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नजरिया / शौर्यपथ / एक अनुमान है कि भारत में लगभग एक करोड़ 60 लाख ऐसे कामगार हैं, जो सिलाई-कढ़ाई-बुनाई जैसे कामों से जुडे़ हुए हैं। ये कामगार मुख्यत: ग्रामीण भारत में रहते हैं, और हमारे कपड़ा उद्योग की उस जटिल प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिस पर शायद ही कभी दुनिया की नजर जाती है। न सिर्फ संख्या बल के लिहाज से यह एक बड़ी तादाद है, बल्कि ये कामगार हमारे कुशल श्रमबल का हिस्सा हैं। पेशेवर गहन जानकारियों के लिहाज से ये लोग काफी हुनरमंद हैं और इन्होंने यह ज्ञान बेहद काबिल मास्टरों से सीखा है, जो सदियों से हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं।
1960 के दशक में पहली बार मैंने पश्चिम बंगाल के गांवों में कपड़े पर सोने की बारीक कढ़ाई का काम होते देखा। वहां पर यह काम सदियों से चलन में रहा है। कहा जाता है कि सोने की कढ़ाई की शुरुआत ईरान में हुई और भारत में यह सल्तनत काल में आई। इन गांवों की कशीदाकारी को बंगाल के नवाबों का संरक्षण हासिल था। वास्तव में, हमारा देश ऐसी ग्रामीण-कार्यशालाओं से भरा पड़ा है, उन्हें आर्थिक मदद और बेहतर बुनियादी ढांचे की जरूरत है, क्योंकि इसके बिना अब ये जीवित नहीं रह सकेंगी। महामारी के बाद देश के हथकरघा व दस्तकारी क्षेत्र को जीवित रहने के लिए रास्ता चाहिए। सरकारी एंपोरियमों की अब कोई प्रासंगिकता नहीं है।
दरअसल, इस संदर्भ में हमारा नजरिया ही गलत है। एक बेहतर हैंडलूम उत्पाद को, जो न सिर्फ मनमोहक, बल्कि पारिस्थितिकी के अनुकूल भी होता है, सहानुभूति के साथ नहीं बेचा जा सकता। उसे मार्केटिंग व रिटेलिंग की आधुनिक तकनीक की जरूरत है। उसे दुनिया में श्रेष्ठतम रूप में पेश किए जाने की आवश्यकता है। प्रतिस्पद्र्धी बाजार में बने रहने का यही एक रास्ता है। यह हम सब जानते हैं कि देश में सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया कराने वाले क्षेत्रों में कृषि के बाद कपड़ा क्षेत्र दूसरे नंबर पर आता है। 200 साल पहले तक दुनिया को कपडे़ का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता हमारा देश था। मगर आजादी के मिलने तक यह अपने ही कपड़ों की कॉपी इंग्लैंड के औद्योगिक क्षेत्रों से लेकर इस्तेमाल करने वाला देश बन गया। जाहिर है, कारीगरी की हमारी समृद्ध आर्थिकी के तहस-नहस हो जाने के कारण भारत के ग्रामीण बाजार बुरी तरह प्रभावित हुए।
लेकिन आजादी के बाद सरकार ने अपनी हस्तशिल्प विरासत को फिर से जिंदा करने की कोशिश की और चमत्कारिक रूप से भारत ने कई बिसरा दिए गए कौशल को पुनर्जीवित भी कर लिया। यह एक दूरदर्शिता भरा लक्ष्य अवश्य था, मगर इसे आसानी से हासिल नहीं किया जा सका। भारतीय दस्तकारी की विरासत को सहेजने के लिए निरंतरता से भरा एक प्रगतिशील पुनरोद्धार आंदोलन चलाया गया। इन कपड़ों को ‘विश्वकर्मा’ प्रदर्शनियों की एक शृंखला के रूप में देश-दुनिया में लॉन्च किया गया।
पिछले दो दशकों से भी अधिक वक्त में भारतीय फैशन उद्योग ने काफी प्रगति की है। और बाकी दुनिया के उलट इसके पास डिजाइनरों की एक देशज टीम है। इस टीम में सिर्फ वही नहीं हैं, जो रैंप पर दिखते हैं, बल्कि इसका हिस्सा वे कामगार भी हैं, जो गांवों में बसते हैं। इनमें बुनकर, कशीदाकारी करने वाले, और साज-सज्जा की डिजाइन तैयार करने वाले कारीगर शामिल हैं। ज्यादातर भारतीय वस्त्रों और उनके ग्लैमराइजेशन का श्रेय इन्हें दिया जा सकता है। महामारी के कारण इस क्षेत्र की हालत को देखते हुए बहुत जरूरी है कि सरकार अपनी तरफ से कोई पहल करे, जैसा उसने 1950 के दशक में किया था, ताकि देश की दस्तकारी को बचाया जा सके। दुनिया आज कपड़ों के उत्पादन में काफी उन्नत मशीनरी का इस्तेमाल करती है और इसका असर क्या होता है, यह हम बनारसी साड़ी के मामले में देख सकते हैं। चीनी उत्पादों ने बनारस के हैंडलूम बाजार को बरबाद कर दिया है। महामारी बाद इस क्षेत्र के कामगारों के लिए आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। वस्त्र के क्षेत्र में एक बौद्धिक संपदा के आगे संकट का सवाल तो खैर है ही।
