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June 27, 2026
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Naresh Dewangan

Naresh Dewangan


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By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। जगदलपुर के राजमहल परिसर के मीना बाजार में चल रहे मौत के कुएँ की जांच अब जनता के बीच चर्चा का विषय बन गई है। हमारी पूर्व प्रकाशित खबर के बाद RTO विभाग की उड़नदस्ता टीम ने भौतिक निरीक्षण तो किया, लेकिन जांच का हाल ऐसा रहा मानो सुरक्षा नहीं, औपचारिकता की जांच की गई हो।

टीम ने रिपोर्ट में बताया कि “सभी दस्तावेज वैध पाए गए”, पर सवाल यह है कि जिन पुरानी गाड़ियों से यह जोखिम भरा खेल चल रहा है, क्या वे तकनीकी रूप से चलने योग्य हैं? क्या किसी विशेषज्ञ ने वाहनों की फिटनेस, ब्रेकिंग सिस्टम या सुरक्षा संरचना की जांच की? रिपोर्ट में इसका कोई ज़िक्र नहीं — क्योंकि यहाँ मामला किसी आम नागरिक का नहीं, मेला प्रबंधन और रसूखदारों का है।

 

दोहरी नीति पर सवाल:

हैरानी की बात यह है कि सड़क पर अगर कोई गरीब मजदूर या आम व्यक्ति अपनी पुरानी मोटरसाइकिल या बिना कागज़ की गाड़ी लेकर निकल जाए, तो यही विभाग पूरा कानून सिर पर उठाकर चलानी काट देता है। उसे रोकने, डराने और वसूली करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। लेकिन जब वही कानून मौत के कुएँ के अंदर टूटता है, तब सबकी आँखें मूँद ली जाती हैं — क्योंकि वहाँ बड़े लोगों का परिचय और रसूख काम आता है। यही विभाग जो सड़क पर आम जनता से नियम पालन की दुहाई देता है, अब खामोश है जब नियमों की धज्जियाँ उनके सामने उड़ाई जा रही हैं। क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए बना है? क्या विभाग की सख्ती सिर्फ उन पर दिखती है जिनका कोई सियासी या अफसरशाही परिचय नहीं होता?

 

स्थानीय नागरिकों की नाराज़गी:

नागरिकों ने कहा कि अगर यही लापरवाही किसी आम व्यक्ति के मामले में हुई होती तो RTO का पूरा अमला उसके पीछे पड़ गया होता। पर यहाँ विभाग ने न फिटनेस जाँची, न सुरक्षा का ब्यौरा लिया — बस फाइलें पलट कर “सब वैध है” का ठप्पा लगा दिया।

 

निष्कर्ष:

जिले में नियमों की परिभाषा अब चेहरों से तय होने लगी है। मौत के कुएँ में जहाँ जनता की जान दांव पर है, वहाँ प्रशासन कागज़ों में फिटनेस और रसूख में इंसाफ ढूँढ रहा है।

सवाल अब जनता पूछ रही है —

क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए है और सुरक्षा सिर्फ रसूख वालों की सुविधा के लिए? क्यूंकि RTO उड़नदस्ता की यह जांच साबित करती है कि विभागीय कार्यवाई अब भी कागज़ों में ही सक्रिय है। मौत का कुआँ आज भी घूम रहा है — फर्क बस इतना है कि अब यह कानून की आंखों के सामने घूम रहा है।

