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टिप्स / शौर्यपथ / कुकिंग टिप्स की बात करें, तो ये छोटे-छोटे टिप्स खाने को और भी टेस्टी बना देते हैं। आज हम आपको ऐसे ही टिप्स बताएंगे जिससे कि चिकन की रेसिपी और भी टेस्टी बनेगी-
-चिकन को पकाते वक्त शुरुआत में उसे हमेशा तेज आंच पर पकाएं ताकि उसका जूस सील हो जाए, उसके बाद उसे धीमी आंच पर पकाएं।
-चिकन के टुकड़ों में मसाले अच्छी तरह से लग जाएं, इसके लिए एक प्लास्टिक की पॉलिथिन में पहले मसाले और मैरीनेट की सभी सामग्री डालें और उसे अच्छी तरह से हिलाएं। इसके बाद चिकन को पकाएं। इसका फायदा यह होगा कि चिकन में मसाले अच्छी तरह से रच-बस जाएगा।
-फ्राइड चिकन बनाते वक्त चिकन को तलने से पहले आटे या मैदा में रोल करने की जगह, मिल्क पाउडर में रोल करें। तलने के बाद चिकन का रंग अच्छा आएगा।
-अगर आप चाहती हैं कि आपके बनाए कबाब मुलायम बनें और उन्हें चबाने में खाने वाले को परेशानी न हो, तो उन्हें अपेक्षाकृत ज्यादा देर तक मैरीनेट करें और साथ ही जरूरत से ज्यादा पकाएं नहीं।
-चिकन को हमेशा ऊंचे तापमान पर पकाएं ताकि उसके सभी बैक्टीरिया पूरी तरह से मर जाएं।
-चिकन की साफ-सफाई के दौरान खास सतर्कता बरतें। चिकन को हमेशा गर्म पानी से धोएं। साथ ही जिस बरतन में आपने कच्चे चिकन को रखा है, उसे भी गर्म पानी से धोना न भूलें। कच्चे चिकन को छूने के बाद अपने हाथों को साबुन से धोना न भूलें। इसके अलावा अगर आप कच्चे चिकन को फ्रिज में स्टोर कर रही हैं, तो इस बात का ध्यान रखें कि उसका जूस खाने के दूसरे सामान में न लगे।
सेहत / शौर्यपथ / आहार विशेषज्ञ दिन में कम से कम दो लीटर पानी पीने की सलाह देते हैं लेकिन रोजाना दो लीटर पानी पीना सभी लोगों के लिए मुमकिन नहीं है।इस वजह यह है कि किसी को प्यास ज्यादा लगती है तो किसी को कम।ऐसे में जाहिर सी बात है कि कम प्यास लगने वाले लोग पानी भी कम पीते होंगे।ऐसे में आपको अपनी डाइट में कुछ ऐसी चीजें जोड़नी चाहिए जिससे कि शरीर में पानी की कमी की पूर्ति हो सके।आइए, जानते हैं कुछ ऐसे ही आहार-
दही
डिहाइड्रेशन की समस्या से दूर रखने में दही सबसे अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसमें पानी की मात्रा 85 प्रतिशत होती है और शरीर के लिए जरूरी प्रोबायोटिक भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद होते हैं।यह गर्मी की एलर्जी से बचाव के लिए भी शरीर का खूब साथ देता है। यह प्रोटीन, विटामिन बी और कैल्शियम का अच्छा स्त्रोत है।
ब्रोकली
ब्रोकली में 89 प्रतिशत तक पानी होता है और यह न्यूट्रिशन से भरपूर होती है। इसकी प्रकृति एंटी इनफ्लेमेटरी होती है, जिस कारण यह गर्मी में होने वाली एलर्जी से बचाव करती है। इसे आप सलाद में कच्चा ही खा सकते हैं और टोस्ट के साथ हल्का तल कर भी इसका भरपूर लाभ उठा सकते हैं। काफी संख्या में लोग इसकी सब्जी भी बनाते हैं।
सेब
एक कहावत है कि डॉंक्टर को खुद से दूर रखने के लिए रोजाना एक सेब खाएं। अनेक तरह से फायदेमंद सेब में 86 प्रतिशत पानी होता है। फाइबर, विटामिन सी आदि का तो यह अच्छा स्त्रोत है ही।
सलाद
सलाद के पत्ते में जल तत्व 95 प्रतिशत होता है। सैंडविच में इसका अच्छा इस्तेमाल होता है। प्रोटीन और ओमेगा 3 से भरपूर सलाद पत्ते में फैट भी नहीं होता और कैलोरी भी बहुत कम होती है।
चावल
पके हुए चावल भी गर्मी में आपके लिए काफी फायदेमंद हैं। इनमें 70 प्रतिशत जल तत्व होता है। इनमें पर्याप्त मात्रा में आयरन, कार्बोहाइड्रेट आदि भी होते हैं। आपको दिन मेें एक कटोरी चावल जरूर खानेे चाहिए।