सरकार को इस क्षेत्र में स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित करने के लिए आगे आना चाहिए। ग्रामीण कृषि पृष्ठभूमि में दस्तकारी वाले कपड़ों का बेहतर उत्पादन हो सकता है। इसके लिए बुनियादी ढांचे या कौशल विकास में ज्यादा निवेश की जरूरत भी नहीं। यह दुनिया में हमारा इकलौता ‘मेड इन इंडिया बाइ हैंड’ ब्रांड होगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं) रितु कुमार, फैशन डिजाइनर
सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / जिस देश की सीमा पर तनाव हो, उसका एकजुट होना समय की सबसे बड़ी मांग है। यह एकजुटता देश के जवानों की शहादत का भी सबसे सच्चा सम्मान है। आज जब देश के लोग और तमाम नेता शहीदों का सम्मान कर रहे हैं, उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं, तब यह हमारे लिए देश के पक्ष में विचार करने का सही समय है। ध्यान रहे, चीन के भी जवान शहीद हुए हैं, लेकिन उनके सम्मान के लिए उसके नेताओं के पास दो शब्द भी नहीं हैं। चीन ने कितने जवान खोए हैं, वह शायद ही बताए, लेकिन भारत में एक-एक जवान की जान कीमती है। वाजिब सम्मान के साथ अपने जवानों की शहादत को सदियों तक याद करना हमारी परंपरा रही है। इस परंपरा के सच्चे सम्मान का ही एक बुनियादी व्यवहार हमारी एकजुटता है।
आज ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों ने अपने आपसी मतभेदों को भुला दिया है और वे सरकार व सेना के साथ खड़ी हैं। सीमा पर होने वाला कोई भी संघर्ष किसी एक नेता या सरकार की जिम्मेदारी नहीं, देश की जिम्मेदारी है। सैनिक देश की रक्षा की शपथ लेते हैं, देश के लिए जान गंवाते हैं। ऐसे में, हमारे रक्षा मंत्री और अन्य नेताओं ने बिल्कुल सही कहा है, शहादत बेकार नहीं जाएगी। यदि हम वाकई चाहते हैं कि शहादत सार्थक हो, तो हमें सबसे पहले एकजुट होने की जरूरत को महसूस करना होगा। राजनीतिक एकजुटता सबसे जरूरी है और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में आगामी बैठकों का खास महत्व है। ध्यान रहे, चीन के प्रति हमारा सांस्कृतिक-ऐतिहासिक-आर्थिक-राजनीतिक जुड़ाव हमें किसी निर्णय लेने की प्रक्रिया में संकोची बना देता है। हम एक कदम आगे बढ़ाकर दो कदम पीछे खींच लेते हैं, लेकिन हम मिल-जुलकर यह नहीं देखते कि चीन कदम-दर-कदम कहां से कहां पहुंच गया है। हमें एकजुट होकर इस सच को सामने लाना चाहिए। ध्यान रहे, चीन अपने लोगों को यह नहीं बता रहा कि उसने भारत की जमीन पर कहां-कहां, किस-किस आधार पर दावा कर रखा है। वह गलवान घाटी को चीनी क्षेत्र बता रहा है, तो यह जरूरी है कि हम दुनिया को सच बताएं।
सख्त शासन की वजह से चीन अपने इतिहास, विरासत व पूर्वजों के विरुद्ध चल रहा है, वरना उसे याद रहता कि चीनी धर्मगुरु कन्फ्यूसियस ने कहा था, ‘एकता, वास्तव में, लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने की अनुमति देती है, और फिर खुशी हासिल करती है’। चीन एक समय बुद्धमय भी हो गया था, आज भी वहां बुद्ध का बहुत प्रभाव है। उसे सोचना चाहिए कि जिस देश की जमीन पर वह निगाह गड़ाए बैठा है, वह देश उसी बुद्ध का है, जिनके शांति और अहिंसा के संदेश के सामने संसार झुक जाता है। चीन सब भूल गया, पर हमें नहीं भूलना है। सीमा पर तनाव भी हमारे लिए चौतरफा प्रेरणा का समय है। कूटनीतिक, राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक, सामाजिक और साथ ही कोरोना के मोर्चे पर भी हमें और एकजुट होकर मुकाबला करना है। 45 साल बाद जो शहादत हुई है, वह चेतावनी है कि हमें अपना रास्ता ठीक कर लेना चाहिए। देशसेवा के प्रति समर्पण के अभाव और एकजुटता की कमी की वजह से ही भारतीय लोकतंत्र की शोभा कम होती है और चीन हमारी खामियों के बहाने ही लोकतंत्र और हमारी ताकत का मखौल उड़ाता है। बेशक, हम एकजुट हुए, तो सबको सही जवाब मिल जाएगा।