July 23, 2026
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    दस्तकारी से मिलेगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती

    • rounak group

    नजरिया / शौर्यपथ / एक अनुमान है कि भारत में लगभग एक करोड़ 60 लाख ऐसे कामगार हैं, जो सिलाई-कढ़ाई-बुनाई जैसे कामों से जुडे़ हुए हैं। ये कामगार मुख्यत: ग्रामीण भारत में रहते हैं, और हमारे कपड़ा उद्योग की उस जटिल प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिस पर शायद ही कभी दुनिया की नजर जाती है। न सिर्फ संख्या बल के लिहाज से यह एक बड़ी तादाद है, बल्कि ये कामगार हमारे कुशल श्रमबल का हिस्सा हैं। पेशेवर गहन जानकारियों के लिहाज से ये लोग काफी हुनरमंद हैं और इन्होंने यह ज्ञान बेहद काबिल मास्टरों से सीखा है, जो सदियों से हमारे समाज का हिस्सा रहे हैं।
    1960 के दशक में पहली बार मैंने पश्चिम बंगाल के गांवों में कपड़े पर सोने की बारीक कढ़ाई का काम होते देखा। वहां पर यह काम सदियों से चलन में रहा है। कहा जाता है कि सोने की कढ़ाई की शुरुआत ईरान में हुई और भारत में यह सल्तनत काल में आई। इन गांवों की कशीदाकारी को बंगाल के नवाबों का संरक्षण हासिल था। वास्तव में, हमारा देश ऐसी ग्रामीण-कार्यशालाओं से भरा पड़ा है, उन्हें आर्थिक मदद और बेहतर बुनियादी ढांचे की जरूरत है, क्योंकि इसके बिना अब ये जीवित नहीं रह सकेंगी। महामारी के बाद देश के हथकरघा व दस्तकारी क्षेत्र को जीवित रहने के लिए रास्ता चाहिए। सरकारी एंपोरियमों की अब कोई प्रासंगिकता नहीं है।
    दरअसल, इस संदर्भ में हमारा नजरिया ही गलत है। एक बेहतर हैंडलूम उत्पाद को, जो न सिर्फ मनमोहक, बल्कि पारिस्थितिकी के अनुकूल भी होता है, सहानुभूति के साथ नहीं बेचा जा सकता। उसे मार्केटिंग व रिटेलिंग की आधुनिक तकनीक की जरूरत है। उसे दुनिया में श्रेष्ठतम रूप में पेश किए जाने की आवश्यकता है। प्रतिस्पद्र्धी बाजार में बने रहने का यही एक रास्ता है। यह हम सब जानते हैं कि देश में सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया कराने वाले क्षेत्रों में कृषि के बाद कपड़ा क्षेत्र दूसरे नंबर पर आता है। 200 साल पहले तक दुनिया को कपडे़ का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता हमारा देश था। मगर आजादी के मिलने तक यह अपने ही कपड़ों की कॉपी इंग्लैंड के औद्योगिक क्षेत्रों से लेकर इस्तेमाल करने वाला देश बन गया। जाहिर है, कारीगरी की हमारी समृद्ध आर्थिकी के तहस-नहस हो जाने के कारण भारत के ग्रामीण बाजार बुरी तरह प्रभावित हुए।
    लेकिन आजादी के बाद सरकार ने अपनी हस्तशिल्प विरासत को फिर से जिंदा करने की कोशिश की और चमत्कारिक रूप से भारत ने कई बिसरा दिए गए कौशल को पुनर्जीवित भी कर लिया। यह एक दूरदर्शिता भरा लक्ष्य अवश्य था, मगर इसे आसानी से हासिल नहीं किया जा सका। भारतीय दस्तकारी की विरासत को सहेजने के लिए निरंतरता से भरा एक प्रगतिशील पुनरोद्धार आंदोलन चलाया गया। इन कपड़ों को ‘विश्वकर्मा’ प्रदर्शनियों की एक शृंखला के रूप में देश-दुनिया में लॉन्च किया गया।
    पिछले दो दशकों से भी अधिक वक्त में भारतीय फैशन उद्योग ने काफी प्रगति की है। और बाकी दुनिया के उलट इसके पास डिजाइनरों की एक देशज टीम है। इस टीम में सिर्फ वही नहीं हैं, जो रैंप पर दिखते हैं, बल्कि इसका हिस्सा वे कामगार भी हैं, जो गांवों में बसते हैं। इनमें बुनकर, कशीदाकारी करने वाले, और साज-सज्जा की डिजाइन तैयार करने वाले कारीगर शामिल हैं। ज्यादातर भारतीय वस्त्रों और उनके ग्लैमराइजेशन का श्रेय इन्हें दिया जा सकता है। महामारी के कारण इस क्षेत्र की हालत को देखते हुए बहुत जरूरी है कि सरकार अपनी तरफ से कोई पहल करे, जैसा उसने 1950 के दशक में किया था, ताकि देश की दस्तकारी को बचाया जा सके। दुनिया आज कपड़ों के उत्पादन में काफी उन्नत मशीनरी का इस्तेमाल करती है और इसका असर क्या होता है, यह हम बनारसी साड़ी के मामले में देख सकते हैं। चीनी उत्पादों ने बनारस के हैंडलूम बाजार को बरबाद कर दिया है। महामारी बाद इस क्षेत्र के कामगारों के लिए आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। वस्त्र के क्षेत्र में एक बौद्धिक संपदा के आगे संकट का सवाल तो खैर है ही।
    सरकार को इस क्षेत्र में स्टार्ट-अप को प्रोत्साहित करने के लिए आगे आना चाहिए। ग्रामीण कृषि पृष्ठभूमि में दस्तकारी वाले कपड़ों का बेहतर उत्पादन हो सकता है। इसके लिए बुनियादी ढांचे या कौशल विकास में ज्यादा निवेश की जरूरत भी नहीं। यह दुनिया में हमारा इकलौता ‘मेड इन इंडिया बाइ हैंड’ ब्रांड होगा।
    (ये लेखिका के अपने विचार हैं) रितु कुमार, फैशन डिजाइनर

     

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