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June 17, 2026
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Naresh Dewangan

Naresh Dewangan


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By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। बस्तर जिले में अवैध खनिज उत्खनन और परिवहन पर लगाम कसने के लिए खनिज विभाग द्वारा लगातार सख्त और प्रभावी कार्रवाई की जा रही है। संचालक खनिज एवं बस्तर कलेक्टर के निर्देश पर चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत जिला खनिज जांच उड़नदस्ता दल ने विभिन्न क्षेत्रों में औचक निरीक्षण कर अवैध कारोबारियों पर बड़ी कार्रवाई करते हुए 36 वाहनों को जब्त किया है।

खनिज विभाग की इस सक्रियता को जिले में प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और राजस्व संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विभागीय टीम ने उपनपाल, देवड़ा, कोडेनार, बड़ेआमाबाल, कोरपाल, बेलगांव, धरमपुरा, जगदलपुर, कुम्हरावंड, पिपलावंड, बजावंड, बडांजी, तारापुर और बनियागांव सहित कई क्षेत्रों में लगातार निरीक्षण किया। जांच के दौरान अवैध रूप से रेत एवं चुना पत्थर का उत्खनन, परिवहन और भंडारण करते पाए जाने पर संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की गई।

कार्रवाई के दौरान जब्त किए गए सभी वाहनों को पुलिस अभिरक्षा में सौंप दिया गया है, वहीं चार भंडारणकर्ताओं के खिलाफ भी प्रकरण दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है। खनिज विभाग ने स्पष्ट किया है कि अवैध खनिज गतिविधियों में संलिप्त लोगों के खिलाफ छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियमावली 2015 एवं खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम 1967 के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई जारी रहेगी।

खनिज विभाग की इस मुहिम से अवैध खनिज कारोबारियों में हड़कंप मचा हुआ है, वहीं आम लोगों में प्रशासन की सक्रियता को लेकर सकारात्मक संदेश गया है। विभागीय अधिकारियों की सतर्कता और मैदान स्तर पर लगातार निगरानी से यह साफ संकेत मिला है कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इस अभियान में खनि अधिकारी शिखर चेरपा, सहायक खनि अधिकारी जागृत गायकवाड, खनि निरीक्षक अंकित पुरी, अनि सिपाही डिकेश्वर खरे, नगर सैनिक विजय कश्यप, कृष्णा बघेल एवं सहदेव बघेल सहित जिला खनिज जांच उड़नदस्ता दल के सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कोंडागांव, शौर्यपथ।  छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कोंडागांव जिला 2012 से जिला घोषित हो गया था जिसके बाद से अब तक जिले में सभी जिलेवासियों को शासन की सभी योजनाओं को पूरा किया जा रहा है । मगर एक तरफ ध्यान दिया जाए तो एक बड़ी बात सामने आती है देश एक कठनाई से गुजर रहा है जहाँ पेट्रोल व डीजल की किल्लत देखा जा रहा है।

वही अगर बात करे कोंडागांव की तो  

न्यायालय कैदियों को जगदलपुर या नारायणपुर जेल भेजती है जो कोंडागांव मुख्यालय से 60 से 50 किलोमीटर दूर पड़ता है जहाँ रोजना कैदियों को लाने में मशक्कत की जाती है अगर कोंडागांव जिला मुख्यालय में भी एक जेल या उप जेल बन जाए तो पुलिस को राहत मिलेगी।

समस्या क्या है?

कोंडागांव को 2012 में जिला घोषित किया गया था

इसके बावजूद यहां अभी तक जिला जेल/उप-जेल नहीं है

कोर्ट (न्यायालय) से कैदियों को जगदलपुर या नारायणपुर भेजा जाता है

यह दूरी लगभग 50–60 किलोमीटर है

इससे क्या दिक्कतें हो रही हैं?