श्रद्धालुओं ने भावुकता के साथ माता मावली को किया विदा

By - नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व का एक अत्यंत भावुक और गरिमामय अध्याय मंगलवार को समाप्त हुआ। लगभग 75 दिनों तक चलने वाले इस अद्वितीय और अद्भुत सांस्कृतिक महापर्व की अंतिम रस्म मावली विदाई के साथ इसका समापन हो गया। हजारों की संख्या में जुटे भक्तों द्वारा अपार श्रद्धा के बीच आराध्य देवी मावली माता की डोली और छत्र को ससम्मान विदा किया गया। परंपरा के निर्वहन में माता की डोली को जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर से गाजे-बाजे और भव्य शोभायात्रा के साथ साथ जिया डेरा तक ले जाया गया। इस अवसर पर सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, महापौर संजय पांडे और अन्य जनप्रतिनिधियों सहित बस्तर दशहरा समिति के उपाध्यक्ष बलराम मांझी, बस्तर दशहरा समिति के पारम्परिक सदस्य मांझी-चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन, नाईक-पाईक और कमिश्नर डोमन सिंह, पुलिस महानिरीक्षक सुन्दर राज पी, कलेक्टर हरिस एस, पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा तथा अन्य अधिकारी मौजूद थे।

 

गार्ड ऑफ ऑनर के साथ हुई ’माई जी’ की विदाई

मां दंतेश्वरी मंदिर के समीप निर्मित आकर्षक मंच पर माई जी की डोली को रखा गया, जिसे श्रद्धालुओं ने दर्शन किया और बस्तर राज परिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव द्वारा परंपरा के अनुसार माई जी की आरती की गई। पुलिस जवानों द्वारा हर्ष फायर कर सलामी दिए जाने के बाद कमलचंद्र भंजदेव ने माई जी की डोली को अपने कंधे पर धारण किया और जिया डेरा के लिए रवाना हुए। विदाई समारोह को बेहद गरिमामय बनाया गया। राज परिवार के सदस्यों ने स्वयं मावली माता की डोली को अपने कंधों पर उठाकर इस प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया। भक्तों ने पूरे रास्ते फूलों की वर्षा कर और जयकारे लगाकर अपनी माई जी को भावभीनी विदाई दी। डोली विदाई की यह रस्म बस्तर दशहरा पर्व की समाप्ति का प्रतीक है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि 600 वर्ष से अधिक पुरानी बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपराओं का जीवंत प्रदर्शन भी है। इस विदाई के साथ भक्तों ने अगले वर्ष फिर से उत्सव की शुरुआत की उम्मीद लिए देवी से क्षेत्र की सुख-समृद्धि का आशीर्वाद माँगा।

 

श्रद्धा और सम्मान से सजी विदाई यात्रा

शोभायात्रा के दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूँज थी, वहीं माता मावली की डोली के सामने उनके साज-श्रृंगार के सामान कांवरिया कावड़ में लेकर चल रहे थे। पारंपरिक वेशभूषा में सिर पर कलश धारण किए महिलाएं, इस विदाई यात्रा की शोभा बढ़ा रही थीं। पूरे मार्ग पर श्रद्धालुओं ने जगह-जगह माई जी का स्वागत किया, पूजा-अर्चना की और भावुकता के साथ उन्हें विदाई दी। जिया डेरा से माता मावली की डोली एवं छत्र को एक सुसज्जित वाहन से दंतेवाड़ा के लिए रवाना किया गया।

जगदलपुर, शौर्यपथ। जन अधिकार सामाजिक कल्याण संघ छत्तीसगढ़ की बस्तर संभाग स्तरीय प्रथम बैठक एवं कार्यशाला का आयोजन 5 अक्टूबर को बोधघाट, जगदलपुर में किया गया। बैठक का मुख्य उद्देश्य संगठन को जमीनी स्तर पर सशक्त बनाना और सामाजिक सरोकारों को लेकर कार्ययोजना तैयार करना रहा।