धर्म संसार / शौर्यपथ / दैत्यराज दंभ संतानहीन थे। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए कठिन तप कर भगवान विष्णु को प्रसन्न किया। श्रीहरि ने दंभ से वरदान मांगने को कहा। दंभ ने मांगा— प्रभु! मुझे अपने समान तेजस्वी और बलवान पुत्र का वरदान दीजिए, जो तीनों लोकों में अजेय और महापराक्रमी हो। नारायण के आशीर्वाद से दंभ के यहां एक बलशाली पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया शंखचूड़। आरंभ में शंखचूड़ बहुत धर्मवान था। उसने पुष्कर में जाकर घोर तप किया। ब्रह्माजी उसके तप से प्रसन्न हुए। ब्रह्मा ने वर मांगने को कहा। शंखचूड ने ब्रह्मदेव से वर मांगा कि वह देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने शंखचूड़ को इच्छित वरदान के साथ-साथ नारायण कवच भी प्रदान किया।
शंखचूड़ का विवाह धर्मध्वज की परम तेजस्वी और साध्वी कन्या तुलसी से हुआ। शंखचूड का जन्म श्रीहरि के आशीर्वाद से हुआ था। ब्रह्मा से उसने वरदान लिया था। यह सोचकर शंखचूड़ में अभिमान आ गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड़ ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर देवता भगवान विष्णु की शरण में गए। श्रीहरि ने कहा- मैंने स्वयं दंभ को अपने समान परम बलशाली पुत्र का वरदान दिया है। इसलिए शंखचूड़ के अत्याचारों से महादेव ही मुक्ति दिला सकते हैं। देवताओं ने महादेव को जाकर अपना कष्ट सुनाया। महादेव देवताओं के दुख दूर करने को तैयार हो गए। महादेव व शंखचूड़ के बीच घोर युद्ध आरंभ हुआ। शंखचूड़ के पास नारायण कवच था। इसके साथ-साथ उसकी पत्नी वृंदा ने, जिनका नाम तुलसी भी है, पतिव्रत धर्म के प्रभाव से शंखचूड़ को एक अभेद्य कवच से युक्त कर दिया था। इस कारण महादेव उसका वध नहीं कर पा रहे थे।
देवताओं ने श्रीहरि से शंखचूड़ के वध की राह निकालने की प्रार्थना की। शंखचूड़ बड़ा दानी भी था। वह प्रतिदिन दान किया करता था। श्रीविष्णु ब्राह्मण रूप बनाकर शंखचूड़ के पास गए और नारायण कवच दान में ले लिया। उसके बाद श्रीहरि ने शंखचूड़ का रूप धारण किया और तुलसी के पास गए। अनेक वर्ष के बाद पति को लौटा देख तुलसी प्रसन्न हुईं और पत्नी समान आचरण किया। तुलसी का पतिव्रत खंडित हो गया। इसके खंडित होते ही कवच भंग हो गया। महादेव ने त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर दिया। कहते हैं कि त्रिशूल के प्रहार से नारायण के समान बलशाली शंखचूड़ की हड्डियां चूूर हुईं, तो उससे शंख बना।
चतुर्भुज नारायण अपने एक हाथ में शंख धारण करते हैं। इसलिए श्रीहरि एवं अन्य देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है, परंतु महादेव ने उसका वध किया था, इसलिए उनका शंख से जलाभिषेक करना निषिद्ध है। गजानन भी शिवपुत्र हैं, इसलिए उन्हें भी शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता।
धर्म संसार / शौर्यपथ / हर साल श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस बार 25 जुलाई 2020 को देशभर में नागपंचमी मनाई जाएगी। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के बाद हस्त नक्षत्र रहेगा। इस दौरान मंगल वश्चिक लग्न में होंगे खास संयोग यह है कि इसी दिन कल्कि भगवान की जयंती भी है और इसी दिन विनायक चतुर्थी व्रत का पारण होगा।
पंडित नीरज शास्त्री के अनुसार नाग पंचमी के दिन नाग देवता के स्वरूपों की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और मनचाहा वरदान देते हैं। इसके अलावा जिन जातकों पर काल सर्प का दोष है उनके लिए भी यह दिन बहुत अहम माना गया है।
मान्यता है कि इस दिन सर्पों की पूजा करने से नाग देवता प्रसन्न होते हैं और काल सर्प दोष से ग्रसित जातकों को इस दोष से मुक्ति से मिलती है। जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प दोष है, उन्हें तो विशेष तौर पर नागपंचमी को विशेष पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
नाग पंचमी के देव
नागपंचमी पूजा और व्रत के आठ नाग देव माने गए हैं- अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट और शंख नामक अष्टनागों की पूजा की जाती है। नागपंचमी पर वासुकि नाग, तक्षक नाग और शेषनाग की पूजा का विधान है। इस बार नागपंचमी श्रावण मास की 25 जुलाई शनिवार को मनाई जाएगी।
