August 14, 2026
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    धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
    क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

      रायपुर / कभी नक्सल गतिविधियों के कारण विकास से अछूता रहा कोयलीबेड़ा विकासखंड के ग्राम हेटारकसा आज बदलाव की नई कहानी लिख रहा है। जहां पहले सड़क, संचार और मूलभूत सुविधाओं तक पहुंच मुश्किल थी, वहीं अब शासन के नक्सल उन्मूलन अभियान और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से गांव में विकास दिखने लगा है।
    नक्सल प्रभाव के कारण वर्षों तक इस क्षेत्र में योजनाओं का क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण रहा। दुर्गम भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा कारणों से पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा भी गांव तक नहीं पहुंच पा रही थी। ग्रामीण, कुएं और नालों पर निर्भर थे, और गर्मी के दिनों में पानी के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता था। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन और राज्य शासन के प्रयासों से ग्राम हेटारकसा के 63 घरों तक नल कनेक्शन पहुंचाए गए हैं। दो सोलर पंप आधारित जल टंकियों के माध्यम से अब गांव के हर घर में नियमित रूप से स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो रहा है। गांव के निवासी राजनाथ पोटाई बताते हैं कि पहले पानी लाने के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता था, जिसमें अधिक समय व श्रम लगता था। वहीं अब घर में ही दिनभर पानी मिलने से दैनिक जीवन काफी आसान हो गया है।
    गांव की महिला सविता बेन ने कहती हैं कि पहले पानी की समस्या के कारण दिन का बड़ा हिस्सा इसी कार्य में चला जाता था, लेकिन अब नल-जल सुविधा से उन्हें राहत मिली है और वे अन्य कामों में समय दे पा रही हैं।
    स्वास्थ्य और आजीविका पर सकारात्मक असर
    स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होने से गांव में जलजनित बीमारियों में कमी आई है। साथ ही ग्रामीण अब घरों के आसपास सब्जी-बाड़ी कर रहे हैं, जिससे टमाटर, मिर्ची, बरबट्टी जैसी फसलें उगाकर वे पोषण के साथ-साथ अतिरिक्त आय भी अर्जित कर रहे हैं। नक्सल प्रभावित इस दूरस्थ क्षेत्र में योजनाओं का सफल क्रियान्वयन प्रशासन के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय और जिला प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया है। आज ग्राम हेटारकसा यह साबित कर रहा है कि जब सुरक्षा, विश्वास और विकास एक साथ आगे बढ़ते हैं, तो सबसे दूरस्थ और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी बदलाव संभव है।

     

    ई-केवायसी, जियो-टैगिंग और क्यूआर कोड से पारदर्शिता को मिली नई गति

    रायपुर / महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के प्रभावी क्रियान्वयन में छत्तीसगढ़ राज्य देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो गया है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य ने विभिन्न प्रमुख मानकों पर उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है।
    97% सक्रिय श्रमिकों का ई-केवायसी पूर्ण
    1 अप्रैल 2026 की स्थिति में राज्य ने 97 प्रतिशत सक्रिय श्रमिकों का ई-केवायसी पूर्ण कर लिया है, जिससे भुगतान प्रणाली में पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित हुई है। जिसके तहत प्रदेश के 58.16 लाख श्रमिकों का ई-केवायसी तथा 11.32 लाख निर्मित परिसंपत्तियों का जियो टैगिंग का कार्य पूर्ण किया जा चुका है, जिससे कार्यों की प्रभावी मॉनिटरिंग संभव हुई है।

    11,668 ग्राम पंचायतों में जीआईएस आधारित योजना
    वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए युक्तधारा पोर्टल के माध्यम से 11,668 ग्राम पंचायतों में 2,86,975 कार्यों की जीआईएस आधारित कार्ययोजना तैयार की गई है, जिससे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप वैज्ञानिक योजना निर्माण सुनिश्चित हुआ है। इसके साथ ही मनरेगा कार्यस्थलों पर फेस ऑथेंटिकेशन आधारित एनएमएमएस (NMMS) प्रणाली के उपयोग से उपस्थिति की निगरानी अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनी है।

    क्यूआर कोड से आमजन को सीधी जानकारी
    ग्राम पंचायतों में लगाए गए क्यूआर कोड के माध्यम से नागरिक, कार्यों की पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। एक सितंबर से अब तक लगभग 5 लाख से अधिक स्कैन दर्ज किए गए हैं। जिससे कार्यों में पारदर्शिता सुनिश्चित हो रही है।