इस संबंध में प्रदेश महासचिव विपिन कुमार तिवारी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर मीडिया को अवगत कराया कि बैठक का आयोजन प्रदेश अध्यक्ष दादा चंद्रिका सिंह के नेतृत्व में किया गया, जिसमें बस्तर संभाग के सातों जिलों के सभी पदाधिकारी एवं सदस्य उपस्थित थे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता बीजापुर जिला संरक्षक श्री तेलैया ने की, जबकि संचालन श्री के.के. भटनागर, जिला अध्यक्ष बस्तर ने किया।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रदेश अध्यक्ष दादा चंद्रिका सिंह ने संगठन की कार्यप्रणाली पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि संगठन जनता की आवाज़ है, जिसे शासन-प्रशासन तक पहुँचाना हमारा दायित्व है। उन्होंने सभी पदाधिकारियों से अपील की कि वे संगठन के 31 बिंदुओं पर समाजहित में निरंतर कार्य करते रहें और जनता की समस्याओं को पत्राचार, मुलाकात एवं संवाद के माध्यम से संबंधित विभागों तक पहुँचाएं।

बैठक में प्रदेश प्रभारी कर्मवीर सिंह जादौन, प्रदेश महासचिव कृष्ण कुमार साहू, विपिन तिवारी, सत्यभान सिंह जादौन, लाला लहरे, अनिल ठाकुर, प्रदेश उपाध्यक्ष कोटेश्वर राव चापडी, राजेश माने, महेंद्र कुमार साहू, श्रीमती सत्यशीला मेश्राम, जिलाध्यक्ष राजेंद्र पांडे, ए. सुधाकर, श्रीमती जयंती परते,श्रीमती राव, श्रीमती माधवी सरकार, श्रीमती सुनीता शोरी, श्रीमती हेमलता नेताम, अशोक जयसवाल, चंद्रिका देवांगन, तुलसीराम बघेल, जितेंद्र सेठिया, शंकरलाल श्रीवास्तव, विनय मंडल, शिवा स्वर्णकार, ईश्वर लाल कश्यप सहित बस्तर संभाग के सातों जिलों के पदाधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

बैठक के समापन पर सभी पदाधिकारियों ने निस्वार्थ भाव से जनसेवा करने एवं संगठन को मजबूत बनाने का संकल्प लिया।

कोंडागांव, शौर्यपथ। कोंडागांव शहर मंडल अध्यक्ष कुलवंत चहल ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि कोंडागांव लोकप्रिय विधायक सुश्री लता उसेंडी निरंतर क्षेत्र की जनता के लिए कार्य कर रही है नवीन कार्य के साथ ही उनकी मांगों को पूरा करने में लगी है। और करे भी क्यो नहीं जब प्रदेश के मुखिया विष्णुदेव साय ने विकास की रोशनी फैलाने का जो संकल्प लिया है उसे पूरा भी कर रहे हैं। शहर मंडल अध्यक्ष कुलवंत सिंह चहल ने कहा कि भाजपा सरकार आने के बाद कोंडागांव में जिस गति से विकास कार्य आगे बढ़ रहे हैं, उसे देखकर कांग्रेस बुरी तरह तिलमिला उठी है। प्रदेश में जब से भाजपा की सरकार बनी है, विकास की गंगा बह रही है, मगर कोंडागांव के कांग्रेसियों को यह सब पच नहीं रहा। उन्हें तो बस आमजन को बस सब्ज बाग दिखाना आता है, धरातल में सब शून्य है। 

श्री चहल ने कहा कि कांग्रेसियों की स्थिति अब ऐसी हो गई है कि जिले में हो रहे हर विकास कार्य से उनका पेट दर्द करने लगता है। उन्होंने कहा, “कांग्रेस ने अपने शासन में केवल दिखावा किया, ढिंढोरा पीटती रही कि विकास हो रहा है, जबकि धरातल पर कुछ नहीं था। अब जब हमारी सरकार ने कार्यों की गति तेज़ की है, तो कांग्रेसियों का खाना तक हजम नहीं हो रहा।”

