August 04, 2026
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    शौर्यपथ

    शौर्यपथ

    गेजेट्स /शौर्यपथ / लॉकडाउन को दौरान कई लोग समय काटने के लिए अपने दोस्तों से बात-चीत करते रहते हैं और अगर आपको लगता है कि कुछ बातों को आप अपनें परिजन या भाई-बहनों से छिपाना चाहते हैं तो उसके लिए एक एप का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो आपकी स्क्रीन पर लिखे टेक्स्ट को दूसरों को पढ़ने से रोकता है।

    गूगल प्लेस्टोर पर मौजूद MaskChat - Hides Whatsapp Chat एक शानदार एंड्रॉयड एप है जिसे यूजर की चैटिंग को प्राइवेट रखने के लिए बनाया गया है। जब आप अपने स्मार्टफोन पर प्राइवेट चैट करते हैं, तब यह एप आपके चैट के उपर की स्क्रीन को डिजिटल पर्दे से छिपा देता हैं। इससे आपके आसपास के झांकने वाले पड़ोसी से आपके मैसेज प्राइवेट रखने में मदद मिलती हैं।

    अन्य चैटिंग एप के लिए भी कारगर
    MaskChat - Hides Whatsapp Chat एप सिर्फ व्हाट्सएप तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका इस्तेमाल फेसबुक मैसेंजर, वीचैट,हाइक और स्नैपचेट के लिए भी किया जा सकता है। इसके साथ ही पासवर्ड टाइप करते समय या बैंक की इनफॉर्मेशन टाइप करते समय अपनी स्क्रीन को हाइड करने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

    कैसे करें इस्तेमाल
    इस एप को डाउनलोड करने के बाद यूजर को स्क्रीन पर एक फ्लोटिंग मास्क चैट आइकॉन दिखाई देगा, जिस स्क्रीन को आप दूसरों से हाइड करना चाहते हैं, उस स्क्रीन पर इस आइकॉन को ऊपर से नीचे की ओर ड्रैग करें। अब एक डिजिटल पर्दा नीचे आ जाएगा, जो आपकी स्क्रीन को छिपा देगा और आप किसी भी शर्मिंदा पलों से बच सकते है जब आपके माता-पिता या बड़े आपके आसपास होते हैं।

    पर्दे की बढ़ा सकते हैं डार्कनेस
    इस एप में कंपनी की तरफ से दिए गए पर्दे की मोटाई औसतन होती है, जो आपको कम लग सकती है। इसके लिए आप पर्दे के दाईं ओर दिए गए तीन लाइन वाले विकल्प पर क्लिक कर सकते हैं। इससे स्क्रीन के बीच में तीन नए विकल्प आएंगे। उनमें से बीच वाले विकल्प की मदद से आप पर्दे की ब्राइटनेस को नियंत्रित कर सकते हैं। बंद करने के लिए क्रॉस आइकॉन पर क्लिक कर आप पर्दे को क्लोज कर सकते हैं, लेकिन फ्लोटिंग मास्केचैट आइकॉन को पीछे छोड़ देगा। गियर आइकॉन पर टैप कर आप थीम को बदल भी सकते हैं। थीम को सिलेक्ट करने के बाद उसके नीचें के Apply theme बटन पर टैप कर अप्लाई करें।

    धर्म संसार / शौर्यपथ / श्रावण गणेश चतुर्थी व्रत है। गणेश जी का व्रत करने वाले यह ध्यान रखें कि कृष्ण पक्ष में चतुर्थी रात में चंद्रोदय के समय रहनी चाहिए और शुक्लपक्ष में मध्याह्न में। इसमें उदया तिथि नहीं ली जाती है। हां, तृतीया के साथ चतुर्थी ले सकते हैं, लेकिन चतुर्थी के साथ पंचमी तिथि नहीं होनी चाहिए। समस्त देवी-देवताओं में प्रथम पूज्य गणेश जी की लीलाएं अत्यंत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने ही माता-पिता को सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्रदान की।

