August 06, 2026
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    लेख /शौर्यपथ / क्रूर कोरोना का कोड़ा सभी को बड़ी बेरहमी से सटासट पीट रहा है। महूवा खा के नशे में मदमस्त भयानक भालू की तरह रात -दिन लोगों को उठा -उठा कर पटक रहा है।बीते दिनों मैं भी क्रूर कोरोना के फंदे में फंस गया।तब हमारे घर में कोहराम मच गया। मुझे मेरी अर्धांगिनी जी तरह तरह के काढ़ा यूं जबरिया पीलाने लगी जैसे जानवरों के डाक्टर बांस की पूंगी में दवाई भरकर गाय भैस के मुंह में ठेल देते हैं।साथ ही साथ वो अपनी उंगलियों को चटकाते हुए कोरोना को श्रापने लगी। कलमुंहा कोरोना तूअकाल मौत मरे,तेरा खानदान कुलवंश का नाश हो।तब मैं
    उसे समझाया कि घर में शांति पूर्वक रहो ,मास्क पहनों , जिंदगी बंचाने का यही कारगर उपाय है। मेरी बात सुन के वो एक टोकरी भर मास्क उठा लाई और पटकते हुए बोली- ए लो कितना मास्क पहनना है पहन लो।माता कालिके जैसे उसके रौद्र रूप के आगे मैं बली के बकरे की भांति हो चला था, पर साहस दिखाते फिर बोला-मनू की मम्मी, यूं गुस्सा करना ठीक नहीं है। आज के समय में मास्क ही प्राण रक्षक है।इसे ऐसे नहीं पटकना।
    पटकूं नहीं तो क्या चूमते चाटते गले लगा लूं। कलमुंहा कोरोना के संग आए इसे एक वर्ष से ऊपर हो गया ।मुंह को ढंकते -ढंकते इस मास्क ने हमारे मुंह को भी बंदरिया जैसे बना दिया है।ए देखो आधा मुंह लाल और आधा सफेद हो गया है।ऐसा कहते-कहते श्रीमती जी ने मुंह में लगे मास्क को यूं नोचना शुरू किया जैसे कोई गिद्ध अपने पंजे में दबे गिरगिट को बेदर्दी से नोचता है। फिर फटे पंतंग की भांति हो चले मास्क को फेक कर पैर पटकते श्रीमती जी वहां से चली गई।
    अपनी अर्धांगिनी के ऐसे "कोरोना छाप" रूप को देख कर मैं भी चूहे की तरह बिस्तर में जा दुबका। तभी अधपकी नींद में मुझे ढेर सारे लोगों के रोने की आवाज सुनाई दी। मैं किसी अनहोनी की आशंका से पसीना- पसीना हो गया।हिम्मत करके उठकर खिड़की से बाहर झांका तो भौंचक रह गया। मैंने देखा कि रात के अंधेरे में पीपल पेड़ के नीचे बड़ी संख्या में तरह तरह के मास्क जमा हैं,और एक दूसरे से लिपट लिपट कर रो रहे हैं।
    इसे देखकर मेरा मन दया के सागर में गोते खाने लगा। मैंने उन्हें शांत कराने के लिए चिल्लाकर कहा- मास्क भाइयों चुप हो जाव जी।रात को यूं रोना अच्छी बात नहीं है।मेरी बात सुनते साथ एक लाल रंग का मास्क आंखे तरेरते हुए बोला- खबरदार बुड्ढा, हमें समझाने का तुझे हक नहीं है,क्यों कि तुम्हारे दुष्कर्मों का फल हमें भोगना पड़ रहा है।
    हां भाई ,एकदम सही कह रहे हो कहते एक नीले रंग के मास्क ने कहा- अरे बुड्ढे, तुम लोगों की जान बंचाने हम रात -दिन लगे हैं,पर तुम लोग मास्क का मान रखने बजाए मजाक उड़ाते रहते हो।