उन्होंने बताया कि हाल ही में कोंडागांव की लोकप्रिय विधायक एवं भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुश्री लता उसेंडी द्वारा कई नए विकास कार्यों का भूमि पूजन किया गया, जिसे देखकर कांग्रेस के पेट में मरोड़ शुरू हो गई। बौखलाए कांग्रेसी अब प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जनता को भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं। चुनाव के 2 माह पूर्व कुछ कागजो में कुछ मंचो द्वारा तो खुद ही नारियल फोड़ लोगो को गुमराह करने का प्रपंच रचा था, यहाँ तक ये भी देखने को आया है कि कांग्रेस के पूर्व विधायक ने एक ही कार्य का पांच बार से ज्यादा एक ही कार्य का भूमिपूजन किया था। पर स्वीकृति नही ला पाए। 

श्री चहल ने कहा कि कांग्रेस का दावा कि “पहले ही भूमि पूजन किया गया था” पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन है। कांग्रेस शासन में यह कार्य केवल कागज़ों पर रह गया था। अब भाजपा सरकार ने उसी मार्ग का वास्तविक निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया है।

श्री चहल ने व्यंग्य करते हुए कहा, लगता है विपक्ष में बैठने का ग़म अभी तक कांग्रेस के सर से उतरा नहीं, तभी उनकी याददाश्त भी कमजोर हो गई है। कांग्रेसियों ने आज फिर ओछी हरकत की उन्होंने कलेक्टर को सौपे ज्ञापन में कहा हैं कि भाजपा स्थानीय जनप्रतिनिधियों को नही पूछती। कभी मौके पर जाकर देखे की वहां के जनप्रतिनिधि का नाम शिलान्यास के पत्थरों पर अंकित है ।उन्होंने अपनी उपस्थित दी या नही ये उनकी जवाबदारी। इससे बेहतर होता, वे प्रेस विज्ञप्ति जारी करने से पहले पुराने स्वीकृति पत्र को एक बार पढ़ लेते की कितने कामो को स्वीकृति मिली है और कितने काम कागजो में है, जिनकी स्वीकृति विधायक महोदय के द्वारा करवाया जा रहा है।ये पब्लिक है ये सब जानती है।

By - नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। अपनी अनूठी परंपराओं और रस्मों के लिए विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की एक और महत्वपूर्ण रस्म, 'कुटुंब जात्रा', रविवार को स्थानीय महात्मा गांधी स्कूल परिसर के गुड़ी में संपन्न हुई। इस रस्म के तहत पूरे बस्तर संभाग एवं पड़ोसी राज्य ओडिशा व महाराष्ट्र के समीपवर्ती गांव से पर्व में शामिल हुए हजारों देवी-देवताओं के छत्र और डोली को बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर ससम्मान विदा किया। यह रस्म 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा पर्व की समाप्ति की ओर इशारा करती है। 

 

600 साल से अधिक पुरानी परंपरा

बस्तर दशहरा की सबसे खास बात यह है कि केवल इसी पर्व में इतनी बड़ी संख्या में एक-एक गांव के देवी-देवताओं के छत्र और डोली शामिल होते हैं। रियासत काल से चली आ रही यह परंपरा आज भी कायम है, जिसमें राजा-महाराजाओं की तरह राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति गांव-गांव से आए देवी-देवताओं और उनके पुजारियों को ससम्मान विदा करते हैं।

 

रूसूम' देकर दी गई विदाई

परंपरानुसार, दशहरा पर्व में शामिल होने आए संभाग के सभी ग्राम के देवी-देवताओं को 'रूसूम' (दक्षिणा/भेंट) भी दी गई। राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और दशहरा समिति ने देवी-देवताओं के छत्र और डोली लेकर पहुंचे पुजारियों को कपड़े, पैसे और मिठाइयां देकर उनकी ससम्मान विदाई की।