    दूर्वा गणेश जी को उसी तरह प्रिय है, जिस तरह से शिवजी को बेलपत्र और नारायण को तुलसी। गणेश विवेक हैं। विद्यावरिधि बुद्धिविधाता हैं। असल में जिसके पास विवेक होगा, उसी को सनातन धर्म के अनुसार आदिशक्ति दुर्गा, सूर्य, शिव और श्री हरि आदि पंचदेवों की अक्षुण्ण ऊर्जा प्राप्त होगी। गणेश हैं, तभी तो सृष्टि रची जा सकी। ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने से पहले उनकी पूजा की। विघ्न का डर तो रहा ही होगा, पर सकारात्मक ऊर्जा, विवेक संपन्नता की इच्छा भी रही होगी। इसलिए जहां गणेश हैं, वहीं समस्त देवी-देवता विराजमान हैं।

    कैसे करें गणेश चतुर्थी व्रत-
    लाल रंग के वस्त्र गणेश जी को पहनकर उन्हें बेलपत्र, अपामार्ग, शमीपत्र, दूर्वा अपर्ण करना चाहिए। धन की अच्छी स्थिति होने पर 21 लड्डू , 21 दूब, जामुन आदि के साथ फल, पंचमेवा, पान आदि तो होना ही चाहिए। 10 लड्डूओं का दान करना चाहिए। आरती आदि करके 'गणेश्वरगणाध्यक्ष गौरीपुत्र गजानन। व्रतं संपूर्णता यातु त्वत्प्रसादादिभानन।।' श्लोक का उच्चारण करते हुए प्रार्थना करें। गणेश चतुर्थी का व्रत करने वाले को उदय हुए चंद्रमा, श्री गणेश और चतुर्थी माता को गंध, अक्षत आदि के साथ अध्र्य अवश्य देना चाहिए। इसके बाद मीठा भोजन कर सकते हैं।

    गणेश चतुर्थी व्रत का महत्व-
    इस श्रावण कृष्ण चतुर्थी व्रत के बारे में कहा जाता है कि माता पार्वती जब शिव जी को पति के रूप में पाने के लिए तप कर रही थीं और शिवजी प्रस्न्न नहीं हो रहे थे, तब उन्होंने यह व्रत किया। व्रत करने के पश्चात उनका शिव से विवाह संपन्न हुआ। हनुमान ने सीता की खोज में जाने पर यह व्रत किया। रावण को जब राजा बलि ने पकड़ कर कैद कर लिया, तब रावण ने यह व्रत किया था। गौतम की पत्नी अहिल्या ने भी इस व्रत को किया था।

    गणेश चतुर्थी व्रत संकटों से बचाता है-
    यह व्रत कम से कम एक या तीन वर्ष करें। जिनका विवाह नहीं हो पा रहा है, उन्हें तो यह व्रत अवश्य करना चाहिए। शनि की साढे साती से पीड़ित राशियों-धनु, मकर, कुंभ और शनि की ढैया वाली राशियों -मिथुन और तुला वाले लोगों को भी यह व्रत संकटों से बचाता है।

     

    लाइफस्टाइल / शौर्यपथ / तपती गर्मी के बाद बारिश का मौसम तन और मन दोनों को सुकून देता है। लेकिन मानसून का मजा तब किरकिरा हो जाता है जब इस समय घरों में सीलन, फंगस और तरह-तरह के इंफेक्शन लोगों के लिए परेशानी का सबब बन जाते हैं। इस समय लोग वैसे ही कोरोना महामारी की वजह से बेहद डरे हुए हैं। ऐसे में खुद को सेहतमंद रखने के साथ अपने घर को भी संक्रमणमुक्त रखना बेहद जरूरी है। तो आइए जानते हैं आखिर कैसे बारिश के मौसम में अपने घर को सीलन और फंगस से रखें दूर।

    क्यों होती है घरों में सीलन-
    बरसात के मौसम में कीटाणु और सूक्ष्मजीव की संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। इसका मुख्य कारण थर्मल इंसुलेशन न होना, साफ-सफाई की कमी, घर में धूप-हवा का ठीक से न आना सीलन और नमी पैदा करता है। जिससे फंगस की समस्या भी देखने को मिलती है।

    सेहत को नुकसान-
    घर में सीलन होने की वजह से अल्टरनारिया, एस्परजिलस, पेनिसिलियम और क्लोडोस्पोलियम जैसी फंगल प्रजातियां पनपने लगती हैं। जिससे व्यक्ति को दमा, एलर्जी, डर्मिटाइटिस और राइनाइटिस के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

