August 05, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    दीपक वैष्णव की ख़ास रिपोर्ट 

    कोंडागांव। पंचायतों में वित्तीय अनियमितताओं पर जिला प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ी कार्रवाई की है। कोंडागांव विकासखंड के ग्राम पंचायत सम्बलपुर में पदस्थ सचिव बालकृष्ण पोयाम एवं शंकर वैष्णव पर जांच उपरांत लघु शास्ति अधिरोपित की गई है।

    जांच में यह तथ्य सामने आया कि पंचायत निधि से अनियमित तरीके से राशि आहरित की गई। आरोप है कि संबंधित सचिवों द्वारा स्वयं से संबंधित फर्म के माध्यम से भुगतान आहरण किया गया। इस मामले को समाचार पत्र शौर्यपथ ने प्रमुखता से उजागर किया था, जिसके पश्चात शिकायत के आधार पर विधिवत जांच प्रारंभ की गई।

    कारण बताओ नोटिस के बाद हुई दंडात्मक कार्रवाई

    जिला पंचायत सीईओ अविनाश भोई द्वारा प्रारंभिक परीक्षण के पश्चात दोनों सचिवों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। प्राप्त स्पष्टीकरण संतोषजनक न पाए जाने तथा प्रस्तुत कथन तथ्यविहीन पाए जाने पर यह कृत्य छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा (आचरण) नियम 1998 के नियम 15 के विपरीत माना गया।

    फलस्वरूप सक्षम प्राधिकारी द्वारा छत्तीसगढ़ पंचायत सेवा नियम 1999 के नियम 5(क)(दो) के अंतर्गत लघु शास्ति अधिरोपित करते हुए दोनों की एक वेतन वृद्धि संचयी प्रभाव से रोके जाने का आदेश पारित किया गया। आदेश तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया गया है

    पंचायतों में बढ़ी सख्ती, अन्य मामलों की भी जांच जारी

    उल्लेखनीय है कि शौर्यपथ द्वारा बम्हनी सहित अन्य पंचायतों में भी वित्तीय अनियमितताओं के मामलों को उजागर किया गया है। सूत्रों के अनुसार कुछ अन्य पंचायतों में भी बड़ी राशि आहरण की जांच प्रचलन में है और आने वाले दिनों में और कार्रवाई संभव है।

    जिला पंचायत प्रशासन के इस कदम को पंचायत व्यवस्था में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    दुर्ग। शौर्यपथ 

    जिला कांग्रेस कमेटी दुर्ग में ऊर्जावान, जमीनी और संघर्षशील युवा नेता राहुल शर्मा को पुनः जिला महामंत्री बनाए जाने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं, युवाओं, वरिष्ठ नेताओं और आमजन में हर्ष और उत्साह की लहर है। उनकी नियुक्ति को संगठन में ऊर्जा, अनुभव और निरंतरता का प्रतीक माना जा रहा है।

    राहुल शर्मा का राजनीतिक सफर 2005 में नगर शाला अध्यक्ष के रूप में शुरू हुआ। इसके बाद

    2006 में एनएसयूआई दुर्ग विधानसभा के उपाध्यक्ष,

    2008–09 में मध्य ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के महामंत्री,

    2010–2012 तथा 2012–2018 तक श्री आर.एन. वर्मा के नेतृत्व में सचिव एवं महामंत्री,

    2018 में गया पटेल की अध्यक्षता वाली समिति में महामंत्री के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूती दी।

    अब 2026 में उन्हें एक बार फिर जिला महामंत्री का दायित्व सौंपा गया है, जो उनके संगठनात्मक कौशल और नेतृत्व पर विश्वास को दर्शाता है।

    राहुल शर्मा का नाम केवल पदों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वे आंदोलनों और जनसंघर्षों में भी अग्रिम पंक्ति में रहे हैं। 2012 में नगर निगम दुर्ग के खिलाफ जनसमस्याओं को लेकर हुए आंदोलन में उनके विरुद्ध प्रकरण दर्ज हुआ, जिसमें वे विवेक मिश्रा, इलियास चौहान, अय्यूब खान, प्रकाश गीते और रज्जन खान के साथ 6 दिन जेल भी गए। इसे उनके संघर्षशील और निडर राजनीतिक जीवन का अहम अध्याय माना जाता है।

    अपनी नियुक्ति पर राहुल शर्मा ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, पूर्व विधायक अरुण वोरा, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री राजेंद्र साहू, तथा शहर कांग्रेस कमेटी दुर्ग के अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें धन्यवाद दिया।