शहर के गंगामुण्डा वार्ड में स्थित देवगुड़ी में श्रद्धालुओं ने अपनी मनोकामना अनुसार देवी देवताओं को भेंट भी अर्पित किया। बस्तर राजपरिवार और दशहरा समिति की अगुवाई में संपन्न हुई इस कुंटुब जात्रा रस्म के साथ ही, 600 साल से अधिक पुरानी बस्तर दशहरा पर्व की परंपराएं विधि विधान से पूरी की गईं। इस दौरान पूरे परिसर में उपस्थित देवी देवता का आपस में मेल मिलाप देखते ही बन रहा था। देवी देवताओं के लाठ, डोली के साथ झुमते सिरहा और विभिन्न क्षेत्रों के आंगादेव का खेल माहौल को आकर्षक एवं अचम्म्भित किया। इस अवसर पर स्थानीय एवं आसपास के गांव से पहुंचे श्रद्धालुओं ने भी देवी देवताओं का अपने परंपरा के अनुसार पूजा अर्चना कर उनका आशीर्वाद लिया। सारा माहौल भक्ति भावना में डूबा नजर आया।

जगदलपुर, शौर्यपथ। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में शामिल होने के लिए जगदलपुर पहुँचे। जगदलपुर में स्थित मां दंतेश्वरी हवाई अड्डे पर मंत्री, सांसद, विधायक, अन्य जनप्रतिनिधि और वरिष्ठ अधिकारियों ने केंद्रीय गृहमंत्री का आत्मीय स्वागत किया गया। केंद्रीय गृहमंत्री मूरिया दरबार, लाल बाग में प्रदर्शनी का अवलोकन, बस्तर दशहरा लोकोत्सव कार्यक्रम में शामिल होंगे। केंद्रीय गृहमंत्री के साथ में प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा भी पहुंचे हैं।

​हवाई अड्डे पर वन मंत्री केदार कश्यप, जनजाति कल्याण मंत्री राम विचार नेताम, महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े ,बस्तर सांसद महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव, कोंडागांव विधायक लता उसेंडी, चित्रकोट विधायक विनायक गोयल, दंतेवाड़ा विधायक चैतराम अटामी, विधायक कांकेर आशाराम नेताम जगदलपुर के महापौर संजय पांडेय, ब्रेवरेज कार्पोरेशन के अध्यक्ष श्रीनिवास राव मद्दी, पूर्व विधायक सहित अन्य जनप्रतिनिधियों और डी जी पी अरुण देव गौतम, प्रमुख सचिव मनोज पिंगुआ, कमिश्नर डोमन सिंह, आईजी सुंदर राज पी., कलेक्टर हरिस एस, पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा ने स्वागत किया।

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व में सोमवार को रथ परिक्रमा की अंतिम और सबसे अनूठी रस्म 'बाहर रैनी' निभाई गई। इस दौरान राज परिवार के सदस्य ने सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए माड़िया आदिवासी समुदाय के लोगों के साथ 'नवाखानी' (नए चावल की खीर) खाई। इस अवसर पर सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष महेश कश्यप, महापौैर संजय पांडे सहित जनप्रतिनिधिगण भी शामिल रहे। नवाखानी के बाद विशालकाय विजय रथ की वापसी हुई। यह रस्म बस्तर की अनूठी सामाजिक समरसता और आदिवासी संस्कृति की झलक पेश करती है।

 

​परंपरा: रथ चोरी और राजा का मान-मनौव्वल

​दरअसल, विजयादशमी की रात (भीतर रैनी) को माड़िया समुदाय के ग्रामीणों ने परंपरानुसार आठ पहियों वाले विशाल रथ को चुराकर नगर के समीप कुम्हड़ाकोट जंगल में छिपा दिया था। यह रस्म उस ऐतिहासिक घटना को याद करती है जब एक बार ग्रामीणों ने राजा से असंतुष्ट होकर रथ चुरा लिया था।

​शुक्रवार दोपहर राज परिवार के सदस्य, राजगुरू और मांझी-मुखिया पूरे लाव-लश्कर और गाजे-बाजे के साथ रथ को वापस लाने के लिए कुम्हड़ाकोट पहुँचे। यहाँ राजा द्वारा ग्रामीणों से रथ वापस करने के लिए मान-मनौव्वल किया गया।