पुलिस को रोज कैदियों को ले जाने में अधिक मेहनत और संसाधन खर्च

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच आर्थिक बोझ

सुरक्षा जोखिम भी बढ़ता है (लंबी दूरी पर ट्रांजिट)

कैदियों और उनके परिजनों को असुविधा

अब देखने वाली बात होगी कि शौर्यपथ की इस खबर से जिला प्रशासन व शासन क्या कदम उठाएगी।

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। डिमरापाल आयुष औषधालय में नियमित उपस्थिति को लेकर शिकायत के बाद अब मामले में एक नया पहलू सामने आया है। विभागीय सूत्रों एवं संबंधित पक्षों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिकायत के बाद जिला आयुष अधिकारी द्वारा संबंधित चिकित्सा अधिकारी से चर्चा की गई, जिसमें कथित रूप से नियमित उपस्थिति प्रभावित होने के पीछे “अत्यधिक गर्मी” एवं व्यक्तिगत कारणों का उल्लेख किया गया।

सूत्रों के अनुसार, संबंधित चिकित्सा अधिकारी ने चर्चा के दौरान कहा कि अत्यधिक तापमान के कारण लंबे समय तक अस्पताल में बैठने में कठिनाई होती है। इस पर जिला आयुष अधिकारी ने कथित तौर पर नाराजगी व्यक्त करते हुए यह कहा कि शासकीय सेवा में निर्धारित समय तक उपस्थित रहकर मरीजों को सेवाएं देना आवश्यक दायित्व है और अन्य अधिकारी-कर्मचारी भी समान परिस्थितियों में कार्य कर रहे हैं।

बताया जा रहा है कि इसके बाद संबंधित चिकित्सा अधिकारी द्वारा पारिवारिक परिस्थितियों, विशेषकर अपनी स्कूली बेटी की देखभाल का उल्लेख करते हुए नियमित उपस्थिति में कठिनाई होने की बात कही गई। साथ ही यह भी चर्चा में आया कि उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों की जानकारी विभागीय स्तर पर होने के कारण उन्हें ऐसे स्थान पर पदस्थ किया गया, जहां आवागमन अपेक्षाकृत सुगम हो। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकारी अस्पताल “व्यक्तिगत सुविधा केंद्र” बनते जा रहे हैं? यदि व्यक्तिगत कारणों और मौसम को आधार बनाकर नियमित ड्यूटी प्रभावित होगी, तो दूरदराज के मरीज आखिर किस भरोसे सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की ओर देखें?

सबसे हैरान करने वाली बात यह बताई जा रही है कि बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अनुपस्थित रहने के बावजूद हाजिरी में अनुपस्थिति दर्ज नहीं होती। हालांकि, इन बिंदुओं की आधिकारिक पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही संभव होगी।

अब मुख्य प्रश्न यह है कि यदि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में नियमित सेवाएं प्रभावित होती हैं, तो इसका सीधा असर ग्रामीण मरीजों पर पड़ता है। ऐसे में आमजन की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विभाग इस मामले में तथ्यात्मक जांच कर क्या निष्कर्ष निकालता है और नियमानुसार क्या कदम उठाए जाते हैं।

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। सरकार आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए भरसक प्रयास कर रही है, योजनाएं बन रही हैं, बजट खर्च हो रहा है—लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ गैर-जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यशैली इन प्रयासों पर सवाल खड़े करती दिख रही है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं मानो जनता का पैसा और सरकारी मंशा, दोनों ही कागज़ों में बेहतर और जमीन पर कमजोर पड़ रहे हों। सबसे चिंताजनक यह है कि जिन अधिकारियों को जिले में निरीक्षण और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है, उन्हें भी यह सब या तो दिखाई नहीं दे रहा, या फिर प्राथमिकता में नहीं है।

इसी क्रम में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र काकलूर से सामने आई जानकारियों ने व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर यह बात सामने आई है कि केंद्र में पदस्थ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी द्वारा नियमित रूप से ड्यूटी का निर्वहन नहीं किया जा रहा है, जिससे मरीजों को निरंतर सेवाएं मिल पाना प्रभावित हो रहा है।