    उनकी नियुक्ति पर बधाई देने वालों में युवा साथियों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं की लंबी सूची शामिल है, जिनमें प्रमुख रूप से सुरेश गुप्ता, पिंकी गुप्ता, आशुतोष सिंह, विवेक मिश्रा, नासिर खोखर, विकास पुरोहित, सुरेश देवांगन, प्रकाश शर्मा, गुरदीप भाटिया, विकास राठी, सरोज यादव, प्रवीण चन्द्राकर, छोटे लाला यादव, राकेश सिन्हा, मनीष सोनवानी, लक्ष्मण शर्मा, विक्रांत शर्मा, राजू यादव, योगेश शर्मा, अनूप सिन्हा, विक्की यादव, प्रवीण सिंह, आशीष मेश्राम, सूर्यमणि मिश्रा, बाला पीढ़ियार, सौरभ पांडे, रिंकू शुक्ला, मोनू शर्मा, अजित शुक्ला सहित अनेक कार्यकर्ता शामिल हैं।

    कुल मिलाकर, राहुल शर्मा की पुनर्नियुक्ति को दुर्ग कांग्रेस संगठन के लिए मजबूती, युवा नेतृत्व और संघर्ष की नई ऊर्जा के रूप में देखा जा रहा है।

    दुर्ग कांग्रेस में नेतृत्व संकट, संगठन सवालों के घेरे में 

    दुर्ग। शौर्यपथ राजनीति 

    दुर्गनगर निगम के पूर्व महापौर के रूप में धीरज बाकलीवाल की पहचान एक शालीन, सौम्य और मिलनसार जनप्रतिनिधि की रही है। आम जनता के बीच उनका व्यवहारिक व्यक्तित्व स्वीकार्य रहा, लेकिन सक्रिय संगठनात्मक राजनीति में कदम रखते ही उनकी भूमिका पर अब गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। शहर कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद जिस ऊर्जा, आक्रामकता और जमीनी सक्रियता की अपेक्षा कार्यकर्ताओं को थी, वह अब तक दिखाई नहीं दे सकी है।

    अध्यक्ष नियुक्ति के साथ ही सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक मीम—जिसमें पैसे देकर अध्यक्ष बनने का तंज कसा गया—को शुरुआत में लोगों ने हल्के-फुल्के व्यंग्य के तौर पर लिया। लेकिन बीते कुछ महीनों की संगठनात्मक कार्यप्रणाली ने उस मज़ाक को अब एक राजनीतिक बहस में बदल दिया है। कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या दुर्ग कांग्रेस वास्तव में मजबूत हो रही है या सिर्फ चेहरों का बदलाव हुआ है?

    वरिष्ठ नेताओं से दूरी, कमजोर पकड़ का संकेत

    धीरज बाकलीवाल के अध्यक्षीय कार्यकाल में सबसे बड़ा सवाल उनकी वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं से बढ़ती दूरी को लेकर खड़ा हो रहा है। दीपक दुबे, आर.एन. वर्मा, अरुण वोरा जैसे अनुभवी नेताओं का मंच से धीरे-धीरे गायब होना केवल संयोग नहीं माना जा रहा। इसके विपरीत, जनसमर्थन खो चुके और सीमित प्रभाव वाले चेहरों के साथ नज़दीकियां संगठन की दिशा पर सवाल खड़े करती हैं।

    यह तुलना स्वाभाविक रूप से भाजपा संगठन से की जा रही है, जहां आज भी चंद्रिका चंद्राकर, उषा टावरी, रमशिला साहू, लाभचंद बाफना जैसे वरिष्ठ नेताओं को सम्मान, मंच और संगठनात्मक स्थान प्राप्त है। भाजपा में वरिष्ठ-कनिष्ठ संतुलन को संगठनात्मक मजबूती की रीढ़ माना जाता है, जबकि दुर्ग कांग्रेस में यही संतुलन टूटता नजर आ रहा है।

    कार्यकारिणी बनी, लेकिन नाराज़गी भी

    जिला व शहर कार्यकारिणी की घोषणा के बाद असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। अनुभवी और संघर्षशील नेताओं को दरकिनार कर अपेक्षाकृत नए और अनुभवहीन लोगों को बड़ी जिम्मेदारियां देना अब चर्चा का विषय बन चुका है। यह नाराज़गी केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रही—कई कार्यकर्ता सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदेश नेतृत्व तक अपनी पीड़ा पहुंचाने लगे हैं।

    हाल ही में कांग्रेस कार्यालय से जारी एक तस्वीर, जिसमें अध्यक्ष सभी पदाधिकारियों से मुलाकात करते दिखाई देने थे, उल्टा असर डाल गई। तस्वीर में चंद लोगों की मौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या संगठन के भीतर ही संवाद टूट रहा है?

    भूपेश बघेल की पसंद पर भी सवाल

    धीरज बाकलीवाल का चयन छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके भूपेश बघेल की पसंद के रूप में हुआ। ऐसे में अब जब संगठनात्मक निष्क्रियता और असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, तो आलोचना की आंच भूपेश बघेल तक भी पहुंचने लगी है। हालांकि यह स्पष्ट है कि चयन के बाद संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी शहर अध्यक्ष की होती है।

    नेता प्रतिपक्ष की निष्क्रियता ने बढ़ाई मुश्किलें

    दुर्ग नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष के रूप में संजय कोहले की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बदहाल निगम व्यवस्था, जनसमस्याएं और प्रशासनिक विफलताओं के बावजूद विपक्ष की आवाज़ कमजोर रही है। इसे भी धीरज बाकलीवाल के निर्णयों और नेतृत्व क्षमता से जोड़कर देखा जा रहा है।

    अस्तित्व की लड़ाई या नई शुरुआत?