    सीलन और फंगस से घर को ऐसे रखें दूर-
    -सीलन की समस्या मानसून में अक्सर ज्यादा देखने को मिलती है। ऐसे में बाथरूम, टॉयलेट, बंद पड़े कमरे में, जहां फंगस, सीलन और कीट आसानी से पनप सकते हैं कीटनाशक छिड़काव और फ्यूमिगेशन करवाकर कीट और मच्छर,मक्खियों से छुटकारा पा सकते हैं।
    -किचन और बाथरूम जहां पानी का इस्तेमाल अधिक होता है और धूप नहीं पहुंच पाती, ऐसी जगह को सूखा रखने की कोशिश करें।
    -हफ्ते में एक दिन किचन की किसी अच्छे कीटनाशक से सफाई करें।
    -नमी , सीलन वाले कमरे में न सोएं।
    -प्राकृतिक रूप से घर में धूप को आने दें। घर की खिड़कियों को कुछ देर के लिए जरूर खोलकर रखें।

    -सीलन से पहले ही खराब हो चुकी दीवारों को ठीक करने के लिए दरारों में वॉटरप्रूफ चूना भरें। ऐसा करने से दोबारा उस जगह सीलन नहीं आएगी।

    -लौंग का इस्तेमाल करके भी आप घर की सीलन से निजात पा सकते हैं। इसके लिए आप लौंग और दालचीनी को करीब आधा घंटा पानी में डालकर छोड़ दें। आधे घंटे बाद इस पानी को उबालकर इसे रूम प्रेशनर की तरह प्रयोग करें।

     

    खाना खजाना / शौर्यपथ / राजस्थान दुनियाभर में न सिर्फ अपनी रंग-बिरंगी संस्कृति बल्कि अपने तीखे-चटपटे खानपान के लिए भी काफी फेमस है। राजस्थान का भोजन तीखा और मसालेदार होने के बावजूद विदेशी लोगों में भी काफी पसंद किया जाता है। मानसून का महीना चल रहा है तो क्यों न ट्राई की जाए राजस्थान की ट्रेडिशनल रेसिपी राजस्थानी बंजारा गोश्त।

    राजस्थानी बंजारा गोश्त बनाने के लिए लगने वाली सामग्री-
    मटन, सरसों का तेल, प्याज, लहसुन का पेस्ट, अदरक का पेस्ट, देगी मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, हल्दी पाउडर, गाढ़ा दही, धनिया बीज पीसकर भुना हुआ, लौंग, साबुत काली मिर्च, सूखी लाल मिर्च, दालचीनी छड़ी, काला नमक

    राजस्थानी बंजारा गोश्त बनाने की वि​धि-
    1- सबसे पहले कड़ाही में सरसों का तेल गर्म कर लें। अब उसमें करी पत्ता, काली मिर्च, लौंग, दालचीनी और सूखी लाल मिर्च डालकर एक मिनट के लिए चलाएं।
    2- अब कड़ाही में कटा हुआ प्याज डालकर उसे अच्छी तरह पका लें।
    3-प्याज पकने के बाद अब इसमें अदरक और लहसुन का पेस्ट डालकर उसे भी 5 मिनट के लिए अच्छी तरह से पका लें।
    4- कड़ाही में अब देगी मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, हल्दी पाउडर और काला नमक डालकर उसे 5 मिनट तक अच्छी तरह पकाएं।
    5- मटन के टुकड़ों को अब इस मसाले में डालकर 10-15 मिनट के लिए ढक्कन से कवर करके अच्छी तरह पकने दें।
    6-अब मटन में दही मिलाकर इसे और 10 मिनट तक पकाएं, जब तक कि मांस पककर तैयार न हो जाए।
    7- अब मटन को हरी मिर्च और अदरक के साथ गार्निश करके सर्व करें।

     

