हो या सही उनसे कोई सरोकार नही । ज्वलंत मुद्दे अब चौथे स्तंभ में बेमानी हो गए है । उसकी जगह अब चाटुकारिता परोसी जा रही है । ऐसी चाटुकारिता जिससे उसका अस्तित्व बना रहे । आईना अब पत्रकारिता का पर्यायवाची नही रह गया अब तो झूठ और बेमानी ही मीडिया का दूसरा रूप बन गया है । गुलाम भारत मे भी मीडिया खुलकर अपनी बात रख लेता था । कई बड़े बड़े आंदोलन में गुलामी के समय मे भी मीडिया स्वतंत्र था किंतु आजाद भारत मे मीडिया अब गुलामो की जिंदगी जी रहा है । मीडिया की स्वतंत्रता अब दिखावा मात्र हो गई । अब अगर जिंदा रहना है तो जिसके पास ताकत है उसके महिमा को वर्णित करते हुए ही अस्तित्व में बने रहने का समय आ गया है अगर विरोध करोगे तो सत्ता की ताकत के आगे नेस्तनाबूद कर दिए जाने का खतरा बन गया है । मीडिया अब आईना ना होकर प्रायोजित फ़िल्म का रूप ले लिया है जिसमे स्क्रीप्ट भी पूर्वनियोजित होती है और फिल्मांकन भी पुर्नियोजित सिर्फ वही दिखाया जा रहा है जो सत्ता की ताकत दिखाना चाहती है । भले ही देश आजाद हो गया किन्तु मीडिया अब गुलाम हो गई और हो भी क्यो ना अगर आपने सच्चाई दिखाई तो आप ही नही दिखेंगे जब आप ही नही दिखेंगे तो सच्चाई कहा दिखेगी । सच्चाई और जिंदगी में किसी एक के चुना में अब जिंदगी चुनने की मजबूरी ही मीडिया के स्वतंत्रता के रास्ते मे सबसे बड़ी रुकावट है । वर्तमान समय मे यही रीति के तहत मीडिया अपना कार्य कर रही है सच्चाई अब मीडिया जगत में विलुप्त सी नजर आ रही है और चाटुकारिता अब बलवान हो गई जो जितनी ज्यादा चाटुकारिता करेगा वो उतना सफल होगा । निष्पक्षता और चाटुकारिता में अब चाटुकारिता की जीत हो गई । और देश के चौथे स्तंभ को अब सहारे के लिए चाटुकारिता का दामन थामना ज़रूरी हो गया । चौथा स्तम्भ अब कब अपने दम पर स्थापित होगा ये भविष्य के कालचक्र में लुप्त है किंतु वर्तमान में इसे स्थापित होने के लिए सहारे की ज़रूरत पड़ रही है बिना सहारे के अस्तित्व खतरे में पड़ने का जो अंदेशा है । अब तो छोटी मोटी सच्चाई जिससे आकाओं को कोई फर्क नही पड़ता ऐसी ही सच्चाई सामने आती है बाकी तो झूठ का पुलिंदा ही बांकी रह गया है । ( शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार पत्र )

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