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / चीन से जिस तरह का अंदेशा था, आखिर उसने वही विश्वासघात किया। भारतीय सैनिकों के शहीद होने की खबर से पूरा देश शोकाकुल है। भारत इसका बदला जरूर लेगा, लेकिन पीठ पीछे वार करके नहीं। इस हमले में चीन की कायरता ही नजर आई। इसलिए अब हमें अपनी चीन-नीति बदल लेनी चाहिए। हमें अब मान लेना चाहिए ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ कभी नहीं हो सकते। अब चीन से सभी तरह के राजनीतिक, आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय और सैन्य समीकरण बदल जाने चाहिए। चीन को अलग-थलग करने की लड़ाई अब प्रमुखता से लड़ने की जरूरत है। भारत के लिए यह माकूल समय है, जब लगभग आधी दुनिया चीन के खिलाफ है। अब भारत सन 1962 वाला नहीं रहा। चीन को मजबूत जवाब दिया जाना चाहिए।
आशीष गुसाईं, नई दिल्ली
अश्लीलता के खिलाफ
विगत कुछ वर्षों में आधुनिकता और मनोरंजन के नाम पर फिल्मों समेत वीडियो, गाने आदि में धड़ल्ले से अब अश्लीलता परोसी जाने लगी है। सबसे बड़ी दिक्कत की बात यह है कि लोग इसे आधुनिकता का प्रतीक मानकर सामान्य जीवन में भी उतारने लगे हैं। इससे न केवल भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर गहरा दाग लग रहा है, बल्कि बच्चे, बुजुर्ग, युवा, सभी के मन-मस्तिष्क में अश्लीलता पनपने लगी है। इसी का नतीजा है कि देश के विभिन्न हिस्सों से दुष्कर्म की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। प्राचीन समय में सिनेमा जागरूकता, आचार-व्यवहार, संस्कार, न्याय और सभ्य जीवन शैली सिखाने का एक सशक्त-सकारात्मक माध्यम था, पर आज यह हमारे समाज को दीमक की तरह चट कर रहा है। साफ है, सेंसर बोर्ड इसके लिए जिम्मेदार है। अश्लीलता रोकने की बजाय वह अपनी मोटी कमाई के लिए बेसिर-पैर की फिल्मों को जारी करने की अनुमति देता है। इस प्रवृत्ति पर जल्द से जल्द रोक लगनी चाहिए।
मनकेश्वर महाराज ‘भट्ट’, मधेपुरा
चीन की चाल
सुपर पावर बनने की चीन की चाहत ने आज दुनिया के लिए एक चुनौती खड़ी कर दी है। पहले उसने कोरोना रूपी संकट दुनिया के सामने खड़ा किया और अब अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए भारतीय सीमा में दखल दे रहा है। इस स्थिति में भारत की विदेश नीति कमजोर पड़ती दिख रही है। स्थिति यह है कि चीन ने अपने नापाक इरादों को पूरा करने के लिए नेपाल को भी हमारे खिलाफ खड़ा कर दिया है, जबकि अब तक काठमांडू हमारा सबसे विश्वसनीय मित्र रहा है। प्रधानमंत्री को बाकी सभी देशों के साथ मिलकर चीन से आ रही चुनौती से निपटना चाहिए। उन्हें चीन के खिलाफ डटकर खड़ा होना चाहिए।
समरजीत कुमार संजीत, वैशाली
बढ़ती परेशानियां
फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या ने देश में नई बहस छेड़ दी है। यह बताता है कि देश में तनाव और अवसाद के चलते आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। ऐसे मामलों में नौजवान तुलनात्मक रूप से अधिक दिख रहे हैं, जो देश और समाज के लिए गंभीर संकेत है। आज अवसाद और तनाव की समस्या इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि शायद ही कोई इससे अछूता है। सेलिब्रिटी इससे ज्यादा पीड़ित हैं, क्योंकि उन पर पूरे देश और समाज की नजर होती है। परेशानी की बड़ी बात यह है कि लोग इस समस्या पर अपनों से भी खुलकर बातें नहीं करते। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि आज भी हमारे देश में शिक्षा की कमी है। घर, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, कहीं पर भी अवसाद या हताशा पर चर्चा नहीं होती, इसे अनसुना कर दिया जाता है। इसी के कारण पीड़ित अपनी समस्या पर बात नहीं कर पाता औरवह अंदर-अंदर घुटता रहता है, और अंत में आत्महत्या की राह चुन लेता है। इस समस्या पर वक्त रहते ध्यान देना होगा।
ममता रानी
काशीपुर, उत्तराखंड
ओपिनियन /शौर्यपथ / भारत और चीन का आपसी रिश्ता एक नाजुक, गंभीर और खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। केंद्र सरकार और देश के सामने बड़ा सवाल यही है कि गलवान घाटी में जो ताजा हिंसक झड़प हुई है, जिसमें हमारे 20 अफसर और जवान शहीद हुए, उसका किस तरह से जवाब दिया जाए? आगे की हमारी चीन-नीति क्या हो? इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए हमें भारत-चीन संबंधों की हकीकत और पृष्ठभूमि पर गौर करना होगा।
