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राजनीति में कुछ लोग जनसेवा से पहचान बनाते हैं, कुछ संघर्ष से, और कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी पहचान कैमरे के एंगल, रीलों और पीआर मैनेजमेंट से बनती है। कहते हैं कि एक विधायक महोदय पर "महादेव" की ऐसी असीम कृपा हुई कि देखते ही देखते अपना भव्य मीडिया हाउस खड़ा हो गया। राजधानी की एक पॉश कॉलोनी में स्थित आलीशान कार्यालय देखकर सहज ही प्रश्न उठता है कि यह पत्रकारिता का केंद्र है या फिर ब्रांड मैनेजमेंट का कॉरपोरेट स्टूडियो?
मिशन वाली पत्रकारिता कब लग्ज़री प्रोजेक्ट में बदल गई, इसका शायद सबसे जीवंत उदाहरण यही है। यहां खबरें कम और इमेज बिल्डिंग ज्यादा दिखाई देती है।
विधायक महोदय की सबसे बड़ी ताकत बताई जाती है—पीआर और इवेंट मैनेजमेंट। कहते हैं कि उन्होंने निजी दुख को भी सार्वजनिक आयोजन में बदलने की कला विकसित कर ली है। परिवार में शोक का अवसर आया तो श्मशान घाट तक में वीआईपी व्यवस्थाओं की चर्चा रही। संवेदना प्रकट करने वालों के फोन भी मानो इतिहास का हिस्सा बन गए—रिकॉर्ड हुए, संपादित हुए और सोशल मीडिया पर प्रसारित भी हुए।
ऐसा लगा कि संवेदना भी अब कंटेंट कैलेंडर का हिस्सा बन चुकी है। बस एक औपचारिकता बाकी रह गई थी—"इस शोक आयोजन को सफल बनाने के लिए आप सभी का हार्दिक धन्यवाद" वाला पोस्टर।
रीलों की दुनिया में शायद यही नया राजनीतिक दर्शन है—जो कैमरे में कैद नहीं हुआ, वह हुआ ही नहीं।
दिलचस्प बात यह भी है कि विधायक महोदय अक्सर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और जनप्रतिनिधियों पर अपरोक्ष टिप्पणियां करने से नहीं चूकते। शायद उन्हें यह याद दिलाने की जरूरत है कि पिछले लगभग 25 वर्षों में प्रदेश में करीब 20 वर्ष उनकी ही सरकार रही है और लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी लंबे समय से उनकी अपनी ही पार्टी के सांसद करते रहे हैं। ऐसे में अपनी ही राजनीतिक परंपरा, नेतृत्व और संगठन के योगदान को नज़रअंदाज़ कर तंज कसना राजनीतिक परिपक्वता कम और तात्कालिक लोकप्रियता की कोशिश अधिक प्रतीत होता है।
जनता नेताओं से संवाद चाहती है, स्व-प्रचार नहीं; जवाबदेही चाहती है, पटकथा नहीं; और सेवा चाहती है, स्टूडियो नहीं।
लोकतंत्र में कैमरे की चमक कुछ समय के लिए तालियां दिला सकती है, लेकिन इतिहास में जगह केवल वही बनाता है जो काम की रोशनी से पहचाना जाए। रीलें कुछ सेकंड चलती हैं, जबकि जनसेवा की असली पटकथा जनता वर्षों तक याद रखती है।
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Feb 09, 2021 Rate: 4.00
