July 24, 2026
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    साहब सुशासन की उठाओ जिम्मेदारी, विभाग के नियमों पर 500 रुपये ट्रिप पड़ रहा है भारी?

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    By- नरेश देवांगन 

    जगदलपुर, शौर्यपथ। छत्तीसगढ़ में सुशासन, संवेदनशीलता और पारदर्शिता को लेकर सरकार लगातार अपनी प्रतिबद्धता जताती रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं खनिज साधन (माइनिंग) विभाग की कमान संभाले हुए हैं और अवैध खनन पर सख्ती के संकेत भी समय-समय पर देते रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है, जहां सुशासन के दावों को जिम्मेदारों की कार्यशैली धीरे-धीरे कुशासन की ओर धकेलती नजर आ रही है।

    जिले के ग्राम छोटे कड़मा में संचालित खदानों से निकलने वाली गिट्टी का खेल अब खुलेआम चल रहा है। बिना फिट-पास के गाड़ियों में गिट्टी का परिवहन धड़ल्ले से जारी है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस अवैध परिवहन को रोकने के लिए जिन सिपाहियों की तैनाती की गई थी, वहीं अब इस पूरे ‘सिस्टम’ के केंद्र में नजर आ रहे हैं।

    सूत्रों की मानें तो बिना फिट-पास गाड़ियों से प्रति ट्रिप 500 रुपये की ‘सेटिंग’ तय कर दी गई है। यानी नियमों का पालन कराने वाली व्यवस्था ही अब नियमों को ‘दरकिनार’ करने की सुविधा शुल्क वसूल रही है। दिनदहाड़े यह खेल चल रहा है और जिम्मेदार विभाग मानो आंखें मूंदे बैठा है।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विभाग के जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी, जो खुद को सुशासन का प्रहरी बताते हैं, वास्तव में सिर्फ “ईमानदारी का चोला” ओढ़े हुए हैं? क्योंकि जमीनी सच्चाई तो यह बताती है कि उस चोले के पीछे ‘हिस्सेदारी’ का खेल बेखौफ जारी है।

    हैरानी की बात यह भी है कि विभाग के जिम्मेदारों को इस बात का जरा भी भय नहीं दिखता कि राज्य के मुखिया स्वयं माइनिंग विभाग की कमान संभाले हुए हैं। ऐसे में यह लापरवाही या मिलीभगत कहीं न कहीं मुख्यमंत्री के सुशासन के दावों को भी सीधा नुकसान पहुंचा रही है।

    इस अवैध परिवहन से सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी का भारी नुकसान हो रहा है। एक ओर शासन सख्ती की बात करता है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ‘500 रुपये प्रति ट्रिप’ का सिस्टम ही असली नियम बनता नजर आ रहा है।

    अब सीधे सवाल:

    क्या छोटे कड़मा में चल रहा यह खेल विभागीय संरक्षण के बिना संभव है?

    क्या जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी मुख्यमंत्री की मंशा के विपरीत काम कर रहे हैं?

    क्या सुशासन के नाम पर केवल दावे ही किए जा रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर ‘सेटिंग राज’ हावी है?

    क्या इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह खेल यूं ही चलता रहेगा?

    जिले की जनता अब यह जानना चाहती है कि सुशासन का मॉडल कागजों तक सीमित रहेगा या छोटे कड़मा जैसे मामलों में सख्त कार्रवाई कर उसकी साख बचाई जाएगी।

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