 

नवाखानी से हुआ सद्भाव

​माड़िया समुदाय ने रथ लौटाने के लिए शर्त रखी कि राजा उनके साथ नवाखानी खाएँगे। राज परिवार ने सहर्ष इस शर्त को स्वीकार किया। नए चावल से बने इस प्रसाद को सभी ने एक साथ ग्रहण किया, जो राज और आदिवासी समुदाय के बीच गहरे पारंपरिक संबंध और सद्भाव का प्रतीक है।

​नवाखानी की रस्म पूरी होने के बाद माँ दंतेश्वरी का छत्र विधि-विधान के साथ रथ पर विराजित किया गया। माड़िया समुदाय के लोगों ने भारी उत्साह के बीच विजय रथ को जंगल से वापस खींचकर दंतेश्वरी मंदिर के सिंहद्वार तक पहुँचाया।

​बाहर रैनी रस्म के समापन के साथ ही बस्तर दशहरा की रथ परिक्रमा पूरी हो गई। 75 दिनों तक चलने वाला यह अनोखा पर्व अब आगामी रस्मों-काछन जात्रा और कुटुम्ब जात्रा- के साथ अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है।

By - नरेश देवांगन 

​जगदलपुर, शौर्यपथ। विश्व प्रसिद्ध 75 दिवसीय बस्तर दशहरा पर्व के प्रमुख अनुष्ठानों में से एक भीतर रैनी की रस्म गुरुवार को पूरी हुई। इस दौरान भव्य आठ चक्कों वाले विजय रथ की परिक्रमा हुई, जिसे खींचने के लिए कोड़ेनार और किलेपाल क्षेत्र के दूर-दराज के गाँवों से बड़ी संख्या में आदिवासी जन जुटे और बारिश के बावजूद रथ को बड़े उत्साह के साथ खींचा।

गुरुवार को बस्तर दशहरा के महत्वपूर्ण दिन भीतर रैनी की रस्म निभाई गई, पिछले वर्ष तैयार आठ चक्कों वाले विशाल विजय रथ को सुसज्जित कर विधि विधान के साथ पूजा अनुष्ठान के पश्चात संचालन किया गया। मां दंतेश्वरी के छत्र को रथारूढ़ करने के बाद पुलिस जवानों द्वारा हर्ष फायर कर सलामी दी गई। इसके बाद रथ को खींचा गया।

इस विशाल रथ को मावली मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, गोल बाजार चौक, गुरु नानक चौक होते हुए दंतेश्वरी मंदिर तक परिक्रमा कराई गई। इस विशाल आठ चक्के के विजय रथ में जहां दंतेश्वरी मां की डोली और छत्र विराजमान थी, वहीं इसके सामने सुसज्जित वाहन में दंतेवाड़ा से आई मावली मां की डोली और छत्र विराजमान थी। रथ के सामने बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों से दशहरा में पहुंचे देवी-देवताओं के छत्र, डोली, और लाठ लिए पुजारी, सेवक चल रहे थे वहीं आंगादेव पूरे मार्ग पर दौड़ते हुए मार्ग के अवरोध हटाने में जुटे नजर आए। इस विहंगम दृश्य को देखने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से आए ग्रामीणों के साथ ही नागरिकगण भी जुटे रहे। लगातार हो रही बारिश के बीच भी बस्तर दशहरे का आकर्षण एवं वैभव नजर आया।

दशहरे की रौनक में बस्तर पुलिस का सराहनीय योगदान

नरेश देवांगन की खास रिपोर्ट 

जगदलपुर, शौर्यपथ। बस्तर दशहरा अपनी परंपरा और भव्यता के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। इन दिनों जगदलपुर शहर में लाखों श्रद्धालु और पर्यटक जुट रहे हैं, जिससे भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बन जाती है। इस चुनौती को बस्तर पुलिस बखूबी संभाल रही है।