मामले को और गंभीर बनाते हुए विभागीय सूत्रों का दावा है कि संबंधित महिला चिकित्सा अधिकारी महीने में एक बार आ जाएं तो ही “बहुत” माना जाता है, जबकि कभी-कभार तो वे लंबे समय तक अनुपस्थित रहती हैं। सूत्र यह भी बताते हैं कि उनके पति—जो स्वयं अन्य स्थान पर पदस्थ बताए जाते हैं—सप्ताह में एक बार आकर उपस्थिति रजिस्टर, ओपीडी रजिस्टर सहित अन्य आवश्यक प्रविष्टियां भरते नजर आते हैं। यदि यह तथ्यात्मक रूप से सही है, तो यह व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सूत्रों के अनुसार, यह सब संभव होने के पीछे स्थानीय स्तर पर “संरक्षण” की चर्चा भी है, जिसमें विकासखंड चिकित्सा अधिकारी की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। हालांकि, यह पहलू जांच का विषय है और आधिकारिक पुष्टि के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकारी स्वास्थ्य संस्थान अब जिम्मेदारी से अधिक “व्यवस्था के भरोसे” चल रहे हैं? और क्या निगरानी तंत्र केवल कागज़ों तक सीमित रह गया है? यदि आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह न केवल सेवा नियमों का उल्लंघन है, बल्कि आमजन के विश्वास के साथ भी गंभीर समझौता है।

अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में क्या रुख अपनाते हैं—क्या पारदर्शी जांच और कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगा।

नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए सरकारी घोषणाएं तेज़ हैं, मगर डिमरापाल में तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती दिख रही है। सवाल सीधा है—जब अस्पताल ही नियमित रूप से संचालित न हो, तो मरीज इलाज कहां कराएं? योजनाओं की चमक और ज़मीनी हकीकत के बीच यह फासला न सिर्फ व्यवस्थाओं पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि आयुर्वेद की साख पर भी असर डाल सकता है। और सबसे दिलचस्प बात—निगरानी तंत्र को जैसे यह सब दिखता ही नहीं, या दिखता है तो दर्ज नहीं होता।

इसी कड़ी में शासकीय आयुर्वेद औषधालय डिमरापाल चर्चा में है, जहां सेवाएं कथित तौर पर “हफ्ते में एक-दो दिन” तक सिमट गई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि डॉक्टर की नियमित अनुपस्थिति के चलते उन्हें छोटे-छोटे इलाज के लिए भी इधर-उधर भटकना पड़ता है, जबकि रजिस्टरों में सब कुछ ‘समय पर’ और ‘नियमित’ बताया जाता है।

“शौर्यपथ” टीम के निरीक्षण में सोमवार से बुधवार तक चिकित्सा अधिकारी मौजूद नहीं मिलीं। गुरुवार—सियान जतन —पर अस्पताल में उपस्थिति दर्ज कर सेवाएं दी जाती दिखीं। ग्रामीणों के शब्दों में, “यहां इलाज नहीं, हाजिरी का कैलेंडर चलता है।”

सूत्रों के अनुसार, उपस्थिति और ओपीडी आंकड़ों के बीच अंतर की आशंका जताई जा रही है। संबंधित चिकित्सा अधिकारी ने अनौपचारिक बातचीत में पारिवारिक कारणों—विशेषकर छोटे बच्चों की देखभाल—का हवाला देते हुए बताया कि वे प्रतिदिन उपस्थित नहीं हो पातीं। साथ ही यह भी संकेत दिया कि मरीजों की संख्या कम होने के बावजूद नियमित आंकड़े प्रस्तुत करने का दबाव रहता है, जिसके चलते प्रविष्टियों में अंतर आ सकता है। सवाल यह है कि अगर आंकड़े ही इलाज बन जाएं, तो मरीज का भरोसा किस पर टिका रहेगा?

