August 05, 2026
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    धीरज बाकलीवाल की राजनीति की उलटी गिनती शुरू?

    धीरज बाकलीवाल की राजनीति की उलटी गिनती शुरू? Ai generated
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    दुर्ग कांग्रेस में नेतृत्व संकट, संगठन सवालों के घेरे में 

    दुर्ग। शौर्यपथ राजनीति 

    दुर्गनगर निगम के पूर्व महापौर के रूप में धीरज बाकलीवाल की पहचान एक शालीन, सौम्य और मिलनसार जनप्रतिनिधि की रही है। आम जनता के बीच उनका व्यवहारिक व्यक्तित्व स्वीकार्य रहा, लेकिन सक्रिय संगठनात्मक राजनीति में कदम रखते ही उनकी भूमिका पर अब गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। शहर कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद जिस ऊर्जा, आक्रामकता और जमीनी सक्रियता की अपेक्षा कार्यकर्ताओं को थी, वह अब तक दिखाई नहीं दे सकी है।

    अध्यक्ष नियुक्ति के साथ ही सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक मीम—जिसमें पैसे देकर अध्यक्ष बनने का तंज कसा गया—को शुरुआत में लोगों ने हल्के-फुल्के व्यंग्य के तौर पर लिया। लेकिन बीते कुछ महीनों की संगठनात्मक कार्यप्रणाली ने उस मज़ाक को अब एक राजनीतिक बहस में बदल दिया है। कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या दुर्ग कांग्रेस वास्तव में मजबूत हो रही है या सिर्फ चेहरों का बदलाव हुआ है?

    वरिष्ठ नेताओं से दूरी, कमजोर पकड़ का संकेत

    धीरज बाकलीवाल के अध्यक्षीय कार्यकाल में सबसे बड़ा सवाल उनकी वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं से बढ़ती दूरी को लेकर खड़ा हो रहा है। दीपक दुबे, आर.एन. वर्मा, अरुण वोरा जैसे अनुभवी नेताओं का मंच से धीरे-धीरे गायब होना केवल संयोग नहीं माना जा रहा। इसके विपरीत, जनसमर्थन खो चुके और सीमित प्रभाव वाले चेहरों के साथ नज़दीकियां संगठन की दिशा पर सवाल खड़े करती हैं।

    यह तुलना स्वाभाविक रूप से भाजपा संगठन से की जा रही है, जहां आज भी चंद्रिका चंद्राकर, उषा टावरी, रमशिला साहू, लाभचंद बाफना जैसे वरिष्ठ नेताओं को सम्मान, मंच और संगठनात्मक स्थान प्राप्त है। भाजपा में वरिष्ठ-कनिष्ठ संतुलन को संगठनात्मक मजबूती की रीढ़ माना जाता है, जबकि दुर्ग कांग्रेस में यही संतुलन टूटता नजर आ रहा है।

    कार्यकारिणी बनी, लेकिन नाराज़गी भी

    जिला व शहर कार्यकारिणी की घोषणा के बाद असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। अनुभवी और संघर्षशील नेताओं को दरकिनार कर अपेक्षाकृत नए और अनुभवहीन लोगों को बड़ी जिम्मेदारियां देना अब चर्चा का विषय बन चुका है। यह नाराज़गी केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रही—कई कार्यकर्ता सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदेश नेतृत्व तक अपनी पीड़ा पहुंचाने लगे हैं।

    हाल ही में कांग्रेस कार्यालय से जारी एक तस्वीर, जिसमें अध्यक्ष सभी पदाधिकारियों से मुलाकात करते दिखाई देने थे, उल्टा असर डाल गई। तस्वीर में चंद लोगों की मौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या संगठन के भीतर ही संवाद टूट रहा है?

    भूपेश बघेल की पसंद पर भी सवाल

    धीरज बाकलीवाल का चयन छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके भूपेश बघेल की पसंद के रूप में हुआ। ऐसे में अब जब संगठनात्मक निष्क्रियता और असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, तो आलोचना की आंच भूपेश बघेल तक भी पहुंचने लगी है। हालांकि यह स्पष्ट है कि चयन के बाद संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी शहर अध्यक्ष की होती है।

    नेता प्रतिपक्ष की निष्क्रियता ने बढ़ाई मुश्किलें

    दुर्ग नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष के रूप में संजय कोहले की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बदहाल निगम व्यवस्था, जनसमस्याएं और प्रशासनिक विफलताओं के बावजूद विपक्ष की आवाज़ कमजोर रही है। इसे भी धीरज बाकलीवाल के निर्णयों और नेतृत्व क्षमता से जोड़कर देखा जा रहा है।

    अस्तित्व की लड़ाई या नई शुरुआत?

    आज दुर्ग कांग्रेस एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सवाल साफ है—

    क्या धीरज बाकलीवाल मजबूत इच्छाशक्ति, स्पष्ट निर्णय और समावेशी नेतृत्व के साथ मैदान में उतरेंगे?

    या फिर कांग्रेस दुर्ग में केवल दस्तावेजों और पुरानी स्मृतियों तक सिमट कर रह जाएगी?

    आने वाले चुनाव सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि कांग्रेस के संगठनात्मक अस्तित्व की परीक्षा होंगे। अब देखना यह है कि अध्यक्ष पद की कुर्सी धीरज बाकलीवाल के लिए अवसर बनती है या उनकी राजनीतिक उलटी गिनती की शुरुआत।

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