सच्चाई यही है कि आजादी मिलने के बाद से ही चीन हमारे लिए सबसे बड़ी सामरिक चुनौती रहा है। इस सच की अनदेखी 1950 के दशक में भारत सरकार ने की। तब हमारा मानना था कि दोनों देश विकासशील हैं, इसलिए उनके हितों में समन्वय बनाया जा सकता है। मगर भारत जहां शांति के पथ पर चल रहा था, वहीं चीन ने अक्साई चिन को अपने कब्जे में ले लिया। जानकारों की मानें, तो उस वक्त बीजिंग सीमाओं को लेकर भारत से समझौता करना चाहता था, लेकिन भारतीय हुकूमत का अपनी भूमि से कोई समझौता न करना एक स्वाभाविक कदम था। सन 1962 में चीन ने भारत पर हमला बोल दिया, जिसमें हमें भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस युद्ध के बाद भारत और चीन के संबंध सीमित हो गए। इस बीच चीन ने पाकिस्तान से अपने रिश्ते सुधारने शुरू कर दिए, ताकि इस्लामाबाद की नई दिल्ली के प्रति पारंपरिक दुश्मनी का वह फायदा उठा सके। उसने पाकिस्तान की आर्थिक-सामरिक ताकत को मजबूत किया, यहां तक कि उसके परमाणु हथियार कार्यक्रम को भी बुनियादी तौर पर सहायता पहुंचाई। आज भारत को चीन-पाकिस्तान के इसी गठजोड़ का मुकाबला करना है।
चीन-भारत युद्ध के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दो बड़ी हिंसक घटनाएं हुई हैं। पहली वारदात साल 1967 में सिक्किम में हुई, जिसमें हमारे 88 सैनिक शहीद हुए थे, जबकि 300 से ज्यादा चीनी सैनिकों की जान गई। दूसरी झड़प 1975 में अरुणाचल प्रदेश में हुई थी। उसमें असम राइफल्स के जवानों पर हमला किया गया था। इसके बाद बीते 45 वर्षों में गलवान घाटी की घटना से पहले भारत और चीन के सैन्य ‘गश्ती’ दल में आपसी टकराव तो हुए, लेकिन किसी सैनिक ने जान नहीं गंवाई।
दरअसल, वर्ष 1988 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री-काल में भारत ने अपनी चीन-नीति बदली। यह तय किया गया कि बीजिंग के साथ सीमा-विवाद सुलझाने की कोशिश तो होगी, लेकिन साथ-साथ तमाम क्षेत्रों में उसके साथ आपसी सहयोग भी बढ़ाया जाएगा। तब से अब तक हर भारतीय हुकूमत ने कमोबेश इसी नीति का पालन किया है। यही कारण है कि आज भारत और चीन के आर्थिक व व्यापारिक रिश्ते काफी मजबूत व व्यापक हो गए हैं। दिक्कत यह रही कि 1988 की नीति में सीमा-विवाद सुलझाने की बात तो कही गई, लेकिन चीन ने कभी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हालांकि, 1993 के बाद दोनों देशों ने यह तय किया था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति के लिए वे आपस में विश्वास बहाली के ठोस उपाय करेंगे। फिर भी, समय-समय पर चीन का रवैया बदलता रहा। यहां तक कि नियंत्रण रेखा को लेकर उसने अपना रुख अब तक स्पष्ट नहीं किया है। इसी वजह से वास्तविक नियंत्रण रेखा के कई स्थानों पर दोनों देशों की सोच एक-दूसरे से अलग है, और दोनों के सैन्य दल आपस में गुत्थमगुत्था हो जाते हैं।
तो क्या 1988 से चल रही हमारी चीन-नीति पर अब पुनर्विचार करने की जरूरत है? यह तभी हो सकता है, जब भारत सरकार ही नहीं, पूरी सामरिक और राजनीतिक बिरादरी में चीन की चुनौती का सामना करने के लिए दृढ़ एकजुटता बने। बेशक 1978 में अपनी अर्थव्यवस्था को खोलने के बाद चीन ने बहुत तरक्की कर ली है। उसने मैन्युफैक्चरिंग के मामले में इतनी ताकत हासिल कर ली है कि उसे ‘दुनिया की फैक्टरी’ कहा जाने लगा है। वहां न सिर्फ हर तरह के उत्पाद बनने लगे हैं, बल्कि उनकी दुनिया भर में आपूर्ति भी होने लगी है। मगर यह भी सच है कि चीन के बढ़ते दबाव के कारण और अंतरराष्ट्रीय नियमों की उसके द्वारा की जा रही अनदेखी को देखते हुए पूरी दुनिया चिंतित है और कई देशों ने आपसी सहयोग बनाना शुरू कर दिया है।