    आज दुर्ग कांग्रेस एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सवाल साफ है—

    क्या धीरज बाकलीवाल मजबूत इच्छाशक्ति, स्पष्ट निर्णय और समावेशी नेतृत्व के साथ मैदान में उतरेंगे?

    या फिर कांग्रेस दुर्ग में केवल दस्तावेजों और पुरानी स्मृतियों तक सिमट कर रह जाएगी?

    आने वाले चुनाव सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक अस्तित्व की परीक्षा होंगे। अब देखना यह है कि अध्यक्ष पद की कुर्सी धीरज बाकलीवाल के लिए अवसर बनती है या उनकी राजनीतिक उलटी गिनती की शुरुआत।

    मुख्यमंत्री साय के ‘सुशासन’ पर भारी पड़ता मुरम माफिया का खुला खेल!

    दुर्ग (ग्रामीण)।

    दुर्ग जिले के ग्रामीण अंचलों में अवैध मुरम मिट्टी उत्खनन और परिवहन अब छुपा हुआ नहीं, बल्कि खुलेआम संचालित हो रहा है। हैरानी की बात यह है कि लगातार शिकायतों, फोटो, लोकेशन और जमीनी साक्ष्यों के बावजूद जिला खनिज विभाग के जिम्मेदार अधिकारी खनिज इंस्पेक्टर दीपक तिवारी की ओर से अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे न केवल किसानों की जमीन तबाह हो रही है, बल्कि शासन को लाखों-करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान की आशंका भी गहराती जा रही है।

    नदी मुहाने से 35 एकड़ तक मुरम की ‘लूट’

    चंगोरी क्षेत्र में नदी के मुहाने के पास स्थित लगभग 35 एकड़ खेत में मुरम मिट्टी की पटिंग का कार्य लगभग पूरा कर लिया गया, जबकि इस पूरे कार्य से संबंधित कोई वैधानिक अनुमति, रॉयल्टी रसीद या खनिज पास सामने नहीं आया है।

    स्थानीय ग्रामीणों का दावा है कि इस स्थल से हजारों गाड़ियों में मुरम मिट्टी का परिवहन किया गया, जो सीधे तौर पर अवैध खनन और परिवहन की श्रेणी में आता है।

    बिरेझर में खेत नहीं, खदान तैयार

    बिरेझर क्षेत्र के किसानों ने गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि राजा स्टील के संचालक मनोज द्वारा खेत बनाने के नाम पर 8 से 10 फीट तक गहरी खुदाई कर मुरम मिट्टी निकाल ली गई।

    परिणामस्वरूप खेत उपज योग्य रहने के बजाय गड्ढों में तब्दील हो गए। अब किसान अपने ही खेतों को फिर से उपयोगी बनाने के लिए अतिरिक्त खर्च और भारी संघर्ष झेलने को मजबूर हैं।

    शिकायतें पहुँचीं, कार्रवाई शून्य

    इन सभी मामलों की जानकारी खनिज विभाग को  दी गई, इसके बावजूद न तो मौके का निरीक्षण हुआ और न ही अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए कोई सख्त कदम उठाया गया।

    खनिज इंस्पेक्टर दीपक तिवारी की यह निष्क्रियता अब केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संरक्षण और मिलीभगत के संदेह को जन्म दे रही है।

    सवालों से बचते दिखे जिम्मेदार अधिकारी

    जब इस पूरे मामले में हमारी टीम ने खनिज इंस्पेक्टर दीपक तिवारी से उनका पक्ष जानना चाहा, तो वे पहले कार्यालय में अनुपस्थित बताए गए।

    लगातार प्रयासों के बाद जब उनकी उपस्थिति मिली, तब भी घंटों तक इंतजार कराया गया। इस दौरान वे ठेकेदारों के साथ चाय-नाश्ता और लंबी बातचीत में व्यस्त नजर आए, लेकिन मीडिया / शिकायतकर्ताओं के सवालों का जवाब देने से बचते रहे।यह रवैया अपने आप में गंभीर संदेह को और गहरा करता है।

    उतई–मोरिद में भी अवैध खनन, फिर भी जांच नदारद

    हाल ही में एक और गंभीर मामला सामने आया है।उतई क्षेत्र के ग्राम मोरिद, तहसील भिलाई-3 अंतर्गत दुर्गा फार्म के पास खुलेआम मुरम मिट्टी का अवैध उत्खनन और परिवहन जारी है।

    इस संबंध में लोकेशन फोटो और शिकायत खनिज विभाग को भेजे जाने के बावजूद तीन दिन बीत जाने के बाद भी खनिज इंस्पेक्टर दीपक तिवारी मौके पर जांच के लिए नहीं पहुंचे।

    नाकाबंदी बंद, विभाग मुख्यालय में जमे अधिकारी

    विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जिले के सभी खनिज नाके बंद कर दिए गए हैं, और अधिकांश कर्मचारी व अधिकारी जिला मुख्यालय में ही जमे हुए हैं।

    ऐसे में सवाल उठता है कि जब अवैध खनन की शिकायतें बढ़ रही हैं, तब जमीनी निगरानी क्यों खत्म कर दी गई?