    खाना खजाना / शौर्यपथ / मानसून में हल्की-हल्की बारिश के बीच आपके हाथों में गर्म मसाला चाय के साथ कुरकुरे प्याज के पकौड़े से भरी एक प्लेट रखी हो, तो वाकई किसी के भी मुंह में देखकर पानी आ जाए। प्याज के पकौड़े ज्यादातर हर भारतीय घर में पंसद और बनाए जाते हैं। यह एक पॉपुलर स्ट्रीट फूड है, जो अचानक घर आए मेहमानों के लिए या फिर मानसून का मजा लेने के लिए अक्सर घरों में बनाएं जाते हैं। लेकिन कई बार लोगों की यह शिकायत रहती है कि उनके पकौड़े क्रिस्पी नहीं बनते, तो देर किस बात की आज आपको बताते हैं कैसे बनाएं जाते हैं मार्केट स्टाइल में क्रिस्पी प्याज के पकौड़े।

    प्याज के पकौड़े के लिए सामग्री-
    -2 प्याज-
    -¼ बाउल- बेसन
    -1½ टी स्पून-लाल मिर्च का पाउडर
    -1 टेबिल स्पून-चावल का आटा
    -¾ कप-हरा धनिया
    -¼ टी स्पून-हींग
    -स्वादानुसार-नमक
    -½ कप-पानी
    -2 टेबिल स्पून- तेल तलने के लिए

    प्याज के पकौड़े बनाने की विधि-

    प्याज के पकौड़े बनाने बनाने के लिए सबसे पहले दो प्याज लेकर उनके ऊपर और नीचे का हिस्सा काट लें। अब प्याज को छीलकर उसका ऊपरी सख्त हिस्सा भी काट लें। अब प्याज को दो टुकड़ों में कांट कर आधा-आधा करके पतले और लंबे टुकड़ों में कांट लें।

    अब कटे प्याज को एक बाउल में निकालकर इसकी लेयर्स निकाल लें। इसी बाउल में अब बेसन लेकर इसमें लाल मिर्च पाउडर, चावल का आटा, हिंग, नमक और कटा हुआ हरा धनिया डालकर सभी चीजों को अच्छे से मिक्स कर लें। अब बाउल में थोड़ा-थोड़ा पानी डालकर इसका एक गाढ़ा घोल बना लें।

    अब एक पैन में तेल गर्म करें। गर्म तेल के दो चम्मच इस बेसन के घोल में डालकर अच्छे से मिक्स करें। तेल गर्म होने पर अपने हाथों की मदद से, एक एक कर पकौड़े बना कर तेल में डालते जाएं। पकौड़ों को 2 मिनट तक मध्यम आंच पर तलने के बाद उन्हें पलट दें। पकौड़ों को तब तक तले जब तक यह दोनों ओर से गोल्डन ब्राउन न हो जाए। पकौड़ों को तेल से निकालकर, गर्मा-गर्म सर्व करें।

     

    खेल / शौर्य पथ / अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मनु साहनी ने वेस्टइंडीज के खिलाफ बुधवार (8 जुलाई) से शुरू हो रही टेस्ट सीरीज के दौरान जैविक रूप से सुरक्षित वातावरण तैयार करने के लिए इंग्लैंड एवं वेल्स क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) के प्रयासों की सराहना की। इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के बीच साउथम्पटन के एजिस बाउल में दर्शकों की गैरमौजूदगी में तीन टेस्ट मैचों की सीरीज की शुरुआत के साथ 117 दिन बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की वापसी होगी।

    कोरोना वायरस महामारी के कारण दुनिया भर में मार्च में खेल गतिविधियां बंद कर दी गईं थी, जिन्हें धीरे-धीरे शुरू किया जा रहा है। साहनी ने बयान में कहा, ''प्रतिभागियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठाने के ईसीबी के प्रयासों के लिए हम उन्हें धन्यवाद देना चाहते हैं।''

    117 दिन बाद आज होगी इंटरनैशनल क्रिकेट की वापसी, जानें सभी Facts

    बता दें कि कोरोना वायरस महामारी के बीच इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के बीच शुरू हो रही टेस्ट सीरीज के जरिये अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बहाल होगा, जो भविष्य में क्रिकेट की दशा और दिशा भी तय करेगा। क्रिकेट के सबसे पारंपरिक प्रारूप के जरिये खेल के नए युग का सूत्रपात होने जा रहा है। ऐसा युग जिसमें मैदान पर खिलाड़ियों में जोश भरने वाले दर्शक नहीं होंगे। खिलाड़ी गले नहीं मिल सकेंगे। हफ्ते में दो बार कोरोना जांच होगी और खिलाड़ी होटल से बाहर नहीं जा सकेंगे।