नागपंचमी का महत्व
हिन्दू धर्म में मान्यता है कि सर्प ही धन की रक्षा करते हैं। इसलिए धन-संपदा व समृद्धि की प्राप्ति के लिए नाग पंचमी मनाई जाती है। इस दिन श्रीया, नाग और ब्रह्म अर्थात शिवलिंग स्वरुप की आराधना से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और साधक को धनलक्ष्मी का आशिर्वाद मिलता है।
क्यों मनाया जाता है नागपंचमी का पर्व
नागपंचमी मनाने के पीछे मान्यता है कि समुद्र मंथन के बाद जो विष निकला उसे पीने को कोई तैयार नहीं था। अंतत: भगवान शिव ने उसे पी लिया। भगवान शिव जब विष पी रहे थे, तभी उनके मुख से विष की कुछ बूंदें नीचे गिरीं और सर्प के मुख में समा गई। इसके बाद ही सर्प जाति विषैली हो गई. सर्पदंश से बचाने के लिए ही इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है।
मनोरंजन / शौर्यपथ / 'द कपिल शर्मा शो' छोटे पर्दे का काफी लोकप्रिय टीवी शो है। कॉमेडियन कपिल शर्मा द्वारा होस्ट किए जाने वाले इस शो के लिए लोग काफी बेसब्री से इंतजार करते हैं। शो में खुद कपिल शर्मा के अलावा, जज और दर्शक भी मौजूद होते हैं। अब कोरोना काल में यह शो बिना दर्शकों के रिकॉर्ड किया जा रहा है। हालांकि, इसके बावजूद भी कपिल शर्मा ने एक तरीका बताया है, जिससे दर्शक उनके शो का हिस्सा बन सकते हैं।
कपिल शर्मा ने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक शॉर्ट वीडियो डालकर बताया है कि दर्शक वीडियो कॉल के जरिए 'द कपिल शर्मा शो' का हिस्सा बन सकते हैं। उन्होंने इंस्टाग्राम पर वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा, 'हेल्लो फ्रेंड्स, हम जल्द ही 'द कपिल शर्मा शो' के नए एपिसोड्स के साथ आ रहे हैं। आप सब भी अपने घर से वीडियो कॉल के जरिए इसका हिस्सा बन सकते हैं।'
कपिल शर्मा ने आगे लिखा कि कपिल शर्मा की टीम मुझे आपके घर तक ले जाएगी। मालूम हो कि कोरोना वायरस के चलते कपिल दर्शकों के सामने परफॉर्म नहीं करेंगे। स्टूडियो में उन्हें चीयर करने के लिए दर्शक नहीं होंगे।
कॉमेडियन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि ऑडियंस ही नहीं होगी अब तो। मैं उन्हें बहुत ज्यादा मिस करूंगा। ऑडियंस के सामने परफॉर्म करने की बात ही अलग होती है। उन्होंने जानकारी दी थी कि हम लोग कपिल शर्मा शो की शूटिंग शुरू करने जा रहे हैं। शो के मेकर्स सभी को सुरक्षित रखने के हर तरीके के उपाय कर रहे हैं।
गौरतलब है कि कोरोना वायरस के चलते लागू किए गए लॉकडाउन की वजह से सभी शूटिंग बंद थीं। छूट मिलने के बाद एक बार फिर से तमाम टीवी शो की शूटिंग शुरू हुई है। हालांकि, इस दौरान शो के मेकर्स क्रू और सेट पर आने वाले सभी लोगों का पहले की तुलना में अत्यधिक ख्याल रख रहे हैं। शूटिंग वाली जगह और सेट्स को लगातार सेनिटाइज किया जा रहा है।
नजरिया / शौर्यपथ / वैसे तो कोरोना से सभी क्षेत्रों का बुरा हाल है, लेकिन बैंकिंग क्षेत्र का हाल आगामी महीनों में सबसे बुरा होने वाला है। इसकी पुष्टि बैंकों द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक से तीन लाख करोड़ रुपये के कर्ज खातों को पुनर्गठित (रिस्ट्रक्चरिंग) करने की मांग से होती है। मोटे तौर पर ये कर्ज होटल, विमानन और रियल एस्टेट क्षेत्र से जुडे़ हैं। इन क्षेत्रों को कोरोना की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। इनके ऋण खातों को पुनर्गठित करने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि इसके बाद कंपनियों को अनेक तरह से राहत दी जाती है। कुछ समय के लिए पुनर्गठित खाते गैर-निष्पादित आस्ति (एनपीए) होने से बच जाते हैं और कंपनियों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का मौका मिल जाता है। दरअसल, कंपनी के दिवालिया होने पर बैंक जितनी वसूली कर सकते हैं, उससे कहीं अधिक पैसे उन्हें ऋण खातों के पुनर्गठन से मिलने की उम्मीद होती है।