पुलिस अधीक्षक शलभ कुमार सिन्हा के कुशल नेतृत्व में सुरक्षा व्यवस्था लगातार सुदृढ़ की जा रही है। श्री सिन्हा स्वयं व्यवस्था पर नजर बनाए हुए हैं और समय-समय पर मैदानी हालात का जायजा ले रहे हैं।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक महेश्वर नाग के मार्गदर्शन में उप पुलिस अधीक्षक (यातायात) संतोष जैन और यातायात प्रभारी मधुसूदन नाग अपनी टीम के साथ शहर के मुख्य मार्गों पर मुस्तैदी से डटे हुए हैं। बैरिकेड्स, ट्रैफिक डायवर्जन और पार्किंग की स्पष्ट व्यवस्था से श्रद्धालुओं को सुरक्षित और सुगम मार्ग मिल रहा है।

भीड़भाड़ वाले इलाकों में अतिरिक्त जवानों की तैनाती और अधिकारियों की लगातार फील्ड निगरानी से दशहरे की रौनक में किसी तरह की अव्यवस्था नहीं दिख रही है। पुलिस जवान श्रद्धालुओं को लगातार मार्गदर्शन और सहयोग प्रदान कर रहे हैं।

स्थानीय नागरिक और बाहर से आए पर्यटक पुलिस की इस मुस्तैदी की खुले दिल से तारीफ कर रहे हैं। लोगों का कहना है, “इस बार दशहरा का आनंद दोगुना हो गया है, क्योंकि पुलिस की सतर्कता ने हमें पूरी सुरक्षा और भरोसे का माहौल दिया है।”

निस्संदेह, दशहरे के इस ऐतिहासिक पर्व में बस्तर पुलिस का योगदान लगातार व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। एसपी और उनकी टीम की यह तत्परता पूरे समाज में सुरक्षा और विश्वास का सकारात्मक संदेश दे रही है।

नरेश देवांगन की खास रिपोर्ट 

जगदलपुर, शौर्यपथ। राजमहल परिसर में मीना बाजार का ‘‘मौत का कुआँ’’ खेल इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है, लेकिन कारण रोमांच नहीं बल्कि लापरवाही है। लगभग 30 साल पुरानी गाड़ियों को बिना तकनीकी जांच और बिना सुरक्षा इंतज़ाम मौत के कुएँ में झोंक दिया गया। फिटनेस शुल्क भरकर कागज़ी मंजूरी तो दिला दी गई, मगर यह कौन तय करेगा कि सड़क पर चलने लायक वाहन मौत का कुआँ जैसे खतरनाक खेल में भी दौड़ाए जा सकते हैं?

 

गृह मंत्री आएँ तो फिटनेस सख़्त, जनता आए तो सब ढीला

विडंबना देखिए—4 अक्टूबर को लालबाग के स्वदेशी मेला में देश के गृहमंत्री अमित शाह कार्यक्रम में संभावित मौजूदगी है। वहाँ मंच की मजबूत लकड़ी से लेकर बिजली के तार तक की फिटनेस जांची जा रही है। हर विभाग का अफसर मैदान में उतरकर पसीना बहा रहा है ताकि कार्यक्रम में सुरक्षा पर कोई सवाल न उठे।

लेकिन दूसरी तरफ़ मीना बाजार, जहाँ रोज़ हज़ारों आम नागरिक जुट रहे हैं, वहाँ जगह जगह कटे केबल बिना इन्सुलेटेट तार जैसी जानलेवा, बिना फिटनेस जाँच के झूला पर सवारी साथ ही मौत का कुआँ लगभग 30 साल पुरानी गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। न फिटनेस की असली जांच, न सुरक्षा उपकरण, न ही जिम्मेदार अधिकारियों की मौजूदगी। लगता है प्रशासन के लिए जनता की जान किसी कागज़ी फिटनेस सर्टिफिकेट से भी सस्ती है।

 

दोहरे मानक पर सवाल

जनता पूछ रही है—

क्या फिटनेस सर्टिफिकेट का मतलब यह भी है कि गाड़ियाँ मौत का कुआँ में उड़ाई जा सकती हैं?