मामले की सूचना जिला आयुर्वेद अधिकारी को दिए जाने पर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन मिला और 20 दिन पहले शिकायत भी सौंपी गई। लेकिन “तत्काल” शब्द फिलहाल फाइलों में ही सक्रिय नजर आता है—स्थानीय स्तर पर किसी ठोस कार्रवाई की पुष्टि अब तक सामने नहीं आई है। ऐसे में यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या व्यवस्था में ‘सब ठीक है’ मान लेना ही नई कार्यप्रणाली बन गई है?

अब नजरें इस बात पर हैं कि क्या जिम्मेदार अधिकारी इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई करेंगे, या फिर डिमरापाल का औषधालय यूं ही कागज़ों में रोज़ खुलता रहेगा और ज़मीन पर हफ्ते में एक-दो दिन ही दिखाई देगा।

नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। राज्य में अवैध रेत उत्खनन पर सख्ती के दावे भले कागज़ों में मजबूत दिखते हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत ग्राम पंचायत बनियागांव के आश्रित ग्राम बेलगांव में कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। कुछ दिन पहले माइनिंग विभाग द्वारा रेत उत्खनन में लगी मशीन को जब्त कर ‘बड़ी कार्रवाई’ का दावा जरूर किया गया, मगर अब वही क्षेत्र फिर से रेत निकासी का केंद्र बनता नजर आ रहा है।

सूत्रों और स्थानीय स्तर पर मिल रही जानकारियों के मुताबिक, प्रस्तावित टेंडर प्रक्रिया से पहले ही खदान से दिन-रात ट्रैक्टरों के जरिए रेत निकासी की गतिविधियां जारी रहने की बात सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि एक मशीन की जब्ती के बाद क्या अवैध उत्खनन पर प्रभावी रोक लग पाई, या फिर यह कार्रवाई केवल सीमित असर तक ही रह गई?

चर्चा यह भी है कि जब तक विभाग टेंडर प्रक्रिया पूरी करेगा, तब तक खदान के भंडार पर असर पड़ सकता है। यानी टेंडर के समय वास्तविक स्थिति प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

सबसे चिंताजनक पहलू यह बताया जा रहा है कि कथित गतिविधियां विभागीय जानकारी के दायरे में होने के बावजूद प्रभावी नियंत्रण नहीं दिख रहा है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक पुष्टि अपेक्षित है, लेकिन जिम्मेदारों की चुप्पी कई सवाल जरूर खड़े कर रही है—क्या यह लापरवाही है या समन्वय की कमी? क्योंकि जिस स्तर पर रेत निकासी की बातें सामने आ रही हैं, वह स्थानीय निगरानी से जुड़ा विषय भी माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री द्वारा अवैध खनन पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जा चुके हैं, लेकिन बेलगांव की स्थिति इन निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करती नजर आ रही है। एक मशीन की जब्ती के बाद भी यदि गतिविधियां जारी रहने की बातें सामने आती हैं, तो यह कार्रवाई की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

यदि समय रहते ठोस और त्वरित कदम नहीं उठाए गए, तो टेंडर प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और खदान के संसाधनों पर भी असर पड़ने की आशंका है। ऐसे में आवश्यक है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि किसी प्रकार की अनियमितता पाई जाती है, तो नियमानुसार सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि शासन की मंशा, राजस्व और पर्यावरणीय संतुलन की प्रभावी सुरक्षा हो सके।

नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। जगदलपुर स्थित मुख्य डाकघर जगदलपुर में इन दिनों डाक सेवा लेने पहुंचे लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। पोस्ट कराने के लिए लंबी कतारों में खड़े लोगों के ऊपर लगे पंखे खराब पड़े हैं, जिससे भीषण गर्मी के बीच हालात और कठिन हो गए हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों और कतार में खड़े लोगों के अनुसार, तेज गर्मी में बिना पंखे के इंतजार करना बेहद मुश्किल हो रहा है। कई लोगों ने बताया कि इस स्थिति में बुजुर्गों और महिलाओं को विशेष परेशानी उठानी पड़ रही है।