हाल के वर्षों में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत ने जिस तरह से आपस में रिश्ते बढ़ाए हैं, उससे भी चीन को ऐतराज है। इन चारों देशों का यह सहयोग अब सामरिक स्तर पर पहुंच गया है। हालांकि, इस चतुष्कोणीय संबंध, यानी क्वाड के साथ-साथ रूस और चीन के साथ मिलकर भारत त्रिपक्षीय बातचीत भी कर रहा है, जिसका स्पष्ट संदेश है कि नई दिल्ली अपने हितों की रक्षा के लिए हर देश से संबंध बढ़ाना चाहती है। भारत बेशक अमेरिका के करीब जाता दिख रहा है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम वाशिंगटन के पिछलग्गू बनकर बीजिंग का विरोध करने को तैयार हैं। हरेक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह हम भी अपनी कूटनीति खुद तैयार कर रहे हैं, जिसमें अपने हितों का पूरा ध्यान रखने का प्रयास किया जा रहा है।
जाहिर है, चीन की ताजा हिंसक कार्रवाई का हमें पूरी दृढ़ता के साथ मुकाबला करना होगा। हाल की घटनाओं को देखकर यही लगता है कि चीन हर हाल में भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को कम करना चाहता है। लेकिन हमें हर तरीके से अपने मान-सम्मान की हिफाजत करनी है। इसके साथ-साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा में बदलाव लाने की बीजिंग की हरेक कोशिश को भी नाकाम करना होगा, और हमें ऐसे उपाय भी करने पड़ेंगे कि वह मई, 2020 से पहले की स्थिति में लौटने को मजबूर हो। अपनी अर्थव्यवस्था की रक्षा करते हुए हमें चीन के साथ अपने आर्थिक और व्यापारिक संबंधों की भी समीक्षा करनी होगी। इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के आह्वान पर संजीदगी से आगे बढ़ना होगा, और मैन्युफैक्र्चंरग के मामले में देश को आगे ले जाना ही होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) विवेक काटजू, पूर्व राजदूत
दुर्ग / शौर्यपथ / शहर के निगम सरकार में कांग्रेस 20 सालो बाद सत्ता में आई है . निगम के सत्ता में आते ही प्रभारी विभागों में सबसे ज्यादा महत्तवपूर्ण विभाग की गिनती में पीडब्ल्यूडी विभाग आता है . निगम की कांग्रेस सरकार ने पीडब्ल्यूडी का प्रभार निगम के सबसे अनुभवी पार्षद अब्दुल गनी को दिया ताकि शहर के विकास कार्य में तेजी आये और गुणवत्ता से समझौता ना हो किन्तु निगम के इन 4-5 महीनो के कार्यकाल में ऐसे कई वाकये सामने आने लगे जिससे निगम के कार्यो में विरोधाभास नजर आने लगा . पीडब्ल्यूडी विभाग की बात करे तो जो कार्य पीडब्ल्यूडी में सदस्य रहते हुए तात्कालिक पार्षद को गलत लग रहा था आज वही पार्षद और पीडब्ल्यूडी प्रभारी अब्दुल गनी को सही लगने लगा ऐसा क्या हुआ इन ५ महीनो में जो प्रभारी के सोंच में आमूलचूल परिवर्तन दिखने लगा .
बता दे कि शिवनाथ नदी मुक्ति धाम के कार्य में 18 प्रतिशत बिलो की निविदा को एमआईसी की पहली बैठक में पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा निरस्त करने की अनुशंसा की गयी थी ये अलग बात है कि 18 प्रतिशत बिलों के इस कार्य जो सांसद सरोज पाण्डेय की अनुशंसा पर हो रहा था के बाद 22 प्रतिशत के कार्य की अनुशंसा को अनुमति प्राप्त हो गयी और बाद में १८ प्रतिशत के मुक्तिधाम के कार्य को भी अनुमति प्राप्त हो गयी एमआईसी की बैठक में . पूर्व पीडब्ल्यूडी प्रभारी दिनेश देवांगन ने शौर्यपथ से चर्चा में कहा कि जब कांग्रेस विपक्ष में थी तब पीडब्ल्यूडी विभाग में सलाहकार समिति में सदस्य रहे अब्दुल गनी १५-२० प्रतिशत बिलों के कार्यो की गुणवत्ता के निम्न स्तर होने की बात कर विरोध करते रहे किन्तु आज जब कांग्रेस की निकाय से लेकर प्रदेश तक सरकार है और अब्दुल गनी पीडब्ल्यूडी प्रभारी है तब उनकी यह निति अब क्यों परिवर्तित हो गयी अब २०-२५ प्रतिशत बिलों कार्य की गुणवत्ता का क्या होगा . क्या अब कांग्रेस के राज में निर्माण के कार्यो की सामग्री की कीमत कम हो गयी क्या महंगाई दर कम हो गयी क्या , मजदूरी कम हो गयी जो अब बिलों रेट पर भी कार्य की अनुशंसा कर रहे है पीडब्ल्यूडी प्रभारी गनी या उन्हें भी मालुम है कि 20-25 प्रतिशत बिलों रेट पर भी कार्य किया जा सकता है . अगर ऐसा है तो क्या सिर्फ तथ्यहीन विरोध कर विपक्ष में रहकर चर्चा में रहना चाहते थे और जनता को गुमराह कर रहे थे .