    हर माह 7 तारीख को समाधान का मंच
    प्रदेश में प्रत्येक माह की 7 तारीख को चावल उत्सव के साथ “रोजगार दिवस” एवं “आवास दिवस” का आयोजन किया जा रहा है, जहां हितग्राहियों की समस्याओं का त्वरित निराकरण एवं योजनाओं की जमीनी समीक्षा की जाती है।

    छत्तीसगढ़ में AI आधारित शिक्षा की नई शुरुआत: मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय से गूगल इंडिया प्रतिनिधियों की मुलाकात रायपुर से शुरू होगा ‘AI सक्षम शिक्षा अभियान’, छत्तीसगढ़ में 2…

     

    रायपुर / छत्तीसगढ़ राज्य के 12 वृहद एवं 34 मध्यम सिंचाई परियोजनाओं में इस वर्ष जल भराव की स्थिति काफी बेहतर है। वर्तमान में राज्य के कुल 46 प्रमुख सिंचाई जलाशयों में औसत रूप से 67.43 प्रतिशत जल भराव है, जो कि वर्ष 2025 मेें इसी अवधि में औसत रूप से 45.23 प्रतिशत तथा वर्ष 2024 के 42 प्रतिशत की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक है। यह स्थिति राज्य में बेहतर वर्षा, सुनियोजित जल प्रबंधन तथा जलाशयों के प्रभावी संचालन का परिणाम है।

    राज्य के 12 वृहद सिंचाई परियोजनाओं में वर्तमान में 68.19 प्रतिशत जल भराव है, जबकि वर्ष 2025 में यह 45.84 प्रतिशत तथा वर्ष 2024 में 38.62 प्रतिशत था। प्रमुख वृहद जलाशयों में शामिल मनियारी जलाशय में 90.41 प्रतिशत, मुरूमसिल्ली में 86.85 प्रतिशत, खारंग में 84.99 प्रतिशत, दुधावा में 84.54 प्रतिशत, रविशंकर सागर में 76.72 प्रतिशत, सोंढूर में 70.65 प्रतिशत एवं तांदुला में 66.19 प्रतिशत में जल उपलब्ध है। वहीं मिनीमाता बांगो जलाशय में 63.86 प्रतिशत तथा केलो में अभी 51.83 प्रतिशत जल भराव है। कोडार जलाशय में अपेक्षाकृत कम 35.45 प्रतिशत जल उपलब्ध है।

    इसी प्रकार राज्य की 34 मध्यम सिंचाई परियोजनाओं में वर्तमान में 63.38 प्रतिशत जल भराव है, जो कि वर्ष 2025 के 44.62 प्रतिशत एवं वर्ष 2024 के 45.38 प्रतिशत से अधिक है। मध्यम जलाशयों में छिरपानी जलाशय मेें 92.23 प्रतिशत, खपरी में 92.98 प्रतिशत, पिपरिया नाला में 89.69 प्रतिशत, गोंडली में 85.53 प्रतिशत, सुतियापाट में 79.82 प्रतिशत, सारोदा में 77.57 प्रतिशत एवं कोसारटेडा में 77.46 प्रतिशत जल भराव अपने उच्च स्तर पर हैं।

    प्रदेश में उपलब्ध जल का उपयोग किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं से नियंत्रित एवं चरणबद्ध रूप से जल छोड़ा जा रहा है। रविशंकर सागर (गंगरेल) परियोजना से नहरों के माध्यम से धमतरी एवं रायपुर क्षेत्रों में निस्तारी एवं सिंचाई जल उपलब्ध कराया जा रहा है। दुधावा जलाशय से मुख्य नहरों के जरिए पानी दिया जा रहा है। सोंढूर परियोजना से नहर प्रणाली के माध्यम से जल छोड़ा जा रहा है। कोडार जलाशय से लगभग 6.84 क्यूमेक्स (घन मीटर प्रति सेकण्ड) जल नहरों के माध्यम से छोड़ा जा रहा है। इसके अतिरिक्त परालकोट परियोजना से दाएं एवं बाएं तट नहरों के जरिए जल वितरण किया जा रहा है।

    मध्यम परियोजनाओं में भी खरखरा, गोंडली, पिपरिया, सारोदा, जुमका, केदार नाला एवं अन्य जलाशयों से आवश्यकता अनुसार नहरों एवं स्लुइस गेट के माध्यम से जल छोड़ा जा रहा है, जिससे रबी फसलों की अंतिम सिंचाई एवं ग्रीष्मकालीन फसलों एवं निस्तारी के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध कराया जा सके। यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि जल का सदुपयोग तथा सभी सिंचित क्षेत्रों को आवश्यकतानुसार पानी मिल सके।

    मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने कहा है कि राज्य सरकार किसानों के हितों को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए जल संसाधनों का वैज्ञानिक एवं प्रभावी प्रबंधन सुनिश्चित कर रही है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष जलाशयों में बेहतर जल भराव समन्वित प्रयासों का परिणाम है। हमारा लक्ष्य है कि प्रदेश के किसानों को समय पर पर्याप्त सिंचाई जल उपलब्ध हो, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हो और किसानों की आय में सुधार हो। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देशित किया है कि जलाशयों के जल स्तर की सतत निगरानी करते हुए जल का उपयोग सुनिश्चित किया जाए।

     

    रायपुर ।
    एक समय माओवाद से प्रभावित रहा कोंडागांव जिले का दूरस्थ ग्राम कुधुर आज विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है। शासन की योजनाओं की पहुँच ने इस क्षेत्र की तस्वीर बदल दी है, और इसी परिवर्तन की मिसाल हैं ग्राम की निवासी श्रीमती रमशीला कश्यप। किराना दुकान संचालन से प्रति माह लगभग 25 हजार रुपये की आय अर्जित कर रहीं हैं l

    राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) से जुड़कर रमशीला कश्यप ने अपने जीवन को नई दिशा दी। वर्ष 2018 में उन्होंने ‘जय मां दंतेश्वरी’ स्व-सहायता समूह की सदस्य बनकर आत्मनिर्भर बनने की शुरुआत की। उस समय गांव में केवल एक किराना दुकान था, जिसके कारण ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए लगभग 20 किलोमीटर दूर मर्दापाल जाना पड़ता था।
    ग्रामीणों की इस समस्या को समझते हुए रमशीला कश्यप ने गांव में ही किराना दुकान खोलने का साहसिक निर्णय लिया। स्व-सहायता समूह से प्राप्त 50 हजार रुपये की सहायता से उन्होंने अपनी दुकान की शुरुआत की। समय के साथ उन्होंने दुकान में जरूरत के अनुसार सामग्री बढ़ाई और अपने व्यवसाय को मजबूत किया।

    आज रमशीला की यह छोटी-सी पहल पूरे गांव के लिए बड़ी सुविधा बन चुकी है। जहां एक ओर ग्रामीणों को आवश्यक वस्तुएं गांव में ही उपलब्ध हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर रमशीला कश्यप के परिवार की आर्थिक स्थिति में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ है। वर्तमान में वे प्रति माह लगभग 20 से 25 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं।
    पहले केवल खेती पर निर्भर रहने वाला उनका परिवार अब अतिरिक्त आय के स्रोत से सशक्त हो गया है।

    रमशीला कश्यप की यह सफलता न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है। आज वे अन्य महिलाओं को भी स्व-सहायता समूह से जुड़कर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। रमशीला कश्यप ने शासकीय योजनाओं से मिली सहायता के लिए शासन प्रशासन के प्रति आभार व्यक्त किया।

    बाकलीवाल की ‘नई कांग्रेस’ की मुहिम को झटका? निष्क्रिय और विवादित चेहरों की एंट्री से कार्यकर्ताओं में असंतोष

    दुर्ग / शौर्यपथ / विशेष रिपोर्ट

    दुर्ग शहर कांग्रेस में चार दशक तक वोरा परिवार के वर्चस्व के बाद जब प्रदेश नेतृत्व ने बड़ा फैसला लेते हुए संगठन की कमान धीरज बाकलीवाल को सौंपी, तब कार्यकर्ताओं के बीच एक नई ऊर्जा और बदलाव की उम्मीद जगी थी। लंबे समय से उठ रहे “परिवारवाद और अवसरवाद” के आरोपों के बीच यह बदलाव कांग्रेस के लिए एक नई शुरुआत माना गया।

    धीरज बाकलीवाल ने अध्यक्ष पद संभालते ही जिस तरह जमीनी और सक्रिय कार्यकर्ताओं को जिला कांग्रेस कमेटी में जगह दी, उसने न केवल संगठन में नई जान फूंकी, बल्कि वर्षों से उपेक्षित कार्यकर्ताओं को भी एक मंच दिया। इस फैसले की शहरभर में सराहना हुई और इसे कांग्रेस के पुनरुत्थान की दिशा में अहम कदम माना गया।

    लेकिन…

    यह “नई सोच” ब्लॉक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर पड़ती नजर आ रही है।

    ? दक्षिण ब्लॉक की सूची: बदलाव या पुनरावृत्ति?