    20 वर्षों से अवैध उत्खनन का आरोप

    भिलाई-3 क्षेत्र अंतर्गत पवन यदु द्वारा पिछले लगभग 20 वर्षों से अवैध उत्खनन किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।

    यदि यह तथ्य सही है, तो यह केवल एक-दो मामलों की बात नहीं, बल्कि खनिज विभाग की वर्षों पुरानी विफलता या मौन सहमति की ओर इशारा करता है।

    राजस्व नुकसान या खुला संरक्षण?

    खनिज संपदा से प्राप्त राजस्व जिला प्रशासन की सबसे बड़ी आय का स्रोत माना जाता है।

    खेत निर्माण, भारतमाला परियोजना और निजी संस्थाओं की आड़ में हो रहा यह अवैध खनन न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि सीधे-सीधे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने वाला कृत्य है।

    अब बड़ा सवाल यह है कि—

    क्या यह सब लापरवाही है या फिर सुनियोजित संरक्षण?

    क्या कलेक्टर को भी गुमराह किया जा रहा है?

    खनिज विभाग सीधे तौर पर जिला कलेक्टर के अधीन कार्य करता है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि

    क्या खनिज इंस्पेक्टर दीपक तिवारी वास्तविक स्थिति से कलेक्टर को अवगत नहीं करा रहे, या फिर जानबूझकर जानकारी छिपाई जा रही है?

    सुशासन बनाम जमीनी हकीकत

    एक ओर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय प्रदेश में सुशासन की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दुर्ग जिले में खनिज विभाग की यह कार्यप्रणाली सरकारी दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर रही है।

    अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि—

    क्या उच्च स्तर पर निष्पक्ष जांच होगी?

    क्या दोषियों पर कार्रवाई कर राजस्व की भरपाई की जाएगी?

    या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों के नीचे दबा दिया जाएगा?

    दुर्ग की जनता और किसान जवाब का इंतजार कर रहे हैं।

    दुर्ग। शौर्यपथ। 

    शहर को सुंदर, स्वच्छ और अतिक्रमण-मुक्त बनाने को लेकर दुर्ग नगर निगम और शहरी सरकार की मुखिया महापौर श्रीमती अलका बाघमार द्वारा जारी की जा रही प्रेस विज्ञप्तियाँ देखने-पढ़ने में जितनी प्रशंसनीय लगती हैं, जमीनी हकीकत उससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। नगर निगम के अतिक्रमण विभाग द्वारा की जा रही कार्रवाई ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुर्ग में कानून सभी के लिए समान है या फिर यह अमीर-गरीब देखकर लागू किया जा रहा है?

    शहरी सरकार के निर्देश पर हाल ही में गरीब पसरा व्यापारियों और फुटपाथ पर रोजी-रोटी कमाने वालों पर कड़ी कार्रवाई की गई। उनका सामान जब्त कर लिया गया, वर्षों से चला आ रहा छोटा-सा व्यवसाय छीन लिया गया। दो वक्त की रोटी कमाने वाले इन लोगों को “अतिक्रमण-मुक्त शहर” के नाम पर बेरोजगार कर दिया गया।

    परंतु इसी शहर के इंदिरा मार्केट स्थित गणेश मंदिर के सामने एक बिल्कुल अलग तस्वीर देखने को मिलती है। यहां सड़क की जमीन पर बड़े पैमाने पर ‘राम रसोई’ का संचालन खुलेआम किया जा रहा है। जनहित का नाम लिया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि यहां एक होटलनुमा व्यावसायिक संचालन हो रहा है, जहां बाकायदा ₹20 प्रति थाली की तय कीमत रखी गई है।

    जनहित के कार्यों पर किसी को आपत्ति नहीं, बल्कि यह सराहनीय है कि शहर के बड़े व्यापारी समाजसेवा में आगे आए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनहित के नाम पर सड़क की जमीन पर कब्जा जायज हो जाता है?

    अगर यही नियम है, तो शहर में दर्जनों संस्थाएं हैं जो जनसेवा करती हैं—क्या सभी को सड़कों पर कब्जा करने की छूट दी जाएगी?

    संविधान की नजर में अमीर और गरीब एक समान हैं, फिर दुर्ग में यह भेदभाव क्यों?

    क्या नगर निगम की कार्रवाई सिर्फ गरीबों के लिए है और प्रभावशाली लोगों के लिए नियम बदल जाते हैं?