यह उल्लेखनीय है कि ऐसे सार्वजनिक स्थानों पर न्यूनतम सुविधाओं का सुचारू रहना आवश्यक माना जाता है, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह व्यवस्था प्रभावित दिख रही है। 

स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि समय रहते इस समस्या पर ध्यान दिया जाए, तो आम नागरिकों को अनावश्यक असुविधा से बचाया जा सकता है। अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग इस स्थिति को कितनी प्राथमिकता से सुधारता है।

By - नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। धरमपुरा क्षेत्र के LIC रोड, कंगोली में सड़क के दोनों किनारों पर खड़ी हैवी गाड़ियों के कारण स्थानीय निवासियों को लगातार असुविधा और संभावित खतरे का सामना करना पड़ रहा है। कॉलोनीवासियों के अनुसार, इस प्रकार की पार्किंग से सड़क की दृश्यता प्रभावित हो रही है, जिससे मुख्य मार्ग पर निकलते समय आने-जाने वाले वाहनों का अंदाजा लगाना कठिन हो जाता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस स्थिति के चलते दुर्घटना की आशंका बनी रहती है, और पूर्व में एक दुर्घटना घटित होने की जानकारी भी सामने आई है। इसके बावजूद क्षेत्र में पार्किंग व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने या यातायात नियंत्रण के लिए कोई स्पष्ट और प्रभावी कदम नजर नहीं आ रहा है।

निवासियों द्वारा संबंधित विभागों को इस विषय में अवगत कराए जाने की बात कही जा रही है, किंतु अब तक समस्या के समाधान हेतु ठोस कार्रवाई नहीं होने से लोगों में असंतोष है।

यह स्थिति संकेत देती है कि क्षेत्र में यातायात प्रबंधन और सड़क सुरक्षा के संबंध में अतिरिक्त ध्यान एवं आवश्यक कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, ताकि किसी संभावित अप्रिय घटना को रोका जा सके। यदि समय रहते उचित व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह समस्या भविष्य में गंभीर रूप ले सकती है, जिसकी जिम्मेदारी तय करना आवश्यक होगा।

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। छत्तीसगढ़ में सुशासन, संवेदनशीलता और पारदर्शिता को लेकर सरकार लगातार अपनी प्रतिबद्धता जताती रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय स्वयं खनिज साधन (माइनिंग) विभाग की कमान संभाले हुए हैं और अवैध खनन पर सख्ती के संकेत भी समय-समय पर देते रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है, जहां सुशासन के दावों को जिम्मेदारों की कार्यशैली धीरे-धीरे कुशासन की ओर धकेलती नजर आ रही है।

जिले के ग्राम छोटे कड़मा में संचालित खदानों से निकलने वाली गिट्टी का खेल अब खुलेआम चल रहा है। बिना फिट-पास के गाड़ियों में गिट्टी का परिवहन धड़ल्ले से जारी है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस अवैध परिवहन को रोकने के लिए जिन सिपाहियों की तैनाती की गई थी, वहीं अब इस पूरे ‘सिस्टम’ के केंद्र में नजर आ रहे हैं।

सूत्रों की मानें तो बिना फिट-पास गाड़ियों से प्रति ट्रिप 500 रुपये की ‘सेटिंग’ तय कर दी गई है। यानी नियमों का पालन कराने वाली व्यवस्था ही अब नियमों को ‘दरकिनार’ करने की सुविधा शुल्क वसूल रही है। दिनदहाड़े यह खेल चल रहा है और जिम्मेदार विभाग मानो आंखें मूंदे बैठा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विभाग के जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी, जो खुद को सुशासन का प्रहरी बताते हैं, वास्तव में सिर्फ “ईमानदारी का चोला” ओढ़े हुए हैं? क्योंकि जमीनी सच्चाई तो यह बताती है कि उस चोले के पीछे ‘हिस्सेदारी’ का खेल बेखौफ जारी है।