    हाल ही में घोषित दुर्ग शहर दक्षिणी ब्लॉक कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी सूची ने एक बार फिर संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूची सामने आते ही कांग्रेसी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया।

    आरोप है कि—

    कई ऐसे नाम शामिल किए गए हैं जो लंबे समय से निष्क्रिय रहे हैं

    कुछ पदाधिकारी विवादित छवि के माने जाते हैं

    और कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जिनकी जनाधार क्षमता पर ही सवाल खड़े हैं

    यहां तक कि संगठन के भीतर ही यह चर्चा है कि कुछ नाम ऐसे हैं जो “अपने घर या मोहल्ले के चार वोट तक कांग्रेस के पक्ष में नहीं ला सकते।”

    ? कार्यकर्ताओं में निराशा, सवालों की भरमार

    जिस जोश और उम्मीद के साथ जिला स्तर पर नई टीम का गठन हुआ था, वह ब्लॉक स्तर पर आते-आते फीका पड़ता दिखाई दे रहा है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर ब्लॉक स्तर पर ही “पुरानी और निष्क्रिय सोच” हावी रही, तो संगठन की मजबूती केवल कागजों तक सीमित रह जाएगी।

    कई कार्यकर्ता इसे “अवसरवाद की वापसी” भी बता रहे हैं, जहां सक्रियता और संघर्ष की बजाय समीकरण और व्यक्तिगत हित हावी हो रहे हैं।

    ? क्या बाकलीवाल की रणनीति को लगेगा झटका?

    राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो धीरज बाकलीवाल ने जिस साहस के साथ संगठन में नई शुरुआत की थी, उसे जमीनी स्तर पर लागू करना सबसे बड़ी चुनौती है।

    अगर ब्लॉक इकाइयों में पुराने और निष्क्रिय चेहरों को ही तवज्जो मिलती रही, तो यह न केवल संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि आगामी चुनावों में कांग्रेस की स्थिति को भी कमजोर कर सकता है।

    ? आगे क्या?

    अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

    ? क्या दक्षिण ब्लॉक के पदाधिकारी संगठन को मजबूत करने के लिए काम करेंगे?

    ? या फिर यह नियुक्तियां केवल “पद और प्रभाव” तक सीमित रह जाएंगी?

    दुर्ग कांग्रेस के भीतर उठती यह असंतोष की लहर आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक रूप ले सकती है। फिलहाल, सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या संगठन इन आलोचनाओं को गंभीरता से लेगा या फिर “पुरानी राह” पर ही आगे बढ़ेगा।

    (विशेष टिप्पणी):

    दुर्ग कांग्रेस के लिए यह समय आत्ममंथन का है—क्योंकि बदलाव केवल चेहरे बदलने से नहीं, सोच बदलने से आता है।

    दुर्ग // शौर्यपथ समाचार दुर्ग नगर निगम के सबसे व्यस्ततम बस स्टैंड क्षेत्र में अवैध कब्जों का खेल अब खुलकर सामने आने लगा है। आरोप है कि निगम के बाजार…

    छत्तीसगढ़ की राजनीति में “जोगी” नाम केवल एक व्यक्ति या परिवार का प्रतीक नहीं, बल्कि एक पूरे दौर, एक सोच और एक राजनीतिक प्रयोग का प्रतिनिधित्व करता है। अजीत जोगी ने जिस राज्य को जन्म के शुरुआती वर्षों में दिशा दी, उसी राज्य में उनके परिवार की राजनीति आज अस्तित्व के संकट और कानूनी लड़ाइयों के बीच खड़ी है। यह कहानी सिर्फ उत्थान और पतन की नहीं, बल्कि सत्ता, संघर्ष और विवादों के जटिल संगम की है।


    नींव के शिल्पकार: अजीत जोगी

    जब छत्तीसगढ़ का गठन हुआ, तब प्रशासनिक ढांचा कमजोर था, संसाधन सीमित थे और उम्मीदें आसमान छू रही थीं। ऐसे समय में अजीत जोगी ने एक मजबूत प्रशासक के रूप में राज्य की नींव रखी।

    उन्होंने किसानों के लिए समर्थन मूल्य, गरीबों के लिए “काम के बदले चावल”, आदिवासियों के लिए भूमि सुरक्षा और जल प्रबंधन के लिए “जोगी डबरी” जैसी योजनाओं से एक जन-नेता की छवि बनाई। यह वह दौर था जब जोगी को छत्तीसगढ़ का “निर्माता मुख्यमंत्री” कहा जाने लगा।