     

    मनोरंजन / शौर्यपथ / कॉमेडियन जॉनी लीवर की अभिनेता की बेटी जेमी लीवर बॉलीवुड में फैले पक्षपात और भाई-भतीजावाद के बहस पर अपना रिएक्शन दिया है। खुद एक स्टार किड होने के नाते उनका यह मानना है कि सभी स्टार किड्स को जन्म के विशेष अधिकारों के श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है क्योंकि बहुत से लोग अपने दम और अपने हुनर की वजह से बॉलीवुड में टिके हुए हैं। उनका कहना है कि बॉलीवुड में पक्षपात और भाई-भतीजावाद कीवर्ड नहीं है।

    मिड डे से बात करते हुए जेमी ने कहा कि मेरा मानना है कि सभी का अपना-अपना सफर है और मैं तुलना का कोई कारण नहीं देखती। सभी का अपना-अपना संघर्ष है। वह कहती हैं कि मैं खुद एक स्टार किड हूं, लेकिन जरूरी नहीं है कि आज जो लोग बॉलीवुड नेपोटिज्म की बात कर रहे हैं वह सभी स्टार किड्स पर लागू हो। क्योंकि बहुत से ऐसे स्टार किड्स हैं जिनके पास स्टार किड प्रिवलेज नहीं है। मेरे सफर ये बात तो बिल्कूल भी लागू नहीं होती है क्योंकि जहां मैं हूं वहां पक्षपात नहीं है, वहां कोई भाई-भतीजावाद नहीं है, वहां कुछ खास लोगों का पक्षपात है। जेमी ने आगे कहा कि उन्होंने कभी भी अपने पिता के नाम का इस्तेमाल ऑडिशन के लिए नहीं किया। उन्होंने कहा कि पिता जॉनी ने कभी उनके कोई फोन नहीं किया।

    अपने पिता जॉनी लीवर के काम करने की खूबी और फिल्म इंडस्ट्री में उनकी स्थिति के बारे में बताते हुए जेमी कहती हैं कि मेरे पिताजी ने अपना काम अपनी नौकरी के रूप में किया है, उन्होंने इसे अपना जीवन नहीं बनाया। वह काम पर गए, अपनी फिल्मों के लिए शूटिंग की और घर वापस आए, यही उनकी असली जिंदगी थी। उनका वास्तविक जीवन जो उनका परिवार था, उनके दोस्त, उनकी आध्यात्मिकता। हम कभी किसी फिल्मी पार्टियों का हिस्सा नहीं थे, हम कभी नहीं गए, हम कभी किसी समूह का हिस्सा नहीं थे। मेरे पिता कभी फिल्मी नहीं थे, मेरी मां, जैसा कि मैंने कहा, बहुत विनम्र बैकग्राउंड से आई थीं।

     