हैरानी की बात यह भी है कि विभाग के जिम्मेदारों को इस बात का जरा भी भय नहीं दिखता कि राज्य के मुखिया स्वयं माइनिंग विभाग की कमान संभाले हुए हैं। ऐसे में यह लापरवाही या मिलीभगत कहीं न कहीं मुख्यमंत्री के सुशासन के दावों को भी सीधा नुकसान पहुंचा रही है।

इस अवैध परिवहन से सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी का भारी नुकसान हो रहा है। एक ओर शासन सख्ती की बात करता है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर ‘500 रुपये प्रति ट्रिप’ का सिस्टम ही असली नियम बनता नजर आ रहा है।

अब सीधे सवाल:

क्या छोटे कड़मा में चल रहा यह खेल विभागीय संरक्षण के बिना संभव है?

क्या जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी मुख्यमंत्री की मंशा के विपरीत काम कर रहे हैं?

क्या सुशासन के नाम पर केवल दावे ही किए जा रहे हैं, जबकि जमीनी स्तर पर ‘सेटिंग राज’ हावी है?

क्या इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह खेल यूं ही चलता रहेगा?

जिले की जनता अब यह जानना चाहती है कि सुशासन का मॉडल कागजों तक सीमित रहेगा या छोटे कड़मा जैसे मामलों में सख्त कार्रवाई कर उसकी साख बचाई जाएगी।

By - नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। ग्राम पंचायत बनियागांव क्षेत्र में भसखंली नदी से कथित अवैध रेत उत्खनन और बड़े पैमाने पर डंपिंग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार, कुछ प्रभावशाली तत्वों द्वारा नदी से रेत निकालकर बनियागांव में भारी मात्रा में डंप किया गया है। आरोप है कि यह पूरा खेल जिम्मेदारों के नाक के नीचे संचालित हो रहा है, लेकिन कार्रवाई लगभग शून्य नजर आ रही है।

अवैध रेत डंपिंग पर रोक लगाने एवं कार्रवाई की मांग को लेकर ग्रामीणों ने पूर्व में जिला कलेक्टर को लिखित शिकायत भी सौंपी थी, जिसमें कथित अवैध उत्खनन और भंडारण का उल्लेख है। बावजूद इसके, अब तक कोई ठोस और प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आने से प्रशासनिक निष्क्रियता पर सवाल उठ रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि शिकायतों के बाद अधिकारी मौके पर पहुंचे जरूर, लेकिन कार्रवाई सीमित और औपचारिक रही। जिससे कथित रूप से जुड़े लोगों के हौसले और बढ़े हैं और अवैध डंपिंग का सिलसिला जारी है।

यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं, तो इस तरह की गतिविधियों से शासन को रेत रॉयल्टी के रूप में भारी राजस्व नुकसान होने की आशंका है। साथ ही, अनियंत्रित उत्खनन से पर्यावरणीय असंतुलन की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

सूत्रों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आ रही है कि उक्त रेत का उपयोग औद्योगिक कार्यों एवं खुले बाजार में किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर “भारती” नामक व्यक्ति का नाम भी चर्चाओं में है, हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

जांच के घेरे में व्यवस्था

शिकायत के बाद भी प्रभावी कार्रवाई नहीं होना कई सवाल खड़े कर रहा है। यह प्रशासनिक शिथिलता है या अन्य कारण—यह निष्पक्ष जांच का विषय है। परिस्थितियों को देखते हुए यह संदेह भी जताया जा रहा है कि कहीं न कहीं उदासीनता इस पूरे प्रकरण को बढ़ावा तो नहीं दे रही।

 

ग्रामीणों की मांग

ग्रामीणों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष जांच कर तथ्य सामने लाने तथा दोषी पाए जाने पर नियमानुसार कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की है, ताकि अवैध रेत डंपिंग के इस खेल पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।


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