    इतना ही नहीं, निगम कर्मचारियों से मिली जानकारी के अनुसार महापौर अलका बाघमार ने नगर निगम के व्यावसायिक परिसरों के बरामदों में व्यापार करने की अनुमति भी दे दी है। बड़ा सवाल यह है कि—

    ➡️ क्या किसी महापौर को यह संवैधानिक अधिकार है कि वह आम जनता के लिए बने बरामदों को दुकानों में तब्दील करने की अनुमति दे?

    ➡️ क्या दुर्ग नगर निगम क्षेत्र में संविधान चलेगा या महापौर का निजी आदेश?

    दुर्ग। शौर्यपथ। भारतीय जनता पार्टी पर “दागदार नेताओं को सर्फ से धोकर राजनीति में शामिल करने” का आरोप लगाने वाली कांग्रेस अब खुद उसी आरोपों के घेरे में नजर आ रही है। दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस की नई कार्यकारिणी समिति के गठन के बाद महामंत्री पद पर लक्ष्मी साहू की नियुक्ति ने संगठन के भीतर और बाहर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है।

    हाल ही में घोषित ग्रामीण कांग्रेस की जंबो कार्यकारिणी में पूर्व जिला पंचायत सदस्य लक्ष्मी साहू को महामंत्री बनाया गया। जैसे ही उनका नाम सूची में सामने आया, राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। सवाल उठने लगे—क्या दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस में साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं की कमी हो गई है? या फिर कांग्रेस भी अब उसी “वाशिंग मशीन” राजनीति की राह पर है, जिसका वह विरोध करती रही है?

    नियुक्ति पर उठे सवाल, संगठन में असंतोष की आहट

    वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जब कांग्रेस पहले से ही बैकफुट पर मानी जा रही है, ऐसे समय में यह नियुक्ति पार्टी के भीतर असहजता का कारण बन गई है। सूत्रों के अनुसार, कुछ कांग्रेसी सदस्य ही इस निर्णय पर सवाल उठा रहे हैं। चर्चा का केंद्र दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष राकेश ठाकुर की कार्यशैली भी बन गई है।

    लक्ष्मी साहू का नाम हाल ही में एक विवाद के कारण भी सुर्खियों में रहा है। रसमड़ा निवासी संतोष रामटेक ने पुलिस अधीक्षक को शिकायत सौंपकर लक्ष्मी साहू, उनके पति यशवंत साहू और मोनिका साहू पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत में आरोप है कि कांग्रेस पार्टी के नाम पर नौकरी दिलाने का झांसा देकर पैसे लिए गए और कार्य न होने पर रकम वापस मांगने पर कथित रूप से धमकी दी गई। संतोष रामटेक ने यह भी दावा किया है कि उनकी मां के साथ मारपीट की गई, जिसका वीडियो उन्होंने सबूत के तौर पर प्रस्तुत करने की बात कही है।

    हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि या पुलिस द्वारा किसी निर्णायक कार्रवाई की जानकारी अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है, लेकिन राजनीतिक चर्चा में इन आरोपों का उल्लेख प्रमुखता से हो रहा है।

    क्या संगठन को अंधेरे में रखा गया?

    लक्ष्मी साहू की नियुक्ति के बाद यह भी चर्चा उठी कि क्या राकेश ठाकुर ने संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को विश्वास में लिया था? क्या यह निर्णय सर्वसम्मति से हुआ या शीर्ष स्तर पर तय कर दिया गया?

    राकेश ठाकुर की ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के समय भी संगठन के भीतर विरोध के स्वर सुनाई दिए थे। ऐसे में अब यह नया विवाद उनके नेतृत्व पर दोबारा सवाल खड़े कर रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि हाल ही में लक्ष्मी साहू का रामटेक परिवार से विवाद सामने आया था, जिससे यह मुद्दा और संवेदनशील बन गया है।

    ‘काबिलियत या सेटिंग’ की बहस

    संगठन के भीतर यह भी फुसफुसाहट है कि क्या नियुक्तियां काबिलियत के आधार पर हो रही हैं या “सेटिंग” के जरिए? क्या कांग्रेस में सर्वसम्मति और सामूहिक निर्णय की परंपरा कमजोर पड़ रही है?

    पूर्व में भी राकेश ठाकुर पर दुर्ग में कांग्रेसी नेताओं के फोटो पोस्टरों से हटवाने को लेकर विवाद खड़ा हो चुका है। ऐसे में यह नया घटनाक्रम उनकी कार्यप्रणाली को लेकर आलोचनाओं को और बल दे रहा है।

    कांग्रेस की छवि पर असर?

    राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप और चर्चा होना सामान्य बात है, लेकिन जब हर चर्चा नकारात्मक दिशा में जाए तो उसका असर संगठन की छवि पर पड़ना स्वाभाविक है। दुर्ग ग्रामीण कांग्रेस अब अपनी जंबो टीम के साथ राजनीतिक मुकाबले के लिए मैदान में उतर चुकी है, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि यह चयन प्रक्रिया भविष्य में संगठन को मजबूती देती है या आंतरिक असंतोष को और बढ़ाती है।

    फिलहाल, लक्ष्मी साहू की नियुक्ति ने दुर्ग की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। आने वाले समय में पुलिस जांच और संगठनात्मक प्रतिक्रिया किस दिशा में जाती है, यही तय करेगा कि यह विवाद अस्थायी राजनीतिक शोर है या कांग्रेस के लिए दीर्घकालिक चुनौती।

        रायपुर / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना के लाभार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण सूचना सामने आई है। भारत सरकार ने इस योजना के अंतर्गत सहायता राशि की प्रथम किस्त मार्च महीने के अंत तक जारी करने की तैयारी में है। हालांकि, इस लाभ को प्राप्त करने के लिए कर्मचारी भविष्य निधि संगठन और संबंधित विभागों ने सदस्यों एवं प्रतिष्ठानों के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं, जिनका पालन न करने पर लाभार्थी राशि से वंचित रह सकते हैं।

    योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रत्येक नए जुडऩे वाले और प्रथम बार सदस्य बनने वाले व्यक्तियों के लिए सार्वभौमिक खाता संख्या (्रहृ) का चेहरा प्रमाणीकरण तकनीक (स्नड्डष्द्ग ्रह्वह्लद्धद्गठ्ठह्लद्बष्ड्डह्लद्बशठ्ठ ञ्जद्गष्द्धठ्ठशद्यशद्द4) के माध्यम से सत्यापन कराना अब अनिवार्य कर दिया गया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि बिना इस डिजिटल सत्यापन के योजना का लाभ प्रदान नहीं किया जाएगा। यदि किसी सदस्य को इस तकनीकी प्रक्रिया में कोई कठिनाई आती है, तो उन्हें तुरंत अपने संबंधित क्षेत्रीय कार्यालय में उपस्थित होकर सहायता प्राप्त करने की सलाह दी गई है।

    योजना की राशि का प्रेषण सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (ष्ठक्चञ्ज) के माध्यम से किया जाएगा। इसके लिए सदस्यों का बैंक खाता इस सुविधा हेतु सक्षम होना अनिवार्य है। जिन कर्मचारियों के खाते वर्तमान में इस प्रणाली से नहीं जुड़े हैं, उन्हें तत्काल अपनी बैंक शाखा में जाकर यह सुविधा सक्रिय कराने के निर्देश दिए गए हैं ताकि भुगतान प्रक्रिया में कोई बाधा न आए।

    व्यक्तियों के साथ-साथ नियोक्ताओं और संस्थानों पर भी नियमों के पालन की जिम्मेदारी डाली गई है। आधिकारिक सूचना के अनुसार, जो प्रतिष्ठान नियमित रूप से इलेक्ट्रॉनिक चालान-सह-विवरणिका (श्वष्टक्र) प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं या अंशदान जमा करने में विलंब कर रहे हैं, उनके कर्मचारियों को योजना के लाभ से रोका जा सकता है। प्रशासन ने सभी संस्थानों से समय पर विवरणिका भरने और अंशदान सुनिश्चित करने का आग्रह किया है ताकि सुचारू रूप से किस्त जारी की जा सके।

       दुर्ग / शौर्यपथ / जिला कार्यालय सभाकक्ष में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम में कलेक्टर श्री अभिजीत सिंह ने आमजनों की समस्याएं गंभीरता से सुनीं और संबंधित विभागों को शीघ्र निराकरण के निर्देश दिए। इस अवसर पर डिप्टी कलेक्टर श्री हितेश पिस्दा सहित विभिन्न विभागों के अधिकारी उपस्थित रहे। जनदर्शन में अवैध कब्जा, आवासीय पट्टा, भूमि सीमांकन, सीसी रोड निर्माण, ऋण पुस्तिका सुधार, आर्थिक सहायता और प्रधानमंत्री आवास योजना सहित कुल 137 आवेदन प्राप्त हुए।
    जन्मतिथि सुधार का मामला
    नयापारा वार्ड क्रमांक 1 निवासी ने अपनी पुत्री की शालेय जन्मतिथि में त्रुटि सुधार की मांग की। अभिलेख में जन्मतिथि 15 मार्च 2008 दर्ज है, जबकि जन्म प्रमाण पत्र में 15 मार्च 2009 अंकित है। विद्यालय प्रबंधन द्वारा सुधार नहीं किए जाने की शिकायत पर कलेक्टर ने प्राचार्य से सीधे चर्चा कर दस्तावेजों के आधार पर उचित कार्रवाई के निर्देश दिए।
    महतारी वंदन योजना की किस्त लंबित
    भिलाई निवासी महिला ने तीन माह से महतारी वंदन योजना की राशि नहीं मिलने की शिकायत की। फिंगरप्रिंट मैच नहीं होने के कारण किस्त अटकी होने पर कलेक्टर ने महिला एवं बाल विकास विभाग को त्वरित समाधान के निर्देश दिए।
    प्रधानमंत्री आवास योजना की किस्त नहीं मिली
    गयानगर वार्ड क्रमांक 4 निवासी ने छह माह बीतने के बाद भी पीएम आवास योजना की एक भी किस्त नहीं मिलने की शिकायत की। कलेक्टर ने नगर निगम दुर्ग आयुक्त को नियमानुसार शीघ्र किस्त जारी करने के निर्देश दिए।
    तेज डीजे पर सख्ती
    कुरूद के सुंदर विहार व प्रगति नगर क्षेत्र के रहवासियों ने प्रीत पैलेस में देर रात तक तेज डीजे बजने से हो रही परेशानी की शिकायत की। कलेक्टर ने एसडीएम भिलाई को निर्धारित समय सीमा के उल्लंघन पर साउंड सिस्टम जब्त करने की कार्रवाई करने के निर्देश दिए।
    कलेक्टर श्री सिंह ने कहा कि जनदर्शन आमजन की समस्याओं के त्वरित समाधान का प्रभावी मंच है और प्रत्येक आवेदन पर संवेदनशीलता व प्राथमिकता से कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