    नजरिया / शौर्यपथ कोरोना वायरस की वजह से करीब चार माह के व्यवधान के बाद इंग्लैंड और वेस्ट इंडीज के बीच टेस्ट मैच की शुरुआत के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की वापसी हो गई। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच 13 मार्च को सिडनी मैदान पर बिना दर्शकों के मैच खेले जाने के बाद से यह पहला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच है। क्रिकेट की वापसी होने के बाद अब निगाहें इस साल के आखिर में ऑस्ट्रेलिया में होने वाले टी-20 विश्व कप के स्थगन और आईपीएल के आयोजन की घोषणा पर लग गई हैं। आईसीसी बोर्ड की इस हफ्ते के अंत में होने वाली बैठक में विश्व कप के स्थगन की घोषणा तय मानी जा रही है। इसकी वजह क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का अब इससे ध्यान हटाकर सितंबर मध्य में इंग्लैंड के साथ लिमिटेड ओवरों की सीरीज आयोजित करने पर ध्यान केंद्रित करना है। कोरोना की वजह से ज्यादातर क्रिकेट बोर्डों की आर्थिक तौर पर कमर टूट चुकी है और वे खिलाड़ियों की फीस में खासी कटौती कर चुके हैं। इसलिए दुनिया के ज्यादातर क्रिकेटर हमेशा से टी-20 विश्व कप की जगह आईपीएल के आयोजन के पक्षधर रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें भाग लेना उनकी माली हालत को सुधार सकता है।
    अब सवाल यह है कि बीसीसीआई को यदि टी-20 विश्व कप की विंडो मिल भी जाती है, तो क्या वह अपने यहां इस टी-20 लीग को आयोजित करने की स्थिति में भी है? देश में कोरोना वायरस के लगातार पैर पसारने से तो नहीं लगता कि यहां इस समय आईपीएल आयोजन की स्थिति है और साल के आखिर तक इन हालात में बदलाव की भी संभावना नजर नहीं आ रही है। सभी क्रिकेट बोर्ड इस बात को अच्छे से जानते हैं कि आईपीएल का आयोजन करने से कोरोना के कारण बिगड़ी आर्थिक हालत पटरी पर आ सकती है। संयुक्त अरब अमीरात और श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड तो पहले ही आईपीएल के आयोजन अपने यहां कराने का प्रस्ताव बीसीसीआई को भेज चुके हैं। अब इसमें नया नाम न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड का भी जुड़ गया है। न्यूजीलैंड कोरोना से मुक्त होने वाला पहला देश भी है। अब यह बीसीसीआई को तय करना है कि साल 2009 की तरह क्या इस बार भी आईपीएल का आयोजन विदेश में किया जाए?
    इसमें कोई दो राय नहीं है कि न्यूजीलैंड में आईपीएल दर्शकों के साथ आयोजित किया जा सकता है, लेकिन यूएई और श्रीलंका में इसे आयोजित करने पर यह बात पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती। लेकिन न्यूजीलैंड में आईपीएल कराने के खिलाफ एक ही बात जाती है कि उसके और भारत के बीच समय में करीब साढ़े सात घंटे का फर्क है, इसलिए वहां भारतीय समयानुसार देर से देर दोपहर 12.30 बजे तक मैच शुरू कराए जा सकते हैं, लेकिन इस कारण भारत में दफ्तरों में काम करने वाले ज्यादातर लोग इन मैचों से नहीं जुड़ सकेंगे। इसके अलावा, वहां मैचों में भारतीय उपमहाद्वीप की तरह दर्शक भी नहीं जुट सकते। फिर, यूएई को 2014 में आईपीएल के कुछ मैच आयोजित करने का अनुभव है, तो श्रीलंका में आयोजन किफायती रह सकता है।
    बीसीसीआई को दुनिया भर के क्रिकेट बोर्डों में सबसे अमीर माना जाता है और इसमें आईपीएल की भी अहम भूमिका है। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि वर्ष 2018 से 2022 का मीडिया राइट्स करार स्टार स्पोट्र्स से 4,087 करोड़ रुपये का हुआ है। यही नहीं, बीसीसीआई टाइटल प्रायोजक, आधिकारिक पार्टनर्स, अंपायरों के प्रायोजक व स्ट्रेटजिक टाइम आउट प्रायोजकों के जरिए भी कमाई करता है। इसी तरह, कोई जीते या हारे, खूब कमाई होती है। इन वजहों से ही इस लीग से जुड़े लोग इसे रद्द करने के पक्ष में नहीं हैं। इनका मानना है कि कोरोना की वजह से लॉकडाउन हो चुकी क्रिकेट अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है।
    बीसीसीआई आईपीएल के आयोजन के संबंध में कोई भी घोषणा करने को लेकर देखो और इंतजार करो की नीति अपना रहा है। वह चाहता है कि पहले टी-20 विश्व कप के स्थगन की घोषणा हो और फिर चीनी कंपनियों के प्रायोजक होने का मामला सुलझे, उसके बाद ही आईपीएल के आयोजन को लेकर कोई घोषणा की जाए। वैसे बीसीसीआई सितंबर के आखिर से लेकर नवंबर की शुरुआत के बीच आईपीएल आयोजन करने का मन बना चुका है।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)मनोज चतुर्वेदी, वरिष्ठ खेल पत्रकार

     