बता दे कि वर्तमान में ही दुर्ग के एमआईसी भवन में पुताई के कार्य की बात तो ईई गोस्वामी ने बताई किन्तु पुताई , वालपेपर , कांच का दरवाज़ा , खिडकिया आदि के कामो की जानकारी के बारे में ईई गोस्वामी फाइल देख कर बताने की बात कर रहे है किन्तु महीने भर हो गए समय अभाव की बात कहकर जानकारी नहीं दे रहे क्या पीडब्ल्यूडी प्रभारी इस अनियमितता पर कोई सख्त कदम उठाएंगे या फिर मौन रहेंगे . जबकि दो तीन महीने पहले इ एम्आईसी भवन की पुताई को देखने से ही स्पष्ट नजर आता है कि किस स्तर का कार्य हुआ है क्या प्रभारी मामले की निष्पक्ष जाँच करेंगे या सिर्फ मौन रहकर ऐसे कार्यो को बढ़ावा देगे ?
कांग्रेसी कार्यकर्ता भी लगा रहे भेदभाव का आरोप .
पीडब्ल्यूडी प्रभारी तकिया पारा वार्ड से आते है इसी वार्ड के एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने वार्ड की उपेक्षा की बात को सोशल मिडिया में पोस्ट की जबकि इस वार्ड से निगम के कद्दावर मंत्री गनी आते है अगर प्रभारी के वार्ड में ही कांग्रेसी कार्यकर्त्ता उपेक्षा का आरोप लगा रहे है तो फिर शहर की व्यवस्था और आम जनता का क्या होगा . ऐसी चर्चा है कि कांग्रेसी कार्यकर्त्ता के पोस्ट के बाद इस मामले पर हलकी नोकझोक भी हुई थी सच्चाई क्या है ये तो कांग्रेस का अंदरूनी मामला है किन्तु पोस्ट करने वाले कांग्रेसी कार्यकर्त्ता सैफ ने फिर एक पोस्ट की जिसमे उनके द्वारा लिखा गया वाक्य // आज मुझे बहुत तकलीफ हुई नगर निगम दुर्ग जाने के बाद एक मेरे वरिष्ठ नेता मुझे कहते हैं तेरी उंगली बहुत चल रही है Whattsapp मे उंगली कट जाएगी क्या मैं कुछ गलत लिखता हूं // क्या कांग्रेस के वरिष्ट अब कार्यकर्ताओ के सवाल पर ऊँगली काटने तक की धमकी दे सकते है क्या कांग्रेस आलाकमान और शहर विधायक मामले को संज्ञान में लेकर निष्पक्ष जाँच करेंगे . ये वही कार्यकर्ता है जो सालो से विपक्ष में रहने के बाद भी कांग्रेस का दामन नहीं छोड़े आज वही कार्यकर्ता ऐसे शब्द सुनकर निराश हो रहे है ....
राष्ट्र हित के लिये केंद्र शासन पर जनता का दवाब जरुरी
रायपुर / शौर्यपथ / कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजेश बिस्सा ने कहा की प्रधानमंत्री जी द्वारा चीन - भारत मुद्दे को लेकर 19 जून की शाम को सर्वदलीय बैठक आयोजित किये जाने का निर्णय कांग्रेस व जागृत जनता का उनके ऊपर बनाये गये दवाब का नतीजा है। राष्ट्र हित के लिये केंद्र शासन पर जनता का दवाब जरुरी होता है जिसे निरंतर कायम रखना होगा। तभी देश की व्यवस्था पुनः पटरी पर लौट सकेगी। बिस्सा ने भारत-चीन लद्दाख बॉर्डर पर शहादत को प्राप्त हुए 20 भारतीय जवानों जिसमें बस्तर का नव युवा गणेश कुंजाम भी था को श्रद्धांजली अर्पित करते हुए कहा की इन सपूतों ने तो राष्ट्र के खातिर अपनी जान न्योछावर कर दी अब हम सब भारतवासियों का लक्ष्य होना चाहिए कि इनकी शहादत व्यर्थ ना जाए। यही उन सेनानियों प्रति सच्ची श्रद्धांजली भी होगी। जवानो की शहादत पर देश ने जो एक जुटता प्रदर्शित की है वह प्रशंसनीय है, इसकी निरंतरता कायम रहनी चाहिये।