       रायपुर / शौर्यपथ / होली के पहले निकाय कर्मियों को वेतन भुगतान के लिए मानवीय सरोकार के साथ पहल करते हुए नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग द्वारा प्रदेश के नगरीय निकायों को चुंगी क्षतिपूर्ति मद से कुल 62.85 करोड़ रुपए का आबंटन आज जारी किया गया है। इसमें वेतन भुगतान के लिए कुल 51 करोड़ 71 लाख 21 हजार रुपये आबंटित किए गए हैं। इसके साथ ही सभी नगरीय निकायों को प्रतिमाह नियमित रूप से दी जा रही चुंगी क्षतिपूर्ति के अंतर्गत कुल 11 करोड़ 14 लाख 38 हजार 492 रुपये का भी आबंटन किया गया है।

    फरवरी-2026 की स्थिति में नगरीय निकायों में वेतन के लिए लंबित राशि के आधार पर नगरीय निकायों को चुंगी क्षतिपूर्ति मद से आबंटन किया गया है, ताकि नगरीय निकायों में वित्तीय संतुलन बनाए रखा जा सके और लंबित देयकों एवं वेतन का निराकरण हो सके।

    11 नगर निगमों को वेतन के लिए 25.05 करोड़

    प्रदेश के 11 नगर निगमों को कुल 25 करोड़ 5 लाख 34 हजार रुपये की राशि वेतन एवं चुंगी क्षतिपूर्ति मद में प्रदान की गई है। नगर पालिक निगम भिलाई को 4 करोड़, बिलासपुर को 5 करोड़, दुर्ग को 1 करोड़ 65 लाख 92 हजार, राजनांदगाँव को 3 करोड़, जगदलपुर को 1 करोड़ 50 लाख, अंबिकापुर को 3 करोड़, चिरमिरी को 2 करोड़, रिसाली को 2 करोड़, बीरगांव को 54 लाख 55 हजार, धमतरी को 1 करोड़ 7 लाख एवं भिलाई-चरोदा को 1 करोड़ 27 लाख 87 हजार रुपये जारी किए गए हैं। नगर निगमों में यह राशि मुख्य रूप से नियमित कर्मचारियों, स्वच्छता कर्मियों एवं संविदा कर्मचारियों के वेतन भुगतान तथा चुंगी समाप्त होने से उत्पन्न राजस्व अंतर की भरपाई हेतु उपयोग की जाएगी। इसके अलावा प्रदेश के सभी 14 नगर निगमों को चुंगी क्षतिपूर्ति के अंतर्गत 7 करोड़ 51 लाख 55 हज़ार 420 रुपये भी आबंटित किए गए हैं।

    वेतन के लिए नगर पालिकाओं को 16.48 करोड़ व नगर पंचायतों को 10.17 करोड़

    नगरीय प्रशासन विभाग ने प्रदेश के 38 नगर पालिका परिषदों में 16 करोड़ 48 लाख की राशि तथा 85 नगर पंचायतों को कुल 10 करोड़ 17 लाख रुपये से अधिक की राशि होली के पूर्व निकाय कर्मियों को वेतन भुगतान के लिए आबंटित की है। छोटे एवं मध्यम नगरीय निकायों के लिए यह वित्तीय सहायता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। प्रदेश के सभी 54 नगर पालिकाओं को भी चुंगी क्षतिपूर्ति की राशि दी गई है। इसके लिए 2 करोड़ 8 लाख 52 हजार 17 रुपए का आबंटन जारी किया गया है। इसके अलावा सभी 124 नगर पंचायतों को एक करोड़ 54 लाख 31 हजार 55 रुपए की मासिक चुंगी क्षतिपूर्ति राशि दी गई है।