    मेलबॉक्स / शौर्यपथ / से अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हुई है, तब से देश में कोरोना मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। अभी हम संक्रमितों के मामले में तीसरे सबसे बड़े देश हैं। बहुत सारे लोगों ने लॉकडाउन का मजाक उड़ाया था, परंतु अनलॉक में मरीजों की बढ़ती संख्या उन्हें माकूल जवाब दे रही है। गनीमत है कि हमारे यहां इस बीमारी के कारण मृत्यु-दर कम है, लेकिन इसका एक प्रभाव यह है कि लोग असावधान हो गए हैं। यह हाल तब है, जब स्वास्थ्य संसाधन के लिहाज से हमारी हालत बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे में, यदि सामुदायिक संक्रमण फैलता है, तो बीमारी पर काबू पाना काफी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए एक सच्चे नागरिक का हम फर्ज निभाएं और सुरक्षित रहने का हर तरीका अपनाएं। सजगता ही इसका निदान है।
    आनंद पाण्डेय, रोसड़ा

    हकीकत समझे नेपाल
    आज नेपाल जिस प्रकार चीन के इशारे पर भारत को आंखें दिखाने की हिमाकत कर रहा है, उसे इसका अंदाजा नहीं है कि चीन धीरे-धीरे उस पर कब्जे की कोशिश में है। आजाद भारत में पहली बार ऐसा हुआ है कि बेटी-रोटी के संबंधों के बीच दूसरी ओर से कंटीली तारों से सीमा-रेखा खींचे जाने की बात कही गई और भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का प्रयास किया गया। ऐसी स्थिति में भारत को ठोस कदम उठाना ही होगा। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत चीन कई देशों की अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमा चुका है। वह रह-रहकर हमें भी आंखें दिखाता है। ऐसे में, नेपाल को यह समझ लेना चाहिए कि चीन के प्रति दोस्ताना रवैया भविष्य में उसे परतंत्र बना सकता है। उसे अपनी संप्रभुता की रक्षा करनी चाहिए, ताकि उसका अस्तित्व स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में बरकरार रहे।
    बिन्नी कुमारी, सारण

    पीछे लौटा चीन
    वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पिछले लगभग दो महीनों से जो भारी तनाव बना हुआ था, उसमें अब काफी सुधार आया है और चीन की सेना वापस लौटने लगी है। यह एक सुखद खबर है, क्योंकि युद्ध से किसी भी देश का भला नहीं होता। भारत की जवाबी कार्रवाइयों और आर्थिक चोट के बाद चीन में यह नरमी आई है। दोनों देशों के बीच सामान्य रिश्ता बेहद जरूरी है, क्योंकि दोनों एशिया की सबसे महत्वपूर्ण ताकतें हैं। इनका आपस में टकराना इस पूरे उपमहाद्वीप में शांति के लिहाज से अच्छा नहीं होगा। इससे विश्व राजनीति पर भी असर पडे़गा। सबसे अच्छी बात यह है कि समय रहते बीजिंग को इस बात का एहसास हो गया और वह पीछे लौट गया।
    शुभम पांडेय गगन
    अयोध्या, फैजाबाद

    विवाद बनाम व्यापार
    किसी देश की अर्थव्यवस्था पर चोट करने से उसकी अकल ढीली पड़ जाती है। इसका ज्वलंत उदाहरण चीन है। वह भारत से टकराने की नीति से पीछे हट गया है। दरअसल, भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए उसके 59 एप पर पाबंदी लगा दी, साथ ही रेलवे ने चीन की कंपनियों को मिले ठेके रद्द कर दिए। हमारे इस सख्त रुख को देखकर चीन को यह बात समझ में आ गई कि भारत विवाद और व्यापार एक साथ नहीं करेगा। इसके बाद चीन पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में पीछे हटने लगा। इससे स्वाभाविक तौर पर वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बहाल हो सकेगी। इससे नेपाल के तेवर भी नरम पड़ जाएंगे। मानचित्र विवाद को उसने बेवजह ही तान दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के उकसावे में आकर वह ऐसा कर रहा है। चूंकि अब चीन को एहसास हो गया है कि भारत 1962 के दौर से काफी आगे बढ़ चुका है, इसलिए वह शायद ही हमसे टकराना चाहेगा। ऐसा होने पर नेपाल भी ढीला पड़ता जाएगा, क्योंकि उसे चीन का साथ शायद ही मिले।
    राकेश चौधरी, दरभंगा, बिहार

     