    लेकिन राजनीति में केवल योजनाएं ही पर्याप्त नहीं होतीं—विश्वास और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी होती है।


    सत्ता का केंद्रीकरण और गिरती साख

    जोगी सरकार पर सबसे बड़ा आरोप था—सत्ता का केंद्रीकरण
    सरकार के फैसले कुछ लोगों और परिवार के इर्द-गिर्द सिमटते नजर आए। इसी दौरान “सुपर सीएम” जैसी उपाधियों ने जन्म लिया, जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।

    कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, वरिष्ठ नेताओं का अलग होना और “जोगी टेप कांड” जैसे विवादों ने जनता के बीच यह संदेश दिया कि सत्ता सेवा से ज्यादा नियंत्रण का माध्यम बनती जा रही है।

    परिणाम स्पष्ट था—2003 में सत्ता हाथ से निकल गई, और 15 साल तक वापसी नहीं हो सकी।


    अमित जोगी: विवादों की परछाई में राजनीति

    जहां अजीत जोगी ने संघर्ष से पहचान बनाई, वहीं अमित जोगी का राजनीतिक सफर शुरुआत से ही आरोपों और विवादों से घिरा रहा।

    “केबल वॉर” हो या प्रशासनिक हस्तक्षेप के आरोप—इन सबने उनकी छवि को एक आक्रामक और प्रभावशाली लेकिन विवादित नेता के रूप में स्थापित किया।

    सबसे बड़ा झटका तब लगा जब रामावतार जग्गी हत्याकांड में हाई कोर्ट ने 2026 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
    हालांकि अंतिम फैसला अभी न्यायिक प्रक्रिया के अंतिम चरण (सुप्रीम कोर्ट) पर निर्भर करेगा, लेकिन इस निर्णय ने जोगी परिवार की राजनीतिक जमीन को हिला कर रख दिया है।


    झीरम घाटी: सवाल जो आज भी जिंदा हैं

    2013 का झीरम घाटी कांड छत्तीसगढ़ की राजनीति का सबसे काला अध्याय रहा।
    इसमें जोगी परिवार पर सीधे आरोप सिद्ध नहीं हुए, लेकिन राजनीतिक संदेह और आरोपों ने उनकी छवि को प्रभावित जरूर किया।

    राजनीति में कभी-कभी सिर्फ दोषी होना जरूरी नहीं होता, संदेह भी काफी होता है।


    जनता कांग्रेस (जे): एक प्रयोग, जो सिमट गया

    अजीत जोगी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई—जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे)।
    2018 में यह पार्टी “किंगमेकर” बनी, लेकिन 2023 तक पूरी तरह हाशिए पर चली गई।

    आज स्थिति यह है कि:

    • संगठन कमजोर
    • नेता बिखर चुके
    • और अस्तित्व बचाने के लिए कांग्रेस में विलय की कोशिश

    यह दिखाता है कि व्यक्ति आधारित राजनीति, संगठन के बिना लंबे समय तक टिक नहीं पाती।


    निष्कर्ष: विरासत बनाम वास्तविकता

    जोगी परिवार की कहानी हमें एक बड़ा राजनीतिक सबक देती है—

    ? विकास की योजनाएं विरासत बनाती हैं, लेकिन विवाद उसे कमजोर कर देते हैं।
    ? सत्ता का केंद्रीकरण अल्पकालिक लाभ देता है, लेकिन दीर्घकाल में नुकसान करता है।
    ? और सबसे महत्वपूर्ण—जनता अंततः छवि और विश्वास के आधार पर फैसला करती है।

    आज जोगी परिवार एक ऐसे मोड़ पर है जहां:

    • अतीत की उपलब्धियां सम्मान दिलाती हैं
    • लेकिन वर्तमान के विवाद भविष्य तय कर रहे हैं

    छत्तीसगढ़ की राजनीति में “जोगी युग” एक अधूरा अध्याय बन चुका है—जिसमें उपलब्धियों की चमक भी है और विवादों की छाया भी।


    दुर्ग। दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में “ट्रिपल इंजन सरकार” के नाम पर जिस तेज़ विकास की उम्मीद आम जनता ने लगाई थी, वह अब राजनीतिक खींचतान की भेंट चढ़ती नजर…
    दुर्ग। शहर के व्यस्ततम बस स्टैंड क्षेत्र में स्थित “राम रसोई” को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसमें नगर निगम के बाजार अधिकारी अभ्युदय मिश्रा की कार्यप्रणाली पर…

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