    ज्ञातव्य हो कि राज्य में चुंगी समाप्त होने के बाद नगरीय निकायों को राजस्व में कमी का सामना करना पड़ा था। इस स्थिति में राज्य सरकार द्वारा चुंगी क्षतिपूर्ति मद के माध्यम से निकायों को नियमित अंतराल पर राशि प्रदान की जाती है, ताकि वे अपने प्रशासनिक एवं सेवा संबंधी दायित्वों का निर्वहन सुचारू रूप से कर सकें। यह मद विशेष रूप से वेतन भुगतान, स्वच्छता व्यवस्था, जलप्रदाय सेवाओं एवं दैनिक संचालन व्यय को संतुलित करने में सहायक होती है।

    विभाग द्वारा आज आबंटित राशि से नगरीय निकायों में कार्यरत हजारों कर्मचारियों को होली के पूर्व वेतन प्राप्त होगा। इससे निकायों में स्वच्छता, पेयजल आपूर्ति, प्रकाश व्यवस्था एवं अन्य शहरी सेवाओं में निरंतरता बनी रहेगी। नगरीय प्रशासन विभाग ने स्पष्ट किया है कि आबंटित राशि का उपयोग निर्धारित मदों में ही किया जाएगा। सभी निकायों को वित्तीय नियमों का पालन करते हुए व्यय विवरण प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। चुंगी क्षतिपूर्ति मद से वेतन के लिए 51.71 करोड़ एवं नियमित चुंगी क्षतिपूर्ति के रूप में 11.14 करोड़, इस प्रकार कुल 62.85 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का होली के पहले आबंटन नगरीय निकायों के लिए बड़ी राहत है।

    दुर्ग | शौर्यपथ।

    छत्तीसगढ़ में किसानों के हित को सर्वोपरि रखते हुए मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार ने एक और ऐतिहासिक निर्णय लिया है। राज्य शासन द्वारा “कृषक उन्नति योजना” के अंतर्गत पंजीकृत धान एवं धान बीज उत्पादक किसानों को धान के अंतर की राशि सीधे उनके खातों में हस्तांतरित की जा रही है। इस संबंध में कृषि विकास एवं किसान कल्याण तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग, मंत्रालय महानदी भवन द्वारा सभी जिलों को स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए गए हैं।

    जारी पत्र के अनुसार, 25 लाख 28 हजार से अधिक पंजीकृत किसानों को ₹10,324 करोड़ से अधिक की आदान सहायता राशि का वितरण दिनांक 28 फरवरी 2026 को किया जाएगा। यह राशि सीधे किसानों के बैंक खातों में डीबीटी के माध्यम से अंतरित की जाएगी, जिससे पारदर्शिता और त्वरित लाभ सुनिश्चित होगा।

    राज्य शासन ने इस अवसर को किसानों के सम्मान और सहभागिता का पर्व बनाने के उद्देश्य से राज्य स्तरीय तथा विकासखंड स्तरीय कार्यक्रमों के आयोजन का निर्णय लिया है। राज्य स्तरीय मुख्य कार्यक्रम मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के मुख्य आतिथ्य में विकासखंड बिल्हा, जिला-बिलासपुर में दोपहर 12.30 बजे आयोजित किया जाएगा। इसी समय सभी विकासखंडों में भी कार्यक्रम आयोजित होंगे।

    पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि—

    राज्य स्तरीय कार्यक्रम में न्यूनतम 20 हजार किसानों तथा

    विकासखंड स्तरीय कार्यक्रमों में न्यूनतम 2 हजार किसानों की सहभागिता सुनिश्चित की जाएगी।

    इसके लिए स्थान चयन, पेयजल, धूप से बचाव, बैठक व्यवस्था एवं आवागमन की सुविधाओं पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए गए हैं।

    कार्यक्रमों में विधायकगण, जिला पंचायत अध्यक्ष, जनपद पंचायत अध्यक्ष एवं अन्य जनप्रतिनिधियों को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाएगा। साथ ही मुख्यमंत्री श्री साय राज्य स्तरीय कार्यक्रम के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से चयनित जिलों के किसानों से सीधा संवाद भी करेंगे, जिसके लिए आवश्यक तकनीकी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

    राज्य शासन ने स्पष्ट किया है कि कार्यक्रम स्थल का चयन इस प्रकार किया जाए जिससे किसानों को किसी प्रकार की असुविधा न हो और आम जनता के दैनिक आवागमन व यातायात पर कोई प्रभाव न पड़े।

    मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में यह निर्णय एक बार फिर यह साबित करता है कि छत्तीसगढ़ में सरकार किसानों के साथ खड़ी है, न कि केवल घोषणाओं तक सीमित है। धान उत्पादक किसानों को समय पर अंतर राशि देकर सरकार ने यह संदेश दिया है कि यह वास्तव में “किसानों की सरकार” है, जो खेत से लेकर खाते तक किसान के हितों की रक्षा कर रही है।

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