अप्रैल 2020 के अंत तक होटल क्षेत्र पर बैंकों के 45,862 करोड़ रुपये, विमानन क्षेत्र पर 30,000 करोड़ रुपये और रियल एस्टेट क्षेत्र पर 2.3 लाख करोड़ रुपये बकाया थे। इन क्षेत्रों को उबरने में छह महीने से भी ज्यादा समय लग सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक, खस्ता हाल विमानन क्षेत्र को अपना अस्तित्व बचाने के लिए आगामी तीन साल में लगभग 35,000 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। आज कई होटल कर्ज में हैं। व्यावसायिक रियल एस्टेट और किराए के कारोबार में भी 25 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट के कयास लगाए जा रहे हैं। ऐसे में, इन क्षेत्रों से जुड़े ऋण खातों का पुनर्गठन और जरूरी हो जाता है।
ध्यान रहे, भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को खुदरा ऋणों की किस्त और ब्याज को सिर्फ टालने का निर्देश दिया है, माफ करने का नहीं। अगर कर्जदार मोराटोरियम का फायदा लेना चाहते हैं, तो उन्हें बाद में किस्त व ब्याज, दोनों चुकाने होंगे। अनुमान है कि मोराटोरियम अवधि समाप्त होने के बाद बड़ी संख्या में कार, गृह व व्यक्तिगत ऋण एनपीए में तब्दील हो सकते हैं। ऐसे में, एनपीए से उपजी समस्याओं के निवारण के लिए सरकार को बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की जरूरत पड़ेगी। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर का भी कहना है कि बैंकों का पुनर्पूंजीकरण समय की मांग है। बैंकों का हालिया विलय भी इस बीमारी के इलाज में असमर्थ है।
भारतीय स्टेट बैंक, केनरा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक व बैंक ऑफ बड़ौदा पूंजी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। स्टेट बैंक को 20,000 करोड़ रुपये तक पूंजी जुटाने की मंजूरी मिली है और पंजाब नेशनल बैंक 7,000 करोड़ रुपये तक की पूंजी जुटाने के लिए शेयरधारकों से मंजूरी लेने वाला है। इनके अलावा, दूसरे बैंक पूंजी के लिए सरकार पर निर्भर हैं। वैसे अभी तक पुनर्पूंजीकरण के बहुत अच्छे नतीजे नहीं निकले हैं। सरकार ने संचयी तौर पर वित्त वर्ष 2015 से वित्त वर्ष 2020 के दौरान बैंकों में लगभग 43 अरब डॉलर की पूंजी डाली है, लेकिन बैंकों के पूंजी आधार में सुधार नहीं हो पाया, क्योंकि बैंकों का नुकसान निवेशित पूंजी से दो-तीन गुना ज्यादा था। बैंकों में डाली गई पूंजी का करीब 60 प्रतिशत हिस्सा पिछले दो साल में डाला गया है।
बैंकिंग क्षेत्र अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन यह क्षेत्र एनपीए की समस्या से जूझ रहा है। दिसंबर 2019 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट में कहा गया था कि सितंबर 2020 तक भारतीय अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों का एनपीए कुल कर्ज के 9.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच सकता है। सितंबर 2020 में 53 देशी-विदेशी बैंकों की पूंजी कम हो जाएगी। बैंकों का मुनाफा कम होगा, जिससे उन्हें ऋण देने में परेशानी होगी। सभी क्षेत्रों को खोलने के बाद उद्योगों को वित्तीय सहायता की जरूरत पड़ेगी। सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है, जिसकी एक बड़ी राशि जरूरतमंदों को ऋण के रूप में दी जानी है। ऐसे में, अगर बैंकों को पूंजी की समस्या का सामना करना पड़ा, तो अर्थव्यवस्था में मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। अत: मौजूदा स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक को कॉरपोरेट और खुदरा ऋणों को डूबने से बचाने के हरसंभव उपाय करने होंगे। साथ ही, सबसे जरूरी यह है कि जो लोग और कंपनियां सक्षम हैं, वे अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऋण चुकाएं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)सतीश सिंह , मुख्य प्रबंधक, आर्थिक अनुसंधान, एसबीआई