    सम्पादकीय लेख / शौर्यपथ / कोरोना महामारी ने अमेरिकी समाज और उसके शासन से जुडे़ कई मिथकों को ध्वस्त किया है। अमेरिका की केंद्रीय आव्रजन संस्था ‘इमिग्रेशन ऐंड कस्टम्स एनफोर्समेंट’ (आईसीई) का ताजा फैसला इसका नया उदाहरण है। आईसीई ने सोमवार को फरमान सुनाया कि अमेरिका में पढ़ रहे उन तमाम विदेशी छात्रों को देश छोड़ना पड़ेगा, जिनकी यूनिवर्सिटी ने आगामी सेमेस्टरों में ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था मुकम्मल कर ली है। यदि इसके बावजूद कोई छात्र अमेरिका में टिका रहा, तो उसे जबरन बाहर किया जाएगा। जाहिर है, इस फैसले का असर लाखों विदेशी विद्यार्थियों पर पडे़गा। खासकर भारत और चीन के छात्र इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे, क्योंकि सबसे ज्यादा इन्हीं दोनों देशों के विद्यार्थियों की तादाद है। यही नहीं, उन हजारों विद्यार्थियों के आगे भी फिलहाल अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है, जो सितंबर से नए अकादमिक-सत्र में भाग लेने के लिए अमेरिका पहुंचने वाले थे।
    इसमें कोई दोराय नहीं कि इस महामारी से निपटने में प्रशासनिक कमियों को लेकर अमेरिकी समाज में अंदरखाने काफी उबाल है। जल्द ही वहां राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में, ट्रंप प्रशासन अमेरिकी अवाम को अब यह दिखाना चाहता है कि उसे सिर्फ उनका ख्याल है। महामारी के बाद वह वीजा नियमों में कई बदलाव कर चुका है। मगर हकीकत यह है कि दुनिया में सबसे अधिक जान-माल का नुकसान उठाने के बावजूद अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठानों में कोरोना से निपटने को लेकर अब भी समन्वय की भारी कमी है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट महामारी के सवाल पर आज भी अलग-अलग नजरिया रखते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञ लगातार आगाह कर रहे हैं कि अमेरिका की स्थिति बेहद गंभीर है, और यह महामारी के बीचोबीच खड़ा है, पर राष्ट्रपति ट्रंप के बेहद करीबी लोग ही संक्रमण से बचाव के मान्य उपायों का मजाक उड़ाते फिर रहे हैं। वे मास्क पहनने की अनिवार्यता की भी खिल्ली उड़ाने से बाज नहीं आ रहे, जबकि ठोस नजीर सामने हैं कि जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने कैसे मास्क और फिजिकल डिस्टेंसिंग के जरिए इस घातक वायरस के प्रसार को काबू करने में सफलता पाई है। मगर सच्ची कोशिश और प्रतीकात्मक लड़ाई अमेरिकी समाज के दोहरेपन को अक्सर दुनिया के सामने ले आती रही है। कोरोना महामारी ने एक बार फिर इसे उजागर कर दिया है।
    ठीक है, हर सरकार अपने नागरिकों के हितों का ख्याल सबसे ऊपर रखती है, पर उसका यह भी फर्ज है कि अपनी भौगोलिक सीमा में दूसरे देशों के बाशिंदों के मानव अधिकारों की भी वह रक्षा करे। वैसे भी, ये विद्यार्थी शरणार्थी नहीं हैं, जिन्हें अमूमन हर देश एक बोझ समझता है। ये वे विद्यार्थी हैं, जिनसे अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने मोटी फीस वसूली है। एक ऐसे वक्त में, जब अंतरराष्ट्रीय सरहदें बंद हैं, तमाम उड़ानें रद्द हैं, ट्रंप प्रशासन को इन विदेशी छात्रों को उनके मुल्क तक सुरक्षित पहुंचाने की व्यवस्था करनी चाहिए। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उच्च शिक्षा उद्योग का अच्छा-खासा योगदान है। उसे सालाना करीब 37 अरब डॉलर की कमाई इससे हो रही है। मुश्किल समय के ऐसे आचरण भावी विद्यार्थियों को उससे विमुख भी कर सकते हैं। बहरहाल, इस नई स्थिति में देशों और सरकारों के लिए भी एक सबक है, अपने यहां ज्यादा से ज्यादा विश्व-स्तरीय संस्थान खड़े कीजिए।

     

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