    क्या मजाक उड़ाते है, हमेशा कान में लादे लादे तो फिरते हैं और क्या करेंगे कहते हूए मैंने खिड़की के दुसरे पल्ले को झटके से खोलकर प्रश्न किया।तब एक काले रंग का मास्क मेरे करीब आकर मुंह बिचकाते बोला -कितने लोग पान गुटका मुंह में भरे रहते हैं।बीड़ी दारू गांजा पीए रहते हैं, फिर भी उनके बदबूदार मुंह को हम शांति पूर्वक ढंके रहते हैं। कभी बाप जनम में तुम लोगों ने मास्क नहीं पहना है, इसीलिए होश तक नहीं रहता।कल एक छोकरा पान खा के पच्च से थूक दिया।वो भूल गया कि मुंहू में मास्क पहना है ।क्या बताऊं भइया पूरे पान की पीक से मैं सराबोर हो गया।
    सच कह रहे हो भाई इंसानों के चक्कर में मास्क परिवारों की जि़न्दगी नर्क बन गई है कहते हुए एक चितकबरा मास्क अपने मुंह को ढके ढके सामनेआकर बोला- मेरी तो और भी दुर्गति हो गई है।एक डेढ़ होशियार छोकरे ने मास्क पहनकर कुछ खाते- पीते नहीं बनता सोचकर मुझे बीचो बीच गोल काट दिया है।ए दे देख लो कहते हूए उसने जब अपना हाथ हटाया तो सबने देखा कि उस बेचारे मास्क के बीचों-बीच का हिस्सा गोल कटा हुआ है।
    उस मास्क को देख के मैं हंस पड़ा। मुझे हंसते देख के एक सफेद रंग की लेडीस मास्क गरजते हुए बोली - सुन बुड्ढे , तूम्हारे घर परिवार के फैशनेबुल महिलाओं के कारण तो हमारा मरना हो गया है।वो खुद तो लाल लाल लिपस्टिक होंठ में लगाती हैं और मास्क लगाने से लिपिस्टिक के मिट जाने पर गुस्सा उतारते हूए कहती हैं कि ए मरी मास्क तो सौतन जैसे हम पर सवार है। पता नहीं कब इससे हमारा पीछा छूटेगा?
    उस मास्क की बात सुनकर एक खाकी रंग का मास्क पुलिसिया अंदाज मेंअकड़ते हुए गरज उठा - पढ़े लिखे होने बाद भी तुम लोगों ने असभ्य गंवारों की तरह अपनी हरकतों को बना रखा है। बेचारे पुलिस वाले तुम्हें मास्क पहनो, मास्क पहनो की हिदायत देते रहते हैं, लेकिन तुम्हारे कानों में जूं तक नहीं रेंगता।जब वे जुर्माना करते हैं तो तुम लोग मास्क पर गुस्सा उतारते हुए कहते हो- साला, हथेली भर का मास्क पांच सौ रूपए का चुना लगा दिया।
    सभी मास्क की पीड़ा सुन सुन के मेरा मन भी दु:खी हो गया। मैं उन्हें समझाते हुए बोला मास्क भाइयों सब दिन एक जैसे नहीं होते हैं।धीरज रखो। तुम्हारी छत्र छाया में ही तो इसानों की जान बच रही है। हाथ जोड़ कर मेरी विनती है, इंसानों का साथ मत छोडऩा।एक न एक दिन उन्हें अपनी भूल का अहसास होगा। देर सबेर उनकी आंख जरूर खुलेगी। कहते हैं न कि कुत्ते की आंख तो इक्कीस दिन में खुलती है पर आदमी कीआंख खुलने में इक्कीस साल लग जाते हैं।मेरी बात सुन के सभी मास्क सिर झुका कर बोले-सौ बात की एक बात बोले हैं बाबा,पर अपनी बिरादरी के लोगों को बताव कि ए समय सजग रहने का है।तभी कोरोना भागेगा।खैर रात बहुत हो गई है। जाइए सो जाइए शुभ रात्रि।मास्क मित्रों से विदा लेकर मैं नई सुबह की आस में गहरी नींद में सो गया।
    विजय मिश्रा "अमित"
    अतिरिक्त महाप्रबंधक (जनसंपर्क), छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कम्पनी

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    Last modified on Monday, 24 May 2021 12:16

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