सम्पादकीय / शौर्यपथ / कोरोना के खिलाफ लड़ाई में सरकारों द्वारा सख्ती में बढ़ोतरी न केवल जरूरी, बल्कि स्वागतयोग्य भी है। झारखंड में कोरोना नियमों की अनदेखी करने वालों और मास्क न पहनने वालों पर एक लाख रुपये का जुर्माना लग सकता है और दो साल की जेल हो सकती है। झारखंड की कैबिनेट ने बुधवार को संक्रामक रोग अध्यादेश 2020 पारित किया है। कोरोना के खिलाफ लड़ाई में ऐसी कड़ाई करने वाला वह देश का पहला राज्य बन गया है। कागज पर ही सही, यह नियम प्रथम दृष्टया काफी कड़ा दिखता है, लेकिन जिस तरह से झारखंड में संक्रमण बढ़ रहा है, उसे रोकने के लिए ऐसे कदमों का व्यापक सांकेतिक महत्व है। अलबत्ता, इसे लागू करना सहज नहीं होगा। इसकी सही अनुपालना सुनिश्चित करने के लिए सबसे पहले सरकारी महकमे और पुलिस-प्रशासन के तमाम लोगों को समाज के सामने आदर्श पेश करना होगा। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि हमारे नेता स्वयं बचाव और मास्क पहनने की दिशा में आदर्श बनकर उभरें। लोगों को लगे कि उनके सभी बडे़ नेता और बडे़ अधिकारी स्वयं मास्क पहनने लगे हैं, तो लोग भी प्रेरित होंगे। अभी आए दिन हम देखते हैं कि किस तरह से मास्क पहनने की अनिवार्यता का मखौल बनाया जाता है। कोई दिखावे के लिए टांग लेता है, तो कोई अपनी नाक नहीं ढकता, तो कोई मास्क अपने गले में लटका लेता है। मास्क से जिस तरह खिलवाड़ हो रहा है, उसमें सरकारें अगर कड़ाई के लिए मजबूर होती जाएं, तो कोई आश्चर्य नहीं। गरीबों की दृष्टि से देखें, तो जुर्माना राशि जरूर ज्यादा है और यह भी संभव है कि इस अध्यादेश या कानून का दुरुपयोग भी होगा। अत: ऐसे कानून बनाते हुए हमारी सरकारों को पूरी तरह तैयार रहना चाहिए। केवल काननू बना देना पर्याप्त नहीं है, उसकी पालना ही सब कुछ है।
झारखंड में कोरोना मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। खबरें आ रही हैं कि सरकारी अस्पतालों में जगह कम पड़ने लगी है। ऐसे में, सरकार लोगों पर ही नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों व बैंक्वेट हॉल आदि पर भी दबाव बनाए हुए है। इन्हें आइसोलेशन वार्ड के रूप में इस्तेमाल करने की योजना है। आने वाले दिनों में झारखंड और संक्रमण बहुल अन्य राज्यों में ऐसे कडे़ कदम सामान्य बात हो जाएंगे। लॉकडाउन खुलने के बाद ज्यादातर राज्यों में संक्रमण बढ़ा है, विशेष रूप से गरीब या अभावग्रस्त राज्यों में स्थिति चिंताजनक होती जा रही है।
आम दिनों में ही जो चिकित्सा सेवा दबाव महसूस करती है, कोरोना के समय में उसका क्या हाल होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कड़ाई केवल आम लोगों पर न हो, जो सेवा में लगा हुआ तंत्र है, उसे भी पूरी मुस्तैदी से काम करने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। यह सुनिश्चित करना होगा कि आम लोगों को इलाज के लिए भटकना न पड़े। सुशासन की कड़ाई के साथ ही स्वशासन की भी जरूरत बढ़ गई है। लोग यदि अनुशासित हो जाएं, तो फिर कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई आसान हो जाएगी। विश्वास बनाए रखना होगा। कोरोना से जंग हम जरूर जीतेंगे। ध्यान रहे, लगभग आठ लाख लोग ठीक हो चुके हैं और अभी देश में सक्रिय मरीजों की संख्या चार लाख भी नहीं है। एक दिन आएगा, जब चंद मरीज रह जाएंगे, लेकिन तब तक हमें सावधानी बरतनी पड़ेगी और सुरक्षित रहना होगा।
मेलबॉक्स / शौर्यपथ / गाजियाबाद में एक पत्रकार जब पुलिस के पास अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने जाता है, तब उसकी रिपोर्ट तो लिखी नहीं जाती, बल्कि इसकी सूचना छेड़छाड़ करने वालों तक पहुंचा दी जाती है। नतीजतन, अपराधी उस पत्रकार पर सरेआम जानलेवा हमला कर उसे गंभीर रूप से घायल कर देते हैं और इलाज के दौरान उसकी मौत हो जाती है। जब इस पर बवाल मचा, तो प्रशासन अब हरकत में आया है। सवाल यह है कि अपराध होने के बाद ही सक्रियता क्यों दिखती है पुलिस? ऐसे सभी मामलों में लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों/ सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह से मुआवजे की राशि काटी जानी चाहिए और इन कर्मियों की नौकरी छीनकर पीड़ित के परिजन को दी जानी चाहिए। कानून का राज फिर से स्थापित करने के लिए इस तरह की मिसालें आवश्यक हैं।