जब गृह मंत्री आते हैं तो सुरक्षा की परत दर परत जांच होती है, मगर जनता की भीड़ के लिए जिम्मेदार क्यों खामोश हैं?

क्या नियम-कानून सिर्फ खास मेहमानों पर लागू होते हैं और आम जनता महज़ भीड़ समझी जाती है?

 

कार्यवाही की मांग 

स्थानीय लोगों ने कहा कि यह दोहरा रवैया जनता के विश्वास पर सीधा चोट है। अगर प्रशासन सिर्फ़ नेताओं और खास मेहमानों के लिए ही सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, तो आम जनता की जान का जिम्मेदार कौन होगा? उन्होंने मांग की है कि आयोजकों और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख़्त कार्यवाही हो, वरना आने वाले दिनों में मीना बाजार जैसी जगहें रोमांच नहीं बल्कि मौत का गढ्ढा साबित होंगी।

 

विभागीय जानकारों की माने तो फिटनेस नियम क्या कहते हैं?

निजी वाहनों की आरसी (RC) केवल 15 वर्ष तक वैध रहती है।

इसके बाद वाहन चलाने के लिए फिटनेस सर्टिफिकेट का नवीनीकरण अनिवार्य है।

फिटनेस का नवीनीकरण यह साबित करता है कि गाड़ी सड़क पर साधारण परिस्थितियों में चलने लायक है।

जोखिमभरे खेल या स्टंट (जैसे मौत का कुआँ) के लिए कोई भी कानून फिटनेस को मान्यता नहीं देता।

ऐसे आयोजनों के लिए अलग सुरक्षा मापदंड और अनुमति आवश्यक है।

 

सवाल अभी भी बाकी…

क्या 30 साल पुरानी गाड़ियों को मौत का कुआँ में उतारना कानून की अवहेलना नहीं है?

जब फिटनेस सिर्फ सड़क पर चलने की इजाजत देता है, तो विभाग ने इन वाहनों को जोखिमभरे खेल में क्यों नज़रअंदाज़ किया?

 

इस मामले पर क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी श्री बंजारे का कहना है की परमिशन हमारे यहाँ से नहीं लिया गया है इसकी शिकायत भी हमें मिली है जिस पर मैंने उड़न्दस्ता की टीम को जाँच के लिए मैंने उड़न्दस्ता प्रभारी व इंस्पेक्टर को बोल दिया है की जाके इसकी फिटनेस, रजिस्ट्रेशन, पाल्यूशन की जाँच कर ले ओर किसी प्रकार की कमी पाई जाती है तो उस पर जुर्माना करें हमारे पास मौत की कुआँ पे चलने वाली गाड़ियों को लेकर कोई गाइड लाइन अभी नहीं आया है यें लोग प्राइवेट गाड़ियों को चलाते है व्यवसायिक गाड़ीयां तो है नहीं यदि इस टाइप से चला रहे होंगे तो फाइन होगा मौत के कुआँ मे करतब दिखा रहे है सुरक्षा नियमों का पालन नहीं हो रहा है तो इसके लिए मै यातायात प्रभारी से बात कर बोलूंगा की नियमों का पालन करवाये ताकि किसी प्रकार का भविष्य मे हादसा ना हो बीते वर्ष भी इस मामले की शिकायत प्राप्त हुई थी जिसकी जाँच कर लगभग पचास हजार रुपए जुर्माना लगाया गया था जुर्माना लगाने के बाद भी ऐसा होगा तो जप्ती की कार्यवाही कर न्यायलय पेश किया जायेगा।


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