बिस्सा ने कहा की आने वाले समय में “राष्ट्र खतरे में है, राष्ट्र को एकता की जरूरत है, राष्ट्र के प्रधानमंत्री के साथ सबको खड़े होकर चलना चाहिए, राष्ट्र प्रथम” जैसी बातें हमारा मुंह बंद कराने का प्रयास करेंगी लेकिन इससे राष्ट्रीय स्वाभिमान और संप्रभुता की रक्षा नहीं की जा सकेगी यह देशवासियों को समझना होगा। बिस्सा ने कहा की देश में जनमानस के विचारों की दिशा को तय करने वाली दो शक्तियों हावी है। पहला सोशल मीडिया जो पूरी तरह विदेशी लोगों के हाथों में है। दूसरा लोकतंत्र का चौथा स्तंभ विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिसका बहुत बड़ा भाग पूंजीपतियों के हाथों में है। यह दोनों कभी नहीं चाहेंगे कि कोई ऐसा व्यक्ति शासन करे जिसके ऊपर वे हावी ना हो सके। देशवासियों को इस बात पर गहराई से चिंतन कर अपनी जवाबदारियों का दायरा सुनुश्चित करना होगा।
बिस्सा ने कहा की जब किसी के ऊपर सत्ता में बने रहने की प्रबल इच्छा हावी हो जाती है तब राष्ट्र और जनता के प्रति उसकी प्राथमिकताएं नगण्य हो जाती है। जिस तरह पूरे देश में सत्ता में बने रहने तथा अपनी ताकत बनाए रखने के लिए खरीद-फरोख्त करती भाजपा की राजनीति को हम सब देख रहे हैं, इस बात का साक्षात प्रमाण भी है। इसकी गंभीरता को महसूस करना हम सब लोगों की प्राथमिकता होना चाहिए। बिस्सा ने कहा की हमारे प्रधानमंत्री बोलने में तो बहुत जोशीले हैं लेकिन रणनीति, कूटनीति, राष्ट्र नीति, विदेश नीति, अर्थ नीति सहित सभी नीतियों में बुरी तरह असफल साबित हुए हैं। जब राजा अक्षम निकल जाए तो जनता को अपनी सक्षमता प्रदर्शित करना चाहिए वरना राष्ट्रीय संप्रभुता खतरे में पड़ सकती है। अब वक्त आ गया है कि जनता आगे बढ़कर प्रश्न करे तथा शासक को मजबूर करे की वो उत्तर दे ना कि प्रश्न के प्रति उत्तर में प्रश्न करे या कीचड़ उछाले।
भिलाई / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी अल्पसंख्यक विभाग दुर्ग संभाग के पूर्व चेयरमैन मो शरीफ खान द्वारा आज न्यूज़ 18 इंडिया के एंकर व मैनेजिंग एडिटर अमीश देवगन को सुल्तान उल हिन्द हुज़ूर ख्वाजा ग़रीब नवाज़ रहमतुल्लाह अलैह को आक्रान्ता चिश्ती (हमला करने वाला चिश्ती) और लुटेरा चिश्ती विडियो में बोलकर उनकी सख्त तौहीन करते हुए देखा व सुना है जोकि न्यूज़ 18 इंडिया के वेरिफाईड ट्विटर अकाउंट पर अपलोड है जिसका लिंक नीचे दिया गया है | जिस पर अल्पसंख्यक नेता मो शरीफ खान ने कड़ी निंदा करते हुवे कहा कि, ख्वाजा गरीब नवाज चिश्ती विश्व प्रसिद्ध सूफी संत हैं, उनकी दरगाह देशवासियों की आस्था का केंद्र है जहां पर हर धर्म व जाति के लोग आस्था के साथ हाज़री देते हैं | एंकर ने उनकी शान में तौहीन व गुस्ताखी करके करोड़ों मुसलमानों की आस्था व भावना को ठेस पहुंचाई है | जिससे भारत समेत दुनियाभर के मुसलमानों में रोष है और उनके करोड़ो मानने वालों के दिल आहत हुए हैं | न्यूज़ 18 इंडिया के एंकर व मैनेजिंग एडिटर अमीष देवगन व न्यूज़ 18 इण्डिया के (सी. ई. ओ.) राहुल जोशी के ख़िलाफ़ आज दुर्ग कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज की गई। जहाँ थाना प्रभारी द्वारा विवेचना कर जल्द ही कार्यवाही करने का आश्वासन दिया गया.