आदित्य अवस्थी, डीएलएफ कैपिटल ग्रीन्स, नई दिल्ली
छात्रों के हित में
किसी भी देश के स्वर्णिम भविष्य का रास्ता स्कूलों से ही निकलता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता किस स्तर की है? इस समय कोरोना संक्रमण-काल में हर जगह शिक्षा की स्थिति डांवांडोल है। स्कूल कब खुलेंगे, यह कोई नहीं कह सकता? अभिभावक घबराहट में हैं, और वे स्कूल खुलने पर भी फिलहाल बच्चों को भेजने के लिए तैयार नहीं हैं। ऑनलाइन शिक्षा की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन स्कूल बंद रहने की स्थिति में अन्य कोई विकल्प भी नहीं है। ऐसे में, सीबीएसई ने 30 फीसदी पाठ्यक्रम कम करने का जो फैसला किया है, वह बच्चों और अध्यापकों के हित में है। मगर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पाठ्यक्रम से ऐसे अंश न हटा दिए जाएं, जिससे शिक्षा की अवधारणा और उसकी गुणवत्ता किसी तरह प्रभावित हो।
सत्य प्रकाश, लखीमपुर खीरी
अच्छा फैसला
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने इस वर्ष ऑस्ट्रेलिया में होने वाली ट्वंटी-20 विश्व कप प्रतियोगिता को स्थगित करने का निर्णय सही दिशा में लिया है। कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण पिछले कुछ महीनों से विश्व स्तरीय क्रिकेट मैचों का आयोजन दिवास्वप्न जैसा हो गया है। जाहिर है, किसी भी देश का कोई भी खिलाड़ी ट्वंटी-20 विश्व कप खेलने के लिए फिलहाल न तो शारीरिक रूप से तैयार है, और न ही मानसिक रूप से। हालांकि, आईसीसी के इस फैसले से क्रिकेटप्रेमियों को जरूर निराशा हुई होगी, पर ट्वंटी-20 विश्व कप के स्थगित होने से आईपीएल के आयोजन की संभावनाएं बढ़ गई हैं, जो सुखद है।
तुषार आनंद, वेस्ट बेली रोड, पटना
बाढ़ से बेहाल
बाढ़ की वजह से बिहार लगभग हर साल विकास की दौड़ में पिछड़ जाता है। यहां बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में सैकड़ों लोग मारे जाते हैं। प्रभावित परिवारों के लिए ढंग से रहने-खाने की व्यवस्था नहीं होती, तो वे सड़कों पर रहने को मजबूर होते हैं। अगर इस बार भी सरकार ने बाढ़ पीड़ितों की सुध नहीं ली, तो इसी तरह की दर्दनाक तस्वीर फिर से दिखेगी। इस बार बाढ़ तो चुनाव का एजेंडा भी बन गया है। मगर दिक्कत यह है कि विपक्षी पार्टियां भी बाढ़ नियंत्रण के वादे पर चुनाव लड़ना चाहती हैं। इस तरह की राजनीति बंद होनी चाहिए। राज्य सरकार अगर जागरूक नहीं होती है, तो जनता को ही सरकार पर दबाव बनाना होगा। आखिर कब तक वे अपनी किस्मत को कोसते रहेंगे? यह बाढ़ ही है, जिसके कारण बिहार आज इतना पिछड़ा राज्य माना जाता है। इसकी वजह से होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई करने में ही अभिभावक बेहाल हो जाते हैं। वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिला पाते। इससे बेरोजगारी दर भी बढ़ रही है। राज्य सरकार को इस पर चिंतन करना होगा।
आफताब आलम, अरवल, बिहार
ओपिनियन / शौर्यपथ / तीन महीने के देशव्यापी लॉकडाउन और अनलॉक-1 के दौरान केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा भ्रम पैदा करने वाले और विस्मयकारी आदेशों की जो बौछार की गई, वह सरकार और आम लोगों के बीच कोविड-19 से संबंधित संवाद का शुरुआती तरीका था। इन आदेशों में लोगों के दैनिक जीवन के हर पहलू को लेकर निर्देश जारी किए गए। मगर जैसे ही लॉकडाउन हटा और संक्रमण के मामले तेज होने लगे, उससे यह स्पष्ट हो गया कि ये ‘आदेश’ महामारी की रोकथाम के अपने लक्ष्य को नाममात्र हासिल कर पाए। ऐसे आदेशों ने एक ऐसी नीतिगत दृष्टि को बल दिया, जिससे कोविड-19 की रोकथाम में नियमों के अनुपालन में कड़ाई करने का विशेषाधिकार मिलता है।
बेशक, कोविड-19 को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्र आपको ‘आदेश’ देगा, आपको अनुशासित करेगा (कई जगह लॉकडाउन डंडे के जोर पर लागू किया गया) और आपकी निगरानी करेगा (तकनीक का इस्तेमाल करते हुए)। मगर, विश्व स्तर पर सार्वजनिक भागीदारी एक महत्वपूर्ण घटक है, जो लोगों की सेहत को संवारने में मदद करती है। इसकी पुष्टि कोई भी सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ कर सकता है। पर इसके लिए जरूरी है कि नागरिकों और राष्ट्र के बीच विश्वास का रिश्ता कायम हो। भारत में कोविड-19 के खिलाफ जो रणनीति अपनाई जा रही है, उसमें इसी विश्वास की कमी है। ऐतिहासिक रूप से नौकरशाही का जो ढर्रा है, वह राष्ट्र और नागरिकों के रिश्ते में अविश्वास पैदा करता रहा है। कोविड-19 के खिलाफ जंग में यह अविश्वास तीन अलग-अलग रूपों में देखा गया है।
पहला है प्रशासनिक संवाद, जिसके माध्यम से अंतहीन आदेश कानूनन लागू किए गए। नृवंशविज्ञानियों की मानें, तो अविश्वास की यह संस्कृति उपनिवेशवादी शासन-व्यवस्था की देन है। देश में स्थानीय नौकरशाही पर अपने शोध में मैंने भी नौकरशाही के रोजमर्रा के कामकाज पर ‘सरकारी आदेश’ का गहरा नियंत्रण देखा है। आदेशों का अनुपालन प्राथमिक तरीका है, जिसके माध्यम से वरिष्ठ अपने अधीनस्थों की निगरानी करते हैं। आदेशों का पालन न करने पर अन्य आदेशों और दंड का भी प्रावधान किया गया है। कोविड-19 का सामना करते हुए नौकरशाही आदेश देने के अपने उसी परिचित तरीके पर निर्भर दिखी। यह जनता से संवाद का उनका आम तरीका बन गया है, फिर चाहे इससे लोगों में भ्रम और खौफ ही क्यों न पैदा हो।
दूसरा है, राहत प्रतिक्रिया। ऐतिहासिक रूप से, अविश्वास की वजह से नौकरशाहों और नागरिकों के बीच रोजाना अनगिनत आदेश जारी होते हैं। आज राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज यह निर्धारित करने की कुंजी बन गए हैं कि कोई नागरिक राहत-उपायों के लाभ का पात्र है या नहीं। और यह दायित्व नागरिकों पर ही होता है कि वे इन दस्तावेजों को पेश करें और अपनी पात्रता साबित करें। अनेक नागरिकों के पास ऐसे दस्तावेजों का न होना ऐसा महत्वपूर्ण कारक है, जिसके आधार पर लॉकडाउन की चरम स्थिति में भी प्रवासी श्रमिकों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने में नौकरशाही खुद को असमर्थ बताती रही। ज्यादातर नागरिकों की मानें, तो राष्ट्र उनकी जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रहा, इसने अविश्वास की खाई को और गहरा किया।
तीसरा, स्वास्थ्य प्रतिक्रिया। इस मोर्चे पर विश्वास की कमी एक और बड़ी चुनौती बन गई है। चूंकि महामारी के प्रसार को थामने और इलाज को लेकर तमाम तरह की उलझनें होती हैं, इसलिए सार्वजनिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर जन-भागीदारी की जरूरत बढ़ जाती है। यह भागीदारी इसलिए भी अहम है, ताकि लक्षण का पता लगाकर जल्द ही जरूरतमंदों को इलाज की सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। लंबे समय तक मानव व्यवहार में बदलाव (मास्क का इस्तेमाल और शारीरिक दूरी का पालन) को सुनिश्चित करने के लिए सहभागिता बहुत जरूरी है। स्वास्थ्य अर्थशास्त्री जिष्णु दास एक साक्षात्कार में कहते हैं कि कोविड-19 के खिलाफ सरकार व लोगों को एक साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। कई संक्रामक रोगों के समय देश ऐसा करने में विफल रहा है। आज कोविड-19 हमारे सामने दोहरी चुनौती पेश कर रहा है।
पहली, इसमें कलंक व भय का दूर-दूर तक विस्तार हुआ है। मीडिया रोजाना बता रहा है कि समाज किस तरह कोविड-19 के मरीजों के साथ भेदभाव करता है। उनको लांछित किया जाता है। भारत की राजनीति ने इसे और बढ़ाने का काम किया है। तब्लीगी जमात की घटना में एक समुदाय विशेष को दोषी ठहराने से ऐसा माहौल बना, जिसमें रोगियों की देखभाल पर जोर देने की बजाय उन्हें कलंकित करने का चलन शुरू हो गया।