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अवधेश टंडन की रिपोर्ट -
हसौद / शौर्यपथ / जाँजगीर चापा जिला के हसौद थाना में हसौद निवासी प्रार्थी अर्जुन बर्मन ,पिता दुजराम बर्मन द्वारा 3 अप्रैल को लिखित में शिकायत स्नढ्ढक्र दर्ज कराई गई थी। की भोला कश्यप द्वारा अपने फेसबुक अकाउंट में सतनामी समाज के प्रति अभद्र टिप्पणी किया था जिससे सतनामी समाज के लोगो को आहत पहुचा था जिससे हसौद थाना भारतीय दंड सहिता 153 ए के तहत अपराध पंजीबध्द कर लिया गया था और विवेचना किया जा रहा था, जिस पर पुलिस अधीक्षक पारुल माथुर ने गंभीरता से मामला को विवेचना मे लेने को निर्देश दिया गया जिससे इनके निर्देशानुसार तथा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मधुलिका सिंह , तथा अनुविभागीय अधिकारी डभरा/चंद्रपुर भवानी भांकर खुंटीया के मार्गदर्शन पर प्रकारण को विवेचना किया गया और विवेचना के दौरान मामले में धारा 506 भी जोड़ी गई व आरोपी भोला कश्यप पिता जीतराम कश्यप उम्र 28 वर्ष साकिन मल्दा थाना हसौद के विरूद्द धारा सादर का अपराध घटीत करना पर्याप्त सबूत पाये जाने से दिनांक 16 जून 2020 को आरोपी भोला कश्यप पिता जीतराम कश्यप ग्राम मल्दा थाना हसौद को विधिवत गिरप्तार कर न्यायिक रिमांड में भेज दिया गया है। उक्त कार्यवाई मे निरिक्षक देवेश सिंह राठौर , सउनि चंदन सिंह आरक्षक शिवगोपाल रात्रे का विशेष योगदान रहा है।
दुर्ग / शौर्यपथ / एल.ए.सी में शहीद हुए देश के जवान वीरों को मोदी आर्मी संगठन ने आज अग्रसेन चौक में श्रद्धांजलि दी,इस दौरान चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग का फोटो और उनके देश के झंडे को फाङते हुए अपना आक्रोश प्रकट किया,ज्ञात हो की चीन लगातार भारतीय सीमा पर अपनी ओछी हरकतों से भारतीय सीमा पर कब्जा करने की फिराक में है,जिसका मुँह तोङ जवाब देने के लिए हमारे देश के जवान तत्पर हैं ऐसे में अपनी नाकामी देख चीनी सेना भारतीय जवानों के साथ झङप पर उतारु हो गई,इसी झङप के तहत हमारे देश के बीस जवान बीती रात शहीद हो गये,प्रदेश अध्यक्ष वरुण जोशी ने कहा संपूर्ण विश्व में कोरोना जैसी महामारी का जातक चीन दुनिया का ध्यान भटकाने के लिए अंतराष्ट्रीय सीमा विवाद को जन्म दे रहा ताकि कोरोना को लोग भुलें,चीन की हकीकत विश्व के सभी देश जान गये हैं,और वह यह भुल रहा है की हमारी सेना मुँहतोङ जवाब देने में सक्षम है,अब हिंदी चीनी भाई भाई का नारा नहीं बल्कि ईंट का जवाब पत्थर से दिया जायेगा,आज चीन हमारे देश से कमाकर हमारे दुश्मन देशों को सहयोग कर रहा है,हमारे पङोसी देशों की मित्रता तोङ रहा है इससे चीन की यह चाल समझ आती है कि वह इसबार नापाक इरादों के साथ भारत से दुश्मनी बढा रहा है,हम भारत सरकार से निवेदन करते हैं चीन से व्यापारीकरण के सारे संबंध खत्म करे,देश को आत्मनिर्भर बनने का मौका दें,यदी हम आज भी चीन से दोस्ती की उम्मीद करते हैं तो भविष्य में हमें और भी नुकसान उठाना पङ सकता है,इस दौरान मोदी आर्मी के टिंकल ताम्रकर,यश कसार,उमेश शासवत,प्रेिंस कसेर,तजेंदर सिंह सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए उपस्थित थे!
लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / कोरोना महामारी की वजह से हुए लॉकडाउन के बाद लाखों लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। किसी को रोजगार खोने का डर तो किसी को सेहत बिगड़ने की चिंता। इस माहौल में लोगों के मन में निराशा घर करने लगी है और वो अपने जीवन के लक्ष्य और सपनों को पूरा करने में खुद को असफल महसूस कर रहे हैं। अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है तो निराशा के इस दौर में सफल होने के लिए याद रखें बस ये 5 मंत्र।
कड़ी मेहनत-
सफलता हासिल करने का पहला मंत्र है कड़ी मेहनत। याद रखें मेहनत का कभी कोई शॉर्टकर्ट नहीं होता है। अगर आप पहले ही हर कठिनाई से निपटने के लिए खुद को तैयार रखेंगे तो आपको भविष्य में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है।
खुश रहें-
जीवन में वही व्यक्ति अपने सपनों को हासिल करता है जो खुद को नकारात्मक विचारों से दूर रखता है। हमेशा पॉजीटिव थिकिंग रखें। आपका खुश रहने का स्वभाव आपको जीवन में सही फैसला लेना में मदद करेगा।
फोकस बनाए रखें-
जीवन में वही व्यक्ति सफलता का स्वाद चखता है जो अपने लक्ष्य के प्रति मन को एकाग्र रखकर उसे हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करता है। असल जीवन में भी अपनी प्राथमिकताओं को फोकस रखकर उन पर काम करें।
संघर्ष करें-
जीवन में हमेशा बड़े सपने देखें और उन्हें हासिल करने के लिए एक गोल बनाएं। जब भी आपको लगे कि आप असफल हो रहे हैं तो अपने सपनों को याद करें। खुद को यह अहसास करवाएं कि आपके लिए आपके सपने पूरे करना कितना जरूरी है।
अपनी कमी को न करें नजरअंदाज-
जीवन में कभी भी कोई व्यक्ति परफेक्ट नहीं होता है। हर किसी में कोई न कोई कमी जरूर होती है। लेकिन जो व्यक्ति अपनी कमियों को पहचानकर उन्हें ही अपनी ताकत बना लेते हैं उन्हें जीवन में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