दूसरी, भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र लंबे समय से यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा है कि नागरिकों को सस्ती व गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने की क्षमता उसके पास है। विडंबना यह है कि अधिकतर भारतीयों का भरोसा अनौपचारिक निजी चिकित्सा क्षेत्र पर है। फिर भी, जब बात कोविड-19 की आती है, तो जांच से इलाज तक सरकार ही पूरी तरह जिम्मेदार दिखती है। यह जरूरी भी है। चूंकि संक्रामक रोगों में तमाम तरह के ऐसे बाहरी कारक होते हैं, जिनका बोझ गरीबों पर ही पड़ता है, इसीलिए इसमें सरकारी हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। मगर सरकार पर विश्वास की कमी के कारण बीमार लोग छिपने-बचने के प्रयास भी करते हैं, क्योंकि वे सरकारी अस्पतालों में इलाज नहीं कराना चाहते। यही वजह है कि दिल्ली जैसे शहर में महज इस फैसले ने तस्वीर बदल दी कि बिना लक्षण या कम लक्षण वाले मरीज घर में ही क्वारंटीन हो सकते हैं।
जाहिर है, सरकार इन तमाम चुनौतियों से बच नहीं सकती। जरूरी है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र पर लोगों के विश्वास को बढ़ाने की तरफ ध्यान दिया जाए। आदेशों के बार-बार प्रयोग, डाटा की कमी, केंद्र व राज्य स्तर पर निर्णय लेने में पारदर्शिता का अभाव आदि परस्पर विश्वास की राह की बड़ी बाधाएं हैं। इन्हें दूर करने की जरूरत है। समुदायों में विश्वसनीय रूप से पहुंच बनाने के लिए भी तंत्र को संजीदा प्रयास करने होंगे। धारावी में सरकार की यह कोशिश कारगर रही। मगर इन सफलताओं को भरोसे की कमी की व्यापकता के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है। यदि इसे सरकार और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ समझ लें, तो हम ऐसी टिकाऊ और समाजोन्मुखी दृष्टि को अपना सकेंगे, जिससे भारत कोविड-19 के खिलाफ कामयाब मुकाबला कर सकेगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)यामिनी अय्यर, अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च
रायपुर /शौर्यपथ / गोधन न्याय योजना के तहत गोबर खरीदी पर विपक्ष पार्टी भाजपा के वार पर पलटवार करते हुए प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने किसानों के हित में, मजदूरों के हित मे, पशुपालकों के हित मे गोबर खरीद रहे हैं तो रमन सिंह जी को तकलीफ होना स्वभाविक है, ईष्र्या होना स्वाभाविक है। रमन सिंह जी के कार्यकाल में तो एक नहीं अनेकों जगह करोड़ों रुपए का घोटाला गौशाला के नाम पर भाजपा नेताओं ने किया और गाय के मांस के लिए, गाय की चमड़ी के लिए गाय की हत्या का जघन्य कृत्य रमन सिंह जी के 15 साल के कार्यकाल में हुआ।
रमन सिंह जी यह बताएं कि उनको राज्य के खजाने की याद क्यों नहीं आई? मुंबई से करीना कपूर को सेल्फी खिंचवाने के लिए राज्य के खजाने का करोड़ों रूपए खर्च किए गए तब उन्हें राज्य की याद क्यों नहीं आई? डेढ़ सौ करोड़ रुपए वाले बजट वाले जनसंपर्क विभाग में रमन सिंह जी के प्रभारी मंत्री रहते हुए साढ़े 400 रू. खर्च किए गए, कांग्रेस के खिलाफ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जी उस समय प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे उनके खिलाफ साजिश रचने के लिए जनसंपर्क का पैसा बर्बाद किया गया तब रमन सिंह जी को राज्य के खजाने की याद क्यों नहीं आई?
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा है कि दरअसल रमन सिंह जी 2018 के चुनाव की हार के बाद भाजपा में अप्रासंगिक हो गए हैं भाजपा का कोई भी सच्चा कार्यकर्ता और नेता उनको पसंद नहीं कर रहा है पार्टी में अपनी जगह बनाए रखने के लिए रमन सिंह इस तरह की बयान बाजी कर रहे हैं और खबरों में बने रहना चाहते हैं
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
